दर्शन — प्रत्यभिज्ञा दर्शन भाग–9 — माया और पाँच कञ्चुक : अनन्त चेतना का सीमित अनुभव

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भाग–9 — माया और पाँच कञ्चुक : अनन्त चेतना का सीमित अनुभव

भाग–8 में हमने 36 तत्त्वों की समग्र संरचना देखी। अब हम उस बिन्दु पर आते हैं जहाँ प्रत्यभिज्ञा दर्शन की अनन्त चेतना पहली बार सीमित अनुभव की संरचना में प्रवेश करती दिखाई देती है।

यहाँ मुख्य प्रश्न सृष्टि का नहीं, सीमितता का है।

जो चेतना मूलतः सर्वकर्ता, सर्वज्ञ, पूर्ण, नित्य और स्वतन्त्र है, वही सीमित ज्ञाता, सीमित कर्ता, इच्छाओं से बँधा, काल में स्थित और परिस्थितियों से नियंत्रित जीव के रूप में कैसे अनुभव होती है?

प्रत्यभिज्ञा का उत्तर केवलअज्ञाननहीं है। वह सीमितता की एक पूरी तत्त्वगत संरचना प्रस्तुत करता हैमाया और पाँच कञ्चुक।

माया : केवल भ्रम नहीं

प्रत्यभिज्ञा दर्शन में माया को समझते समय सबसे पहली भूल यही होगी कि इसे सीधेझूठा संसारमान लिया जाए।

यहाँ माया का दार्शनिक कार्य अधिक विशिष्ट है।

माया वह शक्ति है जिसके माध्यम सेअभेद में भेद,  अनन्त में सीमितता, पूर्ण में अपूर्णता का अनुभव सम्भव होता है।

इसलिए माया को केवल किसी मानसिक भ्रम के रूप में नहीं, बल्कि भेद-प्रतीति और सीमित प्रमाता की तत्त्वगत पृष्ठभूमि के रूप में समझना चाहिए।

माया क्या करती है?

परम चेतना में किसी वस्तु को अपने से पूर्णतः अलग देखने की आवश्यकता नहीं।

लेकिन सीमित अनुभव मेंमैं और यहदो पृथक ध्रुव बन जाते हैं।

मैं यहाँ हूँ।

वस्तु वहाँ है।

मैं इसे जानता हूँ।

वह मेरे ज्ञान का विषय है।

यहीं से ज्ञाताज्ञेय की सीमित संरचना दृढ़ होती है।

माया का कार्य इसी प्रकार के भेद को सम्भव बनाना है।

माया और अविद्या में अन्तर

यह अन्तर बहुत महत्वपूर्ण है।

अविद्या को सामान्यतः किसी वस्तु या सत्य के बारे में अज्ञान के रूप में समझा जा सकता है।

लेकिन माया की भूमिका उससे व्यापक है। माया वह तत्त्वगत स्थिति है जिसके भीतर सीमितता की पूरी व्यवस्था सम्भव होती है।

अर्थात्अविद्या = जानना जबकि यहाँमाया = सीमित ज्ञाताज्ञेय संरचना की तत्त्वगत भूमि। इसलिए दोनों को एक ही मानना उचित नहीं।

यदि माया भेद उत्पन्न करती है तो क्या वह शिव से अलग है?

यहाँ प्रत्यभिज्ञा के अद्वैत की कठिन परीक्षा होती है। यदि माया शिव से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता है, तो दो परम सत्ताएँ माननी पड़ेंगी।

फिर शिव का स्वातन्त्र्य प्रश्न में पड़ जाएगा। इसलिए माया को भी अन्ततः शिव की शक्ति-व्यवस्था के भीतर ही समझना होगा। अर्थात्माया शिव के बाहर की दूसरी परम सत्ता नहीं।

वह चेतना के स्वातन्त्र्य में सम्भव होने वाला सीमितता का आयाम है।

लेकिन यदि माया शिव की शक्ति है तो बन्धन क्यों?

यहीं एक महत्वपूर्ण दार्शनिक समस्या है। यदि माया भी शिव की शक्ति है, तोक्या शिव स्वयं को बाँध रहे हैं?

प्रत्यभिज्ञा की दिशा में इसका उत्तर है कि परम चेतना की स्वतन्त्रता में अनन्त सम्भावनाएँ हैं।

स्वातन्त्र्य का अर्थ केवलपूर्णता में रहनानहीं है। यदि शिव वास्तव में स्वतन्त्र हैं, तो वे स्वयं को

सीमित ज्ञाता के रूप में भी प्रकट कर सकते हैं। यही सीमितता का दार्शनिक आधार है।

लेकिन यहाँशिव अज्ञानी हो गएऐसा कहना गलत होगा। सीमितता अनुभव के स्तर पर है; परम चेतना का स्वातन्त्र्य समाप्त नहीं होता।

पाँच कञ्चुक क्यों आवश्यक हैं?

माया से केवल इतना समझ में आता है किभेद सम्भव हुआ।

लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि जीव की सीमाएँ इतनी विशिष्ट क्यों हैं।

जीव

  • सब कुछ नहीं कर सकता,
  • सब कुछ नहीं जानता,
  • हर वस्तु की इच्छा नहीं करता,
  • समय से बँधा है,
  • परिस्थितियों से बँधा है।

इन पाँच प्रकार की सीमाओं को व्यवस्थित रूप से समझाने के लिए पाँच कञ्चुक माने जाते हैं।

वे हैंकला, विद्या, राग, काल, नियति।

पहला कञ्चुककला

यहाँ कला का अर्थ कला-कौशल नहीं है। यह सर्वकर्तृत्व के संकोच का सिद्धान्त है।

परम शिव की शक्तिअनन्त कर्तृत्व रखती है। लेकिन सीमित जीव कहता है— “मैं यह कर सकता हूँ, लेकिन यह नहीं कर सकता।

यानी अनन्त क्रियाशक्ति एक सीमित क्षमता में अनुभव होती है। इसी को कला कञ्चुक कहा जाता है।

कला की दार्शनिक गहराई

मनुष्य का अनुभव देखिए। वह अपने जीवन में अनेक काम कर सकता है। लेकिनहर काम नहीं।

उसकी शक्ति सीमित है। उसका शरीर सीमित है। उसका ज्ञान सीमित है। उसके साधन सीमित हैं। उसकी परिस्थितियाँ सीमित हैं। इसलिएमैं कर्ता हूँका अनुभव तो बना रहता है, लेकिनमैं सर्वकर्ता हूँका अनुभव समाप्त हो जाता है। यही कर्तृत्व-संकोच है।

दूसरा कञ्चुकविद्या

यहाँ भीविद्याका अर्थ सामान्य शिक्षा नहीं। यह सर्वज्ञत्व के संकोच का सिद्धान्त है। परम चेतना में ज्ञान सीमित नहीं। लेकिन जीव

कुछ जानता है, कुछ नहीं जानता।

वह किसी वस्तु को देखता है। दूसरी वस्तु उसके ज्ञान से बाहर रहती है।

एक विषय का ज्ञान प्राप्त करता है। दूसरे के बारे में अनभिज्ञ रहता है।

इस प्रकारसर्वज्ञत्वसीमित ज्ञान का संकोच होता है। यही विद्या कञ्चुक है।

कला और विद्या में अन्तर

इन दोनों को मिलाना नहीं चाहिए।

कला पूछती हैमैं कितना कर सकता हूँ?

विद्या पूछती हैमैं कितना जान सकता हूँ?

इसलिएकला = कर्तृत्व की सीमा, विद्या = ज्ञान की सीमा यह भेद प्रत्यभिज्ञा की जीवमीमांसा में आगे बहुत महत्वपूर्ण होगा।

तीसरा कञ्चुकराग

अब प्रश्न ज्ञान या कर्म का नहीं, पूर्णता के अनुभव का है। परम चेतना स्वयं में पूर्ण है। उसे किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं। लेकिन सीमित जीव अनुभव करता हैमेरे पास कुछ कम है।यहीं से किसी वस्तु को पाने की इच्छा उत्पन्न होती है। धन चाहिए। सम्मान चाहिए। प्रेम चाहिए। ज्ञान चाहिए। सुरक्षा चाहिए। सफलता चाहिए।

इस प्रकारपूर्णता का संकोचअपूर्णता की अनुभूतिआकर्षण/आसक्ति का क्रम बनता है। इसी को राग कञ्चुक के माध्यम से समझाया जाता है।

राग केवल आसक्ति नहीं

राग को केवल भावनात्मक attachment मानना भी अधूरा होगा। दार्शनिक स्तर पर राग का सम्बन्ध अपूर्णता की अनुभूति से है।

यदि व्यक्ति स्वयं को पूर्ण अनुभव करता, तो किसी वस्तु को प्राप्त करना उसके अस्तित्व की अनिवार्य शर्त नहीं होता। लेकिन सीमित जीवमैं अधूरा हूँके अनुभव सेमुझे यह चाहिएतक पहुँचता है।

इसलिए राग कञ्चुक केवल मनोविज्ञान नहीं, अस्तित्वगत अपूर्णता की व्याख्या भी करता है।

 

 

चौथा कञ्चुककाल

अब चेतना की एक और सीमा सामने आती है। परम चेतना नित्य है। लेकिन जीव अपने अस्तित्व को समय के भीतर अनुभव करता है। मैं जन्मा। मैं बड़ा हुआ। मैं अभी हूँ। मैं बूढ़ा होऊँगा। मैं मरूँगा। यहाँ अस्तित्व

भूतवर्तमानभविष्य के क्रम में बँध जाता है। इसी को काल कञ्चुक से समझाया जाता है।

काल की सीमा केवल घड़ी नहीं काल का अर्थ यहाँ घड़ी या कैलेंडर मात्र नहीं। यह अनन्तता के संकोच का तत्त्व है। परम चेतना में सम्पूर्णता एक साथ सम्भव है। सीमित जीव में अनुभव क्रमिक है। पहले यह हुआ। फिर वह हुआ। अब यह हो रहा है। आगे वह होगा। अर्थात्समग्रताअनुक्रम में बदल जाती है। यही काल का गहरा दार्शनिक अर्थ है।

पाँचवाँ कञ्चुकनियति

अब प्रश्न हैमैं कहाँ और किन परिस्थितियों में हूँ? मनुष्य केवल समय से नहीं बँधा। वहस्थान, परिस्थिति,

कारण-कार्य, सम्बन्ध, सामाजिक संरचना, प्राकृतिक व्यवस्था से भी प्रभावित है। मैं हर परिस्थिति चुन नहीं सकता।

हर घटना को अपनी इच्छा से बदल नहीं सकता। इस प्रकार परम स्वातन्त्र्य का अनुभवनिश्चित परिस्थितियों में सीमित अस्तित्व में बदल जाता है। इसे नियति कञ्चुक कहा जाता है।

नियति और कर्म

यहाँ नियति को सीधेभाग्यकहना उचित नहीं। नियति एक व्यापक तत्त्व है जो सीमित जीव के अनुभव में

व्यवस्था, सम्बन्ध, कारणता और परिस्थितिगत बंधन को सम्भव बनाता है। कर्म आगे इस व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन नियति को केवल कर्मफल का दूसरा नाम मानना ठीक नहीं।

नियति = व्यापक नियामक संरचना और कर्म = जीव के कर्तृत्व से सम्बद्ध विशिष्ट कारण-कार्य व्यवस्था

के रूप में इनके बीच भेद किया जा सकता है।

पाँचों कञ्चुक एक साथ

अब इन्हें एक साथ देखें

कलामैं सब नहीं कर सकता।

विद्यामैं सब नहीं जानता।

रागमेरे पास सब कुछ नहीं है।

कालमैं हर समय में एक साथ उपस्थित नहीं हूँ।

नियतिमैं हर परिस्थिति को अपनी इच्छा से निर्धारित नहीं कर सकता।

यही पाँच सीमाएँ मिलकर

अनन्त चेतना के सीमित जीव-अनुभव की रूपरेखा तैयार करती हैं।

पाँच कञ्चुक और आधुनिक मनुष्य

इस सिद्धान्त की एक रोचक समकालीन व्याख्या सम्भव है। मनुष्य का जीवन लगातार पाँच सीमाओं से घिरा है

क्षमता की सीमा। ज्ञान की सीमा। इच्छाओं की सीमा/विस्तार। समय की सीमा। परिस्थितियों की सीमा।

आधुनिक तकनीक पहली दो सीमाओं को कुछ हद तक विस्तृत कर सकती है। AI ज्ञान तक पहुँच बढ़ा सकता है।

तकनीक कर्तृत्व की क्षमता बढ़ा सकती है। लेकिन

क्या मनुष्य सर्वज्ञ हो गया?

क्या सर्वकर्ता हो गया?

क्या उसकी इच्छाएँ समाप्त हुईं?

क्या वह काल से मुक्त हुआ?

क्या परिस्थितियाँ पूरी तरह उसके नियंत्रण में गईं?

नहीं। इस दृष्टि से पाँच कञ्चुक आज भी एक उपयोगी दार्शनिक मॉडल की तरह पढ़े जा सकते हैं।

क्या कञ्चुक वास्तविक बन्धन हैं?

यहाँ प्रत्यभिज्ञा की सबसे महत्वपूर्ण सूक्ष्मता आती है। यदि कञ्चुक परम चेतना को वास्तव में सीमित कर दें, तो शिव भी सीमित हो जाएँगे। लेकिन यदि वे बिल्कुल वास्तविक नहीं हैं, तो जीव की सीमितता समझाना कठिन होगा।

इसलिए इन्हें उस स्तर पर समझना होगा जहाँ

सीमित अनुभव वास्तविक है, लेकिनउसकी परम स्वतन्त्रता नहीं।

यानी जीव का दुःख अनुभव में वास्तविक है। उसकी सीमाएँ व्यवहार में वास्तविक हैं। लेकिन वे उसकी अंतिम सत्ता नहीं हैं।

माया से पुरुष तक

अब तत्त्व-क्रम स्पष्ट होने लगता है। माया भेद की भूमि तैयार करती है।

फिर पाँच कञ्चुककलाविद्यारागकालनियति अनन्त शक्तियों को सीमित अनुभव में ढालते हैं।

इसके परिणामस्वरूपपुरुष - एक सीमित प्रमाता के रूप में सामने आता है।

अबमैंहैलेकिन वहसर्वज्ञ शिव के रूप में स्वयं को नहीं जानता। वह हैसीमित ज्ञाता।

यहाँ से जीव की वास्तविक समस्या शुरू होती है

पुरुष की स्थिति में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विरोधाभास है। उसमें चेतना है। लेकिन चेतना की पूर्णता का बोध नहीं।

वह जानता है।  लेकिन सब नहीं जानता।

वह करता है। लेकिन सब नहीं कर सकता।

वह चाहता है। लेकिन उसकी इच्छाएँ अपूर्णता से प्रेरित हैं।

वह समय में रहता है। पर उसका मूल चेतन स्वरूप समय से अधिक व्यापक माना जाता है।

यही विरोधाभास आगे बन्धन का वास्तविक प्रश्न बनता है।

क्या माया बुरी है?

प्रत्यभिज्ञा के ढाँचे में माया कोबुराईमानना उचित नहीं। यदि माया होती, तो सीमित अनुभव की यह पूरी विविधता सम्भव होती। समस्या माया के अस्तित्व में नहीं।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब सीमित जीवसीमितता को ही अपना परम स्वरूप मान लेता है।

इसलिए मुक्ति का अर्थ माया का नाश करके जगत को समाप्त करना नहीं।

मुक्ति का अर्थ होगासीमितता के भीतर अपनी अनन्त चेतन प्रकृति की पुनः पहचान।

यही प्रत्यभिज्ञा की विशिष्टता है अब हम इस दर्शन की मूल दिशा को एक नए कोण से देख सकते हैं।

बन्धनसीमित अनुभव की संरचना है।

मुक्तिउस सीमित अनुभव के परम आधार की पहचान।

इसलिए प्रत्यभिज्ञा में मुक्ति किसी दूसरी लोक-व्यवस्था में स्थानान्तरण नहीं है। यह चेतना की अपनी तत्त्वगत स्थिति की पुनर्पहचान है। लेकिन उस मुक्ति को समझने के लिए अभी एक और प्रश्न बाकी है

इन सीमाओं के भीतर कर्म, संस्कार और अहंता कैसे जुड़ते हैं? यहीं से तीन मल का सिद्धान्त सामने आएगा।

तीन मल की आवश्यकता क्यों पड़ी?

यदि पाँच कञ्चुक केवल चेतना की सीमाएँ बताते हैं, तो यह अभी पर्याप्त नहीं। क्योंकि मनुष्य में केवल सीमा नहीं है। उसमेंमैं ही सीमित हूँका गहरा अनुभव भी है।

वह अपने कर्तृत्व को निजी मानता है। अपने अनुभवों से पहचान बनाता है। कर्म करता है। कर्म के परिणामों में बँधता है। इसी अधिक सूक्ष्म बन्धन को समझाने के लिए प्रत्यभिज्ञा-परम्परा में मल की चर्चा होती है।

अगले भाग में यही विषय केंद्र में होगा।

इस भाग के सूत्रात्मक निष्कर्ष

. मायया भेदाभासः प्रवर्तते। माया के द्वारा भेद का प्राकट्य सम्भव होता है।

. कलया कर्तृत्वसंकोचः। कला द्वारा कर्तृत्व सीमित होता है।

. विद्यया ज्ञानसंकोचः। विद्या द्वारा ज्ञान सीमित होता है।

. रागेण पूर्णतासंकोचः। राग द्वारा पूर्णता का अनुभव संकुचित होकर अपूर्णता की चाह बनता है।

. कालेन नित्यत्वसंकोचः। काल द्वारा नित्यता का अनुभव क्रमिक समय में सीमित होता है।

. नियत्या स्वातन्त्र्यसंकोचः। नियति द्वारा स्वतन्त्रता परिस्थितिगत व्यवस्था में सीमित होती है।

. कञ्चुकैः पुरुषस्य सीमितत्वम्। कञ्चुकों द्वारा पुरुष सीमित प्रमाता के रूप में स्थापित होता है।

ये व्याख्यात्मक सूत्र-वाक्य हैं, आचार्यों के मूल उद्धरण नहीं।

मुख्य निष्कर्ष

माया और पाँच कञ्चुक प्रत्यभिज्ञा दर्शन में सीमित जीव की तत्त्वगत संरचना को समझाने वाले अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त हैं।

माया भेद की भूमि बनाती है और पाँच कञ्चुक अनन्त चेतना की शक्तियों को विशिष्ट सीमाओं में अनुभव कराते हैं

सर्वकर्तृत्वकलासीमित कर्तृत्व,  सर्वज्ञत्वविद्यासीमित ज्ञान पूर्णतारागअपूर्णता की चाह

नित्यताकालक्रमिक समय , स्वातन्त्र्यनियतिपरिस्थितिगत बन्धन

इन सबके परिणामस्वरूप पुरुष, अर्थात् सीमित प्रमाता, सामने आता है।

अब तक हमने समझा कि जीव सीमित क्यों दिखाई देता है लेकिन अभी यह नहीं समझाया कि यह सीमितता उसके भीतर मैं कर्ता हूँ”, “मैं भोगता हूँ”, “मेरे कर्म हैं जैसी गहरी अनुभूति कैसे बनाती है।

आज के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न

यदि मनुष्य की हर सीमाज्ञान, क्षमता, समय और परिस्थितिको तत्त्वगत रूप से समझा जा सकता है, तो क्या स्वतंत्र इच्छा वास्तव में पूर्ण है?

और यदि हमारी सीमाएँ पूर्णतः हमारी अंतिम प्रकृति नहीं हैं, तोसीमितमैंअपनी सीमाओं को ही अपना वास्तविक स्वरूप क्यों मानता है?

यही प्रश्न अगले सिद्धान्त की ओर ले जाता है।

अगले भाग की भूमिका

अगले भाग में हम तीन मलआणव मल, मायीय मल और कार्म मल का अध्ययन करेंगे। यहाँ चर्चा केवल नामों की सूची नहीं होगी। हम यह देखेंगे कि मल और कञ्चुक में क्या अन्तर है, आणव मलमैं अपूर्ण हूँकी अनुभूति कैसे बनाता है, मायीय मल भेदबुद्धि को कैसे दृढ़ करता है और कार्म मल कर्तृत्व तथा कर्मफल के चक्र को कैसे बाँधता है। इसी से प्रत्यभिज्ञा का बन्धन-सिद्धान्त अपनी पूरी संरचना में सामने आएगा।

 

मुकेश श्रीवास्तव
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