महाभारत - अध्याय 2.3 महाभारत को “इतिहास” कहने के प्राचीन आधार : ग्रंथ का आत्म-साक्ष्य
अध्याय 2.3 में अब हम बाहरी इतिहास-विवाद से पहले महाभारत के आत्म-साक्ष्य को देखेंगे। यहाँ सबसे जरूरी सावधानी यह है कि “महाभारत स्वयं को इतिहास कहता है” जैसे निष्कर्ष को श्लोक, प्रसंग और पाठ-परंपरा के आधार पर अलग-अलग स्थापित किया जाए।
अध्याय 2.3
महाभारत को “इतिहास” कहने के प्राचीन आधार : ग्रंथ का आत्म-साक्ष्य
1. बाहरी प्रमाण से पहले ग्रंथ की अपनी आवाज
महाभारत की ऐतिहासिकता पर विचार करते समय सामान्यतः चर्चा तुरंत दो दिशाओं में चली जाती है।
एक ओर प्रश्न उठता है— कुरुक्षेत्र का युद्ध वास्तव में हुआ था या नहीं?
दूसरी ओर— महाभारत का वर्तमान पाठ कब बना?
दोनों प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इनसे पहले एक अधिक मूलभूत प्रश्न है—
महाभारत स्वयं अपने स्वरूप के बारे में क्या कहता है?
किसी भी ग्रंथ के अध्ययन में यह पहला पद्धतिगत कदम होना चाहिए कि उसके बारे में बाहरी निष्कर्ष निकालने से पहले उसकी अपनी आत्म-प्रस्तुति को समझा जाए।
महाभारत अपने को किस परंपरा में रखता है? उसका विषय क्या बताता है? उसका प्रयोजन क्या बताता है?
और वह अपने ज्ञान-मूल्य को किस प्रकार प्रस्तुत करता है?
इन्हीं प्रश्नों से महाभारत के “इतिहास” होने की पारंपरिक धारणा को समझने का मार्ग खुलता है।
महाभारत का आत्म-परिचय
महाभारत अपने प्रारंभिक और उपसंहारात्मक अंशों में अपने स्वरूप, विषय और महत्त्व के संबंध में अनेक महत्वपूर्ण संकेत देता है।
वह स्वयं को केवल किसी एक राजा की जीवनी या किसी एक युद्ध का विवरण नहीं बताता। उसके विषय का विस्तार अत्यंत व्यापक है।
इसी व्यापकता को व्यक्त करने वाला एक प्रसिद्ध श्लोक है—
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ। यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्॥
इसका सामान्य अर्थ है—
हे भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संबंध में जो यहाँ है, वही अन्यत्र भी हो सकता है; और जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है।
इस श्लोक को केवल महाभारत की प्रशंसा मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं।
यह उसके आत्म-बोध का महत्वपूर्ण संकेत है। महाभारत अपने को किसी सीमित विषय का ग्रंथ नहीं मानता।
वह मानव-जीवन के चार पुरुषार्थों को अपने भीतर समाहित करने वाला व्यापक ज्ञान-संसार होने का दावा करता है।
इतिहास की परिधि का विस्तार
यदि महाभारत केवल युद्ध का इतिहास होता, तो उसके लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इतनी व्यापक घोषणा आवश्यक नहीं थी।
यहाँ इतिहास का क्षेत्र स्वयं विस्तृत हो जाता है। मनुष्य का जीवन केवल युद्ध और राजनीति नहीं।
उसमें— नैतिकता है, अर्थव्यवस्था और सत्ता है, इच्छा और संबंध हैं, और अंततः मुक्ति का प्रश्न भी है।
महाभारत इन सभी को अपने कथात्मक संसार में जोड़ता है। इसलिए उसका “इतिहास” केवल— क्या हुआ?
का उत्तर नहीं देता।
वह आगे बढ़कर पूछता है— मनुष्य के जीवन में उस घटना का अर्थ क्या है?
“इतिहास” के रूप में आत्म-स्थितिकरण
महाभारत की परंपरा में इतिहास शब्द का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है।
विशेषतः आदि पर्व में इतिहास की परंपरा, उसके कथन और उसके श्रवण के प्रसंग मिलते हैं।
यहाँ हमें यह समझना होगा कि “इतिहास” का यह प्रयोग आधुनिक इतिहास-विज्ञान की परिभाषा प्रस्तुत नहीं करता।
लेकिन इससे एक बात स्पष्ट होती है—
महाभारत स्वयं को अतीत की कथा मात्र नहीं, एक विशिष्ट ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परंपरा का अंग मानता है।
इसलिए महाभारत की ऐतिहासिकता पर विचार करते समय उसके इस आत्म-स्थितिकरण को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
“भारत” और वंश-स्मृति
महाभारत की पहचान भरतवंश से जुड़ी है। यह केवल नाम की बात नहीं।
वंशावली और पूर्वज-स्मृति महाभारत की संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शांतनु से लेकर भीष्म, विचित्रवीर्य, धृतराष्ट्र, पांडु, कौरव और पांडव तक आने वाली वंश-श्रृंखला केवल पात्रों की सूची नहीं।
वह यह स्थापित करती है कि वर्तमान संघर्ष— एक दीर्घकालीन वंशीय इतिहास के भीतर घटित हो रहा है।
इसलिए महाभारत का युद्ध अचानक उत्पन्न हुई घटना नहीं बनता। उसके पीछे पीढ़ियों की स्मृति है।
कथावाचक की परंपरा
महाभारत की संरचना में एक और महत्त्वपूर्ण बात है—
कथा किसी एक क्षण में सीधे पाठक को नहीं सुनाई जाती।
वह कथन-परंपरा से आती है।
उग्रश्रवा सौति द्वारा कथन, शौनक आदि ऋषियों के समक्ष कथा का प्रस्तुतीकरण, वैशम्पायन द्वारा जनमेजय को भारत-कथा का कथन, और संजय द्वारा धृतराष्ट्र को युद्ध का वर्णन—ये सभी महाभारत की बहुस्तरीय कथन-व्यवस्था का हिस्सा हैं।
इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। महाभारत स्वयं को— स्मरण, श्रवण और पुनर्कथन की परंपरा में रखता है।
यह आधुनिक अर्थ में archival history नहीं है। यह संचरित स्मृति है।
जनमेजय का सर्पसत्र : अतीत का वर्तमान में पुनर्स्मरण
जनमेजय का सर्पसत्र महाभारत की कथा-रचना में विशेष महत्त्व रखता है। यह केवल कथा का मंच नहीं।
यह उस प्रक्रिया का प्रतीक है जिसमें एक पीढ़ी पूर्ववर्ती पीढ़ियों के इतिहास को सुनती है। जनमेजय स्वयं कुरुवंश का उत्तराधिकारी है।
उसके सामने उसके पूर्वजों की कथा रखी जाती है।
इस प्रकार— वंश-स्मृति वर्तमान सत्ता और वर्तमान मनुष्य तक पहुँचती है।
यहाँ इतिहास जीवित स्मृति के रूप में काम करता है।
वैशम्पायन और भारतकथा
जनमेजय के समक्ष वैशम्पायन द्वारा कही गई कथा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
यह हमें बताती है कि भारत की कथा केवल घटना नहीं रही। वह श्रवणीय परंपरा बनी।
घटना → स्मरण → कथन → श्रवण → पुनःस्मरण। यही प्रक्रिया महाभारत की कथात्मक संरचना में बार-बार दिखाई देती है।
इस दृष्टि से महाभारत का इतिहास-बोध एक प्रकार का— सांस्कृतिक स्मृति-संचरण है।
सौति की भूमिका : एक और स्मृति-स्तर
महाभारत का वर्तमान कथानक भी एक कथावाचक से दूसरे तक पहुँचता है। सौति शौनक और अन्य ऋषियों को कथा सुनाते हैं।
इससे महाभारत स्वयं एक ऐसा ग्रंथ बन जाता है जिसमें— कथा के साथ कथा-कथन का इतिहास भी उपस्थित है।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण शोध-सूत्र मिलता है। महाभारत केवल अतीत को नहीं सुनाता।
वह यह भी दिखाता है कि— अतीत किस प्रकार सुनाया और संरक्षित किया जाता है।
यह इतिहास-बोध को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
“श्रुति” और “स्मृति” के बीच महाभारत
भारतीय ज्ञान-परंपरा में श्रुति और स्मृति के बीच भेद अत्यंत महत्वपूर्ण है। महाभारत वेद नहीं है।
इसलिए इसे श्रुति के समान श्रेणी में रखना उचित नहीं। वह स्मृति-परंपरा से जुड़ा है।
इसी संदर्भ में महाभारत का महत्व समझना चाहिए।
स्मृति का अर्थ केवल भूलने के विपरीत याद रखना नहीं।
वह एक ऐसी परंपरा है जिसमें पूर्ववर्ती ज्ञान और अनुभव को बाद की पीढ़ियाँ ग्रहण करती हैं, व्यवस्थित करती हैं और पुनः प्रस्तुत करती हैं।
महाभारत इसी व्यापक स्मृति-संसार का एक महान उदाहरण है।
महाभारत का “इतिहास” होना क्या सिद्ध करता है?
यहाँ हमें एक बहुत आवश्यक सीमा निर्धारित करनी होगी। यदि महाभारत स्वयं को इतिहास कहता है, तो इससे यह सिद्ध होता है कि— भारतीय परंपरा ने उसे इतिहास की श्रेणी में समझा।
लेकिन इससे अपने आप यह सिद्ध नहीं होता कि— महाभारत में वर्णित प्रत्येक घटना आधुनिक ऐतिहासिक कसौटी पर प्रमाणित है। दोनों बातें अलग हैं।
पहली बात है— पाठ का आत्म-वर्णन।
दूसरी बात है— उस आत्म-वर्णन की बाहरी ऐतिहासिक परीक्षा।
हमारे शोध में दोनों को कभी एक नहीं किया जाएगा।
आत्म-साक्ष्य की सीमा
किसी ग्रंथ का अपने बारे में किया गया दावा महत्वपूर्ण है।
लेकिन कोई भी आत्म-दावा अपने आप बाहरी प्रमाण नहीं बन जाता।
यदि कोई ग्रंथ स्वयं को प्राचीन कहे, तो यह उसके आत्म-बोध का प्रमाण है।
लेकिन उसकी वास्तविक प्राचीनता निर्धारित करने के लिए बाहरी प्रमाण भी चाहिए।
इसी प्रकार महाभारत का स्वयं को इतिहास कहना हमें बताता है कि—
ग्रंथ और उसकी परंपरा स्वयं को किस रूप में समझती थी।
लेकिन युद्ध की तिथि, पाठ की विभिन्न परतों की तिथि या किसी विशिष्ट पात्र की ऐतिहासिकता के लिए हमें अलग प्रमाणों की आवश्यकता होगी।
यह अंतर पूरे शोध में बनाए रखना अनिवार्य है।
महाभारत की “सर्वज्ञानात्मक” घोषणा
“यदिहास्ति तदन्यत्र…” जैसे श्लोक की एक और विशेषता है। यह महाभारत के आत्मबोध को केवल इतिहास से आगे ले जाता है।
वह स्वयं को मानव जीवन के लगभग समस्त प्रमुख प्रश्नों को समाहित करने वाला ग्रंथ मानता है।
यहाँ हमें उसके इतिहास-बोध का एक गहरा पक्ष दिखाई देता है— इतिहास केवल अतीत की सूचना नहीं; वह मानव-अनुभव का भंडार है।
इसलिए महाभारत में इतिहास, धर्म और दर्शन अलग-अलग अध्यायों में बंद नहीं हैं। वे एक-दूसरे में प्रविष्ट हैं।
“इतिहास” और पुरुषार्थ
महाभारत के आत्म-वक्तव्य में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उल्लेख आकस्मिक नहीं।
भारतीय चिंतन में मनुष्य का जीवन चार पुरुषार्थों से समझा जाता है।
यदि महाभारत अपने को इन चारों का व्यापक ग्रंथ मानता है, तो उसका इतिहास-बोध भी केवल राजनीतिक इतिहास नहीं रह सकता।
वह— मानव जीवन का समग्र इतिहास-बोध बन जाता है। यही कारण है कि राजा के साथ ऋषि भी महत्त्वपूर्ण हैं।
युद्ध के साथ तपस्या भी। राजनीति के साथ मोक्ष भी। विवाह के साथ काम भी। दान के साथ अर्थ भी।
क्या यह इतिहास को “धर्मशास्त्र” बना देता है?
नहीं। - यहाँ फिर एक अतिशयता से बचना होगा। महाभारत में धर्म का अत्यधिक विस्तार है।
लेकिन वह केवल धर्मशास्त्रीय नियमों की पुस्तक नहीं। वह नियमों को जीवन की जटिल परिस्थितियों में रखता है।
इसीलिए द्यूतसभा, वनवास, युद्ध, राजधर्म और मोक्षधर्म सभी एक ही ग्रंथ-संसार में आते हैं।
इतिहास यहाँ धर्म से जुड़ता है, लेकिन उसमें विलीन नहीं हो जाता। “इतिहास” का अर्थ : केवल अतीत नहीं, पूर्ववृत्त
महाभारत के संदर्भ में एक उपयोगी कार्यकारी शब्द है— पूर्ववृत्त।
अर्थात् जो पहले घटित हुआ उसका कथन। लेकिन महाभारत का पूर्ववृत्त निष्प्राण नहीं।
उसके भीतर— निर्णय हैं, संघर्ष हैं, परिणाम हैं और उनसे उत्पन्न प्रश्न हैं।
इसलिए पूर्ववृत्त— वर्तमान के लिए अर्थपूर्ण अतीत बन जाता है।
ग्रंथ का आत्म-साक्ष्य और हमारा शोध
अब तक के आत्म-साक्ष्य से हम कुछ बातें पर्याप्त सावधानी के साथ कह सकते हैं।
पहला - महाभारत की अपनी परंपरा उसे इतिहास से जोड़ती है।
दूसरा - वह अपने विषय को अत्यंत व्यापक मानता है।
तीसरा - उसकी कथा वंश और पूर्वज-स्मृति से जुड़ी है।
चौथा - उसकी संरचना बहुस्तरीय कथन और श्रवण-परंपरा पर आधारित है।
पाँचवाँ - उसका इतिहास-बोध धर्म और पुरुषार्थ से अलग नहीं।
छठा -इन सबके बावजूद, ये आत्म-साक्ष्य आधुनिक अर्थ में प्रत्येक ऐतिहासिक घटना की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करते।
यही संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
तीन स्तरों का विभाजन
अब हमारे शोध में महाभारत के संबंध में तीन अलग प्रश्न स्पष्ट हो गए हैं।
स्तर 1 — परंपरागत सत्य - भारतीय परंपरा महाभारत को किस रूप में स्वीकार करती है?
स्तर 2 — पाठगत सत्य - महाभारत का उपलब्ध पाठ स्वयं अपने बारे में क्या कहता है?
स्तर 3 — ऐतिहासिक सत्यापन - आधुनिक इतिहास, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और अन्य स्वतंत्र प्रमाण क्या बताते हैं?
इन तीनों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। बल्कि—
तीनों को संवाद में रखकर ही महाभारत की ऐतिहासिकता का गंभीर अध्ययन संभव है।
एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष : महाभारत का आत्मबोध स्वयं शोध का विषय है
अक्सर ऐतिहासिकता के प्रश्न में हम केवल यह पूछते हैं— “महाभारत कितना ऐतिहासिक है?”
लेकिन इससे पहले एक और प्रश्न होना चाहिए— “महाभारत स्वयं इतिहास होने का अर्थ क्या समझता है?”
यह प्रश्न अधिक मूलभूत है।
क्योंकि यदि हम “इतिहास” की अपनी आधुनिक परिभाषा पहले ही महाभारत पर आरोपित कर देंगे, तो हम संभवतः उसके आत्मबोध को कभी समझ ही नहीं पाएँगे।
इसलिए शोध की सही दिशा होगी—
पहले भारतीय इतिहास-बोध को समझना, फिर महाभारत की ऐतिहासिकता का परीक्षण करना।
निष्कर्षमहाभारत का आत्म-साक्ष्य हमें किसी एक सरल निष्कर्ष तक नहीं ले जाता।
वह न तो हमें यह अधिकार देता है कि हम उसके प्रत्येक आख्यान को आधुनिक अर्थ में प्रमाणित इतिहास घोषित कर दें।
और न ही यह उचित है कि आधुनिक इतिहास की कसौटी अलग होने के कारण उसके इतिहास-बोध को अस्वीकार कर दिया जाए।
महाभारत की अपनी परंपरा में वह—
पूर्ववृत्त, वंश-स्मृति, कथात्मक परंपरा और धर्म-दर्शन से संयुक्त इतिहास-संसार है।
उसका इतिहास अतीत को वर्तमान से जोड़ता है। उसका आख्यान उस अतीत को जीवित बनाता है।
उसका धर्म उस अतीत से प्रश्न करता है। और उसका दर्शन उस प्रश्न को मानव-अस्तित्व तक ले जाता है।
इसलिए महाभारत के आत्म-साक्ष्य से निकलने वाला हमारा पहला निष्कर्ष है—
महाभारत को “इतिहास” कहे जाने की परंपरा उसके बाहरी ऐतिहासिक प्रमाणों से पहले उसके अपने आत्मबोध में निहित है।
लेकिन अब शोध का अगला और अधिक कठिन चरण सामने है।
यदि महाभारत अपने को इतिहास की परंपरा में रखता है, तो उसका इतिहास किस प्रयोजन के लिए है?
क्या उसका उद्देश्य केवल यह बताना है कि अतीत में क्या हुआ?
या इतिहास का उद्देश्य इससे आगे बढ़कर—
मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संबंध में शिक्षित करना भी है?
यहीं से अगला प्रश्न जन्म लेता है—
अध्याय 2.4 — इतिहास का उद्देश्य : केवल अतीत बताना या धर्मबोध कराना?
इस भाग में हम पहली बार महाभारत के इतिहास-बोध और पुरुषार्थ-बोध के संबंध को व्यवस्थित रूप से देखेंगे।
और यही वह बिंदु होगा जहाँ “इतिहास” एक मृत अतीत न रहकर जीवित नैतिक स्मृति के रूप में सामने आएगा।
— मुकेश श्रीवास्तव
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