दर्शन — प्रत्यभिज्ञा दर्शन — भाग–4 प्रत्यभिज्ञा क्या है? — स्मृति, पहचान और आत्म-पहचान का दार्शनिक विवेचन
दर्शन — प्रत्यभिज्ञा दर्शन — भाग–4
प्रत्यभिज्ञा
क्या है? — स्मृति, पहचान और आत्म-पहचान का दार्शनिक विवेचन
प्रत्यभिज्ञा
दर्शन के तीन प्रमुख
आचार्यों—सोमानन्द, उत्पलदेव और अभिनवगुप्त—का
परिचय प्राप्त करने के बाद
अब हम इसके मूल
दार्शनिक सिद्धान्त में प्रवेश कर
सकते हैं। इस दर्शन
का सबसे महत्वपूर्ण शब्द
ही “प्रत्यभिज्ञा” है। यदि इस
शब्द का अर्थ केवल
“पहचान लेना” मान लिया जाए,
तो इस पूरे दर्शन
की गहराई समाप्त हो जाती है।
प्रत्यभिज्ञा
के लिए प्रश्न यह
नहीं है कि मैंने
किसी व्यक्ति या वस्तु को
पहले देखा था और
अब उसे पहचान लिया।
उसका प्रश्न इससे कहीं गहरा
है—
वह
कौन-सी चेतना है जो अतीत और वर्तमान के अनुभव को एक साथ जोड़कर कह सकती है—“यह वही है”?
और उससे भी गहरा
प्रश्न है—
जो
चेतना किसी वस्तु को पहचानती है, क्या वह स्वयं अपने वास्तविक स्वरूप को भी पहचान सकती है?
यहीं
सामान्य पहचान से आत्म-प्रत्यभिज्ञा की ओर यात्रा
प्रारम्भ होती है।
“प्रत्यभिज्ञा”
शब्द का सामान्य अर्थ
संस्कृत
में प्रत्यभिज्ञा का सामान्य अर्थ
है—पहले से ज्ञात
किसी वस्तु या व्यक्ति को
वर्तमान में पुनः पहचान
लेना।
मान
लीजिए किसी व्यक्ति से
आप वर्षों बाद मिलते हैं।
समय ने उसके चेहरे
में परिवर्तन कर दिया है।
बाल बदल गए हैं,
शरीर बदल गया है,
परिस्थितियाँ बदल गई हैं।
फिर भी आप कहते
हैं— “यह वही व्यक्ति है।”
यहाँ
वर्तमान में जो दिखाई
दे रहा है, वह
बिल्कुल अतीत जैसा नहीं
है। फिर भी चेतना
दोनों के बीच किसी
प्रकार की एकता स्थापित
करती है।
यही
सामान्य स्तर की प्रत्यभिज्ञा
है।
लेकिन
उत्पलदेव के लिए प्रश्न
यहीं समाप्त नहीं होता।
वे पूछते हैं— वर्तमान अनुभव और पूर्व अनुभव को एक ही पहचान में जोड़ने वाली सत्ता क्या है?
यदि
केवल वर्तमान क्षण ही वास्तविक
है, तो वह वर्तमान
अनुभव कैसे कह सकता
है—
“यह
वही है जिसे मैंने पहले जाना था”?
यहीं
प्रत्यभिज्ञा एक गहरे ज्ञानमीमांसात्मक
प्रश्न में बदल जाती
है।
स्मृति
और प्रत्यभिज्ञा में अन्तर
यहाँ
एक अत्यन्त महत्वपूर्ण भेद समझना आवश्यक
है।
स्मृति
में व्यक्ति किसी पूर्व अनुभव
को याद करता है।
उदाहरण— “मैंने
कल वाराणसी देखा था।”
यहाँ
वर्तमान चेतना अतीत के अनुभव
को पुनः उपस्थित करती
है।
लेकिन
प्रत्यभिज्ञा में केवल अतीत
का स्मरण नहीं होता।
जब व्यक्ति किसी पुराने परिचित
को देखकर कहता है— “यह
वही व्यक्ति है,”
तब वर्तमान में उपस्थित वस्तु
और अतीत में ज्ञात
वस्तु के बीच एकत्व
की पहचान होती है।
इसलिए—
स्मृति → अतीत का पुनःस्मरण
प्रत्यभिज्ञा
→ अतीत और वर्तमान की एकता की पहचान
यही
अन्तर आगे प्रत्यभिज्ञा दर्शन
की पूरी संरचना के
लिए निर्णायक बनता है।
“यह
वही है” — प्रत्यभिज्ञा की मूल संरचना
सामान्य
प्रत्यभिज्ञा को सरल वाक्य
में व्यक्त किया जा सकता
है— “यह वही है।”
यह छोटा-सा वाक्य
वास्तव में तीन स्तरों
को जोड़ता है— पूर्व अनुभव → वर्तमान अनुभव → दोनों की एकता
यदि
इन तीनों में से किसी
एक को हटा दिया
जाए, तो प्रत्यभिज्ञा का
स्वरूप बदल जाता है।
केवल
अतीत हो तो वह
स्मृति है। केवल वर्तमान हो तो वह
प्रत्यक्ष अनुभव है।
लेकिन
जब वर्तमान में उपस्थित वस्तु
को पूर्व में ज्ञात वस्तु
के रूप में पहचाना
जाता है, तब प्रत्यभिज्ञा
उत्पन्न होती है। यहीं से
उत्पलदेव की दार्शनिक समस्या
आरम्भ होती है।
बौद्ध
क्षणिकवाद के सामने प्रत्यभिज्ञा
प्रत्यभिज्ञा
दर्शन के विकास को
बौद्ध क्षणिकवाद के साथ हुए
दार्शनिक संवाद से अलग करके
नहीं समझा जा सकता।
यदि
प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक मानसिक अवस्था और प्रत्येक ज्ञान
क्षणिक है, तो प्रश्न
उठता है—
अतीत
के अनुभव और वर्तमान के अनुभव को कौन जोड़ रहा है?
यदि
“मैं” भी हर क्षण
नया है, तो वर्तमान
“मैं” कैसे कह सकता
है— “मैंने इसे पहले देखा था”?
यदि
अतीत का ज्ञाता और
वर्तमान का ज्ञाता सर्वथा
अलग हैं, तो पहचान
की एकता कहाँ से
आई?
यहाँ
प्रत्यभिज्ञा दर्शन स्थायी चेतन आधार की
ओर संकेत करता है।
उसका
तर्क मोटे रूप में
यह है कि पहचान
की सम्भावना स्वयं किसी प्रकार की
निरन्तरता और आत्म-एकता को स्वीकार करने
के लिए बाध्य करती
है।
अर्थात्
प्रत्यभिज्ञा केवल किसी वस्तु
की पहचान नहीं है; वह
उस चेतना की ओर भी
संकेत करती है जो
पहचान को सम्भव बनाती
है।
पहचानने
वाला कौन है?
अब प्रश्न और गहरा हो
जाता है। जब मैं कहता हूँ—
“यह वही व्यक्ति है,”
तो उस पहचान का
कर्ता कौन है? आँख?
मन? स्मृति? मस्तिष्क? या कोई चेतन
“मैं”?
आँख
केवल दृश्य ग्रहण करती है।
स्मृति
केवल पूर्व अनुभव को उपलब्ध कराती
है। मन विभिन्न मानसिक अवस्थाओं को जोड़ सकता
है।
लेकिन
इन सबके बीच जो
कहता है— “मैं इसे पहचानता हूँ,”
वह कौन है? यहीं
प्रत्यभिज्ञा दर्शन प्रमाता, अर्थात् ज्ञाता, की समस्या तक
पहुँचता है।
और यही आगे चलकर
उत्पलदेव के दर्शन में
अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है।
ज्ञाता
केवल ज्ञान का पात्र नहीं
कई दार्शनिक प्रणालियों में आत्मा को
ज्ञान का आश्रय माना
जाता है।
लेकिन
प्रत्यभिज्ञा का प्रश्न इससे
अधिक गहरा है।
यदि
आत्मा केवल ज्ञान को
धारण करने वाली कोई
सत्ता है, तो— वह
स्वयं को कैसे जानती है?
यदि
मैं कहता हूँ— “मैं
जानता हूँ कि मैं जानता हूँ,” तो यहाँ चेतना
केवल किसी बाहरी वस्तु
को नहीं जान रही।
वह अपने ही ज्ञान
की ओर लौट रही
है।
यहीं
से आत्मचेतना का प्रश्न उत्पन्न
होता है। प्रत्यभिज्ञा के लिए चेतना
का यह आत्म-संबंध
अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
“मैं”
की निरन्तरता
अब हम प्रत्यभिज्ञा के
सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न तक पहुँचते हैं।
बचपन
में मेरा शरीर अलग
था। आज मेरा शरीर अलग
है। मेरे विचार बदल गए। मेरी रुचियाँ
बदल गईं। मेरी स्मृतियाँ भी बदलती रहती
हैं। फिर भी मैं कहता
हूँ— “मैं वही हूँ।”
यह
“वही” किस आधार पर
है?
यदि
केवल शरीर ही “मैं”
है, तो शरीर के
निरन्तर परिवर्तन के बीच एक
ही आत्म-पहचान कैसे
बनी रहती है?
यदि
केवल स्मृति ही “मैं” है,
तो जिन घटनाओं को
मैं भूल गया, उनके
बाद भी मैं अपने
अस्तित्व की निरन्तरता क्यों
अनुभव करता हूँ?
यदि
प्रत्येक मानसिक अवस्था ही आत्मा है,
तो बदलती अवस्थाओं के बीच “मैं”
की एकता कैसे बनी
रहती है?
प्रत्यभिज्ञा
दर्शन इन प्रश्नों को
आत्मचेतना की ओर ले
जाता है।
सामान्य
आत्म-पहचान से परम आत्म-पहचान तक यहाँ प्रत्यभिज्ञा दर्शन
एक निर्णायक छलाँग लगाता है।
सामान्य
मनुष्य कहता है— “मैं
वही व्यक्ति हूँ।” प्रत्यभिज्ञा दर्शन इससे आगे पूछता
है—
“मैं
वास्तव में कौन हूँ?” शरीर बदलता है।
मन बदलता है। ज्ञान बदलता है। भावनाएँ बदलती हैं।
परिवर्तन
को जानने वाला कौन है?
यदि
परिवर्तन का अनुभव है,
तो किसी अर्थ में
कोई ऐसा आधार भी
होना चाहिए जिसके संदर्भ में परिवर्तन को
पहचाना जा सके। यहीं प्रत्यभिज्ञा
का दार्शनिक लक्ष्य सामने आता है—
सीमित
‘मैं’ की पहचान से सार्वभौम ‘अहम्’ की पहचान तक पहुँचना।
यही
वह बिन्दु है जहाँ साधारण
प्रत्यभिज्ञा आत्म-प्रत्यभिज्ञा बनने लगती है।
“मैं
शिव हूँ” — इसका अर्थ क्या है?
अब उस कथन पर
आएँ जो प्रत्यभिज्ञा दर्शन
को अद्वितीय बनाता है— शिव ही मेरा वास्तविक स्वरूप हैं।
इसका
अर्थ यह नहीं है
कि सीमित व्यक्ति अपने शरीर, मन
या व्यक्तित्व के स्तर पर
सर्वशक्तिमान ईश्वर बन गया।
यदि
ऐसा अर्थ लिया जाए
तो दर्शन की पूरी संरचना
अत्यन्त सरल और सतही
हो जाएगी।
प्रत्यभिज्ञा
का दावा अधिक सूक्ष्म
है।
वह कहती है कि
जिस चेतना के कारण “मैं”
का अनुभव सम्भव है, उसकी अंतिम
प्रकृति सीमित व्यक्तित्व तक सीमित नहीं
है।
सीमितता
अनुभव की अवस्था है।
परम चेतना उसकी आधारभूत वास्तविकता
है।
इसलिए
“शिवत्व की प्रत्यभिज्ञा” का
अर्थ है—
अपने
सीमित व्यक्तित्व को परम वास्तविकता मानने की धारणा के पार जाकर अपने चेतन स्वरूप की वास्तविक प्रकृति को पहचानना।
क्या
यह केवल अद्वैत वेदान्त जैसा ही है?
यहाँ
सावधानी अत्यन्त आवश्यक है।
प्रत्यभिज्ञा
और अद्वैत वेदान्त दोनों में अभेद की
भाषा मिल सकती है,
लेकिन दोनों की तत्त्वमीमांसा समान
नहीं है।
अद्वैत
वेदान्त में ब्रह्म को
परम सत्य और जगत
को माया के संदर्भ
में समझाया जाता है।
कश्मीर
शैव प्रत्यभिज्ञा में जगत को
परम चेतना की वास्तविक अभिव्यक्ति
के रूप में समझाने
की प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट है।
यहाँ शिव निष्क्रिय, केवल साक्षी सत्ता
नहीं हैं।
वे चेतन और स्वतन्त्र हैं। उनकी शक्ति वास्तविक अभिव्यक्ति करती है।
इसलिए
प्रत्यभिज्ञा का अद्वैत शक्ति-संपन्न अद्वैत है।
इसी
कारण इसे समझने के
लिए केवल “जीव-ब्रह्म अभेद”
की भाषा पर्याप्त नहीं
होगी।
मध्वाचार्य
की पहली निर्णायक आपत्ति
अब हमारे अध्ययन में मध्वीय दृष्टि
को व्यवस्थित रूप से सामने
रखना आवश्यक है।
यदि
कहा जाए कि— जीव
का वास्तविक स्वरूप शिव है,
तो मध्वीय प्रश्न होगा—
यदि
जीव और ईश्वर वास्तव में एक हैं, तो दोनों में अनुभवगत और सामर्थ्यगत इतना मूलभूत अन्तर क्यों है?
जीव
सीमित है। ईश्वर सर्वज्ञ है। जीव परतन्त्र है। ईश्वर स्वतन्त्र है। जीव कर्मफल का भोक्ता है।
ईश्वर कर्मफल का नियन्ता है।
यदि
दोनों की मूल सत्ता
एक ही है, तो
यह असमानता कहाँ से आई?
प्रत्यभिज्ञा
यहाँ सीमितता को परम चेतना
की पूर्ण सत्ता का अभाव नहीं
मानती, बल्कि चेतना के संकोचित अनुभव
की समस्या के रूप में
देखती है।
मध्वीय
दृष्टि इस समाधान को
स्वीकार नहीं करेगी, क्योंकि
उसके लिए जीव की
परतन्त्रता और ईश्वर की
स्वतन्त्रता उनके वास्तविक भेद से जुड़ी है।
इसलिए
विवाद केवल “आत्मा क्या है?” का
नहीं है।
विवाद
है— क्या चेतना की एकता परम सत्ता का तथ्य है या जीव और ईश्वर के बीच भेद ही परम सत्य का तथ्य है?
प्रत्यभिज्ञा और स्मृति का गहरा सम्बन्ध
एक और प्रश्न आवश्यक
है। यदि प्रत्यभिज्ञा केवल स्मृति नहीं
है, तो स्मृति के
बिना प्रत्यभिज्ञा सम्भव होगी?
सामान्य
पहचान में पूर्व अनुभव
का कोई न कोई
संस्कार या ज्ञान-संबंध
आवश्यक दिखाई देता है।
लेकिन
प्रत्यभिज्ञा दर्शन का लक्ष्य केवल
यह नहीं कि हम
किसी वस्तु को पहचानते हैं।
उसका
अंतिम प्रयोजन है— स्वरूप की पहचान। यहाँ “पहचान” का अर्थ किसी
नई सूचना का संग्रह नहीं
है।
यदि
मैं पहले से ही
अपने वास्तविक स्वरूप में शिव हूँ,
तो मुक्ति के समय कोई
नई सत्ता उत्पन्न नहीं होती।
कुछ
नया प्राप्त नहीं होता।
बल्कि—
जो पहले से है, उसकी पहचान होती है। यही बात प्रत्यभिज्ञा
के मोक्ष-सिद्धान्त को विशेष बनाती
है।
पहचान
और ज्ञान में अन्तर
यहाँ
एक और सूक्ष्म भेद
है।
यदि
मुझे किसी वस्तु के
बारे में पहली बार
जानकारी मिलती है, तो वह
नया ज्ञान है।
लेकिन
यदि किसी परिचित को
देखकर मैं कहता हूँ—
“अरे, यह वही है!” तो यहाँ केवल
नया ज्ञान नहीं आया।
अतीत
का ज्ञान और वर्तमान का
अनुभव एक विशिष्ट एकता
में जुड़े।
प्रत्यभिज्ञा
इसी प्रकार के ज्ञान को
दार्शनिक महत्व देती है।
इसलिए
मुक्ति को केवल “ज्ञान
प्राप्त करना” कहना पर्याप्त नहीं
होगा।
यहाँ
मुक्ति— स्वरूप की पहचान है।
अर्थात्—
मैं जो वास्तव में हूँ, उसे पहचानना।
यही
कारण है कि प्रत्यभिज्ञा
दर्शन में मुक्ति को
केवल बौद्धिक सूचना प्राप्त करने के रूप
में नहीं समझा जा
सकता।
अभिनवगुप्त
की ओर बढ़ता हुआ सिद्धान्त
यहीं
से अभिनवगुप्त की भूमिका और
महत्वपूर्ण हो जाती है।
उत्पलदेव
के दार्शनिक प्रतिपादन को अभिनवगुप्त ने
अत्यन्त विस्तार से समझाया और
उसमें प्रकाश-विमर्श, स्वातन्त्र्य, शक्ति और परम अहम्
जैसे सिद्धान्तों को व्यापक रूप
दिया।
चेतना
केवल प्रकाश है—इतना कहना
पर्याप्त नहीं। वह स्वयं को भी जानती
है।
इस आत्म-जानने की
क्षमता को विमर्श के माध्यम से
समझाया जाता है।
यही
विमर्श चेतना को केवल निष्क्रिय
प्रकाश से अलग करता
है।
यहाँ
चेतना— जानती है, अपने ज्ञान को जानती है, और स्वयं को व्यक्त करने की शक्ति रखती है।
यही
आगे प्रत्यभिज्ञा के परम शिव
की विशेषता बनेगी।
प्रत्यभिज्ञा
का वास्तविक दार्शनिक लक्ष्य
अब इस भाग की
पूरी यात्रा को एक सूत्र
में रख सकते हैं।
सामान्य
अनुभव— मैं वस्तु को जानता हूँ।
प्रत्यभिज्ञा—
मैं जानता हूँ कि यह वही वस्तु है।
आत्मचेतना—
मैं जानता हूँ कि मैं जानता हूँ।
प्रत्यभिज्ञा
का अंतिम प्रश्न— मैं वास्तव में कौन हूँ?
और शैव उत्तर— मेरी
चेतना का परम स्वरूप शिवस्वरूप है।
इसलिए
प्रत्यभिज्ञा का लक्ष्य किसी
बाहरी देवता की खोज मात्र
नहीं है।
यह चेतना की स्वयं अपने परम स्वरूप में पहचान है।
यहीं
से अगले भाग में
हमें उस सबसे महत्वपूर्ण
सिद्धान्त की ओर जाना
होगा जो इस पूरी
प्रक्रिया को सम्भव बनाता
है— अहम्।
क्योंकि
यदि प्रत्यभिज्ञा “अपने स्वरूप की
पहचान” है, तो पहले
यह निर्धारित करना होगा कि
वह “स्व” या “अहम्” क्या है जिसकी पहचान होनी है।
मुख्य
निष्कर्ष
प्रत्यभिज्ञा
का सामान्य अर्थ “पुनः पहचानना” है,
लेकिन कश्मीर शैव दर्शन में
इसका अर्थ साधारण स्मृति
या पहचान से कहीं अधिक
गहरा है। यहाँ प्रत्यभिज्ञा
अतीत और वर्तमान की
किसी वस्तु की एकता पहचानने
से आगे बढ़कर ज्ञाता
की अपनी वास्तविक सत्ता की पहचान बन जाती है।
“यह वही है” से
यात्रा “मैं कौन हूँ?”
तक पहुँचती है।
सोमानन्द
के चिन्तन में इस समस्या
का प्रारम्भिक बीज मिलता है,
उत्पलदेव इसे व्यवस्थित दार्शनिक
सिद्धान्त बनाते हैं और अभिनवगुप्त
इसे प्रकाश-विमर्श तथा परम अहम्
की व्यापक तत्त्वमीमांसा से जोड़ते हैं।
यहीं
प्रत्यभिज्ञा का सबसे साहसिक
प्रतिपादन सामने आता है—मुक्ति
किसी नई वस्तु की
प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने वास्तविक शिवस्वरूप
की पहचान है।
लेकिन
इसी बिन्दु पर मध्वीय द्वैत
की सबसे तीखी आपत्ति
भी खड़ी होती है—यदि जीव वास्तव
में शिव है, तो
जीव की सीमितता और
ईश्वर की सर्वज्ञता एवं
स्वतन्त्रता का वास्तविक अन्तर
कैसे समझाया जाए?
इस
प्रश्न का उत्तर आगे
की पूरी श्रृंखला में
निर्णायक भूमिका निभाएगा।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
क्या
मनुष्य की “मैं” की
अनुभूति केवल स्मृति और
मस्तिष्कीय निरन्तरता का परिणाम है?
यदि
चेतना स्वयं को जानती है,
तो क्या यह आत्मचेतना
किसी सार्वभौम चेतना की ओर संकेत
करती है?
क्या
“मैं शिव हूँ” को
मनोवैज्ञानिक अनुभव, आध्यात्मिक अनुभूति और दार्शनिक निष्कर्ष—तीनों स्तरों पर एक ही
अर्थ में समझा जा
सकता है?
और यदि जीव-ईश्वर
का वास्तविक भेद स्वीकार किया
जाए, तो प्रत्यभिज्ञा का
“स्वरूप-पहचान” सिद्धान्त किस रूप में
बचता है?
अगले
भाग की भूमिका
अब तक हमने जाना
कि प्रत्यभिज्ञा किसे कहते हैं
और सामान्य पहचान से उसकी दार्शनिक
यात्रा आत्म-पहचान तक
कैसे पहुँचती है। लेकिन अभी
सबसे महत्वपूर्ण शब्द की व्याख्या
शेष है—“अहम्”। आखिर वह कौन
है जो कहता है—“मैं”? क्या यह शरीर
है, मन है, बुद्धि
है, स्मृति है, अहंकार है,
व्यक्तिगत आत्मा है, या इन
सबको प्रकाशित करने वाली कोई
गहरी चेतना? प्रत्यभिज्ञा दर्शन का उत्तर यहीं
से अपनी विशिष्ट ऊँचाई
ग्रहण करता है। अगले
भाग में हम सीमित
“अहम्” से परम “अहम्” तक की यात्रा करेंगे
और देखेंगे कि उत्पलदेव तथा
अभिनवगुप्त के यहाँ “अहम्”
किस प्रकार शिव की पहचान
का मूल आधार बनता
है। इसी बिन्दु पर
मध्वाचार्य का वास्तविक जीव-ईश्वर भेद भी और
अधिक तीक्ष्ण रूप में सामने
आएगा।
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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