दर्शन — कश्मीर शैव (त्रिक) दर्शन - भाग–8 : शिवसूत्र — सम्पूर्ण कश्मीर शैव दर्शन का बीज

 कश्मीर शैव (त्रिक) दर्शनचेतना, स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा, शिवाद्वैत और मानव-अनुभव का समग्र दार्शनिक अध्ययन

दर्शनभाग–8 : शिवसूत्रसम्पूर्ण कश्मीर शैव दर्शन का बीज

पिछले सात भागों में हमने कश्मीर शैव दर्शन की दार्शनिक पृष्ठभूमि, परमशिव, शक्ति, स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा तथा छत्तीस तत्त्वों की विस्तृत संरचना का अध्ययन किया। अब हम इस श्रृंखला के दूसरे और अधिक महत्त्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ से हमारा अध्ययन मूल ग्रन्थों पर केन्द्रित होगा। कश्मीर शैव परम्परा का वह ग्रन्थ, जिसे सम्पूर्ण दर्शन का बीज कहा जाता है, वह हैशिवसूत्र

भारतीय दार्शनिक परम्परा में सूत्र-ग्रन्थों का विशेष स्थान है। वे विस्तृत व्याख्या नहीं देते, बल्कि अत्यन्त संक्षिप्त शब्दों में सम्पूर्ण दर्शन का सार समेट लेते हैं। जैसे ब्रह्मसूत्र वेदान्त का आधार हैं, योगसूत्र पतञ्जलि योग का, वैसे ही शिवसूत्र कश्मीर शैव दर्शन की मूल आधारशिला हैं।

परम्परा के अनुसार इन सूत्रों का आविर्भाव आचार्य वसुगुप्त को हुआ। प्रसिद्ध कथा है कि उन्हें स्वप्न में भगवान शिव का आदेश मिला और महादेव पर्वत की एक शिला पर उत्कीर्ण ये सूत्र प्राप्त हुए। ऐतिहासिक दृष्टि से इस कथा का सत्यापन कठिन है, किन्तु दार्शनिक दृष्टि से इसका संकेत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसका आशय यह है कि सत्य बाहरी रचना नहीं, बल्कि चेतना का अनावरण है। चाहे इन सूत्रों की रचना वसुगुप्त ने की हो या उनका संकलन किया हो, इसमें कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने भारतीय दर्शन को एक अद्वितीय चेतना-दर्शन प्रदान किया।

शिवसूत्र तीन उपायदृष्टियोंशाम्भवोपाय, शाक्तोपाय और आणवोपायमें विभाजित हैं। इन तीनों का उद्देश्य अलग-अलग साधकों के लिए आत्मबोध का मार्ग प्रस्तुत करना है। यद्यपि साधना-पद्धति का विस्तृत विवेचन आगे आएगा, यहाँ यह समझना पर्याप्त है कि सम्पूर्ण ग्रन्थ का केन्द्र एक ही हैमनुष्य अपने वास्तविक शिवस्वरूप को कैसे पहचान सकता है?

अब हम कुछ प्रतिनिधि सूत्रों का क्रमशः अध्ययन करेंगे।

सूत्र–1 - चैतन्यमात्मा॥

सरल हिन्दी अर्थ - आत्मा का वास्तविक स्वरूप चैतन्य है।

क्षेमराज की व्याख्या का सार

क्षेमराज स्पष्ट करते हैं कि यहाँ आत्मा से आशय सीमित जीव नहीं, बल्कि वह स्वप्रकाश चेतना है जो सभी अनुभवों का आधार है। शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ आत्मा नहीं हैं; वे आत्मा में प्रकाशित होने वाले उपकरण हैं। आत्मा स्वयं कभी जड़ नहीं होती।

दार्शनिक विश्लेषण

यह सम्पूर्ण शिवसूत्र का उद्घाटन-वाक्य है। आश्चर्य की बात यह है कि ग्रन्थ ईश्वर, सृष्टि, कर्म या मोक्ष से आरम्भ नहीं होता। उसका प्रारम्भ चेतना से होता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि कश्मीर शैव दर्शन का केन्द्र ईश्वरवाद नहीं, बल्कि चेतना है।

यदि आत्मा चैतन्य है, तो मनुष्य की वास्तविक पहचान शरीर या मन नहीं हो सकती। शरीर बदलता है, विचार बदलते हैं, स्मृतियाँ बदलती हैं, किन्तु अनुभव करने वाली चेतना का आधार बना रहता है।

यही कारण है कि कश्मीर शैव दर्शन में आत्मा कोई पदार्थ नहीं, बल्कि अनुभव की आधारभूमि है।

अन्य भारतीय दर्शनों से संवाद

अद्वैत वेदान्त भी आत्मा को चैतन्य मानता है, किन्तु कश्मीर शैव दर्शन आगे बढ़कर यह जोड़ता है कि यह चैतन्य केवल साक्षी नहीं, बल्कि स्वातन्त्र्यमय और सृजनात्मक भी है।

बौद्ध विज्ञानवाद अनुभव की प्रधानता स्वीकार करता है, किन्तु स्थायी आत्मा को नहीं मानता। शिवसूत्र इसके विपरीत चेतना की निरन्तरता को स्वीकार करते हैं।

आधुनिक सन्दर्भ

आज चेतना-अध्ययन (Consciousness Studies) का सबसे कठिन प्रश्न यही है कि अनुभव का आधार क्या है। शिवसूत्र इस प्रश्न का उत्तर अनुभवजन्य विज्ञान की भाषा में नहीं, बल्कि दार्शनिक भाषा में देते हैंअनुभव का आधार स्वयं चेतना है।

सूत्र–2 - ज्ञानं बन्धः॥

सरल हिन्दी अर्थ - सीमित ज्ञान ही बन्धन है।

क्षेमराज की व्याख्या का सार

क्षेमराज बताते हैं कि यहाँ "ज्ञान" से आशय परमज्ञान नहीं है। यहाँ वह सीमित, विभाजित और अहंकार-आधारित ज्ञान है जिसमें जीव स्वयं को केवल शरीर, मन और व्यक्तित्व तक सीमित मान लेता है।

दार्शनिक विश्लेषण

यह सम्पूर्ण भारतीय दर्शन के सबसे क्रान्तिकारी सूत्रों में से एक है। सामान्यतः हम सोचते हैं कि ज्ञान मुक्ति देता है। शिवसूत्र कहते हैंसीमित ज्ञान स्वयं बन्धन बन सकता है। यह विरोधाभास नहीं है। यहाँ दो प्रकार के ज्ञानों का अन्तर है। एक है सूचना, अवधारणा, पहचान और सीमित अनुभवों का ज्ञान। दूसरा है आत्मस्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव।

पहला ज्ञान आवश्यक है, किन्तु यदि वही अन्तिम सत्य बन जाए, तो वही बन्धन बन जाता है।

जब मनुष्य स्वयं को केवल नाम, जाति, शरीर, पद, सफलता, असफलता या विचारधारा तक सीमित कर देता है, तब उसका ज्ञान ही उसकी सीमा बन जाता है।

अन्य भारतीय दर्शनों से संवाद

उपनिषदों में "अविद्या" को बन्धन कहा गया है। शिवसूत्र एक कदम आगे बढ़कर बताते हैं कि सीमित ज्ञान भी अविद्या का रूप ले सकता है यदि वह आत्मस्वरूप को ढक दे।

आधुनिक सन्दर्भ

आधुनिक मनोविज्ञान में "Identity Fixation" अर्थात् सीमित आत्म-पहचान का विचार मिलता है। व्यक्ति स्वयं को किसी एक पहचान में इतना बाँध लेता है कि उसकी व्यापक सम्भावनाएँ समाप्त होने लगती हैं।

यद्यपि यह शिवसूत्र का प्रत्यक्ष अर्थ नहीं है, फिर भी संवाद का एक रोचक क्षेत्र अवश्य बनता है।

सूत्र–3 - उद्यमो भैरवः॥

सरल हिन्दी अर्थ - उद्यम अर्थात् चेतना का सर्वोच्च जागरण ही भैरव है।

क्षेमराज की व्याख्या का सार

क्षेमराज के अनुसार "उद्यम" का अर्थ साधारण प्रयास नहीं है। यह वह आन्तरिक चेतना-विस्फुरण है जिसमें जीव अपनी सीमितता से ऊपर उठकर अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करता है।

दार्शनिक विश्लेषण

भैरव शब्द यहाँ किसी उग्र देवता का नाम नहीं है। भैरव उस अनन्त चेतना का प्रतीक है जिसमें समस्त सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। "उद्यम" भी शारीरिक प्रयास नहीं है। यह चेतना की वह तीव्र जागृति है जिसमें आत्मस्वरूप स्वयं प्रकट होता है।

अर्थात् भैरव तक पहुँचना किसी स्थान की यात्रा नहीं, बल्कि चेतना की जागृति है।

अन्य भारतीय दर्शनों से संवाद

योगसूत्र चित्तवृत्ति निरोध की बात करते हैं। शिवसूत्र जागृत चेतना की बात करते हैं। दोनों के लक्ष्य में साम्य है, किन्तु भाषा और पद्धति में भिन्नता है।

आधुनिक सन्दर्भ

कुछ आधुनिक मनोवैज्ञानिक "Peak Experience" अथवा "Transformative Awareness" की चर्चा करते हैं। यद्यपि इन्हें भैरव-अनुभव के समान नहीं माना जा सकता, फिर भी दोनों में चेतना की असाधारण अवस्थाओं के प्रति रुचि दिखाई देती है।

सूत्र–4 - शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः॥

सरल हिन्दी अर्थ - शक्ति-चक्र में पूर्ण एकाग्रता होने पर विश्व का लय हो जाता है।

क्षेमराज की व्याख्या का सार

क्षेमराज स्पष्ट करते हैं कि यहाँ विश्व का वास्तविक विनाश अभिप्रेत नहीं है। इसका अर्थ हैसीमित अनुभवों का विलय होकर चेतना की अखण्डता का अनुभव होना।

दार्शनिक विश्लेषण

जब तक मन अनेक विषयों में बिखरा रहता है, तब तक विश्व असंख्य वस्तुओं का समूह प्रतीत होता है। - किन्तु जब चेतना अपनी मूल शक्ति में स्थिर होती है, तब विषय-वस्तु का भेद क्षीण होने लगता है।

विश्व समाप्त नहीं होता। विश्व के प्रति हमारी सीमित दृष्टि समाप्त होती है।

यही कारण है कि इस सूत्र को ध्यान की चरम अवस्था का संकेत माना गया है।

अन्य भारतीय दर्शनों से संवाद

अद्वैत वेदान्त में ब्रह्मज्ञान के बाद जगत की अनुभूति का स्वरूप बदल जाता है। कश्मीर शैव दर्शन भी अनुभव-परिवर्तन की बात करता है, किन्तु जगत को शिव की शक्ति की अभिव्यक्ति मानते हुए उसकी वास्तविकता को स्वीकार करता है।

आधुनिक सन्दर्भ

ध्यान पर आधुनिक शोधों में यह पाया गया है कि गहन एकाग्रता की अवस्थाओं में आत्म और विश्व के बीच की सीमाओं का अनुभव परिवर्तित हो सकता है। शिवसूत्र इन अवस्थाओं का तंत्रिका-विज्ञान नहीं देते, बल्कि उनकी दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।

शिवसूत्र का समग्र दार्शनिक संदेश

इन चार सूत्रों को यदि एक साथ पढ़ा जाए, तो सम्पूर्ण कश्मीर शैव दर्शन का मूल ढाँचा स्पष्ट हो जाता है।

मनुष्य का वास्तविक स्वरूप चैतन्य है। सीमित आत्म-पहचान ही बन्धन है। चेतना का जागरण ही भैरव-अनुभव है।

और शक्ति में स्थित होकर वही चेतना विश्व की सीमित व्याख्या से ऊपर उठ जाती है।

यही कारण है कि शिवसूत्र केवल साधना-ग्रन्थ नहीं हैं। वे चेतना के दर्शन का संक्षिप्त संविधान हैं।

इन सूत्रों में कहीं भी जटिल कर्मकाण्ड नहीं है, सम्प्रदायगत आग्रह। सम्पूर्ण बल अनुभव, आत्मबोध और चेतना पर है। यही कारण है कि कश्मीर शैव परम्परा में शिवसूत्रों को केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि बार-बार चिन्तन और साधना का विषय बनाया जाता है।

मुख्य निष्कर्ष

शिवसूत्र कश्मीर शैव दर्शन का मूल बीजग्रन्थ है, जिसमें अत्यन्त संक्षिप्त सूत्रों में सम्पूर्ण त्रिक दर्शन का सार निहित है। "चैतन्यमात्मा", "ज्ञानं बन्धः", "उद्यमो भैरवः" और "शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः" जैसे सूत्र स्पष्ट करते हैं कि इस परम्परा का केन्द्र बाहरी धार्मिक व्यवस्था नहीं, बल्कि चेतना, आत्मबोध और अनुभव का दार्शनिक विश्लेषण है। क्षेमराज और अभिनवगुप्त की व्याख्याएँ इन सूत्रों को केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं रहने देतीं, बल्कि उन्हें भारतीय दर्शन की अत्यन्त विकसित चेतना-मीमांसा में रूपान्तरित कर देती हैं।

आज के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न

  1. क्या मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या अज्ञान है या सीमित आत्म-पहचान?
  2. क्या चेतना का प्रत्यक्ष अनुभव केवल ध्यान का विषय है, या सामान्य जीवन में भी सम्भव है?
  3. क्या आधुनिक शिक्षा सूचना तो देती है, किन्तु आत्म-परिचय की उपेक्षा करती है?
  4. क्या चेतना के अध्ययन में अनुभव और तर्क दोनों को समान महत्त्व मिलना चाहिए?

अगले भाग की भूमिका

शिवसूत्रों ने कश्मीर शैव दर्शन की आधारभूमि प्रस्तुत की। किन्तु यदि चेतना वास्तव में स्पन्दमयी है, तो उसका प्रत्यक्ष अनुभव कैसे किया जाए? इस प्रश्न का उत्तर हमें दो महान ग्रन्थोंस्पन्दकारिका और विज्ञानभैरवमें मिलता है। एक ओर स्पन्दकारिका चेतना की जीवंतता का दार्शनिक विश्लेषण करती है, तो दूसरी ओर विज्ञानभैरव ११२ ध्यान-उपायों के माध्यम से अनुभव की सूक्ष्मतम अवस्थाओं का मार्ग खोलता है। अगले भाग में हम इन दोनों ग्रन्थों के प्रतिनिधि श्लोकों के आधार पर अनुभव, ध्यान और चेतना के विज्ञान का अध्ययन करेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)

(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग धारक की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख, पुनर्प्रकाशन अथवा उपयोग हेतु अनुमत नहीं हैं।)

 

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है