भाग–६ : संशय से निर्णय तक — न्याय की तर्क-पद्धति

दर्शनन्याय दर्शन

भाग : संशय से निर्णय तकन्याय की तर्क-पद्धति

जब दो सम्भावनाएँ सामने हों, तो सत्य तक कैसे पहुँचा जाए?”

पिछले भागों में न्याय ने ज्ञान की आधारभूमि तैयार की।

प्रत्यक्ष ने बताया कि वस्तु से प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे उत्पन्न होता है।
अनुमान ने दिखाया कि अप्रत्यक्ष वस्तु का ज्ञान व्याप्ति के आधार पर कैसे सम्भव है।
उपमान ने समानता के माध्यम से अज्ञात वस्तु और उसकी संज्ञा के सम्बन्ध को समझाया।
शब्द ने विश्वसनीय वचन को ज्ञान का प्रमाण माना।

लेकिन वास्तविक जीवन में ज्ञान हमेशा सीधे प्राप्त नहीं होता।

अक्सर हम किसी वस्तु को देखकर निश्चित नहीं होते।

दूर से कोई आकृति दिखाई देती है— “यह मनुष्य है या वृक्ष?”

किसी व्यक्ति के व्यवहार को देखकर— “वह प्रसन्न है या केवल प्रसन्न होने का अभिनय कर रहा है?”

किसी तर्क को सुनकर— “यह निष्कर्ष सही है या इसमें कोई दोष है?”

यहाँ ज्ञान के बीच में एक अवस्था आती हैसंशय।

और न्याय दर्शन का अगला प्रश्न हैसंशय से निश्चय तक कैसे पहुँचा जाए?

 

संशय क्या है?

न्याय में संशय केवलमुझे नहीं पतानहीं है।

संशय वह स्थिति है जिसमें किसी एक वस्तु के विषय में परस्पर विरोधी सम्भावनाएँ उपस्थित हों और उनमें से किसी एक का निश्चित निर्णय अभी हुआ हो।

उदाहरणदूर कोई वस्तु दिखाई देती है।

यह मनुष्य है या खम्भा?”

यहाँ दोनों सम्भावनाएँ किसी आधार के कारण उपस्थित हैं।

यदि केवल अज्ञान हो— “मुझे नहीं मालूम कि यहाँ क्या है।

तो यह संशय नहीं है।

क्योंकि संशय में विकल्प होते हैं

अर्थात्अज्ञान में ज्ञान का अभाव है; संशय में विकल्पों का संघर्ष है।

यह अन्तर न्याय की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

संशय कैसे उत्पन्न होता है?

संशय की उत्पत्ति के पीछे कई परिस्थितियाँ हो सकती हैं।

एक वस्तु में ऐसा कोई सामान्य धर्म दिखाई देता है जो दो या अधिक वस्तुओं में समान रूप से पाया जाता है।

दूर से मनुष्य और खम्भा दोनों की ऊँचाई जैसी दिखाई दे सकती है।

तब मन में विकल्प उत्पन्न होता है— “मनुष्य है या खम्भा?”

इसी प्रकार कभी विरोधी कथनों के कारण संशय उत्पन्न होता है।

किसी विषय पर दो विश्वसनीय प्रतीत होने वाले मत सामने हों

यह ऐसा है।

और— “नहीं, यह वैसा है।

तब निर्णय के लिए परीक्षण आवश्यक होता है।

संशय और जिज्ञासा

संशय अपने आप में अन्तिम अवस्था नहीं।

वह प्रश्न को जन्म देता है।

यदि हमें कोई संशय ही हो, तो सत्य की खोज की प्रेरणा भी अनेक बार उत्पन्न नहीं होती।

इसलिए न्याय की ज्ञान-यात्रा में संशय एक अवरोध मात्र नहीं, बल्कि परीक्षण की भूमिका तैयार करने वाली अवस्था भी है।

यहीं से अगला तत्व आता हैप्रयोजन।

 

प्रयोजन क्या है?

हम किसी विषय की जाँच क्यों करें? क्योंकि उससे कोई उद्देश्य जुड़ा हुआ है।

किसी वस्तु का ज्ञान हमें किसी लाभ तक पहुँचा सकता है या किसी हानि से बचा सकता है।

यही प्रयोजन है।

उदाहरण

यदि दूर दिखाई देने वाली वस्तु साँप है, तो उससे बचना आवश्यक है।

यदि वह रस्सी है, तो भय का कोई कारण नहीं।

यहाँ सही ज्ञान का सीधा सम्बन्ध व्यवहार से जुड़ गया।

इसलिए न्याय का तर्क केवल बौद्धिक खेल नहीं है।

उसके पीछे व्यावहारिक उद्देश्य भी है।

सत्य का ज्ञान व्यवहार को सही दिशा देता है।

दृष्टान्तसामान्य नियम को स्पष्ट करने का माध्यम

जब किसी तर्क को समझाना हो, तब न्याय दृष्टान्त का सहारा लेता है।

दृष्टान्त ऐसा उदाहरण है जिसमें साध्य और हेतु के सम्बन्ध को स्पष्ट किया जा सके।

धुआँ और अग्नि का प्रसिद्ध उदाहरण लें— “जहाँ धुआँ है वहाँ अग्नि है, जैसे रसोई में।

रसोई यहाँ केवल कोई सजावटी उदाहरण नहीं।

यह उस सामान्य सम्बन्ध को सामने लाती है जिसके आधार पर पर्वत के धुएँ से अग्नि का अनुमान किया जा रहा है।

इसलिए न्याय में दृष्टान्त तर्क की सामान्य वैधता को स्पष्ट करने में सहायता करता है।

 

सिद्धान्तकिस बात को पहले से स्वीकार किया गया है?

तर्क करते समय हर बात को शून्य से आरम्भ नहीं किया जा सकता।

कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें किसी विशेष विमर्श में पहले से स्वीकार किया गया है।

उन्हें न्याय सिद्धान्त की श्रेणी में रखता है।

न्यायसूत्र में सिद्धान्त के विभिन्न प्रकारों की चर्चा मिलती है।

विशेष रूप से

सर्वतन्त्रसिद्धान्त, प्रतितन्त्रसिद्धान्त, अधिकरणसिद्धान्त, अभ्युपगमसिद्धान्त का उल्लेख मिलता है।

इनका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि किसी शास्त्रार्थ या दार्शनिक विवेचन में कौन-सी बात किस स्तर पर स्वीकृत है।

 

सिद्धान्त के चार प्रकार

. सर्वतन्त्रसिद्धान्त

ऐसा सिद्धान्त जिसे अनेक दार्शनिक प्रणालियाँ स्वीकार करती हों। अर्थात् वह किसी एक विशेष मत की सीमा में बँधा हुआ हो।

. प्रतितन्त्रसिद्धान्त

ऐसा सिद्धान्त जिसे एक विशेष दर्शन स्वीकार करता हो, लेकिन दूसरे दर्शन द्वारा स्वीकार किया जाता हो।

यहाँ विभिन्न दार्शनिक प्रणालियों के बीच वास्तविक मतभेद सामने आता है।

. अधिकरणसिद्धान्त

किसी व्यापक सिद्धान्त या आधार को स्वीकार कर उससे सम्बद्ध अन्य निष्कर्षों की स्थापना।यह दार्शनिक तर्क में आधारभूमि तैयार करता है।

. अभ्युपगमसिद्धान्त

किसी बात को केवल तर्क की सुविधा के लिए अस्थायी रूप से स्वीकार करना, भले ही वह स्वयं अपने मत का अन्तिम सिद्धान्त हो।

यह शास्त्रार्थ की एक अत्यन्त उपयोगी पद्धति है।

क्योंकि कभी-कभी प्रतिपक्ष की किसी मान्यता को स्वीकार करके भी उसके भीतर से कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

तर्कप्रमाण नहीं, प्रमाण की सहायता

न्याय की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विशेषता यहाँ दिखाई देती है। तर्क स्वयं प्रमाण नहीं है।

लेकिन वह प्रमाण के प्रयोग में सहायता करता है।

इसे एक उदाहरण से समझें।

मान लीजिए किसी व्यक्ति को संदेह है कि किसी स्थान पर अग्नि है।

वह विचार करता है— “यदि अग्नि हो तो धुआँ कहाँ से आएगा?”

यह विचार व्याप्ति की स्थापना या पुष्टि की दिशा में सहायता कर सकता है।

लेकिन केवल ऐसा विचार अपने आप में अग्नि का प्रमाण नहीं बन जाता।

इसलिए न्याय मेंतर्क प्रमाण का सहायक है, स्वयं स्वतंत्र प्रमाण नहीं।

यह अन्तर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

 

निर्णयसंशय का अन्त

जब विरोधी विकल्पों की परीक्षा हो जाती है और प्रमाण के आधार पर किसी एक पक्ष की निश्चित स्थापना हो जाती है, तब उत्पन्न होता है

निर्णय। - अर्थात् संशय का स्थान निश्चित ज्ञान ले लेता है।

उदाहरण

पहले  यह मनुष्य है या खम्भा?”

फिर निकट जाकर प्रत्यक्ष हुआ—“यह खम्भा ही है।

अब संशय समाप्त हो गया। यह निर्णय है।

इस प्रकारसंशयपरीक्षणप्रमाणनिर्णय

न्याय की ज्ञान-प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण क्रम बन जाता है।

 

संशय से निर्णय तक पूरी यात्रा

अब इस प्रक्रिया को एक साथ देखें

. संशय - दो या अधिक सम्भावनाएँ उपस्थित हैं।

. प्रयोजन - निश्चित ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है।

. दृष्टान्त - सामान्य सम्बन्ध को स्पष्ट करने वाला उदाहरण सामने आता है।

. सिद्धान्त - विवेचन की स्वीकृत आधारभूमि निर्धारित होती है।

. तर्क - संभावित विरोधों की परीक्षा की जाती है।

. प्रमाण - प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान अथवा शब्द से यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

. निर्णय - संशय समाप्त होकर निश्चित निष्कर्ष स्थापित होता है।

यहीं न्याय का तर्कशास्त्र एक व्यवस्थित ज्ञान-अनुशासन का रूप लेता है।

 

न्याय में तर्क और प्रमाण का सम्बन्ध

यहाँ एक सूक्ष्म बात फिर से समझनी चाहिए।

न्याय मेंप्रमाणयथार्थ ज्ञान का साधन

जबकितर्कप्रमाण की सहायता करने वाली विचार-प्रक्रिया।

यदि हम तर्क को ही प्रमाण मान लें, तो न्याय की प्रमाण-संरचना बदल जाएगी।

इसीलिए न्याय ने चार प्रमाणों को स्वतंत्र रूप से स्वीकार किया, जबकि तर्क को उनके सहायक रूप में रखा।

यह अन्तर न्याय के ज्ञानशास्त्र को समझने की कुंजी है।

 

यह पद्धति शास्त्रार्थ में कैसे काम करती थी?

न्याय दर्शन केवल व्यक्तिगत चिन्तन की प्रणाली नहीं था। इसका विकास शास्त्रार्थ की संस्कृति में भी हुआ।

दो पक्ष किसी विषय पर अलग-अलग मत रखते हैं। तब आवश्यक होता है

किसका पक्ष क्या है?

उसका प्रमाण क्या है?

हेतु क्या है?

व्याप्ति कहाँ है?

प्रतिपक्ष का दोष क्या है?

क्या निष्कर्ष प्रमाणित है?

इस प्रकार न्याय ने दार्शनिक विवाद को एक अनुशासित पद्धति देने का प्रयास किया।

यही कारण है कि न्याय के षोडश पदार्थों में केवल प्रमाण और प्रमेय ही नहीं, बल्कि वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान जैसे विवाद-संबंधी तत्व भी आते हैं।

इनका विस्तृत अध्ययन आगे किया जाएगा।

सत्य और विवाद में अन्तर

न्याय के लिए किसी विवाद में जीत जाना और सत्य स्थापित करना एक ही बात नहीं है।

यह अन्तर बाद में वाद, जल्प और वितण्डा के विवेचन में और स्पष्ट होगा।

किसी व्यक्ति का उद्देश्य यदि सत्य की खोज है, तो वह प्रमाण और तर्क का उपयोग करेगा।

यदि उद्देश्य केवल प्रतिपक्ष को पराजित करना हो, तो वह ऐसे तर्कों का भी प्रयोग कर सकता है जो सत्य की स्थापना से अधिक वाद-विजय के लिए हों।

न्याय ने इन दोनों प्रवृत्तियों को पहचानने का प्रयास किया। यहाँ न्याय दर्शन का एक आधुनिक महत्व भी सामने आता हैतर्क का उद्देश्य सत्य की खोज है या केवल बहस जीतना?

दोनों में बहुत अन्तर है।

न्याय और आज का बौद्धिक संसार

आज सोशल मीडिया, राजनीतिक बहस, समाचार, सार्वजनिक विमर्श और इंटरनेट पर असंख्य दावे हमारे सामने आते हैं। हर दावा हमें एक ही प्रश्न के सामने खड़ा करता है

इसका प्रमाण क्या है? फिर दूसराप्रमाण विश्वसनीय है या नहीं? - फिरतर्क में कोई दोष तो नहीं?

और अन्ततःक्या निष्कर्ष वास्तव में सिद्ध हुआ है?

इस अर्थ में न्याय की पद्धति आज भी बौद्धिक अनुशासन का एक उपयोगी मॉडल प्रस्तुत करती है।

लेकिन इसका उपयोग करते समय ऐतिहासिक न्याय और आधुनिक critical thinking को पूर्णतः समान मानना उचित नहीं।

न्याय की अपनी दार्शनिक शब्दावली, प्रमाणमीमांसा और मोक्ष-केंद्रित उद्देश्य है।

 

न्याय की एक गहरी विशेषता

अब तक की पूरी यात्रा से न्याय की एक मूल प्रवृत्ति सामने आती है

किसी बात को केवल इसलिए सत्य मत मानो कि वह कही गई है, अनुभव हुई है या तर्कसंगत प्रतीत होती है। उसके ज्ञान-कारण की परीक्षा करो।

यहाँ न्याय का प्रश्न केवल— “क्या सत्य है?” नहीं है।

बल्कितुम्हें कैसे पता कि यह सत्य है?”

यही प्रश्न न्याय को केवल दर्शन नहीं, बल्कि ज्ञान की आलोचनात्मक पद्धति भी बनाता है।

लेकिन क्या सही तर्क हमेशा सही ज्ञान देता है?

यहाँ एक कठिन प्रश्न फिर सामने आता है। मान लीजिए तर्क की संरचना सुन्दर है।

भाषा स्पष्ट है। निष्कर्ष भी आकर्षक है। लेकिन यदि हेतु ही दोषपूर्ण हो तो?

तब पूरा अनुमान विफल हो सकता है।

यही कारण है कि न्याय ने केवल प्रमाण और तर्क की चर्चा करके अपनी यात्रा समाप्त नहीं की।

उसे यह भी बताना पड़ा किगलत हेतु को कैसे पहचाना जाए?

कब कोई तर्क देखने में सही लेकिन वास्तव में दोषपूर्ण होता है?

कब किसी निष्कर्ष का आधार पक्ष में ही नहीं होता?

कब हेतु साध्य से व्याप्त नहीं होता?

कब कोई प्रतिकूल उदाहरण पूरे तर्क को तोड़ देता है?

यहीं से न्याय का अत्यन्त प्रसिद्ध और व्यावहारिक क्षेत्र शुरू होता है

हेत्वाभासगलत हेतु की पहचान

अगले भाग में हम देखेंगे कि न्याय ने सव्यभिचार, विरुद्ध, सत्प्रतिपक्ष, असिद्ध और बाधित जैसे दोषों के माध्यम से गलत अनुमान की पहचान कैसे की।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

न्याय दर्शन१५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग : संशय से निर्णय तकन्याय की तर्क-पद्धति

नोट : इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग पिछले भाग से आगे बढ़ते हुए न्याय दर्शन के एक नये दार्शनिक पक्ष को सामने लाता है। अनावश्यक पुनरावृत्ति से बचते हुए प्रत्येक भाग को स्वतंत्र भी रखा गया है और सम्पूर्ण श्रृंखला से जोड़ा भी गया है। प्रारम्भिक न्याय, उत्तरवर्ती न्याय तथा नव्य-न्याय के मतों को जहाँ आवश्यक हो, ऐतिहासिक रूप से अलग रखा जाएगा।

(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)

 

 


Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है