दर्शन भाग–4 : बौद्ध दर्शन का उदय — वैदिक परम्परा, श्रमण आन्दोलन और बौद्धिक क्रान्ति

 ग्रंथ : भारतीय दर्शन श्रृंखला - बौद्ध दर्शन- अध्याय–1 : बौद्ध दर्शन का परिचय

भाग–4 : बौद्ध दर्शन का उदयवैदिक परम्परा, श्रमण आन्दोलन और बौद्धिक क्रान्ति

किसी भी दर्शन का जन्म शून्य में नहीं होता। वह अपने समय के सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और बौद्धिक परिवेश से प्रभावित होता है। बौद्ध दर्शन भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए यदि हम यह समझना चाहते हैं कि बुद्ध ने क्या कहा, तो उससे पहले यह समझना आवश्यक है कि वे किस युग में बोल रहे थे, किन विचारों के बीच बोल रहे थे, और किन समस्याओं का उत्तर दे रहे थे।

ईसा पूर्व छठी शताब्दी का भारत भारतीय इतिहास के सबसे सृजनशील युगों में से एक था। इसे अनेक इतिहासकार "द्वितीय नगरीकरण" (Second Urbanization) का काल कहते हैं। गंगा के मैदानों में नए नगर बस रहे थे, व्यापार का विस्तार हो रहा था, धातु उद्योग विकसित हो रहा था और महाजनपद शक्तिशाली राजनीतिक इकाइयों के रूप में उभर रहे थे। आर्थिक समृद्धि के साथ सामाजिक जटिलता भी बढ़ रही थी। मनुष्य के सामने केवल जीविका का प्रश्न नहीं था, बल्कि जीवन के अर्थ का प्रश्न भी अधिक तीव्र हो उठा था।

उस समय वैदिक परम्परा भारतीय संस्कृति की प्रमुख धारा थी। वेद, यज्ञ, ऋत्विज, ब्राह्मण, उपनिषद् और आश्रम-व्यवस्था भारतीय समाज के महत्वपूर्ण अंग थे। यह धारणा कि बौद्ध दर्शन पूरी तरह वैदिक परम्परा के विरोध में उत्पन्न हुआ, ऐतिहासिक रूप से पूर्णतः सही नहीं है। वास्तव में बुद्ध ने भारतीय दार्शनिक परम्परा के भीतर चल रहे अनेक प्रश्नों को नई दिशा दी।

उपनिषदों में पहले से ही यह जिज्ञासा उठ चुकी थी कि बाह्य यज्ञों की अपेक्षा आत्मज्ञान अधिक महत्त्वपूर्ण है। "कोऽहम्?", "ब्रह्म क्या है?", "आत्मा क्या है?" जैसे प्रश्न उपनिषदों में प्रमुख थे। बुद्ध ने इन प्रश्नों की उपेक्षा नहीं की, बल्कि उनका उत्तर भिन्न पद्धति से देने का प्रयास किया। इस दृष्टि से बौद्ध दर्शन भारतीय बौद्धिक परम्परा का विरोध नहीं, बल्कि उसका एक वैकल्पिक विकास है।

इसी काल में एक दूसरी धारा भी विकसित हो रही थी, जिसे श्रमण परम्परा कहा जाता है। "श्रमण" वे साधक थे जो वैदिक गृहस्थ व्यवस्था से बाहर निकलकर तप, ध्यान, संयम और आत्मानुशासन के माध्यम से सत्य की खोज करते थे। इस परम्परा में जैन, आजीवक, अज्ञेयवादी, भौतिकवादी तथा अनेक स्वतंत्र विचारधाराएँ सक्रिय थीं। बुद्ध भी इसी व्यापक श्रमण आन्दोलन के एक प्रमुख प्रतिनिधि थे।

किन्तु बुद्ध की विशिष्टता यह थी कि उन्होंने तो केवल वेदों का विरोध किया और केवल तपस्या का समर्थन। उन्होंने दोनों की सीमाओं को अनुभव के आधार पर परखा। उन्होंने कर्मकाण्ड की अनिवार्यता को स्वीकार नहीं किया, परन्तु नैतिक जीवन का महत्त्व पूरी दृढ़ता से स्थापित किया। उन्होंने कठोर तपस्या का अभ्यास किया, किन्तु अंततः उसे भी अंतिम मार्ग नहीं माना। इस प्रकार उनका दर्शन किसी प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि गहन अनुभव और विवेक का निष्कर्ष था।

बुद्ध के समय अनेक दार्शनिक मत प्रचलित थे। कुछ मानते थे कि सब कुछ नियति से होता है; कुछ कहते थे कि कर्म का कोई महत्व नहीं; कुछ आत्मा को शाश्वत मानते थे, तो कुछ मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त मानते थे। इस वैचारिक विविधता के बीच बुद्ध ने एक ऐसा मार्ग प्रस्तुत किया जो अन्धविश्वास पर आधारित था और नास्तिक निरर्थकता पर। उन्होंने अनुभव, तर्क और साधना को एक साथ जोड़ा।

बौद्ध दर्शन की एक विशेषता यह भी है कि उसने सत्य को किसी जाति, वर्ग या जन्म से नहीं जोड़ा। बुद्ध के संघ में राजकुमार भी थे, किसान भी, व्यापारी भी, नाई भी, पूर्व डाकू भी और पूर्व गणिका भी। ज्ञान का अधिकार जन्म से नहीं, बल्कि साधना से निर्धारित होता है। यह उस समय की सामाजिक व्यवस्था के लिए अत्यन्त क्रान्तिकारी विचार था।

स्त्रियों के सम्बन्ध में भी बुद्ध का दृष्टिकोण अपने समय की तुलना में अधिक प्रगतिशील था। प्रारम्भिक संकोच के बाद उन्होंने भिक्षुणी संघ की स्थापना की और महिलाओं को भी निर्वाण की समान सम्भावना स्वीकार की। यद्यपि इस विषय पर आधुनिक विद्वानों में अनेक मतभेद हैं, फिर भी ऐतिहासिक दृष्टि से यह भारतीय धार्मिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी।

यदि हम विश्व-इतिहास पर दृष्टि डालें तो यही वह काल है जब चीन में कन्फ्यूशियस और लाओत्से, ईरान में जरथुस्त्र की परम्परा का प्रभाव, तथा यूनान में प्रारम्भिक दार्शनिक चिन्तन विकसित हो रहा था। इस प्रकार बुद्ध का युग केवल भारत ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के बौद्धिक जागरण का युग था।

इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना बौद्ध दर्शन का सही मूल्यांकन सम्भव नहीं है। बुद्ध ने किसी रिक्त स्थान में नया दर्शन नहीं बनाया; उन्होंने अपने समय के प्रश्नों को नए ढंग से देखा, उन्हें अनुभव की कसौटी पर परखा और एक ऐसा मार्ग प्रस्तुत किया जो आज भी मनुष्य के अस्तित्वगत प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करता है।

मुख्य निष्कर्ष

  • बौद्ध दर्शन छठी शताब्दी ईसा पूर्व के गहन सामाजिक और बौद्धिक परिवर्तन का परिणाम है।
  • इसका विकास वैदिक और श्रमणदोनों परम्पराओं की पृष्ठभूमि में हुआ।
  • बुद्ध ने कर्मकाण्ड और कठोर तपस्यादोनों की सीमाओं का अनुभव किया।
  • बौद्ध दर्शन अनुभव, नैतिकता और तर्क का समन्वित मार्ग प्रस्तुत करता है।
  • ज्ञान और मुक्ति को जन्म नहीं, बल्कि साधना से जोड़ा गया।
  • बौद्ध दर्शन भारतीय बौद्धिक परम्परा का एक मौलिक, किन्तु संवादात्मक विकास है।

आज के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न

  • क्या किसी नई विचारधारा को समझने के लिए उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है?
  • क्या परम्परा का सम्मान और उसकी आलोचना साथ-साथ सम्भव है?
  • क्या आज का समाज भी बुद्ध के समय की तरह एक नए बौद्धिक संक्रमण से गुजर रहा है?

अगले भाग की भूमिका

अब तक हमने बौद्ध दर्शन के ऐतिहासिक उदय को समझा। अगले भाग में हम उस मूल प्रश्न का अध्ययन करेंगे जिसने सम्पूर्ण बौद्ध दर्शन को आकार दियाक्या बौद्ध दर्शन वास्तव में ईश्वरवादी है, नास्तिक है, या इन दोनों से परे एक अनुभववादी दर्शन है? यही प्रश्न आगे बौद्ध दार्शनिक परम्परा की दिशा को स्पष्ट करेगा।

 

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)

इस ब्लॉग के सभी लेख लेखक के मौलिक अध्ययन, दार्शनिक चिंतन एवं शोध-आधारित लेखन पर आधारित हैं। उचित संदर्भ के साथ उद्धृत किया जा सकता है।

 

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