महाभारत - अध्याय 2.4 महाभारत का काल-बोध : समय, युग और इतिहास की अवधारणा

अध्याय 2.4

महाभारत का काल-बोध : समय, युग और इतिहास की अवधारणा

इतिहास को समझने के लिए समय को समझना आवश्यक है

इतिहास का प्रश्न अंततः समय का प्रश्न है।

जो कुछ घटित हुआ, वह कब घटित हुआ?  किसके पहले?  किसके बाद? 

कितनी पीढ़ियों के अंतराल में?

और जिस अतीत को हम इतिहास कहते हैं, उसे वर्तमान से किस प्रकार जोड़ा जाता है?

आधुनिक इतिहास-बोध में समय सामान्यतः एक क्रमबद्ध रेखा के रूप में व्यवस्थित किया जाता है— 

अतीत → वर्तमान → भविष्य। 

घटनाओं को तिथियों, वर्षों, शताब्दियों और कालखंडों में रखा जाता है।

महाभारत का समय-बोध इससे अधिक जटिल है।

उसमें मानवीय जीवन का सीमित समय भी है और युगों तथा मन्वंतरों से जुड़ा अत्यंत विस्तृत काल भी।

इसलिए महाभारत को समझने के लिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि उसमें कौन-सी घटना पहले हुई और कौन-सी बाद में।

हमें यह भी पूछना होगा— महाभारत स्वयं “समय” को किस प्रकार अनुभव करता है?

वंश : समय को पीढ़ियों में देखना

महाभारत का काल-बोध समझने का सबसे स्वाभाविक प्रवेश-द्वार उसकी वंश-परंपरा है।

कुरु-कथा किसी एक पीढ़ी से आरंभ नहीं होती। उसके पीछे अनेक पूर्वज हैं। 

शांतनु के पीछे पूर्ववर्ती वंश है।

शांतनु से भीष्म और विचित्रवीर्य की पीढ़ी आती है।

फिर धृतराष्ट्र और पांडु।

फिर कौरव और पांडव।

इस प्रकार वर्तमान संघर्ष को समझने के लिए पाठक को पीछे लौटना पड़ता है।

यह समय को केवल वर्षों में नहीं, बल्कि— पीढ़ियों में देखने की पद्धति है।

वंशावली यहाँ केवल नामों का क्रम नहीं बनाती। वह वर्तमान को उसके अतीत में स्थित करती है।

पीढ़ीगत समय और ऐतिहासिक स्मृति

आधुनिक इतिहास किसी घटना को कह सकता है— “यह घटना अमुक शताब्दी में हुई।”

महाभारत का कथात्मक संसार अनेक बार किसी घटना को इस प्रकार स्थापित करता है— “यह उस पूर्वज के समय में हुआ था।”

यह अंतर छोटा दिखाई देता है, लेकिन इतिहास-बोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

पहले प्रकार में काल-गणना प्रधान है। दूसरे में वंशगत स्मृति

महाभारत में व्यक्ति अपने पूर्वजों से अलग नहीं है।

वह एक ऐसी परंपरा का उत्तराधिकारी है जिसकी स्मृति उसके वर्तमान आचरण को प्रभावित करती है।

इसलिए समय यहाँ केवल बीतता नहीं। वह— वंश के माध्यम से जीवित रहता है।

“पूर्व” का अर्थ

महाभारत में बार-बार पूर्वजों, पूर्व राजाओं और पूर्व घटनाओं की ओर लौटना मिलता है।

इसका एक गहरा अर्थ है।  अतीत समाप्त हो चुका है, लेकिन उसका प्रभाव समाप्त नहीं हुआ।

पूर्वजों के कर्म वर्तमान को आकार देते हैं। 

पूर्व निर्णयों के परिणाम अगली पीढ़ी को प्राप्त होते हैं।

और वर्तमान में लिया गया निर्णय भविष्य की पीढ़ियों को प्रभावित करता है।

इस प्रकार महाभारत में समय के तीनों आयाम— अतीत, वर्तमान और भविष्य एक-दूसरे से जुड़े हैं।

यह केवल कालक्रम नहीं, बल्कि उत्तराधिकार और परिणाम का समय है।

युग-बोध : समय का दूसरा स्तर

वंशगत समय के ऊपर महाभारत में एक व्यापक समय-संरचना भी है—युग

सत्य या कृत, त्रेता, द्वापर और कलि—ये केवल कालखंडों के नाम नहीं हैं।

इनके साथ धर्म की स्थिति, मानवीय आचरण और सामाजिक व्यवस्था के परिवर्तन की धारणाएँ भी जुड़ी हुई हैं।

इससे समय का एक दूसरा रूप सामने आता है। समय केवल आगे नहीं बढ़ रहा।

समय के साथ— धर्म की स्थिति भी बदल रही है। इस प्रकार काल केवल भौतिक अवधि नहीं रह जाता।

वह एक प्रकार का नैतिक समय भी बन जाता है।

द्वापर से कलि की ओर

महाभारत की परंपरा विशेष रूप से उस संक्रमण की स्मृति रखती है जिसमें कृष्ण के प्रस्थान और महाभारत-युद्ध के बाद एक युग का अंत और दूसरे का आरंभ माना जाता है।

यहाँ युद्ध केवल राजनीतिक घटना नहीं रह जाता। वह— युग-संधि का प्रतीक भी बनता है।

एक युग समाप्त हो रहा है। दूसरे की शुरुआत हो रही है।

इस दृष्टि से महाभारत का युद्ध एक कालखंड के भीतर घटित घटना होने के साथ-साथ काल-परिवर्तन की सीमा-रेखा भी बन जाता है।

युग और इतिहास में सावधानी

यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।

यदि हम युगों को आधुनिक इतिहास की तरह निश्चित वर्षों में बदलने लगें, तो हम दो अलग काल-प्रणालियों को मिला देंगे।

युग की अवधारणा मुख्यतः भारतीय धार्मिक-ब्रह्मांडीय समय-संरचना का हिस्सा है।

आधुनिक इतिहास की कालगणना अलग प्रकार के प्रमाणों पर आधारित होती है।

इसलिए— युग-बोध को सीधे आधुनिक chronology में बदलना उचित नहीं।

यह कहना कि “द्वापर = अमुक निश्चित ऐतिहासिक वर्ष” अपने आप में ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं है।

ऐसी गणना के लिए स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक होंगे।

चक्रीय समय की धारणा

युगों की व्यवस्था भारतीय चिंतन में समय की एक चक्रीय संरचना की ओर संकेत करती है।

सृष्टि होती है। काल चलता है। युग आते हैं। युग समाप्त होते हैं।

फिर एक व्यापक चक्र में पुनः परिवर्तन होता है।

इस दृष्टि में समय केवल एक ऐसी सीधी रेखा नहीं है जिसका एक ही प्रारंभ और एक ही अंतिम बिंदु हो।

यहाँ समय में— आवर्तन का तत्व भी है।

लेकिन महाभारत को केवल “चक्रीय समय” का ग्रंथ कहना भी पर्याप्त नहीं होगा।

क्योंकि उसके भीतर विशिष्ट वंश और विशिष्ट घटनाओं का क्रम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इसलिए उसके समय-बोध में— चक्र और क्रम दोनों साथ दिखाई देते हैं।

चक्र और क्रम : महाभारत की जटिलता

यही महाभारत के काल-बोध की विशेषता है। एक ओर— युगों का व्यापक चक्र।

दूसरी ओर— कुरुवंश की पीढ़ियों का क्रम।

और इनके भीतर— व्यक्तियों के जीवन की सीमित अवधि।

इस प्रकार महाभारत में कम-से-कम तीन स्तरों का समय देखा जा सकता है—

1. मानवीय समय - जन्म, जीवन, मृत्यु और पीढ़ियाँ।

2. वंशगत समय - राजवंशों और पूर्वजों की दीर्घ परंपरा।

3. युग-ब्रह्मांडीय समय - युग, मन्वंतर और व्यापक काल-चक्र।

इन तीनों को एक ही पैमाने से मापना संभव नहीं।

कथा का समय और ऐतिहासिक समय

महाभारत की कथा में एक और महत्वपूर्ण विशेषता है—कथन का समय और घटना का समय अलग हैं।

घटना पहले घटित हुई।  फिर उसे किसी ने देखा या जाना।  फिर किसी ने उसे सुनाया। फिर किसी दूसरी पीढ़ी ने सुना। फिर वह पुनः कही गई।

इस प्रकार— घटना का समय और कथा के कथन का समय एक नहीं है।

महाभारत की बहुस्तरीय कथन-व्यवस्था को समझने में यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

एक घटना अतीत में है, लेकिन उसका कथन वर्तमान में हो रहा है। इस प्रकार अतीत— वर्तमान कथन में पुनर्जीवित होता है।

स्मृति समय को कैसे बदलती है?

जब कोई घटना एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है, तो वह केवल “समय के भीतर” नहीं रहती।

वह नई पीढ़ी के लिए नए अर्थ ग्रहण कर सकती है।

महाभारत की कथात्मक परंपरा में यही प्रक्रिया दिखाई देती है।

कुरुवंश का अतीत जनमेजय के लिए केवल बीती हुई बात नहीं।

वह उसके अपने वंश का अतीत है।  इसलिए वह अतीत वर्तमान में अर्थपूर्ण बना रहता है।

यहाँ इतिहास का संबंध स्मृति से है, लेकिन अब हमारा ध्यान स्मृति की सामान्य चर्चा पर नहीं, बल्कि उसके कालगत कार्य पर है— स्मृति अतीत को वर्तमान में उपस्थित करती है।

परिणाम का समय

महाभारत के काल-बोध में एक और महत्वपूर्ण तत्व है—परिणाम

किसी कर्म का परिणाम तत्काल नहीं आता।

एक निर्णय वर्षों बाद फल दे सकता है। 

किसी पिता का निर्णय पुत्रों को प्रभावित कर सकता है।

किसी राजा की नीति आने वाली पीढ़ियों का जीवन बदल सकती है।

इस प्रकार कारण और परिणाम के बीच समय का अंतर महाभारत की कथा में महत्वपूर्ण है।

यही कारण है कि महाभारत का समय केवल “घटना कब हुई” का प्रश्न नहीं।

वह यह भी पूछता है— किस घटना का परिणाम कब प्रकट हुआ?

इस दृष्टि से उसका काल-बोध गहरे रूप से कारणात्मक है।

नियति और समय

महाभारत में नियति का प्रश्न भी समय से जुड़ता है।

कई बार पात्र भविष्य की किसी संभावित परिणति से परिचित हैं।

कहीं भविष्यवाणी है। कहीं शकुन हैं। कहीं वरदान और शाप हैं। कहीं कर्म के भविष्यगत परिणाम की धारणा है।

लेकिन इन सबको एक ही प्रकार की ऐतिहासिक भविष्यवाणी मानना उचित नहीं।

इनका साहित्यिक, धार्मिक और दार्शनिक कार्य अलग-अलग हो सकता है।

हमारे लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि महाभारत का मनुष्य अपने वर्तमान को— भविष्य के परिणामों से काटकर नहीं देखता।

काल और धर्म

महाभारत में धर्म की समस्या भी समय से स्वतंत्र नहीं।

जो निर्णय एक परिस्थिति में उचित हो सकता है, वही दूसरी परिस्थिति में कठिन हो सकता है।

यही कारण है कि धर्म को केवल स्थिर नियमों से नहीं समझा जा सकता।

समय, परिस्थिति, पात्र और परिणाम—सभी निर्णय को प्रभावित करते हैं।

यहाँ काल-बोध धर्म-विवेक से जुड़ता है। 

लेकिन इसे हम अभी विस्तार से नहीं खोलेंगे, क्योंकि धर्म की सूक्ष्मता हमारे शोध के आगे के हिस्सों का स्वतंत्र विषय है।

इस भाग के लिए इतना पर्याप्त है कि— महाभारत का समय नैतिक रूप से निष्प्रभावी समय नहीं है।

क्या महाभारत में कालक्रम है?

हाँ—लेकिन आधुनिक अर्थ के कालक्रम जैसा पूर्ण और एकरेखीय कालक्रम नहीं।

महाभारत में घटनाओं का क्रम है। वंश-क्रम है। पीढ़ियों का क्रम है। युद्ध से पहले और युद्ध के बाद की स्पष्ट अवस्थाएँ हैं।

लेकिन साथ ही कथा में— दीर्घ वंश-स्मृतियाँ, पूर्वकथाएँ, उपाख्यान, युग-चक्र, और ब्रह्मांडीय समय भी उपस्थित हैं।

इसलिए महाभारत को केवल chronological narrative समझना उसके समय-बोध को छोटा कर देगा।

आधुनिक इतिहास और महाभारत का काल-बोध

आधुनिक इतिहासकार के लिए किसी घटना की तिथि अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

वह पूछता है— घटना किस वर्ष हुई? फिर उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उस तिथि का परीक्षण करता है।

महाभारत में समय का एक अलग प्रश्न भी है— 

यह घटना किस वंश में हुई?  किस युग में हुई? उससे पहले क्या हुआ था? उसके बाद क्या हुआ? उसका परिणाम किस पीढ़ी तक पहुँचा?

अतः दोनों दृष्टियों में “समय” है, लेकिन समय को व्यवस्थित करने की प्राथमिकता अलग हो सकती है।

यही अंतर आगे महाभारत की ऐतिहासिकता पर विचार करते समय ध्यान में रखना होगा।

काल-बोध को तिथि-निर्धारण से अलग रखना

यह इस भाग का सबसे महत्वपूर्ण पद्धतिगत निष्कर्ष है।

काल-बोध का अर्थ है— कोई संस्कृति समय को किस प्रकार समझती है।

कालक्रम का अर्थ है— घटनाओं को क्रम में रखना।

तिथि-निर्धारण का अर्थ है— किसी घटना के लिए विशिष्ट समय निर्धारित करना।

और ऐतिहासिकता का प्रश्न है—                                                                                                                        उस घटना को स्वतंत्र प्रमाणों के आधार पर ऐतिहासिक रूप से किस सीमा तक स्वीकार किया जा सकता है।

ये चारों एक ही बात नहीं हैं।

महाभारत के युग-बोध से सीधे युद्ध की तिथि सिद्ध नहीं होती।

वंश-क्रम से भी स्वतः निश्चित काल नहीं निकलता।

और किसी घटना का कथात्मक क्रम उसकी आधुनिक ऐतिहासिक तिथि का प्रमाण नहीं बन जाता।

यह भेद आगे के शोध के लिए अनिवार्य होगा।

महाभारत का समय : केवल अतीत नहीं

अब तक के विवेचन से एक व्यापक चित्र सामने आता है।

महाभारत में समय—

जीवन का समय है। वंश का समय है। युग का समय है। कर्मफल का समय है।  स्मृति का समय है।

और कभी-कभी— ब्रह्मांडीय समय भी है।

इसलिए महाभारत का इतिहास-बोध केवल अतीत को किसी निश्चित तारीख में बंद करने की इच्छा से निर्मित नहीं दिखाई देता।

वह अतीत को एक व्यापक काल-संसार में रखता है।

फिर भी इतिहास की आवश्यकता समाप्त नहीं होती

यहाँ एक संभावित भ्रम से बचना आवश्यक है।

यदि महाभारत का समय-बोध आधुनिक chronology से भिन्न है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी घटनाओं की ऐतिहासिक जाँच निरर्थक हो जाती है।

बल्कि इसका उलटा है।

अब हमें दो अलग प्रश्न अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं— महाभारत समय को किस प्रकार समझता है?

और— महाभारत में वर्णित घटनाओं की ऐतिहासिक तिथि या ऐतिहासिकता के बारे में प्रमाण क्या कहते हैं?

पहला प्रश्न इस भाग का विषय है। दूसरा अगले भागों का। इन दोनों को मिलाना शोध की दृष्टि से उचित नहीं होगा।

 निष्कर्ष : महाभारत का काल-बोध

महाभारत का समय-बोध न तो केवल आधुनिक अर्थ में कालक्रम है और न केवल एक अमूर्त चक्रीय समय।

उसमें— व्यक्ति का समय, वंश का समय, कथा का समय और युग का समय

एक-दूसरे के भीतर स्थित हैं। उसका अतीत समाप्त नहीं हो जाता।

वह वंश-स्मृति के माध्यम से वर्तमान में आता है।

वर्तमान अपने निर्णयों के माध्यम से भविष्य को प्रभावित करता है।

और युग-बोध इन मानवीय घटनाओं को एक व्यापक काल-संरचना में रखता है।

इसलिए महाभारत में समय को समझना केवल यह जानना नहीं कि— “क्या पहले हुआ और क्या बाद में।”

बल्कि यह समझना भी है कि— 

अतीत किस प्रकार वर्तमान में उपस्थित रहता है और वर्तमान किस प्रकार भविष्य का कारण बनता है।

यहीं महाभारत का काल-बोध उसके इतिहास-बोध से जुड़ता है।

लेकिन अब तक हमने समय की संरचना को समझा है; हमने अभी यह निर्धारित नहीं किया कि महाभारत की घटनाएँ ऐतिहासिक रूप से कितनी प्रमाणित हैं।

वह एक अलग प्रश्न है।

और अब हमारा शोध उसी कठिन क्षेत्र में प्रवेश करेगा—

अध्याय 2.5 — महाभारत की ऐतिहासिकता : पाठ, परंपरा और प्रमाण

यहाँ पहली बार हम व्यवस्थित रूप से पूछेंगे—

महाभारत की ऐतिहासिकता जाँचने के लिए हमारे पास कौन-कौन से प्रमाण हैं?

और वहाँ हम परंपरा को प्रमाण का स्थान नहीं देंगे, न आधुनिक संशय को प्रमाण मानेंगे।

हम पाठ, बाहरी स्रोत, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को उनके-अपने प्रमाण-स्तर पर रखकर देखेंगे।

— मुकेश श्रीवास्तव

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