दर्शन —नकुलीश (पाशुपत) दर्शन - भाग–5 : पाश (बन्धन) और दुःख का सिद्धान्त
नकुलीश (पाशुपत) दर्शन — इतिहास, शिवतत्त्व, साधना, मोक्ष और भारतीय शैव परम्परा के आलोक में समग्र अध्ययन
दर्शन
— भाग–5 : पाश (बन्धन) और दुःख का सिद्धान्त
पाशुपत
दर्शन की दार्शनिक संरचना
तीन आधारभूत संकल्पनाओं पर निर्मित है—पति, पाशु और पाश। पहले दो
भागों में हमने परम
स्वतंत्र सत्ता अर्थात् पति (शिव) तथा सीमित चेतन
सत्ता अर्थात् पाशु (जीव) का अध्ययन किया।
अब तीसरा और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
प्रश्न सामने आता है—यदि
जीव चेतन है, नित्य
है और मोक्ष की
क्षमता रखता है, तो
वह बन्धन में क्यों है?
वह दुःख का अनुभव
क्यों करता है? और
यदि बन्धन है, तो उसका
स्वरूप क्या है?
इन्हीं
प्रश्नों का उत्तर पाशुपत
दर्शन "पाश" की अवधारणा के
माध्यम से देता है।
वास्तव में यदि पाश
को समझ लिया जाए,
तो पाशुपत दर्शन के साधना और
मोक्ष सम्बन्धी अधिकांश सिद्धान्त स्वतः स्पष्ट होने लगते हैं।
पाश
का शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ
संस्कृत
में "पाश" का सामान्य अर्थ
है—रस्सी, बन्धन या वह साधन
जिससे किसी को बाँधा
जाए। परन्तु पाशुपत दर्शन में यह शब्द
प्रतीकात्मक और दार्शनिक अर्थ
ग्रहण कर लेता है।
यहाँ
पाश कोई भौतिक रस्सी
नहीं है। यह उन सभी कारणों
का समष्टि-नाम है जो
जीव की स्वाभाविक चेतना
को सीमित कर देते हैं।
इस
प्रकार पाश एक मानसिक
अवस्था भी है, एक
नैतिक स्थिति भी है, एक
आध्यात्मिक समस्या भी है और
एक अस्तित्वगत वास्तविकता भी।
यही
कारण है कि पाशुपत
परम्परा में जीव को
"पशु" कहा गया है—अर्थात् वह जो पाश
से आबद्ध है।
बन्धन
का वास्तविक स्वरूप
पाशुपत
दर्शन के अनुसार जीव
का बन्धन उसकी वास्तविक सत्ता
नहीं है। यदि बन्धन ही उसका स्वभाव
होता, तो उससे मुक्ति
कभी सम्भव नहीं होती।
बन्धन
एक आगन्तुक अवस्था है—ऐसी स्थिति
जो जीव के साथ
जुड़ी हुई है, किन्तु
उसका मूल स्वरूप नहीं
है। इस दृष्टि से पाशुपत दर्शन
अत्यन्त आशावादी दर्शन है।
यह
मनुष्य को मूलतः दोषपूर्ण
नहीं मानता।
वह
कहता है कि जीव
का वास्तविक स्वरूप चेतन है, किन्तु
उसकी चेतना विभिन्न कारणों से सीमित हो
गई है।
अविद्या
: बन्धन का मूल कारण
यद्यपि
पाशुपत दर्शन अविद्या का वही स्वरूप
स्वीकार नहीं करता जो
अद्वैत वेदान्त में मिलता है,
फिर भी वह अज्ञान
को बन्धन का प्रमुख कारण
मानता है।
यह
अज्ञान केवल पुस्तकीय ज्ञान
का अभाव नहीं है।
यह अपने वास्तविक स्वरूप को न पहचान
पाने की अवस्था है।
जीव
स्वयं को केवल शरीर
समझने लगता है। वह इन्द्रियों
को ही सम्पूर्ण सत्य
मान बैठता है।
वह
क्षणिक सुखों को स्थायी आनन्द
समझ लेता है। यही अज्ञान
धीरे-धीरे कर्म और
दुःख की श्रृंखला को
जन्म देता है।
कर्म
: बन्धन का दूसरा आधार
अज्ञान
से प्रेरित होकर जीव कर्म
करता है। कर्म स्वयं में दोष नहीं
है।
दोष
उस आसक्ति और अहंकार में
है जिसके साथ कर्म किया
जाता है।
ऐसे
कर्म फल उत्पन्न करते
हैं। फल पुनः नए कर्मों
का कारण बनते हैं।
इस प्रकार जीव कर्म और
कर्मफल के निरन्तर चक्र
में घूमता रहता है।
पाशुपत
दर्शन कर्म को स्वीकार
करता है, किन्तु उसे
अंतिम नियन्ता नहीं मानता।
यदि
केवल कर्म ही अंतिम
सत्य होता, तो मोक्ष असम्भव
हो जाता।
इसीलिए
इस दर्शन में शिव के
अनुग्रह का सिद्धान्त भी
उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
दुःख
की उत्पत्ति
पाशुपत
दर्शन में दुःख किसी
दैवी दण्ड का परिणाम
नहीं है। यह बन्धन की स्वाभाविक परिणति
है।
जब जीव सीमित वस्तुओं
में स्थायी सुख खोजता है,
तब निराशा उत्पन्न होती है।
जब वह परिवर्तनशील वस्तुओं
से चिरस्थायी सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है,
तब वियोग दुःख देता है।
जब वह स्वयं को
शरीर तक सीमित कर
लेता है, तब जन्म,
जरा और मृत्यु का
भय उत्पन्न होता है।
इस प्रकार दुःख बाहर से
आरोपित नहीं होता। वह जीव
की सीमित दृष्टि का परिणाम है।
क्या
संसार ही बन्धन है?
यहाँ
पाशुपत दर्शन एक अत्यन्त सूक्ष्म
भेद स्थापित करता है।
संसार
स्वयं बन्धन नहीं है। बन्धन संसार
के प्रति जीव की आसक्ति
है।
यदि
केवल संसार ही बन्धन होता,
तो शिव द्वारा निर्मित
जगत स्वयं दोषपूर्ण सिद्ध होता।
किन्तु
पाशुपत दर्शन ऐसा नहीं कहता।
जगत अनुभव का क्षेत्र है।
समस्या
जगत नहीं, बल्कि उसके प्रति जीव
की अज्ञानपूर्ण प्रवृत्ति है।
बन्धन
और स्वतंत्रता का सम्बन्ध
बन्धन का अर्थ यह
नहीं कि जीव पूर्णतः
असहाय है। यदि ऐसा होता तो
साधना का कोई अर्थ
नहीं रहता।
जीव
में अभी भी चुनाव
करने की क्षमता है।
वह सत्य की ओर भी
जा सकता है और
असत्य की ओर भी।
वह
साधना कर सकता है।
वह आत्मानुशासन अपना सकता है।
वह शिव की ओर उन्मुख
हो सकता है।
इसी
सीमित स्वतंत्रता के कारण आध्यात्मिक
जीवन सम्भव होता है।
बन्धन
और अहंकार
यद्यपि
पाशुपत दर्शन अहंकार का वही विश्लेषण
नहीं करता जो सांख्य
करता है, फिर भी
अहंभाव को बन्धन का
एक प्रमुख कारण मानता है।
जब जीव स्वयं को
कर्मों का पूर्ण स्वामी
समझता है, तब वह
फल के साथ जुड़
जाता है।
जब वह अपने सीमित
अस्तित्व को ही सम्पूर्ण
सत्य मान लेता है,
तब उसका दृष्टिकोण संकुचित
हो जाता है।
यह अहंकार उसे शिव से
दूर नहीं करता, बल्कि
शिव की वास्तविक अनुभूति
से दूर कर देता
है।
बन्धन
और नैतिक जीवन
पाशुपत
दर्शन के अनुसार बन्धन
केवल आध्यात्मिक समस्या नहीं है।
उसका
नैतिक पक्ष भी है।
क्रोध, लोभ, हिंसा, असत्य, स्वार्थ, असंयम—
ये केवल सामाजिक दोष
नहीं हैं। ये जीव की आन्तरिक
परतन्त्रता के लक्षण हैं।
इसी कारण नैतिक जीवन साधना का
अंग बन जाता है।
नैतिकता
यहाँ सामाजिक अनुशासन भर नहीं, बल्कि
आध्यात्मिक शुद्धि का साधन है।
क्या
बन्धन शाश्वत है?
इस
प्रश्न का उत्तर पाशुपत
दर्शन स्पष्ट रूप से "नहीं"
में देता है।
यदि
बन्धन शाश्वत होता, तो मोक्ष असम्भव
होता। यदि जीव का स्वभाव
ही दुःख होता, तो
मुक्ति केवल कल्पना बनकर
रह जाती।
किन्तु
जीव की चेतना में
ऐसी क्षमता विद्यमान है जिससे वह
धीरे-धीरे बन्धनों का
अतिक्रमण कर सकता है।
यही
कारण है कि पाशुपत
दर्शन निराशा का नहीं, आशा
का दर्शन है।
शिवकृपा
और बन्धन का अन्त
एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि
यदि साधना आवश्यक है, तो शिवकृपा
की आवश्यकता क्यों?
पाशुपत
आचार्यों के अनुसार साधना
जीव को पात्र बनाती
है। किन्तु अंतिम आध्यात्मिक पूर्णता केवल व्यक्तिगत प्रयास
से नहीं आती।
शिव
का अनुग्रह जीव के आध्यात्मिक
विकास को पूर्ण करता
है। यहाँ कृपा कर्म का
विरोध नहीं करती।
बल्कि
कर्म और साधना को
उनके चरम परिणाम तक
पहुँचाती है।
अन्य
भारतीय दर्शनों से तुलना
सांख्य
दर्शन में बन्धन का
कारण पुरुष और प्रकृति का
अविवेक है।
योग
दर्शन चित्तवृत्तियों को मूल समस्या
मानता है।
अद्वैत
वेदान्त अविद्या को एकमात्र कारण
बताता है।
बौद्ध
दर्शन तृष्णा और अविद्या को
दुःख का कारण मानता
है।
जैन
दर्शन कर्म-पुद्गल के
बन्धन की चर्चा करता
है।
पाशुपत
दर्शन इन सबसे संवाद
करता हुआ अपना विशिष्ट
दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
यह अज्ञान, कर्म, दुःख और शिव
से दूरावस्था—इन सभी को
मिलाकर बन्धन की व्याख्या करता
है।
आधुनिक
मनोवैज्ञानिक और अस्तित्ववादी परिप्रेक्ष्य
यदि
आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से
देखा जाए तो पाशुपत
दर्शन का "पाश" उन आन्तरिक संरचनाओं
के समान प्रतीत होता
है जो मनुष्य को
स्वतन्त्र जीवन जीने से
रोकती हैं—जैसे भय,
असुरक्षा, आसक्ति, दोषपूर्ण आत्मबोध और नकारात्मक व्यवहार-पद्धतियाँ।
अस्तित्ववादी
दर्शन भी मनुष्य की
सीमाओं और उसके आत्म-विस्मरण की चर्चा करता
है।
किन्तु
पाशुपत दर्शन का समाधान केवल
मनोवैज्ञानिक नहीं है। वह आध्यात्मिक
है।
उसके
अनुसार बन्धन का अन्त केवल
आत्मविश्लेषण से नहीं, बल्कि
साधना, आचार और शिव-अनुग्रह के समन्वय से
होता है।
पाश
क्यों समझना आवश्यक है?
यदि
रोग का कारण ज्ञात
न हो तो उपचार
भी सम्भव नहीं होता।
इसी
प्रकार यदि जीव अपने
बन्धनों को पहचान ही
न सके, तो मुक्ति
केवल एक कल्पना बनकर
रह जाएगी।
इसलिए
पाशुपत दर्शन में बन्धन का
अध्ययन निराशा उत्पन्न करने के लिए
नहीं, बल्कि मुक्ति की दिशा स्पष्ट
करने के लिए किया
गया है।
यही
कारण है कि पाशुपतसूत्र
में बन्धन का विवेचन अन्ततः
साधना और दुःखान्त (मोक्ष)
की भूमिका तैयार करता है।
मुख्य
निष्कर्ष
पाशुपत
दर्शन में "पाश" उन समस्त कारणों
का दार्शनिक नाम है जो
जीव की चेतना को
सीमित कर देते हैं।
अज्ञान, कर्म, आसक्ति, अहंकार और उनसे उत्पन्न
दुःख—ये सभी बन्धन
के विभिन्न रूप हैं। संसार
स्वयं बन्धन नहीं है; बन्धन
उसके प्रति जीव की अज्ञानपूर्ण
प्रवृत्ति है। जीव का
मूल स्वरूप चेतन है, अतः
बन्धन शाश्वत नहीं हो सकता।
साधना, नैतिक जीवन, आत्मानुशासन और शिवकृपा के
माध्यम से इन बन्धनों
का अतिक्रमण सम्भव है। इस प्रकार
पाशुपत दर्शन दुःख का केवल
विश्लेषण नहीं करता, बल्कि
उससे मुक्ति की वास्तविक सम्भावना
भी प्रस्तुत करता है।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
- क्या आधुनिक मनुष्य के मानसिक तनाव और अस्तित्वगत संकट को "पाश" की अवधारणा के आलोक में समझा जा सकता है?
- क्या कर्म और शिवकृपा का समन्वय दार्शनिक दृष्टि से तार्किक है?
- क्या बन्धन मुख्यतः बाहरी परिस्थितियों का परिणाम है या आन्तरिक चेतना की अवस्था का?
- यदि बन्धन आगन्तुक है, तो मनुष्य की वास्तविक आध्यात्मिक पहचान क्या है?
अगले
भाग की भूमिका
अब
तक हमने पाशुपत दर्शन
की मूल त्रयी—पति,
पाशु और पाश—का अध्ययन कर
लिया है। किन्तु इन
तीनों को एक सुव्यवस्थित
दार्शनिक प्रणाली में संगठित करने
वाला सिद्धान्त अभी शेष है।
पाशुपत दर्शन का सबसे विशिष्ट
और मौलिक प्रतिपादन है—पञ्चार्थ सिद्धान्त। कारण, कार्य,
योग, विधि और दुःखान्त—ये पाँच तत्त्व
सम्पूर्ण पाशुपत दर्शन की आधाररचना हैं।
अगले भाग में हम
पाशुपतसूत्र और कौण्डिन्यभाष्य के आधार पर
इन पाँचों अर्थों का विस्तृत दार्शनिक
विवेचन करेंगे और समझेंगे कि
इन्हीं पर सम्पूर्ण पाशुपत
दर्शन का वैचारिक भवन
निर्मित है।
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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