महाभारत - अध्याय 2.1 “इतिहास” शब्द का अर्थ : परंपरा, व्युत्पत्ति और अर्थ-संकट
अध्याय 2.1
“इतिहास” शब्द का अर्थ : परंपरा, व्युत्पत्ति और अर्थ-संकट
महाभारत को समझने की हमारी यात्रा अब एक ऐसे शब्द के सामने आ खड़ी हुई है, जिसे सामान्यतः बहुत सहज मान लिया जाता है—इतिहास।
हम कहते हैं— महाभारत इतिहास है।
लेकिन यह वाक्य तभी अर्थपूर्ण होगा जब पहले यह स्पष्ट किया जाए कि “इतिहास” से हमारा अभिप्राय क्या है।
यदि इतिहास का अर्थ आधुनिक अर्थ में केवल अतीत की घटनाओं का प्रमाण-आधारित, कालक्रमिक और आलोचनात्मक पुनर्निर्माण है, तो प्रश्न उठेगा कि प्राचीन भारतीय परंपरा में महाभारत को इतिहास कहे जाने का आशय क्या था।
इसलिए इस अध्याय की पहली आवश्यकता ही है— इतिहास शब्द को उसके भारतीय संदर्भ में समझना।
“इतिहास” : एक परिचित शब्द, लेकिन सरल नहीं
आज “इतिहास” सुनते ही हमारे सामने कुछ सामान्य धारणाएँ आती हैं—
अतीत में घटी घटनाएँ, उनका कालक्रम, राजाओं और युद्धों का विवरण, प्रमाण, अभिलेख, पुरातत्त्व, और उपलब्ध स्रोतों के आधार पर अतीत का पुनर्निर्माण।
आधुनिक इतिहास-विज्ञान में ये सब महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन प्राचीन भारतीय ग्रंथों में “इतिहास” का प्रयोग इसी आधुनिक अर्थ-संरचना में हुआ हो, ऐसा मान लेना उचित नहीं।
क्योंकि भारतीय परंपरा में अतीत का स्मरण केवल इस उद्देश्य से नहीं था कि— “फलाँ घटना किस वर्ष हुई?”
बल्कि अतीत से यह भी पूछा जाता था— “उस घटना से मनुष्य को क्या सीखना चाहिए?”
यहीं भारतीय इतिहास-बोध की एक विशिष्ट दिशा दिखाई देती है।
“इतिहास” और “इतिवृत्त” में अंतर
भारतीय परंपरा में अतीत को व्यक्त करने के लिए केवल एक ही शब्द नहीं था।
इतिवृत्त, आख्यान, उपाख्यान, पुराण, वंश, चरित आदि विभिन्न शब्द और विधाएँ अलग-अलग प्रकार की स्मृति और कथा को व्यक्त करती हैं।
इसलिए महाभारत को समझते समय यह मान लेना कि— इतिहास = अतीत की हर कथा भी उचित नहीं।
प्रश्न यह होना चाहिए कि किसी कथा को किस उद्देश्य से और किस प्रकार प्रस्तुत किया गया है।
महाभारत का विशेष महत्व इसी में है कि वह पूर्ववृत्त को धर्म, पुरुषार्थ और मानवीय निर्णय के साथ जोड़ देता है।
“इतिहास” की लोकप्रिय व्युत्पत्ति
इतिहास शब्द की एक अत्यंत प्रसिद्ध पारंपरिक व्याख्या इस प्रकार की जाती है— इति + ह + आस
अर्थात्— “ऐसा ही वास्तव में था।” इस व्याख्या के आधार पर इतिहास को अतीत की वास्तविक घटना के स्मरण से जोड़ा जाता है।
यह व्याख्या भारतीय जनमानस में अत्यंत प्रचलित है और इतिहास की पारंपरिक समझ को व्यक्त करने में उपयोगी भी है।
लेकिन शोध की दृष्टि से यहाँ एक आवश्यक सावधानी है।
इसे सीधे आधुनिक भाषावैज्ञानिक अर्थ में निश्चित व्युत्पत्ति मान लेना उचित नहीं होगा।
लोकप्रिय व्याख्या और वैज्ञानिक शब्द-व्युत्पत्ति दो अलग प्रश्न हैं।
इसलिए हमारे शोध में यह भेद बना रहेगा—
“इति ह आस” इतिहास की पारंपरिक अर्थ-व्याख्या है; इसे बिना अतिरिक्त भाषावैज्ञानिक प्रमाण के अंतिम व्युत्पत्ति नहीं माना जाएगा।
यह छोटा-सा अंतर शोध की विश्वसनीयता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
परंपरागत अर्थ फिर भी क्यों महत्वपूर्ण है?
यदि “इति ह आस” को आधुनिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से निश्चित व्युत्पत्ति न भी माना जाए, तब भी इसका सांस्कृतिक महत्व कम नहीं होता।
क्योंकि यह व्याख्या एक महत्वपूर्ण भारतीय मानसिकता को व्यक्त करती है— अतीत को स्मरण करना।
और केवल स्मरण करना नहीं— उसे इस विश्वास के साथ स्मरण करना कि उसमें मनुष्य के वर्तमान के लिए अर्थ निहित है।
इसलिए इतिहास यहाँ केवल सूचना नहीं। वह स्मृति है। और स्मृति केवल पीछे देखने का कार्य नहीं।
वह वर्तमान को समझने का माध्यम भी है।
इतिहास और स्मृति
आधुनिक इतिहासकार अतीत को प्रमाणों के आधार पर पुनर्निर्मित करता है।
स्मृति दूसरी प्रक्रिया है।
स्मृति अतीत को वर्तमान चेतना में जीवित रखती है।
महाभारत की संरचना में दोनों के बीच एक गहरा संबंध दिखाई देता है।
कुरुवंश की कथा इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि वह केवल बहुत पुरानी है।
वह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह बाद की पीढ़ियों के लिए— वंश की पहचान, धर्म के प्रश्न, सत्ता की समस्या, और मानव निर्णयों के परिणाम का स्मृति-स्रोत बन जाती है।
इस अर्थ में महाभारत का इतिहास-बोध स्मृतिमूलक है।
अतीत को वर्तमान के लिए पढ़ना
महाभारत का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि वह अतीत को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनने देता।
कुरुक्षेत्र में जो हुआ, उसका प्रश्न केवल यह नहीं— “किसने किसे हराया?”
बल्कि— “ऐसी स्थिति उत्पन्न क्यों हुई?” “किसके निर्णयों ने इसे जन्म दिया?” “धर्म कहाँ चूका?” “सत्ता और लोभ ने क्या किया?” “विजय के बाद क्या बचा?”
इसलिए अतीत वर्तमान के सामने एक दर्पण बन जाता है।
यही कारण है कि महाभारत का इतिहास-बोध नैतिक और दार्शनिक आयाम ग्रहण करता है।
इतिहास और उपदेश
महाभारत के संदर्भ में इतिहास को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार वह परंपरागत धारणा है जिसमें पूर्ववृत्त कथा और धर्मार्थकाममोक्ष का उपदेश साथ आते हैं।
इससे एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है। अतीत का वर्णन अपने आप में अंतिम प्रयोजन नहीं।
अतीत से— पुरुषार्थ-बोध उत्पन्न होना चाहिए।
इसलिए महाभारत में कथा और उपदेश अलग-अलग संसार नहीं हैं। कथा प्रश्न पैदा करती है।
उपदेश उस प्रश्न पर विचार करता है। और पाठक दोनों के बीच संबंध स्थापित करता है।
यदि इतिहास केवल तथ्य हो तो?
मान लीजिए हम इतिहास को केवल घटनाओं की सूची मान लें।
तब महाभारत में हमें मिलेगा— कौन राजा था। किसका जन्म कब हुआ। किसने किससे युद्ध किया। कौन मरा।
किसने राज्य प्राप्त किया। लेकिन इससे महाभारत का बहुत बड़ा हिस्सा अनावश्यक हो जाएगा।
क्योंकि फिर— गीता क्यों? विदुरनीति क्यों? भीष्म के धर्मोपदेश क्यों? यक्ष-प्रश्न क्यों? नल-दमयन्ती क्यों? सावित्री क्यों? मोक्षधर्म क्यों?
अर्थात् स्वयं महाभारत की संरचना इस बात के विरुद्ध जाती है कि इतिहास केवल घटनाओं का अभिलेख हो।
लेकिन क्या इसका अर्थ है कि महाभारत में तथ्य महत्वपूर्ण नहीं?
बिल्कुल नहीं। यह दूसरी अतिशयता होगी।
महाभारत में वंश, भूगोल, राजनीतिक संस्थाएँ, सामाजिक संबंध, युद्ध और राजसत्ता से संबंधित अनेक सूचनाएँ हैं।
वे ऐतिहासिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
लेकिन उनका ऐतिहासिक मूल्य निर्धारित करने के लिए अलग-अलग प्रमाणों की आवश्यकता होगी।
अतः हमारा सूत्र होगा— कथा में उपस्थित होना और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित होना दो अलग बातें हैं।
महाभारत का पाठ ऐतिहासिक अध्ययन का स्रोत हो सकता है।
लेकिन स्रोत होना और स्वयं आधुनिक अर्थ में इतिहास होना एक ही बात नहीं।
इतिहास : स्मृति और आलोचना के बीच
यहीं हमारे शोध का वास्तविक प्रश्न जन्म लेता है। क्या इतिहास— केवल प्रमाण है?
या— केवल स्मृति है?
या— दोनों के बीच कोई संबंध संभव है?
महाभारत हमें तीसरी दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करता है। उसमें स्मृति है। परंपरा है। वंश है। कथा है। धर्म है।
और घटनाओं की ऐतिहासिक स्मृति के संभावित अंश भी हैं।
लेकिन इन सभी को एक ही प्रमाण-स्तर पर रखना उचित नहीं। इसलिए महाभारत का अध्ययन करते समय हमें— स्मृति का सम्मान और प्रमाण की परीक्षा दोनों साथ रखने होंगे।
इतिहास का भारतीय प्रयोजन
भारतीय परंपरा में इतिहास के प्रयोजन को केवल अतीत का ज्ञान मानना अपर्याप्त होगा। अतीत का ज्ञान तभी सार्थक है जब वह वर्तमान मनुष्य को अपने आचरण के प्रति सजग करे।
इसीलिए महाभारत में पूर्वजों की कथा बार-बार धर्म के प्रश्नों से जुड़ती है। राजा के सामने पूर्व राजाओं के उदाहरण आते हैं।
युधिष्ठिर के सामने पूर्ववर्ती राजाओं और ऋषियों की कथाएँ आती हैं। किसी संकट में किसी पुराने चरित्र का आख्यान प्रस्तुत किया जाता है।
यहाँ इतिहास एक प्रकार से— जीवित नैतिक स्मृति बन जाता है।
इतिहास और अनुकरण
इतिहास का एक उद्देश्य यह भी हो सकता है कि मनुष्य अपने पूर्वजों के आचरण से सीख सके।
लेकिन महाभारत केवल अनुकरण की शिक्षा नहीं देता।
वह यह भी दिखाता है कि महान समझे जाने वाले पात्र भी कठिन निर्णयों में चूक सकते हैं।
भीष्म की महानता है, लेकिन उनकी सीमाएँ भी हैं।
युधिष्ठिर धर्मनिष्ठ हैं, लेकिन द्यूत में उनकी गंभीर भूल है।
कर्ण महान दानी और निष्ठावान है, लेकिन उसके निर्णयों में नैतिक जटिलता है।
इसलिए इतिहास यहाँ केवल— “महापुरुषों का अनुकरण करो” नहीं कहता।
वह पूछता है— “महान व्यक्तियों के निर्णयों की भी परीक्षा करो।”
यही महाभारत के इतिहास-बोध की आलोचनात्मक शक्ति है।
इतिहास और मानव-स्वभाव
महाभारत का एक और विशिष्ट पक्ष है।
उसका इतिहास राजाओं की सूची से अधिक मानव-स्वभाव का इतिहास बन जाता है। लोभ। अहंकार। ईर्ष्या। मोह। प्रतिशोध। करुणा। निष्ठा। भय। कर्तव्य। त्याग। इन सबके कारण इतिहास आगे बढ़ता है।
कुरुक्षेत्र केवल सेनाओं के टकराने से नहीं बना। उसके पीछे मनुष्यों के निर्णय थे।
इसलिए महाभारत का इतिहास-बोध हमें घटनाओं के पीछे छिपे— मानवीय कारणों को देखने के लिए बाध्य करता है।
इतिहास और धर्म
यहीं महाभारत का इतिहास धर्म के प्रश्न से जुड़ता है। यदि इतिहास केवल यह बताए कि— “यह हुआ,”
तो महाभारत की दृष्टि अधूरी समझी जाएगी।
वह आगे पूछता है— “यह क्यों हुआ?” और फिर— “इससे क्या सीखना चाहिए?” और अंततः— “मनुष्य को अब क्या करना चाहिए?”
यहाँ इतिहास— घटना → कारण → अर्थ → धर्म की दिशा में बढ़ता है। यही महाभारत की विशिष्टता है।
लेकिन सावधानी : इतिहास को नैतिक कथा में बदल देना भी उचित नहीं
यहाँ हमें अपनी दूसरी सीमा भी तय करनी होगी।
यदि हम महाभारत को केवल नैतिक शिक्षा का ग्रंथ बना दें, तो उसके ऐतिहासिक और सामाजिक आयाम छूट जाएँगे।
इसलिए यह कहना भी गलत होगा कि— “महाभारत में इतिहास केवल बहाना है और असली उद्देश्य धर्मोपदेश है।”
दोनों को एक-दूसरे के विरोध में रखने की आवश्यकता नहीं।
महाभारत की शक्ति ही इस बात में है कि— इतिहास-स्मृति और धर्म-विमर्श एक-दूसरे के भीतर काम करते हैं।
इतिहास की आधुनिक अवधारणा से पहला अंतर
अब एक प्रारंभिक अंतर स्पष्ट किया जा सकता है। आधुनिक इतिहास-विज्ञान सामान्यतः पूछता है— घटना कब हुई? कहाँ हुई? किन स्रोतों से इसकी पुष्टि होती है? कारण क्या थे? प्रमाण कितने विश्वसनीय हैं?
भारतीय इतिहास-परंपरा का महाभारतीय रूप इसके साथ एक और प्रश्न जोड़ता है— उस घटना का धर्म और मानव जीवन के लिए क्या अर्थ है?
इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय परंपरा को प्रमाण की आवश्यकता नहीं थी।
अर्थ यह है कि उसका इतिहास-बोध केवल प्रमाण-संग्रह तक सीमित नहीं था।
इसीलिए “इतिहास” का अनुवाद सावधानी से
अंग्रेजी का History और संस्कृत/भारतीय परंपरा का Itihāsa एक-दूसरे के पूर्ण पर्याय नहीं माने जाने चाहिए।
दोनों में अतीत का तत्व है। दोनों में घटनाओं का संबंध है।
लेकिन उनकी ज्ञानमीमांसीय और सांस्कृतिक भूमिकाएँ समान नहीं।
इसलिए आगे के अध्याय में हम “History” और “Itihāsa” के बीच इस अंतर को अधिक व्यवस्थित रूप से देखेंगे।
अभी के लिए इतना पर्याप्त है कि—
महाभारत को इतिहास कहने का अर्थ आधुनिक इतिहास की पूरी परिभाषा को उस पर आरोपित करना नहीं है।
पहला पद्धतिगत निष्कर्ष
इस उपाध्याय से हमारी शोध-पद्धति का पहला सिद्धांत निकलता है—
“इतिहास” शब्द को महाभारत के संदर्भ में उसके भारतीय अर्थ-संसार सहित पढ़ना होगा।
इसके लिए हमें चार स्तर अलग रखने होंगे—
शब्द का पारंपरिक अर्थ। ग्रंथ का आत्म-वर्णन। भारतीय इतिहास-बोध। आधुनिक इतिहास-विज्ञान।
इन चारों को मिलाने से भ्रम पैदा होगा।
इनका तुलनात्मक अध्ययन करने से महाभारत की ऐतिहासिकता का प्रश्न अधिक स्पष्ट होगा।
आगे की दिशा
अब हमारे सामने अगला प्रश्न है— यदि इतिहास केवल आधुनिक History नहीं है, तो भारतीय परंपरा में इतिहास, आख्यान और पुराण के बीच क्या संबंध था?
क्या ये तीनों अलग विधाएँ थीं? क्या इनके उद्देश्य अलग थे? और यदि अलग थे, तो महाभारत स्वयं इन परंपराओं के साथ किस प्रकार जुड़ता है?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महाभारत में इतिहास के साथ— आख्यान, उपाख्यान, वंश और पुराण-सदृश सामग्री भी निरंतर उपस्थित है।
इसलिए अगले उपाध्याय में हम इस प्रश्न की ओर बढ़ेंगे—
इतिहास, आख्यान और पुराण : भारतीय परंपरा में भेद और संबंध
वहाँ हमारा लक्ष्य किसी कृत्रिम वर्गीकरण को थोपना नहीं होगा, बल्कि यह देखना होगा कि भारतीय ग्रंथ-परंपरा स्वयं इन विभिन्न रूपों को किस प्रकार समझती और जोड़ती है।
— मुकेश श्रीवास्तव
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