दर्शन — रसेश्वर दर्शन दर्शन का भाग — भाग–2 — रसेश्वर परम्परा के प्रवर्तक, आचार्य और ऐतिहासिक विकास

 दर्शनरसेश्वर दर्शन

दर्शन का भागभाग–2 — रसेश्वर परम्परा के प्रवर्तक, आचार्य और ऐतिहासिक विकास

भूमिका : एक प्रश्न से अब एक परम्परा तक

पिछले भाग में हमने रसेश्वर दर्शन के मूल प्रश्न को समझा थामनुष्य मृत्युशील देह के रहते अमरत्व की खोज क्यों करता है और क्या देह के रूपान्तरण को साधना का अंग बनाया जा सकता है।

अब प्रश्न बदलता है। यदि यह केवल किसी एक साधक की व्यक्तिगत कल्पना नहीं थी, तो

इस विचार को परम्परा का रूप किसने दिया?

कौन इसके आचार्य थे? किन ग्रन्थों में यह विचार व्यवस्थित हुआ?
और इसका ऐतिहासिक विकास किस बौद्धिक वातावरण में हुआ?

यहाँ सबसे पहली सावधानी आवश्यक हैरसेश्वर दर्शन का कोई एक निर्विवाद संस्थापक बताना ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित नहीं है। उपलब्ध सामग्री से यह एक क्रमिक रूप से विकसित परम्परा दिखाई देती है, जिसमें रसशास्त्र, शैव और योग-सम्बद्ध साधना-परम्पराओं के अनेक स्तर सम्मिलित हुए।

प्रवर्तकऔरपरम्परामें अन्तर

भारतीय दर्शन के अध्ययन मेंप्रवर्तकशब्द कई बार बहुत सहजता से प्रयोग कर दिया जाता है। जैसे किसी दर्शन के साथ किसी एक ऋषि, आचार्य या ग्रन्थकार का नाम जोड़ देना। लेकिन रसेश्वर के मामले में स्थिति अधिक जटिल है। इसे किसी एक व्यक्ति द्वारा एक निश्चित तिथि पर स्थापित किया गया दर्शन मानना कठिन है।

इसलिए यहाँ तीन अलग भूमिकाएँ समझनी चाहिए

परम्परा के आरम्भिक साधकजिनके माध्यम से रस और देह-साधना की धारणाएँ विकसित हुईं।

रससिद्ध आचार्यजिन्होंने रस-साधना को व्यवस्थित किया।

दार्शनिक ग्रन्थकारजिन्होंने इन धारणाओं को दार्शनिक तर्क और मोक्ष-विचार के साथ जोड़ा।

इन तीनों को एक ही व्यक्ति मान लेना इतिहास को अनावश्यक रूप से सरल बना देगा।

रसेश्वर के प्राचीन संकेत

रसेश्वर परम्परा का इतिहास केवल उन ग्रन्थों से शुरू नहीं होता जिनमें बाद मेंरसेश्वरनाम स्पष्ट रूप से मिलता है।

भारतीय धार्मिक और साधनात्मक साहित्य में पहले से हीअमृतत्व, कायाकल्प, औषधि, दीर्घजीवन और सिद्ध देह जैसी धारणाओं के अनेक रूप मिलते हैं।

इन धारणाओं का अस्तित्व अपने आप में रसेश्वर दर्शन का प्रमाण नहीं है।

लेकिन वे उस सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने में सहायता करते हैं जिसमें बाद में रस और देह-सिद्धि के विचार विकसित हुए।

इसलिए रसेश्वर का इतिहास एक अचानक उत्पन्न दर्शन के बजाय अनेक पुरानी धाराओं के क्रमिक संगम के रूप में देखना अधिक उचित है।

रससिद्ध परम्परा

रसेश्वर के इतिहास में रससिद्ध शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सिद्धयहाँ केवल किसी विद्वान का नाम नहीं, बल्कि ऐसी साधना-परम्परा की ओर संकेत करता है जिसमें साधक ने रस, देह और साधना के क्षेत्र में सिद्धि प्राप्त करने का दावा किया।

इसी कारण रससिद्ध परम्परा मेंगुरुशिष्यप्रयोगअनुभवसिद्धि का क्रम महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

यह परम्परा केवल पुस्तकीय ज्ञान पर निर्भर नहीं थी। इसका बड़ा भाग अनुभव और प्रयोगात्मक साधना की भाषा में व्यक्त हुआ।

यही बात इसे शास्त्रीय दर्शन की उन परम्पराओं से अलग बनाती है जिनका विकास मुख्यतः सूत्र, भाष्य और वार्तिक की बौद्धिक परम्परा में हुआ।

नागार्जुन का प्रश्न

रसेश्वर और रसशास्त्र के इतिहास में नागार्जुन का नाम अत्यन्त प्रसिद्ध है। लेकिन यहाँ सबसे अधिक सावधानी की आवश्यकता है।

नागार्जुननाम से भारतीय बौद्धिक इतिहास में एक से अधिक ऐतिहासिक व्यक्तित्व जुड़े हुए हैं। विशेष रूप से प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन और रसशास्त्रीय परम्परा से जुड़े नागार्जुन को बिना प्रमाण एक ही व्यक्ति मान लेना उचित नहीं। इसलिएबौद्ध दार्शनिक नागार्जुन ही रसेश्वर दर्शन के प्रवर्तक थे

जैसा निश्चित कथन ऐतिहासिक रूप से नहीं किया जाना चाहिए।

रसशास्त्रीय साहित्य में नागार्जुन को महत्त्वपूर्ण रसाचार्य के रूप में परम्परा ने स्मरण किया है, लेकिन उनके जीवनकाल, कृतित्व और बौद्ध नागार्जुन के साथ उनकी पहचान के विषय में पर्याप्त ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।

यहाँ परम्परा और इतिहास को अलग रखना ही शोध की सही पद्धति है।

रसेश्वर की दार्शनिक पहचान कहाँ स्पष्ट होती है?

रसेश्वर को केवल रस-प्रयोगों से दर्शन का रूप नहीं मिलता।

दर्शन तब बनता है जब प्रश्न उठते हैं

देह क्यों सिद्ध की जाए?

पारद का साधना में क्या प्रयोजन है?

सिद्ध देह और मोक्ष का क्या सम्बन्ध है?

क्या देह-सिद्धि केवल दीर्घजीवन है?

औरक्या शरीर का संरक्षण अन्ततः आत्मिक मुक्ति की दिशा में सहायक है?

जब इन प्रश्नों पर व्यवस्थित चिन्तन प्रारम्भ होता है, तब रस-परम्परा एक विशिष्ट दार्शनिक दिशा ग्रहण करती है।

यही कारण है कि रसेश्वर का इतिहास केवल रसायन-विज्ञान का इतिहास नहीं है।

रसेश्वर-सिद्धान्त और दार्शनिक साहित्य

रसेश्वर सम्बन्धी दार्शनिक सामग्री का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत वह साहित्य है जिसमें विभिन्न भारतीय दर्शनों का सर्वेक्षण और आलोचनात्मक विवेचन किया गया।

विशेषतः मध्यकालीन दार्शनिक साहित्य में रसेश्वर को स्वतंत्र दार्शनिक मत के रूप में पहचान मिलती है।

इससे एक महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आता है

रसेश्वर केवल गुप्त साधना-परम्परा के रूप में सीमित नहीं रहा; वह भारतीय दार्शनिक मतों की सार्वजनिक बौद्धिक चर्चा में भी प्रवेश कर चुका था।

इस ऐतिहासिक स्थिति को समझना आगे के अध्ययन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होगा।

माधवाचार्य और रसेश्वर

रसेश्वर के दार्शनिक स्वरूप को समझने के लिए माधवाचार्य के सर्वदर्शनसंग्रह का उल्लेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

इस ग्रन्थ में विभिन्न भारतीय दार्शनिक मतों का क्रमबद्ध सर्वेक्षण किया गया है और रसेश्वर को भी एक विशिष्ट दार्शनिक मत के रूप में स्थान दिया गया है।

यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि मध्यकालीन भारतीय दार्शनिक चेतना में रसेश्वर को केवल औषधीय या रासायनिक परम्परा के रूप में नहीं देखा जाता था।

उसे एक ऐसे मत के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था जिसके अपनेसाध्य, साधन और दार्शनिक प्रतिपादन

थे। लेकिन यहाँ भी एक सीमा याद रखनी चाहिए।

किसी दर्शन का किसी सर्वदर्शन-संग्रह में वर्णित होना और उस दर्शन का सम्पूर्ण ऐतिहासिक स्वरूप वही होनादो अलग बातें हैं।

इसलिए आगे हम मूल रसेश्वर स्रोतों और बाद के दार्शनिक प्रस्तुतिकरणों को अलग-अलग देखेंगे।

रसेश्वर और शैव वातावरण

रसेश्वर का विकास जिस भारतीय सांस्कृतिक वातावरण में हुआ, उसमें शैव और तान्त्रिक परम्पराओं का महत्त्व था।

लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता किरसेश्वर = शैव दर्शन

या रसेश्वर केवल शैव दर्शन की शाखा है।

दोनों के बीच सम्बन्ध अवश्य हैं, लेकिन उनकी दार्शनिक पहचान को एक कर देना उचित नहीं होगा।

रसेश्वर की विशिष्टता उसकी रस-साधना और देह-सिद्धि की दिशा में है।

शैव सम्बन्ध उसकी व्यापक साधनात्मक पृष्ठभूमि को समझने में सहायता करता है; उसकी सम्पूर्ण पहचान को समाप्त नहीं करता।

नाथ और सिद्ध परम्पराओं से सम्बन्ध

इसी प्रकार नाथ और सिद्ध परम्पराओं के साथ भी रसेश्वर का ऐतिहासिक और साधनात्मक सम्बन्ध चर्चा का विषय रहा है।

विशेष रूप सेदेह-साधना, सिद्धि, योग और दीर्घजीवन जैसे विषय इन परम्पराओं के बीच संवाद की सम्भावना उत्पन्न करते हैं। लेकिन समान विषय का होना समान दर्शन होने का प्रमाण नहीं है।

इसलिए आगे जब इन परम्पराओं की तुलना की जाएगी तो तीन स्तरों को अलग रखा जाएगा

समानतासम्भावित सम्बन्धप्रमाणित ऐतिहासिक प्रभाव।

इन तीनों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं बनाया जाएगा।

रसेश्वर का ऐतिहासिक विकास : एक सम्भावित क्रम

उपलब्ध परम्परागत और दार्शनिक सामग्री को देखते हुए रसेश्वर के विकास को मोटे तौर पर इस प्रकार समझा जा सकता हैप्राचीन अमृतत्व-आकांक्षा से देह-संरक्षण और कायाकल्प की साधना फिर रस एवं पारद के व्यवस्थित प्रयोग और उसके बाद रससिद्ध परम्परा  तथादेह-सिद्धि को दार्शनिक लक्ष्य से जोड़ने वाली रसेश्वर दृष्टि  तक।यह कोई कठोर कालक्रम नहीं, बल्कि विचार के विकास को समझने का एक व्याख्यात्मक ढाँचा है।

विशिष्ट ग्रन्थों और आचार्यों की तिथियों के आधार पर इसका अधिक सूक्ष्म पुनर्निर्माण आवश्यक है।

क्या रसेश्वर का कोई एकसंस्थापकथा?

इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल सावधानी से देना चाहिए। निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

रसेश्वर को किसी एक ऐतिहासिक व्यक्ति की स्थापना का परिणाम मानने के बजाय एक ऐसी परम्परा के रूप में देखना अधिक सुरक्षित है जिसका विकास अनेक रससिद्धों, साधकों और ग्रन्थकारों के योगदान से हुआ।

इसलिएरसेश्वर के प्रवर्तक अमुक व्यक्ति थे

जैसा एकरेखीय निष्कर्ष तभी स्वीकार किया जाना चाहिए जब उसके समर्थन में स्पष्ट प्राथमिक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हों।

यह सावधानी विशेष रूप से आवश्यक है क्योंकि रसशास्त्रीय साहित्य में परम्परा, आख्यान और ऐतिहासिक तथ्य कई बार एक-दूसरे के बहुत निकट दिखाई देते हैं।

इतिहास की सबसे बड़ी कठिनाई : आख्यान और प्रमाण

रसेश्वर परम्परा का अध्ययन करते समय एक विशेष समस्या सामने आती है।

सिद्धों और रसाचार्यों से जुड़े अनेक आख्यानों मेंअसाधारण आयु, चमत्कार, देह-सिद्धि और अद्भुत प्रयोग

का वर्णन मिलता है। ऐसे आख्यानों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व हो सकता है।

लेकिन ऐतिहासिक शोध में उन्हें उसी रूप में प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।

इसलिए हमारी अध्ययन-पद्धति होगीपरम्परा में क्या कहा गया?

फिरग्रन्थ में क्या लिखा है?

फिर  ऐतिहासिक प्रमाण क्या है?

और अन्ततःआधुनिक अनुसन्धान उससे क्या निष्कर्ष निकाल सकता है?

यही चार-स्तरीय परीक्षण रसेश्वर के अध्ययन को अधिक विश्वसनीय बनाएगा।

एक दर्शन से एक बौद्धिक परम्परा तक

अब तक एक बात स्पष्ट हो जाती है। रसेश्वर को किसी एक सूत्र में बन्द नहीं किया जा सकता।

यह एक ऐसी परम्परा है जिसमेंरसशास्त्र  और देह-साधना के साथ  मोक्ष-विचार का सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास हुआ। इसीलिए इसका इतिहास केवल आचार्यों की सूची नहीं है।

वास्तव में इसका इतिहास एक प्रश्न के धीरे-धीरे विकसित होने का इतिहास है

क्या पदार्थ का रूपान्तरण मनुष्य के अस्तित्व के रूपान्तरण से जुड़ सकता है? और यही प्रश्न हमें अगले चरण में ले जाता है।

निष्कर्ष : अब व्यक्ति नहीं, ग्रन्थ बोलेंगे

भाग–1 में हमने पूछा थारसेश्वर दर्शन क्यों उत्पन्न हुआ?

भाग–2 में हमने देखायह किसी एक निर्विवाद संस्थापक का दर्शन नहीं, बल्कि क्रमशः विकसित हुई परम्परा है।

नागार्जुन जैसे नामों के साथ ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है। रससिद्ध परम्परा ने इसे साधनात्मक आधार दिया। मध्यकालीन दार्शनिक साहित्य, विशेषतः माधवाचार्य के सर्वदर्शनसंग्रह, ने इसे एक स्वतंत्र दार्शनिक मत के रूप में पहचानने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन अभी तक हमने किसी विशिष्ट ग्रन्थ के भीतर प्रवेश नहीं किया है। अब वही अगला आवश्यक कदम है।

अगले भाग की भूमिका

यदि रसेश्वर एक विकसित परम्परा थी, तो उसके विचारों का सबसे विश्वसनीय परीक्षण उसके ग्रन्थ-साहित्य से होगा।

भाग–3 में हम रसेश्वर के प्रमुख ग्रन्थों और ग्रन्थ-परम्परा का अध्ययन करेंगेकौन-सा ग्रन्थ किस विषय को सामने लाता है, उसका काल और कर्तृत्व कहाँ निश्चित है और कहाँ विवादित, तथा रसशास्त्रीय साहित्य किस प्रकार दार्शनिक प्रश्नों तक पहुँचता है।

इस प्रकार हम इतिहास से सीधे ग्रन्थ की ओर बढ़ेंगेबिना भाग–1 और भाग–2 की सामग्री को दोहराए।

 

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI)

 

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