दर्शन —मध्वाचार्य का द्वैत दर्शन - भाग–5 : जगत का स्वरूप और उसकी वास्तविकता
मध्वाचार्य का द्वैत दर्शन — इतिहास, तत्त्वमीमांसा, भक्ति, तर्क और आधुनिक चिन्तन के आलोक में समग्र अध्ययन
दर्शन
— भाग–5 : जगत का स्वरूप और उसकी वास्तविकता
पिछले
भाग में हमने मध्वाचार्य
के अनुसार जीव के स्वरूप,
उसकी परतन्त्रता तथा जीवों के
तारतम्य का अध्ययन किया।
अब हम द्वैत दर्शन
के तीसरे और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
स्तम्भ की ओर बढ़ते
हैं—जगत। यदि ईश्वर
सर्वोच्च स्वतंत्र सत्ता हैं और जीव
वास्तविक परतन्त्र सत्ता है, तो यह
दृश्य ब्रह्माण्ड क्या है? क्या
पर्वत, नदियाँ, आकाश, ग्रह, तारे, वनस्पतियाँ, पशु, मनुष्य और
समस्त प्रकृति वास्तव में अस्तित्व रखते
हैं, या वे केवल
चेतना में उत्पन्न होने
वाले आभास हैं?
भारतीय
दर्शन में यह प्रश्न
केवल ब्रह्माण्ड-विज्ञान (Cosmology) का नहीं, बल्कि
मोक्ष, नैतिकता और आध्यात्मिक साधना
का भी प्रश्न है।
यदि संसार वास्तविक नहीं है, तो
कर्म, धर्म, दया, सेवा और
उत्तरदायित्व का क्या अर्थ
होगा? और यदि संसार
वास्तविक है, तो ईश्वर
और जगत का सम्बन्ध
किस प्रकार समझा जाए? मध्वाचार्य
का उत्तर अत्यन्त स्पष्ट है—जगत वास्तविक है, क्योंकि उसका आधार वास्तविक ईश्वर है। वह ईश्वर पर
निर्भर है, किन्तु मिथ्या
नहीं है।
जगत
: भ्रम नहीं, वास्तविक सृष्टि
मध्वाचार्य
का सबसे प्रसिद्ध दार्शनिक
प्रतिपादन यह है कि
यह संसार सत्य है। यहाँ "सत्य"
का अर्थ यह नहीं
कि जगत ईश्वर के
समान स्वतंत्र और अनन्त है।
उसका अर्थ यह है
कि संसार का अस्तित्व वस्तुगत
(Objective) और वास्तविक है।
हम
जिन वस्तुओं को देखते हैं,
वे केवल मानसिक कल्पनाएँ
नहीं हैं। पर्वत वास्तव
में पर्वत हैं, नदियाँ वास्तव
में नदियाँ हैं, शरीर वास्तव
में शरीर है और
प्रकृति वास्तव में प्रकृति है।
यह
सम्पूर्ण विश्व ईश्वर की व्यवस्था का
अंग है। इसलिए इसकी
वास्तविकता को अस्वीकार करना
ईश्वर की सृष्टि को
अस्वीकार करने के समान
होगा।
मायावाद
का खण्डन
मध्वाचार्य
का दार्शनिक विमर्श अद्वैत वेदान्त की आलोचना के
बिना पूर्ण नहीं होता। यद्यपि
उन्होंने शंकराचार्य के प्रति व्यक्तिगत
सम्मान बनाए रखा, किन्तु
उन्होंने मायावाद की मूल अवधारणा
का तर्कपूर्वक प्रतिवाद किया।
उनके
अनुसार यदि संसार केवल
अविद्या का परिणाम हो,
तो अनेक गंभीर प्रश्न
उत्पन्न होते हैं—
यदि
अविद्या है, तो वह
किसकी है?
यदि
ब्रह्म की है, तो
ब्रह्म पूर्ण कैसे रहा?
यदि
जीव की है, तो
जीव स्वयं कब और कैसे
उत्पन्न हुआ?
यदि
संसार मिथ्या है, तो धर्म,
अधर्म, वेद, गुरु, साधना
और मोक्ष भी क्या मिथ्या
होंगे?
मध्वाचार्य
का मत है कि
इन प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर
तभी सम्भव है जब संसार
की वास्तविकता स्वीकार की जाए।
इस
प्रकार उनका खण्डन केवल
विरोध के लिए नहीं,
बल्कि वैकल्पिक दार्शनिक समाधान प्रस्तुत करने के लिए
है।
प्रकृति
का स्वरूप
द्वैत
दर्शन में प्रकृति एक
वास्तविक परतन्त्र सत्ता है। वह न
तो ईश्वर है और न
ईश्वर का भ्रम।
प्रकृति
ईश्वर की अधीन शक्ति
है, जिसके माध्यम से सृष्टि की
विविधता प्रकट होती है।
यहाँ
प्रकृति का सम्मान किया
गया है, क्योंकि वह
ईश्वर की व्यवस्था का
उपकरण है।
इसका
अर्थ यह भी है
कि पर्यावरण, जैव विविधता और
प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण केवल
सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक उत्तरदायित्व
भी है।
सृष्टि
: उत्पत्ति या व्यवस्था?
मध्वाचार्य
के अनुसार ईश्वर सृष्टि के सर्वोच्च नियन्ता
हैं। वे सृष्टि का
संचालन करते हैं, उसका
संरक्षण करते हैं और
नियत समय पर उसका
संहार भी होता है।
किन्तु
इसका अर्थ यह नहीं
कि ईश्वर स्वयं पदार्थ में बदल जाते
हैं।
द्वैत
दर्शन में ईश्वर और
सृष्टि के बीच कारण-कार्य सम्बन्ध है, परन्तु दोनों
की सत्ता अभिन्न नहीं हो जाती।
ईश्वर
जगत के निमित्त कारण
हैं, और उनकी इच्छा
से प्रकृति में सृष्टि का
क्रम प्रकट होता है।
इस
प्रकार सृष्टि ईश्वर की वास्तविक व्यवस्था
है, न कि किसी
प्रकार का स्वप्न या
भ्रम।
पदार्थ
की वास्तविकता
मध्वाचार्य
पदार्थ (Matter) को भी वास्तविक
मानते हैं।
पृथ्वी,
जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पंचमहाभूत केवल
अनुभवजन्य प्रतीतियाँ नहीं हैं, बल्कि
ईश्वर द्वारा व्यवस्थित वास्तविक तत्त्व हैं।
मनुष्य
का शरीर, इन्द्रियाँ, ग्रह, नक्षत्र, वनस्पति, पशु और समस्त
भौतिक जगत इसी वास्तविक
व्यवस्था का भाग हैं।
यद्यपि
पदार्थ परिवर्तनशील है, किन्तु परिवर्तनशील
होना मिथ्या होने का प्रमाण
नहीं है।
एक
वृक्ष बीज से उत्पन्न
होकर विशाल बनता है, फिर
सूख जाता है। उसका
परिवर्तन उसकी वास्तविकता को
समाप्त नहीं करता।
काल
और दिक् की वास्तविकता
मध्वाचार्य
के अनुसार काल (Time) और दिक् (Space) भी वास्तविक तत्त्व
हैं। काल केवल मानसिक कल्पना
नहीं है। दिक् केवल अनुभव की
रचना नहीं है।
ये
दोनों ईश्वर के अधीन परतन्त्र
तत्त्व हैं और जगत
की व्यवस्था के लिए आवश्यक
हैं।
आधुनिक
भौतिकी भी समय और
स्थान को ब्रह्माण्ड की
मूल संरचना का अंग मानती
है। यद्यपि दोनों दृष्टियों की कार्यपद्धति भिन्न
है, फिर भी यह
तथ्य विचारणीय है कि मध्वाचार्य
ने भी काल और
दिक् को वास्तविक सत्ता
के रूप में स्वीकार
किया था।
परिवर्तन
और वास्तविकता
मध्वाचार्य
के दर्शन में परिवर्तन (Change) वास्तविक है।
ऋतुएँ बदलती हैं। जीवन बदलता है। शरीर बदलता है। सभ्यताएँ बदलती हैं। किन्तु परिवर्तन का अर्थ यह
नहीं कि परिवर्तनशील वस्तुएँ
मिथ्या हैं।
यदि
परिवर्तन ही असत्य का
प्रमाण होता, तो स्वयं अनुभव
का कोई आधार नहीं
बचता।
इस प्रकार द्वैत दर्शन परिवर्तन और स्थायित्व—दोनों
को समुचित स्थान देता है।
जगत
और नैतिक जीवन
यदि
संसार वास्तविक है, तो नैतिकता
भी वास्तविक है।
किसी
भूखे को भोजन कराना
वास्तविक पुण्य है। किसी को पीड़ा देना
वास्तविक पाप है। पर्यावरण की
रक्षा करना वास्तविक उत्तरदायित्व
है। अन्याय का विरोध करना
वास्तविक धर्म है।
द्वैत
दर्शन संसार से पलायन नहीं
सिखाता; वह संसार में
रहते हुए ईश्वर की
व्यवस्था के अनुरूप जीवन
जीने की प्रेरणा देता
है।
आधुनिक
विज्ञान और द्वैत का यथार्थवाद
आधुनिक
विज्ञान पदार्थ, ऊर्जा, आकाशगंगाओं, जैव-विकास और
प्राकृतिक नियमों का अध्ययन करता
है। वह यह मानकर
चलता है कि ब्रह्माण्ड
वस्तुगत रूप से विद्यमान
है।
मध्वाचार्य
का यथार्थवाद भी जगत की
वस्तुगत वास्तविकता को स्वीकार करता
है। किन्तु दोनों के उद्देश्य अलग
हैं।
विज्ञान
पूछता है—"यह संसार कैसे कार्य करता है?"
दर्शन
पूछता है—"यह संसार क्यों है, इसका अंतिम आधार क्या है?"
इस
प्रकार विज्ञान और द्वैत दर्शन
समान नहीं हैं, परन्तु
उनके बीच सार्थक संवाद
सम्भव है।
पर्यावरणीय
दृष्टि से द्वैत
आज
मानव सभ्यता जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के
क्षय और प्राकृतिक संसाधनों
के अंधाधुंध दोहन जैसी समस्याओं
का सामना कर रही है।
यदि
जगत को ईश्वर की
वास्तविक सृष्टि माना जाए, तो
उसका संरक्षण केवल उपयोगितावादी नीति
नहीं रह जाता, बल्कि
धार्मिक उत्तरदायित्व बन जाता है।
द्वैत
दर्शन हमें यह दृष्टि
देता है कि प्रकृति
उपभोग की वस्तु नहीं,
बल्कि ईश्वर की व्यवस्था का
पवित्र आयाम है।
शास्त्रीय
आधार
मध्वाचार्य
ने ब्रह्मसूत्रभाष्य, अनुव्याख्यान, तत्त्वोद्योत और तत्त्वविवेक में जगत की
वास्तविकता का विस्तार से
प्रतिपादन किया है। भगवद्गीता
(9.10)— मयाध्यक्षेण
प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
की
व्याख्या करते हुए वे
स्पष्ट करते हैं कि
प्रकृति ईश्वर के अधीन कार्य
करती है, किन्तु उसका
अस्तित्व वास्तविक है। महाभारत तात्पर्यनिर्णय तथा
भागवत तात्पर्यनिर्णय में
भी सृष्टि को ईश्वर की
वास्तविक व्यवस्था के रूप में
प्रस्तुत किया गया है।
मुख्य
निष्कर्ष
मध्वाचार्य
के अनुसार जगत न तो
मिथ्या है और न
ईश्वर से अभिन्न। यह
ईश्वर पर आश्रित, किन्तु
वास्तविक सृष्टि है। प्रकृति, पदार्थ,
काल, दिक् और परिवर्तन—सभी वास्तविक परतन्त्र
तत्त्व हैं। संसार की
इसी वास्तविकता के कारण नैतिकता,
कर्म, धर्म, भक्ति और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व
का दार्शनिक आधार स्थापित होता
है। इस प्रकार द्वैत
दर्शन एक सशक्त यथार्थवादी
विश्वदृष्टि प्रस्तुत करता है।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
- यदि
संसार ईश्वर की वास्तविक सृष्टि है, तो पर्यावरण विनाश को क्या आध्यात्मिक संकट भी माना जाना चाहिए?
- क्या
परिवर्तनशील होना किसी वस्तु के मिथ्या होने का प्रमाण है?
- आधुनिक
विज्ञान के वस्तुगत यथार्थवाद और मध्वाचार्य के तत्त्ववाद के बीच संवाद की सीमाएँ और सम्भावनाएँ क्या हैं?
- यदि
संसार वास्तविक है, तो आध्यात्मिक जीवन और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच क्या सम्बन्ध स्थापित होता है?
अगले
भाग की भूमिका
अब
तक हमने द्वैत दर्शन
के तीन आधारभूत तत्त्वों—ईश्वर, जीव और जगत—को अलग-अलग
समझा। किन्तु मध्वाचार्य का सबसे प्रसिद्ध
दार्शनिक प्रतिपादन अभी शेष है।
यदि ये तीनों वास्तविक
हैं, तो उनके बीच
सम्बन्ध किस प्रकार का
है? क्या ईश्वर और
जीव समान हैं? क्या
जीव और जीव समान
हैं? क्या जगत की
सभी वस्तुएँ एक-दूसरे से
भिन्न हैं? इन सभी
प्रश्नों का उत्तर मध्वाचार्य
अपने पंचभेद सिद्धान्त के माध्यम से
देते हैं। अगले भाग
में हम इस सिद्धान्त
के पाँचों भेदों का क्रमशः अध्ययन
करेंगे और समझेंगे कि
यही सिद्धान्त सम्पूर्ण द्वैत दर्शन की दार्शनिक रीढ़
क्यों माना जाता है।
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE
BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI)
Comments
Post a Comment