दर्शन —कश्मीर शैव (त्रिक) दर्शन - भाग–1 : पाशुपत से कश्मीर शैव तक

 कश्मीर शैव (त्रिक) दर्शनचेतना, स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा, शिवाद्वैत और मानव-अनुभव का समग्र दार्शनिक अध्ययन

दर्शनभाग–1 : पाशुपत से कश्मीर शैव तकएक नये शैव दर्शन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारतीय दर्शन के इतिहास में ऐसे अनेक अवसर आए जब किसी नई दार्शनिक परम्परा का उदय केवल इसलिए नहीं हुआ कि पुराने मत असत्य सिद्ध हो गए थे, बल्कि इसलिए कि मनुष्य के सामने नए दार्शनिक प्रश्न उपस्थित हो चुके थे। एक दर्शन अपने समय की जिज्ञासाओं का समाधान देता है, परन्तु समय बदलने पर नई समस्याएँ जन्म लेती हैं और तब एक नया दार्शनिक दृष्टिकोण विकसित होता है। कश्मीर शैव दर्शन का उदय भी इसी प्रकार समझा जाना चाहिए। यह पाशुपत परम्परा का विरोध नहीं है, बल्कि उसके बाद विकसित हुई चेतना-केंद्रित दार्शनिक यात्रा का स्वाभाविक और परिपक्व चरण है।

प्रश्न यह नहीं है कि पाशुपत दर्शन में क्या कमी थी। वास्तविक प्रश्न यह है कि जब पाशुपत दर्शन अनेक शताब्दियों तक प्रभावशाली रहा, तब भी भारत की बौद्धिक चेतना को एक नए शैव दर्शन की आवश्यकता क्यों अनुभव हुई? यही प्रश्न इस पूरी श्रृंखला का प्रारम्भिक बिन्दु है।

भारतीय शैव परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। वैदिक रुद्र से लेकर पुराणों के महादेव, आगमों के परमशिव और तांत्रिक परम्पराओं के सर्वव्यापी चैतन्य-स्वरूप शिव तक इसकी यात्रा निरन्तर चलती रही। इस दीर्घ विकासक्रम में पाशुपत परम्परा ने पहली बार शैव विचारधारा को व्यवस्थित दार्शनिक आधार प्रदान किया। उसने शिव को सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्थापित किया, जीव और बन्धन की समस्या का विश्लेषण किया तथा मोक्ष का एक सुसंगत मार्ग प्रस्तुत किया। यह भारतीय धार्मिक और दार्शनिक इतिहास की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी।

किन्तु दर्शन केवल परम्परा की रक्षा नहीं करता, वह नए प्रश्न भी उत्पन्न करता है। पाशुपत दर्शन में शिव सर्वोच्च हैं, जीव उनसे भिन्न है और बन्धन से मुक्त होकर शिव के समीप पहुँचना ही साधना का लक्ष्य है। यह व्यवस्था साधना के स्तर पर अत्यन्त प्रभावशाली थी, परन्तु समय के साथ कुछ ऐसे दार्शनिक प्रश्न सामने आए जिनका अधिक सूक्ष्म उत्तर अपेक्षित था।

यदि शिव सर्वशक्तिमान हैं, तो जीव उनसे पृथक क्यों प्रतीत होता है? यदि शिव ही जगत के कारण हैं, तो जगत को केवल बाहरी सृष्टि मानना पर्याप्त क्यों नहीं है? यदि मोक्ष शिव की प्राप्ति है, तो आत्मानुभव की वास्तविक प्रकृति क्या है? यदि चेतना सर्वोच्च सत्ता है, तो पदार्थ और चेतना का सम्बन्ध कैसे समझा जाए? और सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्नक्या शिव केवल उपासना का विषय हैं, या स्वयं प्रत्येक अनुभव की आधारभूत चेतना भी वही हैं?

यही वे प्रश्न थे जिनसे आगे चलकर कश्मीर शैव दर्शन का जन्म हुआ।

इस विकास को समझने के लिए उस समय के भारतीय बौद्धिक वातावरण को देखना आवश्यक है। लगभग सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच भारत में अद्वितीय दार्शनिक सक्रियता दिखाई देती है। एक ओर बौद्ध दार्शनिक ज्ञान, अनुभूति और चेतना पर अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे थे। योगाचार और विज्ञानवाद चेतना की प्रकृति पर गहन विमर्श कर चुके थे। दूसरी ओर अद्वैत वेदान्त ब्रह्म को एकमात्र सत्य मानकर जगत की नई व्याख्या प्रस्तुत कर रहा था। न्याय और मीमांसा ज्ञान के साधनों का सूक्ष्म परीक्षण कर रहे थे। सांख्य प्रकृति और पुरुष की द्वैत व्यवस्था को व्यवस्थित रूप दे चुका था।

ऐसे समृद्ध दार्शनिक वातावरण में शैव परम्परा के सामने भी यह चुनौती थी कि वह केवल धार्मिक आस्था तक सीमित रहे, बल्कि चेतना, अनुभव, आत्मबोध और विश्व की दार्शनिक संरचना का समग्र उत्तर प्रस्तुत करे।

यहीं से आगमिक और तांत्रिक साहित्य का महत्त्व बढ़ता है। आगमों में शिव केवल पूजनीय देवता नहीं रहते; वे स्वयं चेतना के अनन्त स्रोत के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। साधना का उद्देश्य बाहरी देवता की कृपा प्राप्त करना मात्र नहीं, बल्कि उसी सार्वभौमिक चेतना का प्रत्यक्ष अनुभव करना बन जाता है। यह परिवर्तन भारतीय दर्शन में अत्यन्त गहरा मोड़ था।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि कश्मीर शैव दर्शन का जन्म किसी एक ग्रन्थ या एक आचार्य की देन नहीं है। यह अनेक शताब्दियों तक विकसित हुए आगमिक, तांत्रिक और दार्शनिक चिन्तन का परिणाम है। इस परम्परा ने पूर्ववर्ती शैव मतों का सम्मान करते हुए भी एक नया प्रश्न उठायायदि परम सत्य चेतना है, तो क्या सम्पूर्ण विश्व उसी चेतना की अभिव्यक्ति नहीं है?

यहीं से शिव की धारणा भी परिवर्तित होती है। शिव अब केवल ब्रह्माण्ड के नियन्ता नहीं, बल्कि स्वयं प्रत्येक अनुभव के आधारभूत प्रकाश हैं। यह परिवर्तन केवल धार्मिक नहीं, दार्शनिक है। शिव को विश्व से बाहर स्थित सत्ता मानने के स्थान पर विश्व के अन्तःस्थित चैतन्य के रूप में समझना कश्मीर शैव दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता बनने वाली थी।

कश्मीर इस विकास के लिए उपयुक्त भूमि क्यों बना? इसका उत्तर केवल भूगोल में नहीं, बल्कि वहाँ की बौद्धिक संस्कृति में छिपा है। उस समय कश्मीर भारतीय ज्ञान-परम्पराओं का एक अत्यन्त सक्रिय केन्द्र था। यहाँ बौद्ध, वैदिक, शैव, तांत्रिक और साहित्यिक परम्पराएँ साथ-साथ विकसित हो रही थीं। संस्कृत विद्वत्ता, व्याकरण, काव्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र और दर्शनसभी का यहाँ अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। इस खुले बौद्धिक वातावरण ने संवाद की संस्कृति को जन्म दिया, जहाँ मतभेद संघर्ष का नहीं बल्कि दार्शनिक विकास का माध्यम बने।

यही कारण है कि कश्मीर शैव दर्शन ने विरोध की भाषा नहीं अपनाई। उसने बौद्धों से अनुभव की सूक्ष्मता सीखी, वेदान्त से अद्वैत की गंभीरता का संवाद किया, आगमों से साधना की परम्परा ग्रहण की और अपनी मौलिकता के आधार पर एक नया चेतना-दर्शन विकसित किया।

इस नए दर्शन का केन्द्र ईश्वरवाद नहीं बल्कि चैतन्य है। यहाँ यह प्रश्न गौण हो जाता है कि ईश्वर कहाँ हैं; अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह बन जाता है कि अनुभव किसके कारण सम्भव है। देखने वाला कौन है? जानने वाला कौन है? स्मरण, कल्पना, आनन्द, दुःख, प्रेम, भय, सौन्दर्य और आत्मबोधइन सभी अनुभवों की आधारभूमि क्या है? यदि प्रत्येक अनुभव के पीछे एक ही चेतना कार्य कर रही है, तो क्या वही परमशिव नहीं हैं?

यहीं कश्मीर शैव दर्शन भारतीय दर्शन में एक अनूठी दिशा प्रस्तुत करता है। यह संसार से पलायन का दर्शन नहीं बनता, बल्कि संसार को चेतना की अभिव्यक्ति के रूप में देखने का प्रयास करता है। विश्व यहाँ बन्धन का कारण नहीं, बल्कि चेतना के अनन्त विस्तार का क्षेत्र बन जाता है। आगे चलकर यही विचार स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा, प्रकाश-विमर्श, स्वातन्त्र्य और शिव-शक्ति जैसे सिद्धान्तों में विकसित होगा।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कश्मीर शैव दर्शन केवल दार्शनिक अमूर्तता तक सीमित नहीं है। इसमें अनुभव का अत्यन्त महत्त्व है। ज्ञान केवल तर्क से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आत्मानुभूति से पूर्ण होता है। यही कारण है कि इस परम्परा में दर्शन, योग, तन्त्र, सौन्दर्यशास्त्र, काव्य और ध्यानसभी एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। भारतीय बौद्धिक इतिहास में ऐसी समन्वयकारी दृष्टि विरल है।

यदि हम आधुनिक सन्दर्भ में देखें तो आज भी चेतना का प्रश्न विज्ञान, मनोविज्ञान और दर्शन के सबसे जटिल प्रश्नों में से एक है। तंत्रिका-विज्ञान मस्तिष्क की गतिविधियों का अध्ययन करता है, संज्ञान-विज्ञान अनुभव की प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास करता है, जबकि चेतना-अध्ययन यह पूछता है कि अनुभव का व्यक्तिपरक पक्ष उत्पन्न कैसे होता है। कश्मीर शैव दर्शन इन आधुनिक प्रश्नों का प्रत्यक्ष उत्तर नहीं देता, क्योंकि उसका ऐतिहासिक सन्दर्भ भिन्न है; किन्तु वह यह अवश्य कहता है कि चेतना को केवल किसी भौतिक प्रक्रिया का उपोत्पाद मानकर नहीं समझा जा सकता। चेतना स्वयं अस्तित्व का मूल आयाम है। यही कारण है कि आज विश्व के अनेक दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और चेतना-अध्येता इस परम्परा की ओर पुनः आकर्षित हो रहे हैं।

फिर भी सावधानी आवश्यक है। आधुनिक विज्ञान और कश्मीर शैव दर्शन की अवधारणाओं को समान घोषित करना उचित नहीं होगा। दोनों की कार्य-पद्धति, प्रमाण-प्रणाली और उद्देश्य अलग हैं। संवाद सम्भव है, किन्तु कृत्रिम समानता नहीं। यही संतुलित दृष्टि इस पूरी श्रृंखला का आधार रहेगी।

इस प्रथम भाग का निष्कर्ष यही है कि कश्मीर शैव दर्शन का उदय किसी सम्प्रदायगत प्रतिस्पर्धा का परिणाम नहीं था। यह भारतीय बौद्धिक परम्परा की उस स्वाभाविक यात्रा का अगला चरण था, जिसमें प्रश्न ईश्वर से आगे बढ़कर चेतना तक पहुँच चुका था। पाशुपत दर्शन ने शिव को सर्वोच्च सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया; कश्मीर शैव दर्शन आगे चलकर यह पूछेगा कि क्या वही शिव प्रत्येक अनुभव के भीतर स्वयं को प्रकाशित कर रहे हैं।

मुख्य निष्कर्ष

कश्मीर शैव दर्शन का उदय पाशुपत परम्परा के निषेध के रूप में नहीं, बल्कि उसके दार्शनिक विस्तार के रूप में हुआ। जब भारतीय दर्शन में चेतना, अनुभव और आत्मबोध के प्रश्न अत्यन्त सूक्ष्म रूप से उठने लगे, तब शैव परम्परा ने भी अपने चिन्तन को नई दिशा दी। इस नई दिशा में शिव केवल उपास्य देवता नहीं रहे, बल्कि समस्त अनुभव के आधारभूत चैतन्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यही परिवर्तन आगे चलकर त्रिक दर्शन की पहचान बना। इस प्रकार कश्मीर शैव दर्शन भारतीय दर्शन में चेतना-केंद्रित अद्वैत की एक मौलिक और अत्यन्त परिष्कृत अभिव्यक्ति के रूप में सामने आता है।

आज के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न

  1. यदि चेतना मूल वास्तविकता है, तो क्या पदार्थ की हमारी आधुनिक अवधारणाओं पर पुनर्विचार आवश्यक है?
  2. क्या आत्मबोध केवल धार्मिक अनुभव है, या मानव-चेतना की सार्वभौमिक सम्भावना?
  3. क्या विश्व को चेतना की अभिव्यक्ति के रूप में देखने से मनुष्य और प्रकृति के सम्बन्ध की नई व्याख्या सम्भव है?
  4. क्या आधुनिक चेतना-अध्ययन कश्मीर शैव दर्शन के साथ सार्थक दार्शनिक संवाद स्थापित कर सकता है?

अगले भाग की भूमिका

अब तक हमने केवल यह समझा कि कश्मीर शैव दर्शन की आवश्यकता क्यों अनुभव हुई। किन्तु यह नया दर्शन वास्तव में है क्या? "त्रिक" शब्द का क्या अर्थ है? इसे "शिवाद्वैत" क्यों कहा जाता है? आगम इस दर्शन में किस प्रकार प्रमाण और साधना दोनों का आधार बनते हैं? और यह वेदान्त, पाशुपत तथा अन्य शैव परम्पराओं से किस प्रकार भिन्न अपनी स्वतंत्र दार्शनिक पहचान निर्मित करता है? अगले भाग में हम इन्हीं मूल प्रश्नों के माध्यम से कश्मीर शैव दर्शन की आधारभूत संरचना को समझेंगे और उस बौद्धिक भूमि पर प्रवेश करेंगे जहाँ से आगे परमशिव, शक्ति, स्पन्द और प्रत्यभिज्ञा जैसे महान सिद्धान्त क्रमशः विकसित होते हैं।

 

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)

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