दर्शन —कश्मीर शैव (त्रिक) दर्शन - भाग–4 : शक्ति : शिव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति
कश्मीर शैव (त्रिक) दर्शन — चेतना, स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा, शिवाद्वैत और मानव-अनुभव का समग्र दार्शनिक अध्ययन
दर्शन
— भाग–4 : शक्ति : शिव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति
पिछले
भाग में हमने कश्मीर
शैव दर्शन के सबसे मूल
प्रश्न पर विचार किया
था—परमशिव कौन हैं? हमने देखा कि
इस दर्शन में परमशिव किसी
सीमित देवता या केवल सृष्टिकर्ता
ईश्वर का नाम नहीं
हैं, बल्कि स्वप्रकाश, आत्म-विमर्शी, स्वातन्त्र्यमय
चेतना हैं। किन्तु यदि
परमशिव पूर्ण, अनन्त और सर्वव्यापक हैं,
तो एक नया प्रश्न
उत्पन्न होता है—यह
जगत कहाँ से आया? यदि परम सत्य
एक ही है, तो
विविधता का उद्भव कैसे
हुआ? यदि शिव नित्य,
अपरिवर्तनशील और पूर्ण हैं,
तो सृष्टि, परिवर्तन, गति, अनुभव और
जीवों की बहुलता की
व्याख्या कैसे की जाएगी?
इन्हीं
प्रश्नों का उत्तर कश्मीर
शैव दर्शन "शक्ति" की अवधारणा के
माध्यम से देता है।
वास्तव में यदि परमशिव
इस दर्शन का हृदय हैं,
तो शक्ति उसकी धड़कन है।
शिव और शक्ति को
अलग करके कश्मीर शैव
दर्शन को समझना असम्भव
है। यहाँ शक्ति कोई
गौण तत्त्व नहीं, बल्कि स्वयं परमशिव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति
है।
भारतीय
धार्मिक परम्परा में "शक्ति" शब्द सुनते ही
सामान्यतः देवी की उपासना
का स्मरण होता है। दुर्गा,
काली, त्रिपुरसुन्दरी, पार्वती, ललिता आदि देवियाँ शक्ति
के विविध रूपों के रूप में
पूजित हैं। परन्तु कश्मीर
शैव दर्शन में शक्ति का
अर्थ केवल देवी-स्वरूप
तक सीमित नहीं है। यहाँ
शक्ति एक गहन दार्शनिक
सिद्धान्त है। यह परमचेतना
की सृजनात्मक क्षमता, उसकी आत्म-जागरूकता,
उसकी स्वतन्त्रता और उसकी अभिव्यक्तिशीलता
का नाम है।
यदि
हम पिछले भाग में वर्णित
"प्रकाश" और "विमर्श" की अवधारणाओं को
स्मरण करें, तो शक्ति का
वास्तविक अर्थ अधिक स्पष्ट
हो जाएगा। परमशिव प्रकाश हैं—स्वप्रकाश चेतना।
किन्तु यह प्रकाश निष्क्रिय
नहीं है; वह स्वयं
को जानता है, स्वयं को
व्यक्त करता है और
स्वयं में अनन्त सम्भावनाएँ
धारण करता है। चेतना
की यही आत्म-अभिव्यक्ति
शक्ति है। इसलिए अभिनवगुप्त
बार-बार कहते हैं
कि शिव बिना शक्ति के नहीं और शक्ति बिना शिव के नहीं।
यहाँ
शिव और शक्ति का
सम्बन्ध किसी दो पृथक
सत्ताओं का सम्बन्ध नहीं
है। वे एक ही
सत्य के दो भिन्न
पक्ष हैं। जैसे अग्नि
और उसकी ऊष्मा को
अलग नहीं किया जा
सकता, सूर्य और उसके प्रकाश
को पृथक नहीं किया
जा सकता, उसी प्रकार शिव
और शक्ति का भी विभाजन
सम्भव नहीं है। यदि
शिव चेतना हैं, तो शक्ति
उसी चेतना की सक्रियता है।
यदि शिव अस्तित्व हैं,
तो शक्ति अस्तित्व की अभिव्यक्ति है।
यदि शिव अनन्त सम्भावना
हैं, तो शक्ति उसी
सम्भावना का वास्तविक प्रस्फुटन
है।
यहीं
कश्मीर शैव दर्शन भारतीय
दर्शन में एक अत्यन्त
मौलिक योगदान देता है। अनेक
दार्शनिक प्रणालियों में परम सत्य
को निष्क्रिय, निर्विकल्प या केवल साक्षी
के रूप में देखा
गया है। कश्मीर शैव
दर्शन कहता है कि
यदि परम सत्य में
सृजन की क्षमता ही
न हो, तो विश्व
की व्याख्या अधूरी रह जाएगी। इसलिए
परमशिव केवल मौन साक्षी
नहीं, बल्कि सृजनात्मक चेतना हैं। यह सृजनात्मकता
शक्ति है।
यह
सृजन किसी बाहरी पदार्थ
पर आधारित नहीं है। शक्ति
कोई ऐसा उपकरण नहीं
जिससे शिव सृष्टि करते
हों। शिव स्वयं शक्ति
हैं और शक्ति स्वयं
शिव है। यही कारण
है कि त्रिक परम्परा
में "शिव-शक्ति-अभेद"
केवल धार्मिक नारा नहीं, बल्कि
सम्पूर्ण दर्शन का आधारभूत सिद्धान्त
है।
शक्ति
और स्वातन्त्र्य
पिछले
भाग में हमने स्वातन्त्र्य
का उल्लेख किया था। अब
उसका सम्बन्ध शक्ति से स्पष्ट होता
है। कश्मीर शैव दर्शन के
अनुसार परमशिव पूर्णतः स्वतन्त्र हैं। उनकी सृजनात्मकता
किसी बाहरी कारण से बाध्य
नहीं है। यह स्वतन्त्रता
शक्ति के माध्यम से
प्रकट होती है।
यदि
कोई चित्रकार चित्र बनाता है, तो वह
रंगों और कैनवास पर
निर्भर है। यदि कोई
कुम्हार घड़ा बनाता है,
तो उसे मिट्टी चाहिए।
परन्तु परमशिव की सृष्टि किसी
बाहरी पदार्थ से नहीं होती।
विश्व उनकी शक्ति का
विस्तार है। इसलिए यहाँ
सृष्टि को "निर्माण" नहीं, बल्कि "अभिव्यक्ति" अधिक उपयुक्त शब्द
माना गया है।
इस
सूक्ष्म अन्तर को समझना आवश्यक
है। निर्माण में निर्माता और
सामग्री अलग-अलग होती
हैं। अभिव्यक्ति में ऐसा नहीं
होता। जब कवि कविता
लिखता है, तो कविता
उसके अन्तर्मन की अभिव्यक्ति होती
है। उसी प्रकार विश्व
परमशिव की शक्ति की
अभिव्यक्ति है।
इच्छा,
ज्ञान और क्रिया शक्तियाँ
कश्मीर
शैव दर्शन शक्ति के अनेक आयामों
की चर्चा करता है, किन्तु
उनमें तीन प्रमुख मानी
जाती हैं—इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति।
इच्छाशक्ति
का अर्थ सामान्य इच्छा
नहीं है। यह परमचेतना
की सृजनात्मक प्रेरणा है। यह किसी
अभाव से उत्पन्न इच्छा
नहीं, बल्कि पूर्णता की सहज अभिव्यक्ति
है।
ज्ञानशक्ति
वह शक्ति है जिसके द्वारा
चेतना स्वयं को और अपने
द्वारा प्रकट विश्व को जानती है।
यहाँ ज्ञान बाहरी वस्तुओं का संग्रह नहीं,
बल्कि चेतना का आत्म-विस्तार
है।
क्रियाशक्ति
वह क्षमता है जिसके द्वारा
सम्भावना वास्तविक अभिव्यक्ति में परिवर्तित होती
है। सृष्टि, स्थिति, परिवर्तन और अनुभव का
सम्पूर्ण प्रवाह इसी शक्ति से
सम्भव होता है।
इन
तीनों को अलग-अलग
प्रक्रियाएँ नहीं समझना चाहिए।
वे एक ही चेतना
की तीन कार्यात्मक अभिव्यक्तियाँ
हैं।
शक्ति
और विश्व की वास्तविकता
यदि
विश्व शक्ति की अभिव्यक्ति है,
तो क्या यह वास्तविक
है?
कश्मीर
शैव दर्शन का उत्तर स्पष्ट
है—हाँ। विश्व वास्तविक
है, क्योंकि यह परमचेतना की
वास्तविक अभिव्यक्ति है। इसका अर्थ
यह नहीं कि प्रत्येक
अनुभव अन्तिम सत्य है, बल्कि
यह कि सम्पूर्ण अस्तित्व
का आधार सत्य है।
यही
कारण है कि इस
दर्शन में संसार का
निषेध नहीं मिलता। संसार
साधना का क्षेत्र भी
है, सौन्दर्य का क्षेत्र भी
है, अनुभव का क्षेत्र भी
है और आत्मबोध का
क्षेत्र भी। बन्धन संसार
में नहीं, बल्कि हमारी सीमित पहचान में है।
शक्ति
और सौन्दर्य
अभिनवगुप्त
ने शक्ति को केवल दार्शनिक
अवधारणा तक सीमित नहीं
रखा। उन्होंने भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में भी इसी
सिद्धान्त का प्रयोग किया।
जब कोई कलाकार सृजन
करता है, जब कोई
कवि कविता लिखता है, जब कोई
संगीतकार राग का निर्माण
करता है, तब वह
केवल कौशल का प्रदर्शन
नहीं करता; वह चेतना की
सृजनात्मक शक्ति को अभिव्यक्त करता
है।
इसीलिए
अभिनवगुप्त के लिए कला
भी आध्यात्मिक अनुभव का माध्यम बन
सकती है। रस का
अनुभव केवल मनोरंजन नहीं,
बल्कि सीमित अहं से ऊपर
उठकर व्यापक चेतना का स्पर्श है।
यह
दृष्टिकोण भारतीय सौन्दर्यशास्त्र को एक गहन
दार्शनिक आधार प्रदान करता
है।
शक्ति
और मानव जीवन
यदि
शक्ति केवल ब्रह्माण्डीय सिद्धान्त
है, तो मनुष्य के
जीवन में उसका क्या
अर्थ है?
कश्मीर
शैव दर्शन कहता है कि
प्रत्येक मनुष्य में वही शक्ति
विद्यमान है। हमारी कल्पना,
स्मृति, प्रेम, निर्णय, सृजनात्मकता, करुणा, भाषा, चिन्तन और आत्मबोध—ये
सब उसी शक्ति की
सीमित अभिव्यक्तियाँ हैं। साधना का
उद्देश्य नई शक्ति प्राप्त
करना नहीं, बल्कि अपने भीतर निहित
शक्ति को पहचानना है।
इसी
कारण यह दर्शन मनुष्य
को मूलतः असहाय प्राणी नहीं मानता। वह
उसे परमचेतना की अभिव्यक्ति मानता
है, जिसने अपनी वास्तविक पहचान
अस्थायी रूप से विस्मृत
कर दी है।
शक्ति
और आधुनिक विज्ञान
आधुनिक
विज्ञान "ऊर्जा" (Energy) की बात करता
है, इसलिए कभी-कभी लोग
शक्ति की तुलना ऊर्जा
से करने लगते हैं।
यह तुलना सावधानी से करनी चाहिए।
कश्मीर शैव दर्शन की
शक्ति भौतिक ऊर्जा नहीं है। ऊर्जा
भौतिक ब्रह्माण्ड की एक वैज्ञानिक
अवधारणा है, जबकि शक्ति
चेतना की सृजनात्मक क्षमता
का दार्शनिक सिद्धान्त है।
फिर
भी एक संवाद सम्भव
है। आज संज्ञान-विज्ञान
(Cognitive Science), रचनात्मकता-अध्ययन (Creativity Studies) और चेतना-विज्ञान
(Consciousness Studies) यह
स्वीकार करते हैं कि
मानव अनुभव केवल निष्क्रिय ग्रहण
नहीं है; उसमें सक्रिय
निर्माण और अर्थ-निर्माण
भी होता है। कश्मीर
शैव दर्शन इस सक्रियता को
शक्ति की व्यापक अवधारणा
के भीतर देखता है।
यह
समानता नहीं, बल्कि संवाद की सम्भावना है।
अगले
चरण की ओर
अब
तक हमने दो मूल
स्तम्भों को समझ लिया
है—परमशिव और शक्ति। किन्तु
एक प्रश्न अभी भी शेष
है। यदि शिव और
शक्ति अभिन्न हैं, तो यह
चेतना निरन्तर गतिशील क्यों प्रतीत होती है? अनुभवों
का प्रवाह कैसे उत्पन्न होता
है? परिवर्तन का आधार क्या
है? चेतना स्थिर होकर भी गतिशील
कैसे है?
इन्हीं
प्रश्नों के उत्तर में
कश्मीर शैव दर्शन अपना
एक अत्यन्त मौलिक सिद्धान्त प्रस्तुत करता है—स्पन्द। यह केवल
कम्पन नहीं, न गति मात्र
है और न ही
भौतिक कंपन का सिद्धान्त।
यह चेतना की सूक्ष्मतम जीवंतता
का दार्शनिक नाम है। वास्तव
में स्पन्द को समझे बिना
न शक्ति की पूर्ण व्याख्या
सम्भव है और न
ही विश्व की।
मुख्य
निष्कर्ष
कश्मीर
शैव दर्शन में शक्ति परमशिव
से पृथक कोई स्वतंत्र
सत्ता नहीं, बल्कि उनकी स्वाभाविक, सृजनात्मक
और आत्म-अभिव्यक्तिशील चेतना
है। शिव और शक्ति
का अभेद इस सम्पूर्ण
दर्शन की आधारशिला है।
इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियाँ
उसी परमचेतना की कार्यात्मक अभिव्यक्तियाँ
हैं, जिनके माध्यम से विश्व का
प्राकट्य, अनुभव और आत्मबोध सम्भव
होते हैं। इस दृष्टि
से संसार न तो मिथ्या
है और न ही
परमशिव से पृथक; वह
शक्ति का जीवित विस्तार
है। यही सिद्धान्त आगे
स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा और सम्पूर्ण त्रिक
दर्शन की दार्शनिक संरचना
का आधार बनता है।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
- क्या सृजनात्मकता केवल मस्तिष्क की जैविक प्रक्रिया है, या चेतना की कोई गहरी अभिव्यक्ति?
- यदि प्रत्येक मनुष्य में शक्ति निहित है, तो शिक्षा और साधना का वास्तविक उद्देश्य क्या होना चाहिए?
- क्या कला, साहित्य और संगीत को चेतना की दार्शनिक अभिव्यक्ति के रूप में पुनः समझा जा सकता है?
- क्या विश्व को शक्ति की अभिव्यक्ति मानने से मनुष्य और प्रकृति के सम्बन्ध की नई नैतिक व्याख्या सम्भव है?
अगले
भाग की भूमिका
अब
तक हमने परमशिव और
शक्ति की अभिन्नता को
समझा। किन्तु शक्ति केवल सृजन की
क्षमता नहीं है; वह
एक निरन्तर जीवित चेतना भी है। यह
जीवंतता किस रूप में
प्रकट होती है? कश्मीर
शैव दर्शन "स्पन्द" शब्द से क्या
अभिप्राय लेता है? क्या
स्पन्द गति है, कम्पन
है, ऊर्जा है, या उससे
भी अधिक सूक्ष्म कोई
दार्शनिक सत्य? अगले भाग में
हम स्पन्द सिद्धान्त का अध्ययन करेंगे
और समझेंगे कि त्रिक परम्परा
सम्पूर्ण विश्व को चेतना के
जीवंत स्पन्द के रूप में
क्यों देखती है।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग धारक की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख, पुनर्प्रकाशन अथवा उपयोग हेतु अनुमत नहीं हैं।)
Comments
Post a Comment