शाङ्कर दर्शन भाग 4 — आत्मा कौन है? : आत्मा और ब्रह्म का संबंध
शाङ्कर दर्शन
भाग
4 — आत्मा कौन है? : आत्मा और ब्रह्म का संबंध
पिछले
भाग में हमने ब्रह्म
को शाङ्कर दर्शन के परम तत्त्व
के रूप में देखा।
ब्रह्म कोई सीमित वस्तु
नहीं, न किसी दूसरी
सत्ता पर निर्भर है;
वह अस्तित्व और चैतन्य की
मूल भूमि है।
लेकिन
अब दर्शन का सबसे निकट
और व्यक्तिगत प्रश्न सामने आता है—
यदि
ब्रह्म ही परम सत्य है, तो मैं कौन हूँ?
यह
प्रश्न केवल आध्यात्मिक जिज्ञासा
नहीं है। शंकराचार्य के
लिए यही वह बिंदु
है जहाँ ब्रह्मविद्या मनुष्य
के अपने अनुभव से
जुड़ती है।
मनुष्य
संसार को जानता है,
ईश्वर की कल्पना करता
है, सुख-दुःख अनुभव
करता है, कर्म करता
है और अपने बारे
में कहता है— “मैं।”
लेकिन यह “मैं” वास्तव
में कौन है?
यहीं
से शाङ्कर दर्शन की आत्ममीमांसा आरम्भ होती है।
शरीर
से आत्मा तक
सामान्य
अनुभव में मनुष्य अपने
शरीर को ही “मैं”
मानता है।
मैं
लंबा हूँ। मैं बूढ़ा हो गया हूँ।
मैं स्वस्थ हूँ। मैं बीमार हूँ। लेकिन शरीर निरन्तर बदल
रहा है।
बाल्यावस्था
का शरीर आज नहीं
है। युवावस्था का शरीर भी
स्थायी नहीं रहा। फिर
भी व्यक्ति अपने पूरे जीवन
के अनुभव को एक ही
“मैं” से जोड़ता है।
इससे एक दार्शनिक प्रश्न उत्पन्न होता है—
जो
निरन्तर बदल रहा है, क्या वही उस परिवर्तन का अंतिम ज्ञाता हो सकता है?
शरीर
दिखाई देता है। उसकी अवस्था
हमें ज्ञात होती है। अर्थात् शरीर
ज्ञेय है।
और यदि शरीर ज्ञेय
है, तो आत्मा को
केवल शरीर मान लेना
कठिन हो जाता है।
मन
भी “मैं” नहीं
शरीर
से आगे बढ़ें तो
मन सामने आता है।
मन कभी प्रसन्न है,
कभी उदास। कभी स्थिर है, कभी चंचल।
कभी प्रेम से भरा है,
कभी क्रोध से।
हम कहते हैं— “मेरा
मन परेशान है।”
इस छोटे-से वाक्य
में एक गहरा दार्शनिक
संकेत है।
यदि
मन “मेरा” है, तो “मैं”
और मन के बीच
कोई भेद स्वीकार किया
जा रहा है।
मन की स्थिति बदलती
है और हम उस
परिवर्तन को जानते हैं।
इसलिए
शाङ्कर दृष्टि में मन आत्मा
का स्वरूप नहीं हो सकता।
मन अनुभव का माध्यम है;
आत्मा उस अनुभव की
चेतन आधारभूमि है।
बुद्धि
और अहंकार
मन के साथ बुद्धि
और अहंकार भी हैं।
बुद्धि
निर्णय करती है— यह
उचित है। यह अनुचित है। यह सत्य है। यह असत्य है।
अहंकार
कहता है— मैंने जाना। मैंने किया। मैं सफल हुआ। मैं असफल हुआ।
लेकिन
बुद्धि के निर्णय भी
बदलते हैं। अहंकार की धारणाएँ भी
बदलती हैं।
आज जिसे हम अपने
व्यक्तित्व का सबसे महत्त्वपूर्ण
भाग मानते हैं, कुछ वर्षों
बाद वही महत्वहीन हो
सकता है।
फिर
वह कौन है जो
इन परिवर्तनों को जानता है?
यहीं
से शाङ्कर दर्शन साक्षी-चैतन्य की ओर संकेत
करता है।
साक्षी का अर्थ
“साक्षी”
शब्द सुनते ही भीतर बैठे
किसी निरीक्षक की कल्पना करना
आसान है।
मानो
शरीर एक मशीन है,
मन एक स्क्रीन है
और आत्मा भीतर बैठकर सब
देख रही है।
लेकिन
शंकराचार्य की दिशा इतनी
सरल नहीं है।
यदि
आत्मा भी कोई बैठा
हुआ निरीक्षक होती, तो उसे भी
कोई दूसरा जानने वाला चाहिए होता।
साक्षी
का वास्तविक संकेत है—
वह
चैतन्य जिसके प्रकाश में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की पूरी अनुभूति सम्भव होती है।
जैसे
दीपक स्वयं को प्रकाशित करने
के लिए किसी दूसरे
दीपक की आवश्यकता नहीं
रखता, वैसे ही चैतन्य
को किसी बाहरी प्रकाश
से प्रकाशित नहीं किया जाता।
इसीलिए
आत्मा को स्वप्रकाश कहा जाता है।
आत्मा
को वस्तु की तरह क्यों नहीं जाना जा सकता?
यह शाङ्कर दर्शन का अत्यन्त सूक्ष्म
प्रश्न है।
जब हम किसी वस्तु
को जानते हैं, तो वह
हमारे ज्ञान का विषय बनती
है।
वृक्ष
सामने है—मैं वृक्ष
को जानता हूँ।
शरीर
का अनुभव है—मैं शरीर
को जानता हूँ।
विचार
उठता है—मैं विचार
को जानता हूँ।
तो यदि मैं आत्मा
को भी इसी प्रकार
जानूँ, तो आत्मा मेरे
ज्ञान का विषय बन
जाएगी।
फिर
प्रश्न होगा— आत्मा को जानने वाला कौन है?
यदि
उसके लिए दूसरा ज्ञाता
मानें, तो उस दूसरे
को जानने के लिए तीसरे
की आवश्यकता होगी।
इससे
अनन्त क्रम उत्पन्न होगा।
इसलिए आत्मा को सामान्य वस्तु
की तरह “जानना” सम्भव
नहीं।
आत्मा
वह है जिसके कारण
जानना सम्भव है।
जीव
और आत्मा
अब एक महत्त्वपूर्ण अंतर
सामने आता है— जीव
कौन है और आत्मा कौन है?
हम स्वयं को जीव के
रूप में अनुभव करते
हैं। मेरा जन्म हुआ। मेरा परिवार
है। मैं कर्म करता हूँ।
मैं सुखी या दुःखी होता
हूँ। मुझे सफलता और असफलता मिलती
है।
यह सम्पूर्ण व्यक्तित्व जीव के स्तर पर
है।
लेकिन
अद्वैत पूछता है— इन सब
अनुभवों का आधार क्या
है?
शरीर
बदलता है। मन बदलता है। बुद्धि बदलती है। अहंकार बदलता है।
फिर
भी अनुभव का मूल “मैं”
बना रहता है।
शाङ्कर
दृष्टि में यही आत्मचैतन्य
जीव-अनुभव का आधार है।
जीव
सीमित क्यों दिखाई देता है?
यदि
आत्मा चैतन्य है और उसका
वास्तविक स्वरूप सीमित नहीं, तो फिर मनुष्य
स्वयं को सीमित क्यों
अनुभव करता है?
यहीं
पिछले भाग में चर्चा
किए गए ब्रह्म और अब के
जीव का संबंध सामने
आता है।
एक व्यक्ति कहता है— “मैं
छोटा हूँ।” , दूसरा कहता है— “मैं
ज्ञानी हूँ।” तीसरा— “मैं दुःखी हूँ।”
चौथा—
“मैं कर्ता हूँ।”
चैतन्य
स्वयं इन विशेषताओं से
सीमित नहीं है।
लेकिन
शरीर, मन और बुद्धि
के साथ उसकी पहचान
होने पर चेतना का
अनुभव सीमित व्यक्ति के रूप में
होने लगता है।
यही
स्थिति अद्वैत की भाषा में
उपाधि-संबंध और अध्यास की
दिशा में ले जाती
है।
आत्मा
और ब्रह्म का संबंध
अब श्रृंखला के दो केंद्रीय
शब्द एक-दूसरे के
सामने हैं— ब्रह्म और आत्मा।
यदि
ब्रह्म परम चैतन्य है
और आत्मा भी चैतन्यस्वरूप है,
तो क्या दोनों अलग-अलग चेतनाएँ हैं?
यदि
अलग हैं, तो ब्रह्म
अद्वैत कैसे रहेगा?
और यदि एक हैं,
तो जीव अपने को
ब्रह्म से अलग क्यों
अनुभव करता है?
उपनिषद्
इसी प्रश्न को महावाक्यों के
माध्यम से सामने रखता
है।
सबसे
प्रसिद्ध है— “तत्त्वमसि।” अर्थात्— “तू वही है।”
लेकिन
“तू” और “वह” को
सामान्य अर्थ में जोड़
देना पर्याप्त नहीं है।
“तत्त्वमसि”
का दार्शनिक रहस्य
“तत्”
से ब्रह्म का बोध होता
है। “त्वम्” से जीव का।
साधारण दृष्टि में दोनों के
गुण विपरीत दिखाई देते हैं।
जीव
सीमित है। ईश्वर सर्वज्ञ माना जाता है।
जीव कर्म के अधीन दिखाई
देता है। ईश्वर कर्मफलदाता है।
जीव
अज्ञान का अनुभव करता
है। ब्रह्म ज्ञानस्वरूप है। तो फिर—
“तत्त्वमसि”
कैसे सत्य हो सकता है?
शंकराचार्य
की व्याख्या यहाँ शब्दों के
बाहरी अर्थ से आगे
जाती है।
जीव
और ईश्वर की उपाधियों को
अलग करने पर जो
मूल चैतन्य बचता है, उसी
स्तर पर अभेद का
प्रतिपादन किया जाता है।
अर्थात्—
शरीर ब्रह्म नहीं है। मन ब्रह्म नहीं है। अहंकार ब्रह्म नहीं है।
और उसी प्रकार ईश्वर
की उपाधिगत विशेषताओं को भी ब्रह्म
का अंतिम स्वरूप नहीं माना जा
सकता।
महावाक्य
का संकेत उस चैतन्य-तत्त्व की ओर है
जो दोनों का आधार है।
“अहं
ब्रह्मास्मि” — अहंकार की घोषणा नहीं
बृहदारण्यक
उपनिषद् कहता है— “अहं
ब्रह्मास्मि।”
इसका
अर्थ यदि सामान्य अहंकार
के स्तर पर लिया
जाए तो अद्वैत का
पूरा अर्थ उलट जाएगा।
यह नहीं कहा जा
रहा— “मैं, यह व्यक्ति, सर्वशक्तिमान ब्रह्म हूँ।”
यहाँ
“अहं” से उस सीमित
व्यक्तित्व का आशय नहीं
जिसे हम नाम, शरीर,
स्मृति और सामाजिक पहचान
से जानते हैं।
अद्वैत
का आशय है—
जिस
चैतन्य के कारण “मैं” का अनुभव संभव है, उसका अंतिम स्वरूप ब्रह्म से भिन्न नहीं।
इसलिए—
“अहं ब्रह्मास्मि” अहंकार का विस्तार नहीं, अहंकार की अंतिम सीमा का अतिक्रमण है।
चार महावाक्य
अद्वैत
वेदान्त की परंपरा में
चार महावाक्य विशेष रूप से प्रसिद्ध
हैं—
प्रज्ञानं
ब्रह्म — ऐतरेय उपनिषद्
अहं
ब्रह्मास्मि —
बृहदारण्यक उपनिषद्
तत्त्वमसि
— छान्दोग्य
उपनिषद्
अयमात्मा
ब्रह्म — माण्डूक्य उपनिषद्
इन चारों का केंद्र एक
ही प्रश्न है—
चैतन्य और परम सत्य का संबंध क्या है?
लेकिन
इन्हें केवल चार सूत्रों
की तरह याद कर
लेना पर्याप्त नहीं।
प्रत्येक
वाक्य अपने उपनिषद् के
प्रसंग में समझना होगा।
विशेषतः
“तत्त्वमसि”
की शंकराचार्य द्वारा की गई व्याख्या
अद्वैत की आत्मा-ब्रह्म
अभिन्नता को समझने में
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
क्या
आत्मा अनेक हैं?
हम देखते हैं— मेरी चेतना
अलग है। आपकी चेतना अलग है। हर जीव
अपना सुख-दुःख अनुभव
करता है।
तो क्या आत्माएँ अनेक
हैं? अद्वैत यहाँ अनुभव के
दो स्तरों को अलग करता
है।
व्यक्तिगत
मन अलग-अलग हैं।
शरीर अलग-अलग हैं।
अन्तःकरण
अलग-अलग हैं। इसलिए
अनुभवों की विविधता स्वाभाविक
है।
लेकिन
चेतना को भी मनों
की तरह टुकड़ों में
बाँट दिया जाए तो
समस्या पैदा होती है।
चेतना
स्वयं विभाजित नहीं होती।
अलग-अलग पात्रों में
आकाश अलग दिखाई दे
सकता है, लेकिन आकाश
वास्तव में पात्रों के
कारण खंडित नहीं होता।
यह उपमा पूर्ण दार्शनिक
प्रमाण नहीं, लेकिन अद्वैत की दिशा समझने
में सहायक है।
आत्मा
कर्ता है या साक्षी?
मनुष्य
कहता है— “मैंने कर्म किया।” फिर— “मुझे कर्म का फल मिला।”
यहीं
कर्म और आत्मा का
संबंध सामने आता है। यदि आत्मा
शुद्ध चैतन्य है और स्वयं
परिवर्तनरहित है, तो कर्म
करने वाला कौन है?
शाङ्कर
दृष्टि में कर्तृत्व का
संबंध शरीर-मन-बुद्धि
और अहंकार से है। चैतन्य इन
सबको प्रकाशित करता है।
लेकिन
अध्यास के कारण मनुष्य
कहता है— “मैं कर्ता हूँ।” यही कर्तृत्व आगे
कर्मबंधन को जन्म देता
है।
इसलिए
आत्मा को समझना केवल
दार्शनिक जिज्ञासा नहीं है।
यह सीधे बंधन और मोक्ष के प्रश्न से
जुड़ जाता है।
आत्मज्ञान
— नई वस्तु की प्राप्ति नहीं
यदि
आत्मा ब्रह्मस्वरूप है, तो आत्मज्ञान
का अर्थ क्या है?
क्या कोई व्यक्ति साधना
करके नया आत्मतत्त्व प्राप्त
करता है?
अद्वैत
का उत्तर है— नहीं। जो पहले से
है, उसे पैदा नहीं
किया जा सकता।
ज्ञान
का कार्य किसी नई वस्तु
का निर्माण करना नहीं, बल्कि
अज्ञान का निवारण करना
है।
रज्जु
अंधकार में भी रज्जु
ही थी। सर्प का भ्रम वास्तविकता
को बदल नहीं रहा
था।
प्रकाश
ने केवल भ्रम को
समाप्त किया। इसी प्रकार आत्मज्ञान आत्मा को ब्रह्म नहीं
बनाता।
वह केवल उस भ्रांति
को समाप्त करता है जिसके
कारण आत्मा स्वयं को शरीर-मन
से सीमित मानती है।
आत्मा
की खोज कहाँ समाप्त होती है?
यहाँ
शाङ्कर दर्शन अपनी सबसे अद्भुत
दिशा में पहुँचता है।
मनुष्य आत्मा को खोजने निकलता
है।
पहले
शरीर को अलग करता
है। फिर इन्द्रियों को। फिर मन को। फिर बुद्धि
को। फिर अहंकार को।
लेकिन
अन्त में वह जिस
चैतन्य को खोज रहा
था, उसे किसी वस्तु
की तरह सामने नहीं
पा सकता।
क्योंकि—
खोजने वाला और खोजा जाने वाला अंतिम सत्य एक ही चैतन्य के स्तर पर प्रश्न बन जाते हैं।
यहीं
अद्वैत का वास्तविक रहस्य
है।
शाङ्कर
दर्शन में आत्मा कोई
शरीर के भीतर रहने
वाली सूक्ष्म वस्तु नहीं है।
वह मन का कोई
परिवर्तन नहीं। वह अहंकार भी नहीं।
आत्मा
वह चैतन्य है जिसके प्रकाश
में शरीर, मन, बुद्धि और
संसार का अनुभव संभव
होता है।
और यही आत्मा जब
अपने वास्तविक स्वरूप में जानी जाती
है, तब उपनिषद् का
वचन अर्थपूर्ण होता है—
“अयमात्मा
ब्रह्म।” यह आत्मा ही
ब्रह्म है।
लेकिन
अभी हमारी सबसे बड़ी समस्या
समाप्त नहीं हुई। यदि आत्मा
वास्तव में ब्रह्म है,
तो फिर मनुष्य स्वयं
को सीमित जीव क्यों मानता
है? यदि ब्रह्म एक
है तो अनेकता कहाँ
से आई?
यदि
आत्मा शुद्ध चैतन्य है तो अज्ञान
का अनुभव किसे होता है?
और सबसे कठिन प्रश्न—
जिस जगत् को हम प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं, उसकी सत्ता क्या है?
क्या
वह ब्रह्म से उत्पन्न वास्तविक
परिवर्तन है? क्या वह
भ्रम है?
या
“मिथ्या” का कोई ऐसा
सूक्ष्म अर्थ है जो
सत्य और असत्य—दोनों
से अलग है?
यहीं
से शाङ्कर दर्शन का सबसे अधिक
चर्चित सिद्धान्त सामने आता है।
अगला
भाग — भाग 5 : जगत् — वास्तविक, अवास्तविक या मिथ्या?
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस
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