दर्शन - भाग–5 : क्या बौद्ध दर्शन नास्तिक है? — ईश्वर, आत्मा और परम सत्य का प्रश्न

 ग्रंथ : भारतीय दर्शन श्रृंखला - बौद्ध दर्शन- अध्याय–1 : बौद्ध दर्शन का परिचय

भाग–5 : क्या बौद्ध दर्शन नास्तिक है? — ईश्वर, आत्मा और परम सत्य का प्रश्न

बौद्ध दर्शन के सम्बन्ध में सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न यह है कि क्या बौद्ध दर्शन नास्तिक (Atheistic) है? सामान्यतः इसका उत्तर "हाँ" या "नहीं" में दे दिया जाता है, किन्तु दार्शनिक दृष्टि से यह उत्तर अधूरा है। वास्तव में बौद्ध दर्शन को समझने के लिए पहले यह स्पष्ट करना होगा कि "नास्तिक" शब्द का अर्थ क्या है और भारतीय दर्शन में इसका प्रयोग किस सन्दर्भ में हुआ है।

आधुनिक पश्चिमी परम्परा में नास्तिक वह है जो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। किन्तु भारतीय दर्शन में "आस्तिक" और "नास्तिक" शब्दों का मूल अर्थ ईश्वर-स्वीकृति नहीं, बल्कि वेद-प्रामाण्य की स्वीकृति या अस्वीकृति है। जो दर्शन वेदों को प्रमाण मानते हैं, वे परम्परागत रूप से आस्तिक कहे गए; जो वेदों को अंतिम प्रमाण नहीं मानते, उन्हें नास्तिक कहा गया। इस दृष्टि से बौद्ध, जैन और चार्वाकतीनों नास्तिक दर्शनों की श्रेणी में रखे जाते हैं।

किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि बौद्ध दर्शन केवल ईश्वर का निषेध करता है। आश्चर्य की बात यह है कि बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व का तो स्पष्ट प्रतिपादन किया और ही उसका व्यवस्थित खण्डन किया। उन्होंने इस प्रश्न को मानव-मुक्ति के लिए अनिवार्य नहीं माना।

जब बुद्ध से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, आत्मा की शाश्वतता, ईश्वर की सत्ता अथवा मृत्यु के बाद आत्मा की अंतिम स्थिति जैसे प्रश्न पूछे गए, तब अनेक अवसरों पर उन्होंने मौन धारण किया। बौद्ध साहित्य में इन्हें अव्याकृत प्रश्न (Avyākta Questions) कहा गया है। बुद्ध का तर्क था कि यदि कोई व्यक्ति विषबाण से घायल हो, तो उसके लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि बाण कैसे निकाला जाए; यह नहीं कि बाण किस लकड़ी का बना है या किसने चलाया है। उसी प्रकार दुःख से पीड़ित मनुष्य के लिए पहला प्रश्न यह नहीं कि सृष्टि किसने बनाई, बल्कि यह है कि दुःख से मुक्ति कैसे मिले।

यह दृष्टिकोण बौद्ध दर्शन की मौलिक विशेषता है। बुद्ध ने दार्शनिक जिज्ञासाओं का विरोध नहीं किया, किन्तु वे उन प्रश्नों को प्राथमिकता नहीं देते थे जिनका समाधान मनुष्य के दुःख को कम नहीं करता। इसलिए उनका दर्शन व्यावहारिक (Pragmatic) और अनुभववादी (Experiential) कहा जाता है।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि बौद्ध दर्शन आध्यात्मिक नहीं है। इसके विपरीत, सम्पूर्ण बौद्ध परम्परा ध्यान, समाधि, करुणा, प्रज्ञा और निर्वाण जैसे गहन आध्यात्मिक अनुभवों पर आधारित है। अन्तर केवल इतना है कि यहाँ आध्यात्मिकता का आधार किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर में विश्वास नहीं, बल्कि मानव चेतना का रूपान्तरण है।

यही कारण है कि आधुनिक विद्वान बौद्ध दर्शन को कई प्रकार से वर्गीकृत करते हैं। कुछ इसे -ईश्वरवादी (Non-theistic) कहते हैं, क्योंकि यह ईश्वर का निषेध करने की अपेक्षा ईश्वर के प्रश्न को साधना का केन्द्र नहीं बनाता। कुछ इसे अज्ञेयवादी (Agnostic) प्रवृत्ति का मानते हैं, क्योंकि बुद्ध ने अनेक आध्यात्मिक प्रश्नों पर निर्णायक मत देने से परहेज़ किया। वहीं कुछ विद्वान इसे अनुभव-केन्द्रित दर्शन कहते हैं, क्योंकि इसमें सत्य का आधार प्रत्यक्ष साधना और आत्मानुभूति है।

यहाँ एक और महत्वपूर्ण तथ्य ध्यान देने योग्य है। बुद्ध ने मनुष्य को बाहरी सत्ता पर निर्भर रहने के स्थान पर स्वयं अपने प्रयास का महत्त्व सिखाया। उनका प्रसिद्ध वचन है

"अप्प दीपो भव"
"स्वयं अपने दीपक बनो।"

इसका आशय यह नहीं कि गुरु या परम्परा का कोई महत्त्व नहीं, बल्कि यह कि अंतिम जागृति किसी बाहरी शक्ति द्वारा प्रदान नहीं की जा सकती। मार्ग दिखाया जा सकता है, किन्तु उस मार्ग पर चलना प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं ही होगा।

बौद्ध दर्शन में देवताओं का उल्लेख अवश्य मिलता है, किन्तु वे भी जन्म-मरण के चक्र से परे नहीं माने गए हैं। वे सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता नहीं हैं। इसलिए बौद्ध दर्शन का केन्द्र देव-पूजा नहीं, बल्कि मानव चेतना का विकास है।

यही कारण है कि आधुनिक विज्ञान और बौद्ध दर्शन के बीच संवाद अपेक्षाकृत सहज दिखाई देता है। दोनों ही अनुभव, निरीक्षण और परीक्षण को महत्त्व देते हैं। यद्यपि दोनों के उद्देश्य भिन्न हैं, फिर भी सत्य की खोज की उनकी पद्धतियों में एक प्रकार की बौद्धिक ईमानदारी दिखाई देती है।

अतः यह कहना अधिक उचित होगा कि बौद्ध दर्शन का उद्देश्य ईश्वर को सिद्ध या असिद्ध करना नहीं, बल्कि मनुष्य को जागृत करना है। उसके लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि ईश्वर है या नहीं, बल्कि यह है कि मनुष्य अपने अज्ञान, तृष्णा और दुःख से कैसे मुक्त हो सकता है।

मुख्य निष्कर्ष

  • भारतीय परम्परा में "नास्तिक" का अर्थ वेद-प्रामाण्य का अस्वीकार है, केवल ईश्वर का निषेध नहीं।
  • बुद्ध ने ईश्वर-संबन्धी प्रश्नों को मानव-मुक्ति की दृष्टि से गौण माना।
  • बौद्ध दर्शन का केन्द्र अनुभव, साधना और दुःख-निवारण है।
  • इसे अधिक उपयुक्त रूप से -ईश्वरवादी (Non-theistic) या अनुभववादी दर्शन कहा जा सकता है।
  • बौद्ध आध्यात्मिकता का आधार चेतना का रूपान्तरण है, कि सृष्टिकर्ता ईश्वर में अनिवार्य विश्वास।

आज के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न

  • क्या हर आध्यात्मिक परम्परा के लिए ईश्वर की अवधारणा अनिवार्य है?
  • क्या मनुष्य नैतिक और आध्यात्मिक जीवन ईश्वर-विश्वास के बिना भी जी सकता है?
  • क्या दुःख के समाधान का प्रश्न, ईश्वर के प्रश्न से अधिक व्यावहारिक है?
  • क्या आधुनिक विज्ञान और बौद्ध दर्शन के बीच संवाद का आधार अनुभव की समान महत्ता है?

अगले भाग की भूमिका

अब तक हमने बुद्ध, उनके युग और बौद्ध दर्शन की मूल प्रकृति को समझा। अगले भाग में हम बौद्ध दर्शन की संपूर्ण शिक्षाओं की आधारशिला का अध्ययन करेंगेचार आर्य सत्य यही वे सिद्धान्त हैं जिन पर सम्पूर्ण बौद्ध दर्शन, नैतिकता और साधना का भवन निर्मित हुआ।

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)

इस ब्लॉग के सभी लेख लेखक के मौलिक अध्ययन, दार्शनिक चिंतन एवं शोध-आधारित लेखन पर आधारित हैं। उचित संदर्भ के साथ उद्धृत किया जा सकता है।

 

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