दर्शन — कश्मीर शैव (त्रिक) दर्शन - भाग–14 : कश्मीर शैव दर्शन की आलोचनाएँ, सीमाएँ और समकालीन प्रासंगिकता
कश्मीर
शैव (त्रिक) दर्शन — चेतना, स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा, शिवाद्वैत और मानव-अनुभव का समग्र दार्शनिक अध्ययन
दर्शन
— भाग–14 : कश्मीर शैव दर्शन की आलोचनाएँ, सीमाएँ और समकालीन प्रासंगिकता
किसी
दर्शन की वास्तविक शक्ति
केवल उसके सिद्धान्तों की
व्यापकता से नहीं, बल्कि
इस बात से निर्धारित
होती है कि वह
आलोचना के सामने कितना
टिकता है। कश्मीर शैव
दर्शन ने परमशिव को
स्वप्रकाश चेतना, शक्ति को उसकी स्वाभाविक
अभिव्यक्ति, जगत को चेतना
की वास्तविक अभिव्यक्ति और मुक्ति को
प्रत्यभिज्ञा के रूप में
स्थापित किया। यह संरचना अत्यन्त
शक्तिशाली है, लेकिन इसके
साथ कई गंभीर दार्शनिक
प्रश्न भी उत्पन्न होते
हैं। यदि चेतना ही
परम वास्तविकता है, तो जड़
पदार्थ की स्वतंत्र प्रतीति
कैसे सम्भव है? यदि जीव
मूलतः शिव है, तो
अज्ञान उत्पन्न क्यों होता है? यदि
जगत शिव की शक्ति
है, तो दुःख, हिंसा
और अन्याय को कैसे समझा
जाए? यदि परमशिव सर्वथा
स्वतंत्र हैं, तो उनकी
शक्ति द्वारा बन्धन की स्थिति क्यों
उत्पन्न होती है? और
यदि प्रत्यभिज्ञा ही मुक्ति है,
तो क्या केवल आत्म-पहचान पर्याप्त है?
इन
प्रश्नों का सामना किए
बिना कश्मीर शैव दर्शन को
समझना अधूरा होगा। इसलिए इस भाग का
उद्देश्य न तो त्रिक
की प्रशंसा करना है और
न उसका खण्डन, बल्कि
उसकी दार्शनिक क्षमता, तर्कगत कठिनाइयों और समकालीन उपयोगिता का संतुलित परीक्षण
करना है।
पहली
आलोचना : क्या चेतना को ही परम वास्तविकता माना जा सकता है?
कश्मीर
शैव दर्शन का मूल प्रतिपादन
है कि परमशिव चैतन्यमय
हैं और चेतना ही
वास्तविकता की आधारभूमि है।
लेकिन
भौतिकवादी दर्शन इसके विपरीत प्रश्न
उठाता है।
मस्तिष्क
के क्षतिग्रस्त होने पर स्मृति
बदल जाती है। मस्तिष्क
के कुछ क्षेत्रों में
परिवर्तन होने पर व्यक्तित्व,
निर्णय-क्षमता और भावनाएँ प्रभावित
होती हैं। चेतना की
अवस्थाएँ भी मस्तिष्कीय अवस्थाओं
के साथ गहरे रूप
से जुड़ी दिखाई देती हैं।
तो
क्या चेतना मस्तिष्क की जैविक प्रक्रिया
से उत्पन्न नहीं होती?
कश्मीर
शैव दर्शन इसका उत्तर इस
प्रकार देगा कि मस्तिष्क
चेतना की अभिव्यक्ति का उपकरण हो सकता है, लेकिन चेतना का अंतिम अस्तित्वगत आधार नहीं।
लेकिन
यह उत्तर आधुनिक विज्ञान के स्तर पर
स्वतः सिद्ध नहीं होता। यही पहली
सीमा है।
त्रिक
एक metaphysical
thesis प्रस्तुत करता है; Neuroscience उसके
सामने empirical प्रश्न रखता है। दोनों
के बीच निर्णय के
लिए प्रमाण की प्रकृति पर
भी विचार करना होगा।
क्या
"चेतना"
और "मस्तिष्क" को उलट देना पर्याप्त उत्तर है?
यदि
कोई कहे— "मस्तिष्क चेतना उत्पन्न नहीं करता; चेतना
मस्तिष्क का उपयोग करती
है।"
तो
यह अपने आप में
प्रमाण नहीं है।
इसी
प्रकार कोई यह कहे—
"मस्तिष्क में परिवर्तन से
चेतना बदलती है; इसलिए चेतना
केवल मस्तिष्क है।"
यह
निष्कर्ष भी तार्किक रूप
से अनिवार्य नहीं है। क्योंकि correlation और identity एक
ही बात नहीं हैं।
कश्मीर
शैव दर्शन का महत्त्व इस
प्रश्न को खुला रखने
में है। लेकिन उसकी चुनौती भी
यही है कि उसे
आधुनिक empirical
evidence के साथ संवाद करते
हुए अपने metaphysical दावे को अधिक
स्पष्ट करना होगा।
बन्धन
की समस्या : यदि जीव शिव है तो बन्धन क्यों?
यह
कश्मीर शैव दर्शन की
सबसे गम्भीर दार्शनिक समस्याओं में से एक
है। यदि जीव वास्तव में
परमशिव ही है, तो
वह सीमित कैसे हो गया?
यदि
शिव सर्वज्ञ हैं, तो जीव
अज्ञानी क्यों है?
यदि
शिव सर्वशक्तिमान हैं, तो जीव
स्वयं को सीमित और
दुःखी क्यों अनुभव करता है?
त्रिक
यहाँ मल, विशेषतः आणवमल, मायीयमल और कार्ममल के
माध्यम से सीमितता की
व्याख्या करता है।
जीव
का मूल स्वरूप नष्ट
नहीं होता; उसकी चेतना संकुचित
होती है।
यह
उत्तर त्रिक की आन्तरिक प्रणाली
में अत्यन्त प्रभावशाली है।
लेकिन
आलोचक फिर पूछ सकता
है— यह संकुचन हुआ ही क्यों?
यदि
इसे शिव की स्वतंत्र
इच्छा अर्थात् स्वातन्त्र्य कहा जाए, तो
अगला प्रश्न होगा— क्या दुःख और
अज्ञान भी परमशिव की
इच्छा का परिणाम हैं?
यहीं
त्रिक को अपनी "लीला",
"स्वातन्त्र्य"
और "मल" की अवधारणाओं को
अत्यन्त सूक्ष्मता से समझाना पड़ता
है।
स्वातन्त्र्यवाद
और दुःख की समस्या
कश्मीर
शैव दर्शन का एक मूल
सिद्धान्त है— स्वातन्त्र्य।
परमशिव
किसी बाहरी कारण से बँधे
नहीं हैं। उनकी शक्ति
स्वतंत्र है।
लेकिन
यदि संसार शिव की स्वतंत्र
शक्ति का विस्तार है,
तो संसार में दुःख भी
उसी विश्व-व्यवस्था का हिस्सा है।
फिर
प्रश्न उठता है— क्या
परमशिव दुःख के लिए
भी उत्तरदायी हैं?
त्रिक
के भीतर इसका उत्तर
यह होगा कि परमशिव
की दृष्टि में सम्पूर्ण विश्व
चेतना की अभिव्यक्ति है
और सीमित जीव की दृष्टि
से दिखाई देने वाला दुःख
उसकी संकुचित चेतना से सम्बन्धित है।
लेकिन
नैतिक दर्शन की दृष्टि से
यह उत्तर अभी पूर्ण नहीं
माना जा सकता।
विशेषतः
निर्दोष व्यक्ति का दुःख, प्राकृतिक
आपदा, हिंसा और बालक की
पीड़ा जैसी घटनाएँ "चेतना
का खेल" कहकर समाप्त नहीं
की जा सकतीं।
इसलिए
आधुनिक नैतिक दर्शन के सामने त्रिक
की एक बड़ी चुनौती
है—
अद्वैत
को बनाए रखते हुए दुःख की नैतिक वास्तविकता को कैसे स्वीकार किया जाए?
बौद्ध
आलोचना : स्थायी आत्मा की आवश्यकता क्यों?
बौद्ध
दर्शन की अनेक धाराएँ
आत्मा की स्थायी सत्ता
पर प्रश्न उठाती हैं।
यदि
अनुभव निरन्तर परिवर्तनशील है, तो एक
स्थायी आत्मा की कल्पना क्यों
की जाए?
माध्यमिक
परम्परा किसी भी वस्तु
की स्वतंत्र स्वभाव-सत्ता पर प्रश्न उठाती
है।
यहाँ
कश्मीर शैव दर्शन से
मूलभूत मतभेद सामने आता है।
त्रिक
कहता है कि परिवर्तन
को जानने के लिए चेतना
आवश्यक है।
बौद्ध
दार्शनिक पूछ सकता है—
क्या
परिवर्तनशील अनुभव-प्रवाह को समझाने के
लिए किसी स्थायी आत्मा
की आवश्यकता वास्तव में सिद्ध हुई?
यही
वह स्थान है जहाँ दोनों
परम्पराओं के बीच अत्यन्त
गहरा दार्शनिक शास्त्रार्थ सम्भव है।
त्रिक
के लिए चैतन्य मूल है।
बौद्ध
के लिए स्थायी आत्मा
की स्थापना स्वयं एक अतिरिक्त दार्शनिक
प्रतिज्ञा हो सकती है।
अद्वैत
वेदान्त की सम्भावित आलोचना
अद्वैत
वेदान्त कश्मीर शैव दर्शन से
अत्यन्त निकट दिखाई देता
है, फिर भी उसकी
ओर से एक प्रश्न
उठ सकता है—
यदि
परम वास्तविकता अद्वितीय है, तो परमशिव
में शक्ति, स्वातन्त्र्य, इच्छा, ज्ञान और क्रिया जैसी
अनेक विशेषताओं को क्यों जोड़ा
जाए?
अद्वैत
की दृष्टि से परम ब्रह्म
को किसी प्रकार की
सक्रियता से जोड़ना उसे
उपाधियों से सम्बद्ध करने
का जोखिम पैदा कर सकता
है।
कश्मीर
शैव दर्शन इसका उत्तर देता
है कि स्वातन्त्र्य परमशिव से अलग कोई दूसरा तत्त्व नहीं है।
शक्ति
शिव से अलग नहीं
है।
इसलिए
क्रियाशीलता परम वास्तविकता पर
आरोपित गुण नहीं, बल्कि
उसकी स्वाभाविक प्रकृति है।
यहीं
दोनों अद्वैतों का मूल अन्तर
उभरता है।
न्याय
की आलोचना : प्रमाण कहाँ है?
न्याय
दर्शन प्रमाण और तार्किक परीक्षण
को अत्यन्त महत्त्व देता है।
यदि
कोई कहता है— "मैंने
परमचेतना का अनुभव किया।"
तो
न्याय पूछ सकता है—
यह किस प्रमाण से
सिद्ध है?
यदि
वह प्रत्यक्ष है, तो क्या
वह सभी के लिए
समान रूप से उपलब्ध
है?
यदि
वह आगम है, तो
आगम की प्रमाणिकता कैसे
स्थापित होगी?
यदि
वह अनुमान है, तो उसका
व्याप्ति-सम्बन्ध क्या है?
कश्मीर
शैव दर्शन प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम की
अपनी व्यापक प्रमाण-परम्परा के भीतर उत्तर
देता है और विशेष
रूप से आध्यात्मिक अनुभूति
को महत्त्व देता है।
लेकिन
आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति के सामने यह
प्रश्न फिर लौटता है—
व्यक्तिगत
आध्यात्मिक अनुभव को सार्वभौमिक ज्ञान में कैसे बदला जाए?
यह
समस्या आज भी पूरी
तरह हल नहीं हुई
है।
क्या
आध्यात्मिक अनुभव सत्य का प्रमाण है?
मानव
इतिहास में अनेक साधकों
ने ध्यान, समाधि, रहस्यात्मक अनुभव और एकत्व की
अनुभूति का वर्णन किया
है।
लेकिन
अलग-अलग धार्मिक परम्पराओं
के साधक इन अनुभवों
की अलग-अलग व्याख्या
करते हैं।
कोई
इसे ब्रह्मानुभूति कहता है।
कोई
निर्वाण।
कोई
ईश्वर-साक्षात्कार।
कोई
शून्यता।
कोई
mystical union।
इसलिए
अनुभव और उसकी व्याख्या
में अन्तर करना आवश्यक है।
कश्मीर
शैव दर्शन का अनुभव अत्यन्त
गम्भीर हो सकता है,
लेकिन यह प्रश्न बना
रहता है—
क्या
अनुभव स्वयं metaphysical
conclusion सिद्ध
करता है, या उसकी व्याख्या के लिए अलग दार्शनिक ढाँचा आवश्यक है?
यही
शोध का एक महत्वपूर्ण
क्षेत्र है।
36 तत्त्वों की समस्या
कश्मीर
शैव दर्शन ने चेतना से
पदार्थ तक 36 तत्त्वों की अत्यन्त विस्तृत
संरचना प्रस्तुत की।
यह
दार्शनिक दृष्टि से प्रभावशाली है।
लेकिन
आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में
इन 36 तत्त्वों को पदार्थ की
वैज्ञानिक संरचना समझना उचित नहीं होगा।
इन्हें
आधुनिक physics के particles, forces या dimensions के समान बताना
दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों
स्तरों पर त्रुटिपूर्ण होगा।
36 तत्त्व
मूलतः अनुभव, चेतना, subject-object संबंध और विश्व-अभिव्यक्ति की दार्शनिक संरचना हैं।
इस
प्रकार उनका मूल्य आधुनिक
विज्ञान के विकल्प के
रूप में नहीं, बल्कि
एक
phenomenological-metaphysical framework के
रूप में अधिक स्पष्ट
होता है।
स्पन्द
की वैज्ञानिक व्याख्या की सीमा
आज
कभी-कभी स्पन्द को
quantum vibration, cosmic energy या
universal frequency से
जोड़ दिया जाता है।
यह
आकर्षक भाषा हो सकती
है, लेकिन शोधपरक दृष्टि से सावधानी आवश्यक
है।
स्पन्द
कोई physics की measurable frequency नहीं है।
यह
चेतना की गतिशील स्वाभाविकता
की दार्शनिक अवधारणा है।
इसलिए—
स्पन्द = quantum
vibration कहना प्रमाणित निष्कर्ष नहीं है।
सही
दृष्टिकोण यह होगा कि
दोनों अलग क्षेत्रों की
अवधारणाओं के बीच संभावित
दार्शनिक संवाद खोजा जाए।
तन्त्र
की आलोचना और ऐतिहासिक प्रश्न
कश्मीर
शैव दर्शन तान्त्रिक परम्परा से गहराई से
जुड़ा हुआ है।
लेकिन
तन्त्र शब्द स्वयं अनेक
ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थों
से जुड़ा रहा है।
आधुनिक
शोध में इसलिए आवश्यक
है कि तन्त्र को
केवल चमत्कार, गुप्त साधना या बाहरी अनुष्ठान
के रूप में न
समझा जाए।
साथ
ही यह भी आवश्यक
है कि उसके सभी
दावों को केवल आध्यात्मिक
अधिकार के कारण सत्य
न मान लिया जाए।
ऐतिहासिक
आलोचना पूछेगी—
कौन-सा ग्रन्थ कब
रचा गया?
किस
परम्परा से प्रभावित था?
किस
प्रकार की सामाजिक संरचना
में विकसित हुआ?
किस
साधना का वास्तविक ऐतिहासिक
प्रमाण उपलब्ध है?
इस
प्रकार textual
criticism और
philosophical interpretation दोनों
आवश्यक हैं।
समकालीन
समाज में कश्मीर शैव दर्शन की प्रासंगिकता
इन
आलोचनाओं के बावजूद कश्मीर
शैव दर्शन की समकालीन उपयोगिता
कम नहीं होती।
आज
मनुष्य अत्यधिक बाहरी सूचना के बीच जी
रहा है।
उसकी
पहचान सामाजिक मीडिया, पेशे, उपभोग, राजनीतिक समूह, आर्थिक स्थिति और डिजिटल प्रोफाइल
से निर्मित होती जा रही
है।
ऐसे
समय में प्रत्यभिज्ञा का
प्रश्न अत्यन्त आधुनिक हो जाता है—
मैं वास्तव में कौन हूँ?
यदि
मेरी पहचान लगातार बदलती सामाजिक भूमिकाओं पर निर्भर है,
तो मेरे अस्तित्व का
आधार क्या है?
त्रिक
का उत्तर हमें भीतर की
चेतना की ओर लौटाता
है।
मानसिक
विखण्डन और प्रत्यभिज्ञा
आधुनिक
जीवन में मनुष्य की
पहचान अनेक भूमिकाओं में
विभाजित हो जाती है।
घर
में एक व्यक्ति। कार्यस्थल पर दूसरा।
सामाजिक माध्यमों
पर तीसरा। निजी जीवन में चौथा।
इन
सभी के बीच तनाव
पैदा हो सकता है।
प्रत्यभिज्ञा
का दर्शन यह नहीं कहता
कि इन भूमिकाओं को
छोड़ दो।
वह
कहता है कि अपनी
मूल चेतना को केवल इन
भूमिकाओं तक सीमित मत
समझो।
इस
अर्थ में प्रत्यभिज्ञा आधुनिक
identity crisis के लिए एक दार्शनिक
संवाद प्रस्तुत कर सकती है।
पर्यावरण
और शिव-दृष्टि
यदि
जगत केवल जड़ पदार्थ
नहीं, बल्कि चेतना की शक्ति की
अभिव्यक्ति है, तो प्रकृति
के प्रति मनुष्य का सम्बन्ध भी
पुनर्विचार योग्य हो जाता है।
नदी
केवल संसाधन नहीं। वन केवल लकड़ी नहीं।
पृथ्वी केवल संपत्ति नहीं।
वे
उसी विश्व-अभिव्यक्ति के अंग हैं
जिसमें मनुष्य भी स्थित है।
यह
दृष्टि आधुनिक ecological ethics के साथ संवाद
कर सकती है।
लेकिन
यहाँ भी सावधानी आवश्यक
है। आधुनिक environmental science
को त्रिक से सीधे सिद्ध
नहीं किया जा सकता।
हाँ,
त्रिक एक ऐसी दार्शनिक
संवेदना प्रदान कर सकता है
जिसमें प्रकृति के प्रति गहरा
अस्तित्वगत सम्मान विकसित हो।
AI युग में त्रिक की चुनौती
AI के
विकास ने चेतना और
बुद्धिमत्ता के प्रश्न को
फिर से केन्द्र में
ला दिया है।
यदि
मशीन भाषा बोल सकती
है, चित्र बना सकती है,
तर्क कर सकती है
और मनुष्य के भावनात्मक संकेतों
को पहचान सकती है, तो
क्या वह चेतन है?
कश्मीर
शैव दर्शन का "चैतन्यमात्मा" यहाँ एक महत्त्वपूर्ण
कसौटी प्रस्तुत करता है।
व्यवहारिक
क्षमता और आत्मप्रकाशी अनुभव
अलग हो सकते हैं।
लेकिन
त्रिक स्वयं कोई empirical AI
consciousness test नहीं
देता।
इसलिए
इसका योगदान प्रश्न को स्पष्ट करना
है, उसका वैज्ञानिक समाधान
प्रस्तुत करना नहीं।
कश्मीर
शैव दर्शन की सबसे बड़ी शक्ति
यदि
आलोचनाओं के बाद पूछा
जाए कि त्रिक की
सबसे बड़ी दार्शनिक उपलब्धि
क्या है, तो उत्तर
होगा—
उसने
चेतना को केवल ज्ञान का उपकरण नहीं, बल्कि स्वयं वास्तविकता की संरचना के केन्द्र में रखा।
वह
यह नहीं पूछता कि
चेतना वस्तुओं को कैसे जानती
है।
वह
इससे पहले पूछता है—
वस्तु, ज्ञाता और ज्ञान—तीनों की मूलभूमि क्या है?
यहीं
से प्रकाश, विमर्श, शक्ति, स्वातन्त्र्य और प्रत्यभिज्ञा की
पूरी संरचना विकसित होती है।
सबसे
बड़ी सम्भावित सीमा
और
इसकी सबसे बड़ी सीमा?
यह
कि इसकी मूल metaphysical प्रतिज्ञाएँ
आधुनिक empirical विज्ञान से सीधे सिद्ध
नहीं की जा सकतीं।
परमशिव,
सार्वभौम चैतन्य और चेतना की
विश्व-अभिव्यक्ति जैसे दावे अनुभव,
आगम और दार्शनिक तर्क
पर आधारित हैं।
इन्हें
वैज्ञानिक तथ्य के रूप
में प्रस्तुत करना उचित नहीं
होगा।
लेकिन
किसी metaphysical
proposition का
laboratory में सिद्ध न होना अपने
आप में उसका खण्डन
भी नहीं है।
इसलिए
त्रिक को उचित रूप
से दार्शनिक-आध्यात्मिक metaphysics के रूप में
पढ़ना चाहिए, न कि आधुनिक
विज्ञान की वैकल्पिक पाठ्यपुस्तक
के रूप में।
आलोचना
से बचना नहीं, दर्शन को परिष्कृत करना
कश्मीर
शैव दर्शन का भविष्य उसके
अंध-समर्थन में नहीं है।
यदि
इसे आधुनिक युग में जीवित
रहना है, तो इसे
कठिन प्रश्नों का सामना करना
होगा।
चेतना
और मस्तिष्क का सम्बन्ध। व्यक्तिगत अनुभव की
प्रमाणिकता। दुःख और नैतिकता की
समस्या। स्वातन्त्र्य और नियति का
सम्बन्ध। आत्मा और self-model का सम्बन्ध। AI और
कृत्रिम चेतना। प्रकृति और मानव के
सम्बन्ध।
इन
सभी प्रश्नों पर त्रिक से
संवाद हो सकता है।
लेकिन
संवाद तभी सार्थक होगा
जब श्रद्धा के साथ आलोचनात्मक
विवेक भी उपस्थित हो।
मुख्य
निष्कर्ष
कश्मीर
शैव दर्शन की शक्ति और
सीमा दोनों उसकी व्यापक चेतना-दृष्टि में निहित हैं।
वह परमशिव को स्वप्रकाश चेतना,
शक्ति को उसकी सृजनात्मक
स्वतंत्रता और जगत को
उसकी वास्तविक अभिव्यक्ति मानकर एक ऐसी समग्र
तत्त्वमीमांसा प्रस्तुत करता है जिसमें
आत्मा और विश्व के
बीच अन्तिम विभाजन नहीं रहता। लेकिन
इसी कारण उससे गम्भीर
प्रश्न भी पूछे जाते
हैं—यदि जीव शिव
है तो बन्धन क्यों
है, यदि विश्व शिव
की अभिव्यक्ति है तो दुःख
की वास्तविकता क्या है, यदि
चेतना मूल है तो
मस्तिष्क की भूमिका कैसे
समझी जाए और यदि
प्रत्यभिज्ञा मुक्ति है तो व्यक्तिगत
अनुभव को सार्वभौमिक सत्य
कैसे माना जाए। इन
प्रश्नों का सामना करने
पर त्रिक का मूल्य कम
नहीं होता; बल्कि उसका वास्तविक दार्शनिक
स्वरूप अधिक स्पष्ट होता
है। समकालीन युग में इसकी
सबसे बड़ी सम्भावना आधुनिक
विज्ञान का विकल्प बनने
में नहीं, बल्कि चेतना, आत्मता, अनुभव, नैतिकता और वास्तविकता के उन प्रश्नों को पुनर्जीवित करने में है जिन्हें विज्ञान अकेले हल नहीं कर सकता।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
- यदि
चेतना और मस्तिष्क के बीच सम्बन्ध अभी भी पूर्णतः स्पष्ट नहीं है, तो क्या भौतिकवाद को अन्तिम दार्शनिक निष्कर्ष मानना उचित है?
- यदि
जीव को शिवस्वरूप माना जाए, तो व्यक्तिगत दुःख और नैतिक उत्तरदायित्व की पर्याप्त व्याख्या कैसे की जा सकती है?
- क्या
आध्यात्मिक अनुभव को दार्शनिक प्रमाण मानने के लिए कोई सार्वभौमिक पद्धति विकसित की जा सकती है?
- क्या
कश्मीर शैव दर्शन आधुनिक चेतना-अध्ययन में एक वैकल्पिक metaphysical
framework दे सकता है, बिना स्वयं को विज्ञान घोषित किए?
अगले
भाग की भूमिका
अब
यह 15 भागों की यात्रा अपने
अंतिम पड़ाव पर पहुँचती है।
अंतिम भाग में कश्मीर
शैव दर्शन को केवल ऐतिहासिक
या सिद्धान्तगत प्रणाली के रूप में
नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण दार्शनिक
परम्परा के रूप में
पुनः देखा जाएगा। वहाँ
चैतन्यमात्मा, ज्ञानं बन्धः, उद्यमो भैरवः, शक्तिचक्रसन्धाने, प्रत्यभिज्ञा और शिव-शक्ति अभेद जैसी मूल धारणाओं
को एक व्यापक संरचना
में रखकर यह पूछा
जाएगा कि त्रिक वास्तव
में हमें क्या सिखाता
है। उसके बाद भारतीय
दर्शन में उसकी विशिष्ट
स्थिति, वैश्विक दर्शन में उसकी सम्भावित
भूमिका, आधुनिक चेतना-विमर्श में उसकी उपयोगिता
और भविष्य के शोध की
दिशाओं को निर्धारित किया
जाएगा। अंतिम निष्कर्ष यह तय करने
का प्रयास करेगा कि कश्मीर शैव
दर्शन को केवल एक
ऐतिहासिक शैव सम्प्रदाय के
रूप में पढ़ना पर्याप्त
है, या उसे चेतना
और मानव-अनुभव के एक स्वतंत्र दार्शनिक प्रतिमान के रूप में
भी पढ़ा जाना चाहिए।
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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