पाणिनीय दर्शन — भाग १० शब्द और अर्थ का सम्बन्ध : क्या शब्द केवल संकेत है?
पाणिनीय दर्शन — भाग १०
शब्द
और अर्थ का सम्बन्ध : क्या शब्द केवल संकेत है?
पाणिनीय
व्याकरण में शब्दार्थ-संबन्ध की दार्शनिक मीमांसा
पाणिनीय
दर्शन की अब तक
की यात्रा में हम व्याकरण
को केवल भाषा को
शुद्ध करने वाली विद्या
के रूप में नहीं,
बल्कि शब्द, अर्थ और ज्ञान के सम्बन्ध को समझने वाली एक गहन दार्शनिक प्रणाली के रूप में
देखते आए हैं। ध्वनि
से व्यवस्थित शब्द की ओर,
शब्द से भाषा की
ओर और भाषा से
ज्ञान की ओर बढ़ने
के बाद अब एक
अत्यन्त मूल प्रश्न सामने
आता है—
शब्द
अर्थ को व्यक्त कैसे करता है?
जब
कोई मनुष्य “गौः” शब्द सुनता
है तो उसके भीतर
केवल कुछ ध्वनियाँ उत्पन्न
नहीं होतीं। उसके चित्त में
एक अर्थ का बोध
होता है। वह पशु,
उसका रूप, उसकी जाति
अथवा उससे सम्बन्धित कोई
संकल्पना उसके ज्ञान में
उपस्थित हो जाती है।
लेकिन
प्रश्न यह है कि—
क्या
“गौः” शब्द के भीतर
ही गौ का अर्थ
निहित है?
या
समाज ने उस ध्वनि
को गौ के लिए
निर्धारित कर दिया है?
या
शब्द और अर्थ के
बीच कोई स्वाभाविक सम्बन्ध
है?
यही
प्रश्न भारतीय भाषा-दर्शन की
सबसे गहरी समस्याओं में
से एक बन जाता
है।
शब्द
बोलता है या अर्थ प्रकट होता है?
हम कहते हैं— “गौः
चरति।”
यहाँ
“गौः” एक शब्द है
और “चरति” क्रिया है।
परन्तु
जब कोई संस्कृतज्ञ इस
वाक्य को सुनता है,
तो उसके भीतर केवल
दो ध्वनियों का क्रम नहीं
बनता। वह एक अर्थ
ग्रहण करता है— गाय
चल रही है।
इससे
स्पष्ट होता है कि
भाषा में ध्वनि और
अर्थ के बीच कोई
ऐसी प्रक्रिया अवश्य है जिसके द्वारा
श्रव्य शब्द ज्ञान का कारण बनता है।
पाणिनीय
व्याकरण की विशेषता यही
है कि वह इस
प्रक्रिया को केवल दार्शनिक
कल्पना के स्तर पर
नहीं छोड़ता।
वह शब्द को उसकी
अत्यन्त सूक्ष्म संरचना तक ले जाता
है।
धातु
क्या है?
प्रत्यय
क्या है?
विभक्ति
क्यों आती है?
वचन
कैसे बदलता है?
लिङ्ग
कैसे निर्धारित होता है?
समास
से अर्थ में क्या
परिवर्तन आता है?
उपसर्ग
क्या करता है?
इन सभी प्रश्नों के
पीछे एक गहरा दार्शनिक
प्रश्न छिपा हुआ है—
शब्द
के रूप में परिवर्तन होने पर अर्थ का बोध क्यों बदल जाता है?
यहीं
से पाणिनीय व्याकरण केवल व्याकरण नहीं
रहता।
वह शब्दार्थमीमांसा बन जाता है।
पाणिनि
के यहाँ शब्द केवल ध्वनि नहीं है
यदि
शब्द केवल ध्वनि होता,
तो अलग-अलग भाषाओं
में एक ही वस्तु
के लिए अलग-अलग
शब्द होने पर कोई
विशेष समस्या नहीं होती।
एक भाषा में— गोः
दूसरी में— cow तीसरी में— गाय चौथी में
कोई अन्य ध्वनि।
यदि
शब्द और अर्थ का
सम्बन्ध केवल ध्वनि की
भौतिक संरचना पर आधारित होता,
तो एक ही अर्थ
के लिए इतनी विविध
ध्वनियाँ सम्भव नहीं होतीं।
इससे
एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आती
है— अर्थ केवल ध्वनि में नहीं बैठा हुआ है।
ध्वनि
किसी ऐसी व्यवस्थित भाषिक
परम्परा का अंग बनती
है जिसके द्वारा वह अर्थबोध उत्पन्न
करती है।
यही
कारण है कि पाणिनि
ने भाषा को मनमाने
शब्दों का संग्रह नहीं
माना।
उन्होंने
उसे नियमबद्ध व्यवस्था के रूप में
देखा।
व्याकरण
का महान रहस्य — रूप बदलता है, अर्थ-संबंध बना रहता है
पाणिनीय
प्रणाली का एक अद्भुत
पक्ष यह है कि
एक ही मूल अर्थ
अनेक रूपों में व्यक्त हो
सकता है।
उदाहरण
के लिए— रामः, रामम्, रामेण, रामाय, रामात्, रामस्य,
रामे
यहाँ
“राम” की मूल पहचान
बनी रहती है, परन्तु
प्रत्यय और विभक्ति बदलने
से वाक्य में उसका सम्बन्ध
बदल जाता है।
अर्थात्
भाषा में दो स्तर
दिखाई देते हैं— मूल
अर्थ की पहचान और वाक्यगत सम्बन्ध का परिवर्तन।
पाणिनि
की अष्टाध्यायी इस परिवर्तन को
नियमों में बाँधती है।
इसका
दार्शनिक परिणाम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
शब्द
कोई स्थिर पत्थर नहीं है।
वह एक व्यवस्थित रूपान्तरशील सत्ता है।
उसका
रूप बदल सकता है,
परन्तु नियमबद्ध परिवर्तन के कारण अर्थबोध
की संरचना बनी रहती है।
शब्द
और अर्थ के बीच सम्बन्ध कैसा है?
भारतीय
दर्शन में इस प्रश्न
पर अनेक मत विकसित
हुए।
कुछ
परम्पराओं ने शब्दार्थ-संबन्ध
को ईश्वरनियत माना। कुछ ने इसे संकेतजन्य
माना।
मीमांसकों
ने शब्द की प्रामाणिकता
और शब्दार्थ-संबन्ध को अत्यन्त गंभीरता
से लिया।
नैयायिकों
ने शब्दार्थ-संबन्ध को मुख्यतः सामाजिक
संकेत की दृष्टि से
समझाया।
बाद
में भाषादर्शन की परम्परा में
भर्तृहरि ने शब्द को
और भी व्यापक ontological आयाम प्रदान
किया और शब्द-ब्रह्म की अवधारणा को
विकसित किया।
परन्तु
पाणिनीय दर्शन की भूमिका यहाँ
विशेष है।
क्योंकि
इन बाद के दार्शनिक
विस्तारों के लिए पाणिनि
ने भाषा का ऐसा
वैज्ञानिक ढाँचा निर्मित कर दिया था
जिसमें— ध्वनि → रूप → पद → वाक्य → अर्थ की प्रक्रिया को
सूक्ष्मता से देखा जा
सकता था।
अतः
पाणिनि को केवल किसी
एक “शब्दार्थ-सिद्धान्त” में बाँधना उचित
नहीं होगा।
उनकी
वास्तविक क्रान्ति यह है कि
उन्होंने शब्द के व्यवहार को नियमबद्ध करके उसके दार्शनिक अध्ययन की भूमि तैयार की।
महाभाष्य
की दृष्टि : शब्द का ज्ञान क्यों आवश्यक है?
पतञ्जलि
के महाभाष्य में व्याकरण के
प्रयोजन पर चर्चा करते
हुए शब्दज्ञान का महत्त्व सामने
आता है।
व्याकरण
केवल इसलिए नहीं पढ़ाया जाता
कि मनुष्य “शुद्ध बोल सके”।
शब्द
के सही रूप का
ज्ञान उसके सही प्रयोग,
अर्थबोध और वैदिक परम्परा
की रक्षा से जुड़ जाता
है।
यही
कारण है कि व्याकरण
की दृष्टि से— शब्दज्ञान = केवल भाषिक कौशल नहीं।
वह ज्ञान की शुद्धता से
सम्बन्धित है।
यहाँ
पाणिनीय परम्परा एक अत्यन्त सूक्ष्म
बात कहती हुई दिखाई
देती है—
यदि
शब्द का रूप अनियमित
हो जाए, तो अर्थबोध
की प्रक्रिया भी अस्पष्ट हो
सकती है।
इसलिए
व्याकरण भाषा की बाहरी
सजावट नहीं।
वह अर्थ तक पहुँचने की संरचनात्मक व्यवस्था है।
“गौः”
और “गोः” — केवल ध्वनि का अन्तर नहीं
संस्कृत
में विभक्ति-परिवर्तन केवल शब्द की
ध्वनि नहीं बदलता।
उदाहरणतः—
गौः और गोः दोनों रूपों का आधार “गो”
है, परन्तु वाक्य में दोनों की
भूमिका अलग हो सकती
है।
इसी
प्रकार— रामः पठति। और— रामस्य पुस्तकम्।
यहाँ
“राम” से सम्बन्धित अर्थ
एक ही व्यक्ति से
जुड़ा है, परन्तु विभक्ति
उसके सम्बन्ध को बदल देती
है।
इससे
पाणिनीय दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण
सिद्धान्त सामने आता है—
शब्द
का अर्थ केवल शब्दकोशीय अर्थ नहीं होता; व्याकरणिक रूप भी अर्थनिर्माण में सहभागी होता है।
अर्थात्—
व्याकरण अर्थ का बाहरी अनुशासन नहीं, अर्थ की अभिव्यक्ति की आन्तरिक संरचना है।
प्रत्यय
— अर्थ का सूक्ष्म वास्तुकार
पाणिनीय
व्याकरण में प्रत्यय का
महत्त्व केवल शब्द-निर्माण
तक सीमित नहीं है।
प्रत्यय
किसी मूल शब्द या
धातु में नया अर्थ-संस्कार उत्पन्न करता है।
धातु
में प्रत्यय जुड़ता है— रूप बदलता
है।
रूप
बदलता है— अर्थ की
दिशा बदलती है।
अर्थ
की दिशा बदलती है—
वाक्य में उसकी भूमिका
बदलती है।
इस प्रकार पाणिनीय प्रणाली में प्रत्यय को
हम आधुनिक भाषा-विज्ञान की
दृष्टि से semantic operator की तरह भी
समझ सकते हैं—यद्यपि
यह आधुनिक शब्दावली पाणिनि की अपनी नहीं
है।
यहाँ
एक गहरी दार्शनिक बात
छिपी है—
अर्थ
शब्द में स्थिर पदार्थ की तरह नहीं रहता; वह भाषिक संरचना में सक्रिय होता है।
क्या
शब्द अर्थ का दर्पण है?
यदि
शब्द अर्थ का पूर्ण
दर्पण होता, तो प्रत्येक वस्तु
का केवल एक ही
नाम होना चाहिए था।
लेकिन
ऐसा नहीं है। एक ही
वस्तु के अनेक नाम
हो सकते हैं।
“सूर्य”
के लिए संस्कृत में—
सूर्यः, आदित्यः, भानुः, रविः, भास्करः, दिवाकरः
आदि
अनेक शब्द मिलते हैं।
क्या ये सभी बिल्कुल एक
ही अर्थ रखते हैं?
नहीं।
इनमें
अर्थ का मूल क्षेत्र
समान हो सकता है,
किन्तु प्रत्येक शब्द अपने साथ
अर्थ की विशेष छाया
लेकर आता है।
भास्करः
प्रकाश उत्पन्न करने वाला।
दिवाकरः
दिवस का निर्माता।
रविः
एक विशिष्ट नाम-परम्परा।
इससे
स्पष्ट होता है कि—
शब्द केवल वस्तु की ओर संकेत नहीं करता; वह वस्तु के सम्बन्ध में किसी विशिष्ट दृष्टि को भी प्रकट कर सकता है।
यहीं
भाषा दर्शन का क्षेत्र और
गहरा हो जाता है।
शब्द
केवल नाम नहीं — दृष्टि भी है
मनुष्य
संसार को केवल देखता
नहीं। वह उसे नाम देता है।
और नाम देकर संसार
को अपने लिए व्यवस्थित
करता है।
जिस
वस्तु को नाम मिला,
वह चेतना के लिए एक
पहचानी हुई इकाई बन
गई।
इसलिए
भाषा केवल संचार का
साधन नहीं।
भाषा—
अनुभव
को वर्गीकृत करती है। वस्तुओं को पहचान देती है। सम्बन्धों को व्यक्त करती है। अनुभव को स्मृति में स्थिर करती है।
और सबसे महत्त्वपूर्ण— - चेतना को
अपने ही अनुभव के बारे में विचार करने योग्य बनाती है।
पाणिनीय
व्याकरण इसी कारण भारतीय
ज्ञानपरम्परा में इतना असाधारण
स्थान प्राप्त करता है।
उसने
भाषा को केवल बोलने
की वस्तु नहीं माना।
उसने
भाषा को ज्ञान की संरचना के रूप में
देखने की सम्भावना प्रदान
की।
शब्द,
अर्थ और वाक्य
एक शब्द अपने आप
में एक सीमा तक
अर्थ देता है।
किन्तु
पूर्ण विचार अक्सर वाक्य से उत्पन्न होता
है। गौः धावति। यहाँ— “गौः” एक सत्ता
को प्रस्तुत करता है।
“धावति”
उसके कर्म या अवस्था
को। नों का सम्बन्ध मिलकर
एक पूर्ण बोध उत्पन्न करता
है।
इसलिए
केवल शब्दार्थ जान लेना पर्याप्त
नहीं।
वाक्य
में शब्दों का परस्पर सम्बन्ध
भी अर्थनिर्माण करता है।
पाणिनीय
व्याकरण ने इस सम्बन्ध
को विभक्ति, कारक, क्रिया, पुरुष, वचन, लिङ्ग आदि
की अत्यन्त सूक्ष्म व्यवस्था द्वारा नियंत्रित किया।
इस प्रकार— शब्द अकेला अर्थ का पूर्ण ब्रह्माण्ड नहीं है।
वह एक ऐसी व्यवस्था
का अंग है जिसमें
अनेक शब्द परस्पर सम्बन्ध
स्थापित करके व्यापक अर्थ
उत्पन्न करते हैं।
कारक-सिद्धान्त : अर्थ के सम्बन्धों का व्याकरण
पाणिनीय
दर्शन की महान उपलब्धियों
में से एक है—
कारक-सिद्धान्त।
कर्ता,
कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान,
अधिकरण आदि केवल व्याकरणिक
श्रेणियाँ नहीं हैं।
वे वस्तुओं और क्रियाओं के
बीच सम्बन्धों की तार्किक संरचना को व्यक्त करते
हैं।
उदाहरण—
रामः हस्तेन लेखन्या पत्रं लिखति।
यहाँ
कौन लिख रहा है?
कर्ता।
किसे
लिखा जा रहा है?
कर्म।
किस
साधन से? करण।
अर्थात्
वाक्य केवल वस्तुओं की
सूची नहीं देता।
वह संसार में घटित होने
वाले सम्बन्धों का मानचित्र प्रस्तुत करता है।
यहीं
पाणिनीय व्याकरण दर्शन के अत्यन्त निकट
आ जाता है।
क्योंकि
दर्शन भी अन्ततः पूछता
है— कौन? किससे? किसके लिए? किस कारण? किस पर? किससे अलग?
पाणिनि
इन सम्बन्धों को भाषिक संरचना
में पकड़ लेते हैं।
पाणिनीय
दृष्टि की मौलिकता
पाणिनि
ने यह नहीं कहा
कि संसार केवल शब्द है।
उन्होंने यह भी नहीं कहा
कि प्रत्येक शब्द वस्तु का
पूर्ण स्वरूप है।
उनका
योगदान इससे अधिक सूक्ष्म
है।
उन्होंने
दिखाया कि— मानव-भाषा में अर्थबोध एक नियमबद्ध संरचना के भीतर घटित होता है।
ध्वनियाँ
व्यवस्थित होती हैं। ध्वनियों से
रूप बनते हैं। रूपों से
पद बनते हैं।
पद वाक्य में सम्बन्ध ग्रहण
करते हैं। और सम्बन्धों की यह समग्र
संरचना अर्थबोध उत्पन्न करती है।
इसलिए
पाणिनीय दर्शन को एक सूत्र
में कहें तो— शब्दः
संरचना; संरचनया अर्थाभिव्यक्तिः।
शब्द
केवल ध्वनि नहीं। शब्द व्यवस्थित ध्वनि है।
और व्यवस्थित ध्वनि केवल उच्चारण नहीं।
वह अर्थ को प्रकट करने की क्षमता है।
एक
गहरी दार्शनिक सम्भावना
यहाँ
से एक ऐसा प्रश्न
उत्पन्न होता है जो
आगे चलकर भारतीय भाषा-दर्शन को भर्तृहरि तक
ले जाएगा—
यदि
अलग-अलग ध्वनियाँ क्रमशः
सुनाई देती हैं, तो
हमें एक एकीकृत अर्थ कैसे प्राप्त होता
है?
हम
“गौः” सुनते समय— ग् → औ
→ ः
इन ध्वनियों को अलग-अलग
अर्थों में नहीं ग्रहण
करते।
हम एक साथ “गौः”
का बोध करते हैं।
तो क्या अर्थ ध्वनियों के
जोड़ से उत्पन्न होता
है?
या ध्वनियाँ किसी पहले से
उपस्थित भाषिक इकाई को प्रकट
करती हैं?
यहीं
से आगे भारतीय दर्शन
में स्फोट, वाक्य, पद, प्रत्यभिज्ञा और शब्दब्रह्म जैसे अत्यन्त गम्भीर
प्रश्न विकसित होते हैं।
पाणिनि
ने स्वयं इन सभी सिद्धान्तों
को जिस रूप में
बाद के आचार्यों ने
विकसित किया, उस रूप में
प्रस्तुत नहीं किया; परन्तु
उनकी व्याकरण-व्यवस्था ने उन दार्शनिक
प्रश्नों के लिए आधारभूमि
तैयार कर दी।
पाणिनीय
दर्शन की अगली दहलीज
अब तक हमने भाषा
को— ध्वनि से, ध्वनि को
शब्द से, शब्द को
रूप से, रूप को
अर्थ से, और अर्थ
को वाक्यगत सम्बन्ध से जोड़कर देखा।
लेकिन
अभी एक रहस्य शेष
है।
शब्द
अलग-अलग सुनाई देते हैं, पर अर्थ एक साथ क्यों प्रकट होता है?
यदि—
ग् + औ + ः तीन ध्वनियाँ हैं,
तो “गौः” का एकीकृत
बोध कहाँ से आया?
क्या
वह ध्वनियों के क्रम से
बना? क्या वह मन
में पहले से उपस्थित
किसी भाषिक आकृति का प्रकाश है?
क्या
शब्द का वास्तविक स्वरूप
उच्चरित ध्वनि से भिन्न है?
और यदि ऐसा है—
तो शब्द की वास्तविक सत्ता क्या है?
यहीं
से पाणिनीय परम्परा का अध्ययन हमें
भाषा-विज्ञान से उठाकर भाषा
के अस्तित्वमीमांसात्मक प्रश्न तक ले जाता
है।
अगले
चरण में प्रश्न केवल
यह नहीं रहेगा कि—
“शब्द
कैसे बनता है?” बल्कि यह होगा— “वास्तव
में शब्द है क्या?”
और इसी प्रश्न के
भीतर भारतीय शब्द-दर्शन की
सबसे विलक्षण यात्रा आरम्भ होती है।
प्रमुख
आधार-ग्रन्थ - पाणिनि — अष्टाध्यायी, कात्यायन — वार्त्तिक, पतञ्जलि — महाभाष्य , भर्तृहरि — वाक्यपदीय, नागेशभट्ट — परिभाषेन्दुशेखर, लघुमञ्जूषा आदि , माधवाचार्य — सर्वदर्शनसंग्रह, व्याकरण-दर्शन सम्बन्धी विवेचन भारतीय व्याकरण-परम्परा के प्रमुख टीका-ग्रन्थ
पाणिनीय
दर्शन श्रृंखला — भाग १०
इस भाग का केन्द्रीय विषय: शब्द–अर्थ सम्बन्ध,
कारक-संरचना और अर्थाभिव्यक्ति।
आगामी भाग के लिए नया प्रश्न: शब्द का वास्तविक
स्वरूप क्या है — ध्वनि,
पद, वाक्य या उससे भी
सूक्ष्म कोई सत्ता?
नियम: पूर्ववर्ती भागों में विवेचित विषयों
की पुनरावृत्ति न करते हुए
प्रत्येक अगला भाग पाणिनीय
शब्द-दर्शन की एक नई
दार्शनिक परत खोलेगा।
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
पाणिनीय
दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–१० : शब्द और अर्थ का सम्बन्ध — पाणिनीय व्याकरण में अर्थाभिव्यक्ति की संरचना
शोध-टिप्पणी : इस भाग में
शब्द और अर्थ के
सम्बन्ध को पाणिनीय व्याकरण
की संरचनात्मक दृष्टि से समझाया गया
है। शब्द को केवल
ध्वनि अथवा मात्र सामाजिक
संकेत मानने के बजाय उसके
रूप, प्रत्यय, विभक्ति, कारक और वाक्यगत
सम्बन्धों के माध्यम से
अर्थबोध की प्रक्रिया का
विवेचन किया गया है।
यहाँ पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि की
व्याकरण-परम्परा को भर्तृहरि के
विकसित शब्द-दर्शन से
अलग कालगत और दार्शनिक स्तरों
पर रखा गया है।
“स्फोट” और “शब्दब्रह्म” जैसे
सिद्धान्तों को पाणिनि के
प्रत्यक्ष सिद्धान्त के रूप में
प्रस्तुत न करते हुए
उन्हें पाणिनीय परम्परा से विकसित होने
वाली परवर्ती दार्शनिक भूमि के रूप
में देखा गया है।
आधुनिक भाषावैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग केवल
तुलनात्मक सुविधा के लिए किया
गया है, इसे प्राचीन
भारतीय सिद्धान्तों की आधुनिक विज्ञान
द्वारा पुष्टि नहीं माना जाना
चाहिए।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
पाणिनीय
दर्शन
भाग–११ : शब्द क्या है? — ध्वनि, स्फोट और अखण्ड अर्थबोध की मीमांसा
पाणिनीय
दर्शन की हमारी यात्रा
अब उस बिन्दु पर
पहुँच गई है जहाँ
प्रश्न केवल यह नहीं
रह जाता कि शब्द
अर्थ को कैसे व्यक्त करता है, बल्कि उससे भी अधिक
मूल प्रश्न सामने आता है—
शब्द
स्वयं क्या है?
भाग–१० में हमने
देखा कि शब्द का
अर्थ केवल उसकी भौतिक
ध्वनि में सीमित नहीं
है। व्याकरणिक रूप, प्रत्यय, विभक्ति,
कारक और वाक्यगत सम्बन्ध
अर्थाभिव्यक्ति में सक्रिय भूमिका
निभाते हैं। अब उसी
विचार को एक और
गहराई तक ले जाना
आवश्यक है।
यदि
शब्द उच्चरित होते समय ध्वनि
के रूप में क्रमशः
प्रकट होता है, तो
श्रोता को उसका अर्थ
एक अखण्ड बोध के रूप में
कैसे प्राप्त होता है?
यहीं
से भारतीय व्याकरण-दर्शन में स्फोट की समस्या सामने
आती है।
ध्वनि
और शब्द — क्या दोनों एक ही हैं?
जब कोई व्यक्ति “राम”
बोलता है तो वायु-कम्पन उत्पन्न होता है। वह
कम्पन कान तक पहुँचता
है। ध्वनि सुनाई देती है और
कुछ ही क्षण बाद
समाप्त हो जाती है।
लेकिन
आश्चर्य यह है कि—
ध्वनि समाप्त हो जाती है, अर्थ समाप्त नहीं होता।
“राम”
शब्द को अलग-अलग
व्यक्ति बोलें तो उनके उच्चारण
में सूक्ष्म अन्तर होगा। किसी की आवाज
भारी होगी, किसी की पतली;
कोई तीव्र बोलेगा, कोई मन्द।
फिर
भी हम सबके उच्चारण
को “राम” ही पहचानते
हैं।
इससे
एक दार्शनिक समस्या पैदा होती है—
यदि
प्रत्येक उच्चारण भौतिक रूप से अलग
है, तो वह कौन-सी समानता है
जिसके कारण हम उन्हें
एक ही शब्द के रूप में
पहचानते हैं?
यहीं
ध्वनि और शब्द के बीच भेद
की सम्भावना उत्पन्न होती है।
परवर्ती
व्याकरण-दर्शन में भर्तृहरि ने
इसी प्रश्न को अत्यन्त गहराई
से विकसित किया। उनके यहाँ उच्चरित
ध्वनि और अर्थबोध कराने
वाली भाषिक सत्ता को सरलता से
एक नहीं माना जाता।
पाणिनि
और स्फोट — एक सावधानी आवश्यक
यहाँ
इतिहास के स्तर पर
एक अत्यन्त आवश्यक सावधानी है।
पाणिनि
की अष्टाध्यायी में स्फोटायन नाम का उल्लेख
मिलता है। परन्तु इससे
यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि
पाणिनि ने वही विकसित
स्फोटवाद प्रतिपादित किया था जिसे
बाद में भर्तृहरि ने
व्यवस्थित दार्शनिक सिद्धान्त के रूप में
प्रस्तुत किया।
स्फोट
की दार्शनिक चर्चा पतञ्जलि के महाभाष्य में
अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई
देती है और भर्तृहरि
के वाक्यपदीय में यह एक
व्यापक भाषा-दर्शन का
रूप ग्रहण करती है।
इसलिए
हमारी श्रृंखला में तीन स्तरों
को अलग रखना आवश्यक
है—
पाणिनि
— व्याकरणिक संरचना
पतञ्जलि
— शब्द और ध्वनि की दार्शनिक समस्या
भर्तृहरि
— शब्द, वाक्य और अर्थ की दार्शनिक मीमांसा
इन तीनों को एक ही
सिद्धान्त मानना ऐतिहासिक रूप से उचित
नहीं होगा।
स्फोट
का मूल प्रश्न
मान
लीजिए कोई व्यक्ति कहता
है— “गौः चरति।” श्रोता को ध्वनियाँ क्रमशः
प्राप्त होती हैं।
पहले—
गौः फिर— चरति।
परन्तु
अन्ततः उसके भीतर केवल
दो शब्दों की स्मृति नहीं
रहती।
एक सम्पूर्ण अर्थ प्रकट होता
है— गाय चल रही है।
अब प्रश्न यह है—
क्या
यह अर्थ पहले “गौः”
के अर्थ से बना,
फिर “चरति” के अर्थ से
जुड़ा और फिर दोनों
को जोड़कर अन्तिम अर्थ तैयार हुआ?
या सम्पूर्ण वाक्य सुनते ही एक अखण्ड
अर्थबोध उत्पन्न हुआ?
यही
वह समस्या है जिसे भर्तृहरि
की स्फोट-मीमांसा विशेष तीक्ष्णता से सामने रखती
है। उनके अनुसार वाक्य
का अर्थ केवल पृथक्-पृथक् शब्दार्थों का यांत्रिक जोड़
नहीं है।
क्रमशः
सुनाई देने वाला वाक्य और एक साथ समझ में आने वाला अर्थ
यहाँ
एक अद्भुत विरोध दिखाई देता है। ध्वनि क्रमिक है।
लेकिन—
अर्थबोध अखण्ड हो सकता है।
हम
“रामः वनं गच्छति” सुनते
समय प्रत्येक ध्वनि को अलग-अलग
पकड़कर फिर किसी गणितीय
प्रक्रिया से वाक्य का
अर्थ नहीं बनाते।
वाक्य
पूरा होते ही अर्थ
हमारे सामने एक समग्र बोध
के रूप में उपस्थित
होता है।
इसीलिए
स्फोट की धारणा को
सामान्यतः उस ऐसी भाषिक
सत्ता के रूप में
समझाया जाता है जो
स्वयं क्रमिक ध्वनि नहीं है, बल्कि
ध्वनि द्वारा प्रकट होने वाला अखण्ड
अर्थ-तत्त्व है।
यहाँ
से भारतीय भाषा-दर्शन एक
अत्यन्त गम्भीर प्रश्न पूछता है— क्या भाषा का वास्तविक अर्थ-वाहक वही है जो कान से सुनाई देता है? स्फोटवाद का उत्तर है—
नहीं,
सुनाई देने वाली ध्वनि और अर्थ के अखण्ड बोध को एक ही वस्तु मानना पर्याप्त नहीं।
ध्वनि
क्रम में है, स्फोट अखण्डता में
इस सम्बन्ध को सरल उदाहरण
से समझ सकते हैं।
किसी
दीपक की लौ को
तेजी से घुमाया जाए
तो आँख को एक
वृत्त दिखाई दे सकता है,
जबकि वास्तव में वहाँ कोई
स्थिर वृत्त उपस्थित नहीं है।
इसी
प्रकार उच्चारण में ध्वनियाँ क्रमशः
आती हैं— एक ध्वनि,
फिर दूसरी, फिर तीसरी।
लेकिन
चेतना उन्हें केवल अलग-अलग
ध्वनियों के रूप में
ग्रहण नहीं करती।
वह उनके पीछे एक
एकीकृत भाषिक आकृति को पहचानती है।
भर्तृहरि
के दर्शन में यह समस्या
केवल भाषाविज्ञान की समस्या नहीं
रह जाती। यह इस प्रश्न
तक पहुँचती है कि चेतना
क्रम से प्राप्त संकेतों को एक अखण्ड अर्थ में कैसे ग्रहण करती है।)
क्या
स्फोट कोई दूसरी ध्वनि है?
यहाँ
एक सामान्य भ्रम दूर करना
आवश्यक है।
स्फोट
को केवल “एक और सूक्ष्म
ध्वनि” समझ लेना ठीक
नहीं।
यदि
स्फोट भी ध्वनि ही
होता, तो समस्या हल
नहीं होती।
क्योंकि
तब प्रश्न फिर वही रहता—
वह ध्वनि भी क्रमिक क्यों
नहीं है?
इसलिए
व्याकरण-दर्शन में स्फोट को
सामान्यतः ध्वनि से भिन्न भाषिक तत्त्व के रूप में
विवेचित किया गया है,
जबकि ध्वनि उसके प्रकटीकरण का
माध्यम मानी जाती है।
सरल
रूप में—
ध्वनि
— सुनाई देती है।
स्फोट
— अर्थ को प्रकट करता है।
किन्तु
यह भी ध्यान रखना
चाहिए कि यह आधुनिक
“signal versus meaning” की
सरल समानता नहीं है। भारतीय
व्याकरण-परम्परा में स्फोट की
स्थिति और स्वरूप पर
स्वयं अनेक दार्शनिक विमर्श
हुए हैं।
स्फोट
के स्तर
भर्तृहरि
की परम्परा में स्फोट की
चर्चा विभिन्न स्तरों पर की जाती
है— वर्णस्फोट, पदस्फोट, वाक्यस्फोट
इनमें
विशेष महत्त्व वाक्यस्फोट को प्राप्त होता
है।
क्योंकि
भाषा का वास्तविक संप्रेषण
केवल अलग-अलग शब्दों
के संग्रह में समाप्त नहीं
होता।
हम—
“सूर्य उदित हुआ।” सुनते हैं और सम्पूर्ण
घटना का बोध करते
हैं।
यह बोध केवल “सूर्य”
और “उदित” के पृथक अर्थों
का जोड़ नहीं है।
वाक्य
उनके बीच एक ऐसा
सम्बन्ध निर्मित करता है जो
समग्र अर्थ को जन्म
देता है।
भर्तृहरि
के वाक्य-दर्शन में यही वाक्य
की अखण्डता एक मूल समस्या
बनती है।)
क्या
वाक्य शब्दों का जोड़ है?
यहीं
भारतीय दर्शन की दो प्रवृत्तियाँ
आमने-सामने आती हैं।
एक दृष्टि कह सकती है—
पहले शब्द हैं, फिर उनका सम्बन्ध है, फिर वाक्यार्थ बनता है।
दूसरी
दृष्टि कहती है— वाक्य
का अर्थ मूलतः अखण्ड है; शब्द-विभाजन विश्लेषण की सुविधा के लिए है।
भर्तृहरि
विभिन्न मतों का उल्लेख
करते हैं और वाक्यार्थ
की अखण्डता को विशेष महत्त्व
देते हैं। वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड
में वाक्यार्थ की अविभाज्यता तथा
उसके विभिन्न प्रकार के विश्लेषणों पर
चर्चा मिलती है।
यहाँ
एक अत्यन्त गम्भीर बात समझनी होगी—
विश्लेषण और अनुभव एक ही चीज नहीं हैं।
हम व्याकरण पढ़ते समय वाक्य को—
पदों में, पदों को
धातु-प्रत्यय में, धातु को
और सूक्ष्म घटकों में विभाजित कर सकते हैं।
लेकिन
वास्तविक समझ का अनुभव
इन सभी विभाजनों से
पहले एक समग्रता के
रूप में हो सकता
है।
यही
स्फोट की दार्शनिक शक्ति
है।
व्याकरण
और चेतना का सम्बन्ध
अब पाणिनीय दर्शन एक और गहरी
दिशा खोलता है।
व्याकरण
बाहर की भाषा का
अध्ययन करता हुआ दिखाई
देता है। लेकिन अन्ततः भाषा का अर्थ
कहाँ प्रकट होता है? चेतना
में। ध्वनि बाहर से आती
है।
शब्द
सुना जाता है। लेकिन अर्थ—
भीतर प्रकाशित होता है।
इसलिए
भाषा की सम्पूर्ण यात्रा
को केवल मुख से
कान तक की यात्रा
मानना अधूरा होगा।
वास्तविक
यात्रा है— वक्ता की चेतना → भाषिक अभिव्यक्ति → ध्वनि → श्रोता की ग्रहण-प्रक्रिया → अर्थबोध।
भर्तृहरि
के यहाँ यह प्रश्न
और गहरा होकर प्रतिभा
की अवधारणा से जुड़ता है—वह तात्कालिक बोध
जिसके द्वारा वाक्य का अर्थ व्यवहार
में उपलब्ध होता है।
प्रतिभा
— अर्थ का अचानक प्रकाश
कभी-कभी कोई व्यक्ति
हमें कोई बात समझाता
रहता है।
हम सुनते रहते हैं। अर्थ स्पष्ट
नहीं होता।
फिर
अचानक— “अच्छा! अब समझ में आया।”
उस क्षण ज्ञान धीरे-धीरे नहीं आता।
वह जैसे अचानक प्रकाशित
हो जाता है।
भर्तृहरि
के भाषा-दर्शन में
प्रतिभा इसी प्रकार के
तत्काल बोध को समझने
का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम
बनती है।
यहाँ
भाषा केवल सूचना देने
वाली व्यवस्था नहीं है।
वह चेतना में एक ऐसा
क्षण उत्पन्न करती है जहाँ—
शब्द पीछे हट जाता है और अर्थ सामने आ जाता है।
यही
वह बिन्दु है जहाँ भाषा
का दर्शन ज्ञानमीमांसा के अत्यन्त निकट
पहुँच जाता है।
शब्द
सुनना और अर्थ समझना एक ही प्रक्रिया नहीं
किसी
विदेशी भाषा का वाक्य
हमारे सामने बोला जाए तो—
हम ध्वनि सुन सकते हैं,
पर अर्थ नहीं समझ
सकते।
इससे
सिद्ध होता है कि—
ध्वनि का ग्रहण और अर्थ का ग्रहण अलग प्रक्रियाएँ हैं।
उसी
प्रकार कोई संस्कृत वाक्य
संस्कृतज्ञ सुनता है तो उसके
भीतर अर्थ तत्काल प्रकट
हो सकता है।
अतः
अर्थ केवल ध्वनि की
भौतिक उपस्थिति से उत्पन्न नहीं
होता।
उसके
लिए आवश्यक है— भाषिक संस्कार,
पूर्वज्ञान, व्याकरणिक क्षमता, सन्दर्भ, और चेतना की
ग्रहणशीलता।
इस प्रकार स्फोट की समस्या हमें
भाषा के साथ-साथ
मानवीय ज्ञान की संरचना तक ले जाती
है।
आधुनिक
भाषाविज्ञान से सावधानीपूर्ण तुलना
आधुनिक
भाषाविज्ञान में भी यह
प्रश्न महत्वपूर्ण है कि मानव
मस्तिष्क क्रमिक ध्वनियों और शब्दों से
अर्थ की समग्र संरचना
कैसे निर्मित करता है।
लेकिन
यहाँ सावधानी आवश्यक है।
स्फोट
को आधुनिक phoneme, morpheme,
syntax, semantic representation या
neural processing में से किसी एक
का सीधा प्राचीन संस्करण
कहना उचित नहीं होगा।
दोनों
परम्पराएँ अलग बौद्धिक संदर्भों
में विकसित हुई हैं।
हाँ,
इतना तुलनात्मक रूप से कहा
जा सकता है कि
दोनों में एक साझा
दार्शनिक समस्या दिखाई देती है—
क्रमिक
भाषिक संकेत से अर्थ की एकीकृत संरचना कैसे बनती है?
यह तुलना संवाद खोल सकती है।
लेकिन
इसे आधुनिक विज्ञान द्वारा स्फोटवाद की पुष्टि कहना
ऐतिहासिक और दार्शनिक दोनों
दृष्टियों से अनुचित होगा।
स्फोटवाद
की सबसे बड़ी शक्ति
स्फोटवाद
का महत्त्व केवल इस बात
में नहीं कि उसने
कोई नया भाषिक सिद्धान्त
दिया।
उसकी
वास्तविक शक्ति इस प्रश्न में
है—
क्या
अर्थ को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर उसकी वास्तविकता को पूरी तरह समझा जा सकता है?
मान
लीजिए— “कमल खिल गया।”
यदि
हम इसे अलग-अलग
शब्दों में तोड़ दें—
कमल। - खिल।-
गया। - तो क्या पूरा अनुभव बचा
रहता है?
नहीं। क्योंकि
वाक्य में एक घटना
का बोध है।
एक सम्बन्ध है। एक कालगत परिवर्तन है।
एक समग्र दृश्य है। अर्थात्—
विश्लेषण
अर्थ के घटकों को दिखा सकता है, लेकिन अर्थ की समग्र अनुभूति को केवल घटकों का जोड़ मान लेना आवश्यक नहीं।
यही
भाषिक holism की वह दिशा
है जिसे भर्तृहरि के
वाक्य-दर्शन में अत्यन्त प्रभावशाली
रूप मिला। (
पाणिनीय दर्शन में इसका स्थान
अब एक महत्त्वपूर्ण सीमा
फिर स्पष्ट करनी चाहिए।
स्फोटवाद
को सीधे पाणिनि का प्रतिपादित दर्शन कहना उचित नहीं है।
पाणिनि
का मुख्य कार्य अष्टाध्यायी में भाषा की
अत्यन्त औपचारिक, नियमबद्ध और संक्षिप्त व्याकरणिक
व्यवस्था का निर्माण है।
पतञ्जलि
उस व्यवस्था पर विचार करते
हुए शब्द की प्रकृति
से जुड़े दार्शनिक प्रश्नों को अधिक स्पष्ट
करते हैं।
भर्तृहरि
उस परम्परा को एक स्वतंत्र
भाषा-दर्शन के उच्च स्तर
तक ले जाते हैं।
इसलिए
हमारी श्रृंखला में— पाणिनि → पतञ्जलि → भर्तृहरि
को एक दार्शनिक विकास-रेखा के रूप में
देखना अधिक उचित है,
न कि तीनों को
एक ही सिद्धान्त का
प्रतिपादनकर्ता मानना। ऐतिहासिक अध्ययनों में भी पाणिनि
की अष्टाध्यायी, पतञ्जलि के महाभाष्य और
भर्तृहरि के वाक्यपदीय के
बीच यही कालगत और
वैचारिक अन्तर रेखांकित किया जाता है।
(eGyankosh)
शब्द
से आगे — वाक् की ओर
अब हमारी यात्रा एक अत्यन्त रोचक
मोड़ पर पहुँच गई
है। पहले प्रश्न था— ध्वनि क्या है? फिर— शब्द क्या है?
फिर—
शब्द अर्थ कैसे देता है?
अब प्रश्न है— वाक्य का अर्थ कहाँ से आता है?
और उसके बाद उससे
भी बड़ा प्रश्न—
क्या
भाषा केवल मनुष्य द्वारा निर्मित संचार-व्यवस्था है, या भारतीय व्याकरण-दर्शन में वाक् को अस्तित्व की गहरी संरचना से जोड़ा गया है?
भर्तृहरि
का उत्तर यहाँ भाषा को
केवल व्यवहार की वस्तु न
मानकर उसे अस्तित्व और
चेतना की गहराइयों से
जोड़ने की दिशा में
जाता है। वाक्यपदीय का ब्रह्मकाण्ड इसी
कारण केवल व्याकरण की
पुस्तक नहीं रह जाता;
वह शब्द, चेतना और सत्ता के सम्बन्ध की दार्शनिक खोज
बन जाता
यदि
शब्द केवल संचार का साधन नहीं, तो क्या “वाक्” स्वयं अस्तित्व के किसी मूल तत्त्व का प्रकाश है?
यानी
अगला चरण केवल— शब्द
से अर्थ नहीं रहेगा।
वह होगा— शब्द से वाक्, वाक् से चेतना और चेतना से सत्ता।
यहीं
पाणिनीय दर्शन की भाषा-मीमांसा
अपने सबसे गहरे दार्शनिक
क्षेत्र में प्रवेश करती
है।
स्रोत
एवं आधार
इस भाग के लिए
पाणिनीय परम्परा के साथ पतञ्जलि
के महाभाष्य और भर्तृहरि के
वाक्यपदीय में विकसित शब्द-दर्शन को आधार बनाया
गया है। विशेष रूप
से स्फोट, ध्वनि, वाक्य की अखण्डता और
वाक्यार्थ के प्रश्नों के
लिए आधुनिक अकादमिक अध्ययनों से भी तुलनात्मक
सहायता ली गई
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
पाणिनीय
दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–११ : शब्द क्या है? — ध्वनि, स्फोट और अखण्ड अर्थबोध की मीमांसा
शोध-टिप्पणी : इस भाग में
“स्फोट” को सीधे पाणिनि
का विकसित सिद्धान्त न मानते हुए
पाणिनि–पतञ्जलि–भर्तृहरि की क्रमिक व्याकरण-दर्शन परम्परा में रखा गया
है। ध्वनि और शब्द, क्रमिक
उच्चारण और अखण्ड अर्थबोध
तथा वाक्य और वाक्यार्थ के
सम्बन्ध का विवेचन किया
गया है। भर्तृहरि के
स्फोट और प्रतिभा-सिद्धान्त
को पाणिनीय व्याकरण की मूल अष्टाध्यायी
से ऐतिहासिक रूप से अलग
रखते हुए समझाया गया
है। आधुनिक भाषाविज्ञान से की गई
तुलनाएँ केवल तुलनात्मक हैं;
उन्हें प्राचीन भारतीय सिद्धान्तों की आधुनिक विज्ञान
द्वारा प्रत्यक्ष पुष्टि नहीं माना जाना
चाहिए।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
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