पाणिनीय दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला भाग–१५ : शब्द से बोध तक — पाणिनीय परम्परा का दार्शनिक उत्कर्ष और समापन
पाणिनीय
दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–१५ : शब्द से बोध तक — पाणिनीय परम्परा का दार्शनिक उत्कर्ष और समापन
शोध-टिप्पणी
पन्द्रह
भागों की इस यात्रा
का यह समापन-भाग
है। यहाँ पाणिनि, पतञ्जलि
और भर्तृहरि को एक ही
दार्शनिक मत का प्रतिनिधि
मानने के बजाय एक
विकसित होती हुई व्याकरण-परम्परा के क्रम में
देखा गया है। पाणिनि
की अष्टाध्यायी मुख्यतः औपचारिक व्याकरणिक व्यवस्था है; पतञ्जलि का
महाभाष्य उसके भाषिक, प्रयोगात्मक
और दार्शनिक प्रश्नों को विस्तार देता
है; और भर्तृहरि का
वाक्यपदीय शब्द, वाक्य, अर्थ, बोध और सत्ता
के प्रश्न को दार्शनिक ऊँचाई
तक ले जाता है।
अतः “पाणिनीय दर्शन” यहाँ किसी एक
ग्रन्थ में प्रतिपादित दर्शन
के अर्थ में नहीं,
बल्कि पाणिनीय व्याकरण से विकसित दार्शनिक परम्परा के अर्थ में
प्रयुक्त है।
हमारी
यात्रा कहाँ से आरम्भ हुई थी?
पन्द्रह
भाग पहले हमारे सामने
एक सरल-सा प्रश्न
था— व्याकरण आखिर है क्या?
पहली
दृष्टि में उत्तर बहुत
सरल था— भाषा को
शुद्ध बोलने और लिखने के
नियम।
लेकिन
जैसे-जैसे हम पाणिनि
के निकट गए, यह
सरल उत्तर टूटने लगा।
हमें
पता चला—
व्याकरण
केवल शुद्ध-अशुद्ध का विधान नहीं।
वह भाषा की संरचना
को समझने का प्रयास है।
फिर
हमने देखा कि—
संरचना
के भीतर रूप है।
रूप
के भीतर अर्थ-संकेत
है।
अर्थ
के भीतर सम्बन्ध है।
सम्बन्ध
के भीतर वाक्य है।
और वाक्य के भीतर—
बोध।
यहीं
से व्याकरण दर्शन की भूमि पर
आ खड़ा हुआ।
पाणिनि
की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
पाणिनि
ने संस्कृत को केवल वर्णित
नहीं किया।
उन्होंने
उसकी संरचना को ऐसे नियमबद्ध
तन्त्र में व्यवस्थित किया
जिसमें—
ध्वनि
→ रूप → प्रत्यय → पद → वाक्य की प्रक्रियाएँ अत्यन्त
सूक्ष्म नियमों द्वारा नियंत्रित होती हैं।
अष्टाध्यायी
लगभग चार हजार सूत्रों
में संस्कृत के रूप-निर्माण
की एक अत्यन्त संक्षिप्त
और औपचारिक प्रणाली प्रस्तुत करती है।
उसकी
शक्ति उसकी विशालता में
नहीं— उसकी संक्षिप्तता और नियम-संरचना में है।
एक छोटा सूत्र अनेक
शब्दरूपों पर लागू हो
सकता है।
एक ही नियम विभिन्न
परिस्थितियों में अलग परिणाम
दे सकता है।
अपवाद
भी नियमबद्ध ढाँचे के भीतर आते
हैं।
यहाँ
भाषा पहली बार हमारे
सामने लगभग एक औपचारिक
प्रणाली की तरह दिखाई
देती है।
पाणिनि
ने भाषा को स्थिर वस्तु नहीं माना
भाषा
कोई संग्रहालय में रखी हुई
वस्तु नहीं।
भाषा
चलती है। बदलती है। नए शब्द बनाती है।
पुराने शब्दों के अर्थ बदलती
है। नए सम्बन्ध व्यक्त करती है।
पाणिनीय
प्रणाली की विशेषता यह
है कि वह भाषा
को केवल उसके वर्तमान
रूप में नहीं देखती।
वह पूछती है— यह रूप बना कैसे?
धातु
से क्या हुआ? प्रत्यय
क्यों लगा? विभक्ति
क्यों बदली? सन्धि क्यों हुई? समास कैसे
बना?
अर्थ
के किस सम्बन्ध ने
यह रूप उत्पन्न किया?
इस अर्थ में पाणिनीय
व्याकरण— भाषा का परिणाम नहीं, भाषा की प्रक्रिया पकड़ता है।
पाणिनि
से पतञ्जलि तक — नियम से प्रयोजन तक
पाणिनि
के बाद प्रश्न बदलने
लगे।
यदि
व्याकरण इतना सूक्ष्म है—
तो इसका प्रयोजन क्या
है?
मनुष्य
को व्याकरण क्यों पढ़ना चाहिए?
शब्द
का शुद्ध प्रयोग क्यों आवश्यक है?
भाषा
में दोष और गुण
का क्या महत्त्व है?
पतञ्जलि
के महाभाष्य में व्याकरण के
प्रयोजन, शब्द-प्रयोग और
भाषिक शुद्धता से जुड़े अनेक
प्रश्नों पर विचार मिलता
है।
यहाँ
व्याकरण केवल— “यह रूप कैसे बनेगा?” का उत्तर नहीं
देता।
वह पूछने लगता है— “यह
ज्ञान मनुष्य के लिए उपयोगी क्यों है?”
यहीं
व्याकरण विद्या से दर्शन की
ओर बढ़ता है।
व्याकरण
और साधुशब्द
भारतीय
परम्परा में साधुशब्द की अवधारणा अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण है।
साधुशब्द
का अर्थ केवल— “अच्छा
शब्द” नहीं है।
यह उस भाषिक रूप
की ओर संकेत करता
है जो स्वीकृत व्याकरणिक
और भाषिक परम्परा के अनुसार सिद्ध
है।
लेकिन
यहाँ एक गहरी बात
है। जब हम कहते हैं—
“यह शब्द सही है।”
तो
“सही” होने का आधार
क्या है?
प्रयोग? परम्परा?
व्याकरण? अर्थ-संप्रेषण? शास्त्रीय
स्वीकृति?
इस प्रकार “शुद्ध शब्द” का प्रश्न भी
अन्ततः— ज्ञान और मानक की समस्या बन जाता है।
फिर
आया शब्द और अर्थ का प्रश्न
भाग–१४ में हमने
जिस प्रश्न को सबसे गहराई
से देखा था, वही
अब हमारी पूरी यात्रा का
केन्द्र बन जाता है—
शब्द
किस अर्थ को व्यक्त करता है?
“गौः”
कहने पर— क्या एक
विशेष गाय का बोध
होता है?
गोत्व
का? जाति
का? आकृति का? किसी मानसिक
वर्ग का? या—
इन सबको पार करती
हुई कोई समग्र अर्थ-प्रतिति?
न्याय
ने जाति और व्यक्ति
की वस्तुगत संरचना से उत्तर खोजा।
बौद्ध
ने अपोह की ओर
संकेत किया।
मीमांसा
ने शब्द की नित्यता
और वाक्यबोध की अपनी व्यवस्था
विकसित की।
और भर्तृहरि ने प्रश्न को—
समग्र बोध तक पहुँचा दिया।
भर्तृहरि
ने एक निर्णायक परिवर्तन किया
पाणिनि
की अष्टाध्यायी मुख्यतः शब्दरूप की व्यवस्था है।
पतञ्जलि
उस व्यवस्था की व्याख्या और
प्रयोजन पर विचार करते
हैं।
लेकिन
भर्तृहरि पूछते हैं— शब्द अन्ततः बोध में क्या करता है?
यह प्रश्न पूरी दिशा बदल
देता है।
अब विषय— शब्दरूप से उठकर— चेतना में अर्थ के प्राकट्य तक पहुँच जाता
है।
इसीलिए
भर्तृहरि का वाक्यपदीय भारतीय भाषा-दर्शन की
महान कृतियों में गिना जाता
है।
स्फोट
— शब्द की अखण्डता
हमने
श्रृंखला के मध्य भागों
में देखा कि ध्वनि
क्रमिक है।
पहले
एक ध्वनि। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
लेकिन
अर्थ का बोध केवल
तीन अलग-अलग ध्वनियों
के गणितीय जोड़ जैसा नहीं
होता।
जब हम कोई परिचित
शब्द सुनते हैं— अर्थ एक
साथ प्रकाशित होता है।
इसी
समस्या को समझाने के
लिए स्फोट की अवधारणा सामने
आती है।
यहाँ
स्फोट को आधुनिक भौतिक
विस्फोट समझना भारी भूल होगी।
स्फोट
यहाँ— अर्थ के अखण्ड भाषिक प्राकट्य की दार्शनिक समस्या
है।
वाक्य
— केवल शब्दों का जोड़ नहीं
यदि
कोई कहे— रामः। तो एक अर्थ।
गच्छति।
तो दूसरा अर्थ।
लेकिन—
रामः गच्छति।
अब दोनों शब्दों के बीच सम्बन्ध
से एक पूर्ण घटना
का बोध होता है।
यहीं
भर्तृहरि का वाक्य-दर्शन
महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
वाक्य
को केवल— शब्द
१ + शब्द २मान लेने
से उसका पूर्ण अर्थ
नहीं मिलता।
वाक्य
का अर्थ एक समग्र
बोध के रूप में
सामने आता है।
इसलिए—
वाक्य शब्दों से बड़ा है।
और—वाक्यार्थ शब्दार्थों के साधारण जोड़ से अधिक है।
वाक्य
से बोध
अब हमारी पूरी श्रृंखला का
सबसे महत्त्वपूर्ण सूत्र सामने आता है— शब्द
→ अर्थ → वाक्य → बोध।
लेकिन
यह क्रम केवल बाहरी
क्रम नहीं। यह मनुष्य की ज्ञान-प्रक्रिया
का संकेत भी है।
हम सुनते हैं। पहचानते हैं। सम्बन्ध स्थापित करते हैं। पूर्वज्ञान से
जोड़ते हैं। सन्दर्भ ग्रहण करते हैं।
और फिर— अर्थ का बोध होता है।
इसलिए
भाषा केवल बाहर से
भीतर आने वाली ध्वनि
नहीं।
भाषा—
चेतना और जगत् के बीच अर्थ-सम्बन्ध की एक जटिल प्रक्रिया है।
क्या
शब्द के बिना विचार सम्भव है?
यहाँ
हमें फिर सावधान रहना
होगा।
यह कहना कि— “भाषा
के बिना कोई विचार सम्भव नहीं”
भारतीय
परम्पराओं के सभी मतों
का निष्कर्ष नहीं है।
प्रत्यक्ष
अनुभव, संवेदना, ध्यान, योगिक अनुभूति और अवाचिक ज्ञान
की अनेक सम्भावनाएँ भारतीय
दर्शन में स्वीकार की
गई हैं।
लेकिन
एक दूसरा प्रश्न अभी भी जीवित
है—
जब
अनुभव को संकल्पना, वर्गीकरण, तर्क और संप्रेषण में बदला जाता है, तब भाषा की भूमिका क्या होती है?
यहीं
पाणिनीय परम्परा अत्यन्त आधुनिक प्रतीत होती है।
वह हमें बताती है—
ज्ञान को व्यक्त करने की संरचना स्वयं अध्ययन का विषय हो सकती है।
व्याकरण
और ज्ञानमीमांसा
अब व्याकरण केवल भाषा-विज्ञान
नहीं रह जाता।
वह पूछता है—
शब्द
से ज्ञान कैसे?
वाक्य
से ज्ञान कैसे?
वक्ता
की विश्वसनीयता का क्या स्थान?
सन्दर्भ
की भूमिका क्या?
पूर्वज्ञान
कितना आवश्यक?
श्रोता
की ग्रहण-क्षमता का क्या महत्त्व?
यह सब मिलकर— शब्दबोध
की समस्या बनाते हैं।
और शब्दबोध— ज्ञानमीमांसा का प्रश्न है।
इस प्रकार पाणिनीय परम्परा का विकास हमें
दिखाता है कि—
व्याकरण
और ज्ञानमीमांसा के बीच दूरी उतनी नहीं जितनी आधुनिक विषय-विभाजन देखकर प्रतीत होती है।
व्याकरण
और प्रमाण
भारतीय
दर्शन में प्रमाण का
प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
हम जानते कैसे हैं?
प्रत्यक्ष
से? अनुमान
से? उपमान से? शब्द से?
विभिन्न
दर्शन अलग-अलग प्रमाण
स्वीकार करते हैं।
लेकिन
शब्दप्रमाण की समस्या पर
विचार करते समय एक
मूल प्रश्न आता है—
शब्द
से ज्ञान उत्पन्न होने की प्रक्रिया क्या है?
यदि
किसी विश्वसनीय व्यक्ति ने कहा— “वहाँ
नदी है।”
तो सुनने वाले को नदी
का ज्ञान कैसे हुआ?
ध्वनि
कान तक पहुँची। शब्द पहचाने
गए। शब्दार्थ स्मरण हुआ। शब्दों के सम्बन्ध को
समझा गया। वाक्य का तात्पर्य ग्रहण
हुआ।
और फिर— नदी का ज्ञान उत्पन्न हुआ। यानी शब्द से
ज्ञान की यात्रा में
कई स्तर सक्रिय हैं।
पाणिनीय
व्याकरण का मौन योगदान
पाणिनि
ने प्रमाणशास्त्र की कोई स्वतंत्र
प्रणाली नहीं बनाई।
फिर
भी उनकी व्याकरणिक प्रणाली
ने एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
कार्य किया—
उसने
यह दिखाया कि— भाषा में अर्थ-संरचना नियमबद्ध होती है।
यदि
भाषा पूर्णतः अराजक होती— तो शब्द से
निश्चित अर्थबोध सम्भव न होता।
“रामः”
और “रामम्” का अन्तर केवल
ध्वनि का अन्तर नहीं।
वह वाक्य में सम्बन्ध और
भूमिका बदलता है।
इस प्रकार व्याकरण— ज्ञान के भाषिक आधार की संरचना को स्पष्ट करता
है।
शब्दब्रह्म
— यात्रा का दार्शनिक शिखर
भाग–१३ में हमने
शब्दब्रह्म की चर्चा की
थी। अब उसे पूरी यात्रा
के भीतर रखें।
यदि—
शब्द अर्थ को व्यक्त
करता है,
अर्थ
ज्ञान में प्रकट होता
है,
ज्ञान
चेतना में प्रकाशित होता
है,
और भाषा की पूरी
व्यवस्था चेतना के अर्थ-प्रकाश
से जुड़ी है,
तो भर्तृहरि का प्रश्न स्वाभाविक
हो जाता है—
क्या
शब्दतत्त्व स्वयं अस्तित्व की किसी मूल सत्ता से सम्बद्ध है?
यहीं—
शब्दब्रह्म की अवधारणा आती
है।
लेकिन
हमने जानबूझकर इसे कोई सरल
धार्मिक घोषणा नहीं बनाया।
क्योंकि
प्रश्न अभी भी खुला
है—
क्या
शब्दब्रह्म परम ब्रह्म के
समान है?
या यह भाषा-दर्शन
की विशिष्ट दार्शनिक संकल्पना है?
यही
विद्वानों के बीच विचार
का विषय बना रहता
है।
पाणिनि
को “दार्शनिक” कहना कितना उचित है?
यहाँ
इस पूरी श्रृंखला की
एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।
यदि
कोई पूछे— “क्या पाणिनि ने कोई दर्शन लिखा?”
तो उत्तर होगा— अष्टाध्यायी स्वयं किसी स्वतंत्र दर्शनशास्त्र की पुस्तक नहीं है।
इसलिए
पाणिनि को— न्याय, सांख्य,
योग, मीमांसा, वेदान्त
की तरह एक स्वतंत्र
दार्शनिक मत के संस्थापक
के रूप में प्रस्तुत
करना उचित नहीं।
फिर
“पाणिनीय दर्शन” क्यों?
क्योंकि
पाणिनि से प्रारम्भ हुई
व्याकरण-परम्परा ने आगे चलकर—
पतञ्जलि, भर्तृहरिऔर
अनेक व्याकरणाचार्यों के माध्यम से—
भाषा, अर्थ, ज्ञान और सत्ता पर
असाधारण दार्शनिक विमर्श उत्पन्न किया।
अतः—
पाणिनीय
दर्शन = पाणिनि की अष्टाध्यायी में निहित नियमों + उस पर विकसित व्याकरण-दर्शन की दीर्घ परम्परा के रूप में
समझना अधिक उचित है।
आधुनिक
भाषाविज्ञान और पाणिनि
पाणिनीय
व्याकरण की औपचारिकता ने
आधुनिक भाषाविज्ञान और formal grammar के अध्येताओं को
आकर्षित किया है।
विशेषतः—
नियम, संक्षिप्त संकेत, ध्वनि-परिवर्तन, रूप-निर्माण, व्युत्पत्ति,
और संरचनात्मक प्रक्रियाओं का पाणिनीय संगठन उल्लेखनीय है।
लेकिन
यहाँ भी हमें अतिशयोक्ति
से बचना चाहिए।
यह कहना— “पाणिनि आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान के जनक थे”
या—
“अष्टाध्यायी
आधुनिक AI की programming language थी”
इतिहास
और विज्ञान दोनों के साथ अन्याय
होगा।
अधिक
उचित कथन यह है—
पाणिनीय
व्याकरण एक अत्यन्त विकसित औपचारिक भाषिक प्रणाली है, जिसकी कुछ विशेषताएँ आधुनिक formal systems से तुलनात्मक अध्ययन को प्रेरित करती हैं।
तुलना
उपयोगी है। समानता सिद्ध करना अलग बात
है।
पाणिनि
और कम्प्यूटेशन — एक सावधान तुलना
आधुनिक
computational linguistics में
हम भाषा को नियमों,
संरचनाओं और प्रक्रियाओं के
माध्यम से मॉडल कर
सकते हैं।
पाणिनीय
व्याकरण में भी— नियमों
का क्रम, परिभाषाएँ, अधिकार, अनुवृत्ति, प्रत्याहार, अपवाद, और प्रक्रियात्मक संचालन—
एक अत्यन्त व्यवस्थित प्रणाली बनाते हैं।
इसलिए
तुलनात्मक अध्ययन सम्भव है।
लेकिन—
पाणिनि ने आधुनिक अर्थ में computer algorithm नहीं बनाया था।
उनकी
प्रणाली का लक्ष्य संस्कृत
के व्याकरणिक रूपों की व्याख्या और
निर्माण था, न कि
डिजिटल computation।
यह अन्तर बनाए रखना ही
शोध की ईमानदारी है।
पाणिनीय परम्परा की सबसे बड़ी शक्ति — संक्षिप्तता
पाणिनि
का सूत्र देखें—
छोटा। कभी-कभी अत्यन्त छोटा।
लेकिन उसके भीतर—
एक तकनीकी परिभाषा, एक संचालन, एक
सीमा, एक अपवाद, या
अनेक शब्दरूपों की व्युत्पत्ति—
समाहित
हो सकती है। यह केवल
भाषिक प्रतिभा नहीं।
यह ज्ञान-संपीड़न की अद्भुत कला
है।
एक विशाल भाषिक व्यवहार को न्यूनतम नियमों
में व्यक्त करना—
अपने
आप में एक महान
बौद्धिक उपलब्धि है।
प्रत्याहार
— संकेत में विशालता
अइउण्। ऋऌक्। एचोऽयवायावः।
पाणिनीय
प्रणाली में शिवसूत्रों और
प्रत्याहारों का प्रयोग यह
दिखाता है कि—
कुछ
ध्वनियों के समूह को
एक अत्यन्त संक्षिप्त संकेत से नियंत्रित किया
जा सकता है।
आज की भाषा में
कहें तो— compression of
description जैसी तुलना यहाँ की जा
सकती है।
लेकिन
फिर वही सावधानी—
यह आधुनिक information theory नहीं है।
यह पाणिनीय व्याकरण की अपनी तकनीकी
व्यवस्था है।
पाणिनीय
दर्शन हमें क्या सिखाता है?
यदि
इस पूरी यात्रा से
कुछ मूल शिक्षाएँ निकालें,
तो वे केवल संस्कृत
सीखने की शिक्षाएँ नहीं
हैं।
पहली
शिक्षा — भाषा व्यवस्था है। - भाषा अराजक ध्वनियों
का समूह नहीं।
दूसरी
— रूप के पीछे नियम हैं। - शब्द कैसे बनता
है, यह मनमाना नहीं।
तीसरी
— अर्थ सम्बन्धात्मक है। - शब्द अकेला नहीं;
वाक्य में उसका अर्थ
बदल सकता है।
चौथी
— वाक्य केवल शब्दों का जोड़ नहीं। - वाक्य एक समग्र बोध
उत्पन्न कर सकता है।
पाँचवीं
— भाषा और ज्ञान गहरे जुड़े हैं।- शब्द केवल सूचना
नहीं देता; वह अर्थ को
संरचित करता है।
छठी
— शब्द पर विचार अन्ततः चेतना पर प्रश्न उठाता है।- यही भर्तृहरि तक
पहुँचने की दिशा है।
पाणिनि
से भर्तृहरि तक — एक सम्पूर्ण बौद्धिक यात्रा
अब पूरी यात्रा को
एक सूत्र में रखें—
पाणिनि –
भाषा
की संरचना-
पतञ्जलि
-भाषा का
प्रयोजन, प्रयोग और शास्त्रीय विवेचन
↓
भर्तृहरि
-शब्द → वाक्य
→ अर्थ → बोध → सत्ता
यह क्रम किसी सरल
“विकासवाद” का दावा नहीं।
यह केवल यह दिखाता
है कि व्याकरण-परम्परा
के भीतर प्रश्नों का
क्षेत्र कैसे विस्तृत हुआ।
आरम्भ
में प्रश्न था— “शब्द कैसे बनता है?”
बाद
में— “शब्द का अर्थ क्या है?” फिर— “वाक्य से बोध कैसे होता है?”
और अन्ततः— “शब्द, अर्थ और चेतना की मूल एकता क्या है?”
यही
इस परम्परा की दार्शनिक यात्रा
है।
क्या
पाणिनीय दर्शन अद्वैत है? - सीधे नहीं। -
क्या
यह न्याय है? - नहीं।
क्या
यह मीमांसा है? - नहीं।
क्या
यह बौद्ध अपोहवाद है? - नहीं।
फिर
यह क्या है?
यह—
भाषा
को अस्तित्व, अर्थ और ज्ञान की समस्या के केन्द्र में रखकर सोचने वाली व्याकरण-दर्शन परम्परा
है। इसकी
अपनी विशिष्टता इसी में है।
यह
संसार को केवल— पदार्थों
या चेतना के माध्यम
से नहीं समझती।
यह पूछती है— मनुष्य संसार को अर्थवान कैसे बनाता है?
और इस प्रश्न का
उत्तर खोजते हुए— भाषा को केन्द्र
में रखती है।
क्या
भाषा संसार बनाती है?
यह प्रश्न आज भी खुला
है।
एक दृष्टि कह सकती है—
संसार पहले है। भाषा बाद
में उसका नामकरण करती
है।
दूसरी
कह सकती है— हम
जिस संसार को अर्थपूर्ण रूप
में जानते हैं, उसकी संरचना
में भाषा सक्रिय है।
तीसरी
दृष्टि कह सकती है—
संसार और भाषा का
सम्बन्ध इतना गहरा है
कि दोनों को पूर्णतः अलग
करके समझना कठिन है।
भर्तृहरि
की दिशा तीसरी सम्भावना
के अत्यन्त निकट जाती दिखाई
देती है।
लेकिन
इसे आधुनिक “language constructs
reality” जैसे किसी एक वाक्य
में सीमित करना उचित नहीं।
भारतीय
परम्परा का प्रश्न अधिक
सूक्ष्म है— वस्तु, शब्द और बोध का पारस्परिक सम्बन्ध क्या है?
मौन
की ओर लौटना
हमारी
यात्रा शब्द से आरम्भ
हुई।
अब समापन में हम फिर
मौन के निकट पहुँचते
हैं।
क्यों?
क्योंकि यदि— शब्द
बोध तक पहुँचाता है,तो बोध के
बाद क्या?
जब अर्थ पूर्णतः समझ
में आ जाता है—
तब शब्द आवश्यक रहता
है क्या?
किसी
प्रिय व्यक्ति का चेहरा देखने
के लिए हमें हर
बार उसका नाम बोलना
नहीं पड़ता।
किसी
गहरे अनुभव में भाषा पीछे
हट सकती है।
ध्यान
में शब्द शांत हो
सकते हैं।
काव्य
में कभी-कभी कहा
हुआ कम और अनकहा
अधिक बोलता है।
इसलिए
शब्द का चरम शायद—
शब्द
की अनन्त वृद्धि नहीं, बल्कि उस बोध तक पहुँचना है जहाँ शब्द अपना कार्य पूरा कर चुका हो।
यहाँ
व्याकरण दर्शन को एक गम्भीर
आध्यात्मिक प्रश्न देता है।
शब्द
साधन है या सत्य?
यहाँ
दो सम्भावनाएँ हैं।
यदि
शब्द केवल साधन है—
तो वह हमें अर्थ
तक पहुँचाता है।
यदि
शब्द स्वयं सत्य की किसी
मूल सत्ता का रूप है—
तो शब्द की प्रकृति
का ज्ञान स्वयं सत्यज्ञान की दिशा बन
जाता है।
भर्तृहरि
का दर्शन दूसरी सम्भावना को गंभीरता से
लेता है।
लेकिन
भारतीय परम्परा का व्यापक परिदृश्य
हमें पहली सम्भावना को
भी विस्मृत नहीं करने देता।
इसलिए
हमारी अंतिम स्थिति कोई जल्दबाज़ निष्कर्ष
नहीं— बल्कि एक खुला दार्शनिक
प्रश्न है।
पाणिनीय
दर्शन की वास्तविक विरासत
पाणिनि
की विरासत केवल यह नहीं
कि— संस्कृत का व्याकरण व्यवस्थित
हुआ।
उनकी
सबसे बड़ी विरासत यह
है कि उन्होंने यह
सम्भव कर दिया कि—
भाषा
स्वयं दार्शनिक अनुसन्धान का विषय बन सके।
भाषा
को बाहर से देखने
के बजाय— भाषा के भीतर
उतरकर उसके नियमों को
देखना।
फिर
उन नियमों से अर्थ की
ओर जाना।
अर्थ
से वाक्य की ओर।
वाक्य
से बोध की ओर।
और बोध से अस्तित्व
के प्रश्न तक।
यही
पाणिनीय परम्परा की विराट उपलब्धि
है।
हमारी पन्द्रह-भागीय यात्रा का संक्षिप्त मानचित्र
पूरी
श्रृंखला को एक बार
फिर देखें—
भाग–१ — पाणिनि और पाणिनीय परम्परा
: दर्शन की भूमिका
भाग–२ — अष्टाध्यायी : भाषा को सूत्र
में बाँधने की अद्भुत प्रणाली
भाग–३ — शिवसूत्र और प्रत्याहार : ध्वनि
की वैज्ञानिक-संरचनात्मक व्यवस्था
भाग–४ — वर्ण, ध्वनि और उच्चारण : भाषा
की सूक्ष्म रचना
भाग–५ — संधि : ध्वनियों के सम्बन्ध और
परिवर्तन का विज्ञान
भाग–६ — धातु और प्रत्यय
: शब्द-निर्माण की गतिशील संरचना
भाग–७ — कारक और विभक्ति
: क्रिया, सम्बन्ध और अर्थ-संरचना
भाग–८ — वाक्य, प्रयोग और व्याकरण : भाषा
से बोध की ओर
भाग–९ — देवभाषा क्यों? : संस्कृत, वाक् और भाषिक
प्रतिष्ठा
भाग–१० — पतञ्जलि और महाभाष्य : व्याकरण
से दर्शन की ओर
भाग–११ — स्फोट : ध्वनि से अखण्ड अर्थबोध
तक
भाग–१२ — वाक् के स्तर
: परा से वैखरी तक
भाग–१३ — शब्दब्रह्म : क्या शब्द परम
तत्त्व है?
भाग–१४ — शब्द और अर्थ
: जाति, व्यक्ति, आकृति और अपोह
भाग–१५ — शब्द से बोध
तक : पाणिनीय परम्परा का दार्शनिक उत्कर्ष
इस प्रकार यात्रा—
वर्ण
से आरम्भ होकर ब्रह्म तक गई,
और ब्रह्म से लौटकर बोध पर आकर पूर्ण हुई।
अन्तिम
दार्शनिक निष्कर्ष
पाणिनीय
परम्परा को केवल “संस्कृत
व्याकरण” कह देना उसके
वास्तविक विस्तार को बहुत छोटा
कर देना होगा।
और उसे सीधे “एक
स्वतंत्र दर्शन” कहना भी ऐतिहासिक
रूप से सावधानीहीन होगा।
अधिक
सटीक रूप में इसे
इस प्रकार समझा जा सकता
है—
पाणिनि
ने भाषा को संरचना दी।
पतञ्जलि ने उस संरचना के प्रयोजन और दार्शनिक प्रश्नों को खोला।
भर्तृहरि ने शब्द को बोध और सत्ता के प्रश्न तक पहुँचाया।
इस यात्रा में—
ध्वनि
केवल ध्वनि नहीं रही।
शब्द
केवल नाम नहीं रहा।
अर्थ
केवल वस्तु नहीं रहा।
वाक्य
केवल शब्दों का समूह नहीं
रहा।
और व्याकरण केवल नियमों की
पुस्तक नहीं रहा।
अन्ततः
प्रश्न बचा—
जो
शब्द को सुनता है, जो अर्थ को समझता है, जो वाक्य का बोध करता है— वह कौन है?
यहीं
व्याकरण की सीमा समाप्त
नहीं होती।
यहीं
से— चेतना का दर्शन आरम्भ होता है।
उपसंहार
— व्याकरण से आत्मबोध तक
शायद
पाणिनीय परम्परा की सबसे गहरी
शिक्षा यही है— शब्द
को समझना केवल शब्द को समझना नहीं है।
क्योंकि
शब्द— अर्थ
की ओर ले जाता
है।
अर्थ—
बोध की ओर।
बोध—
ज्ञान की ओर।
और ज्ञान— ज्ञाता के प्रश्न की
ओर।
इसलिए
हमारी पन्द्रह भागों की यात्रा का
अंतिम सूत्र हो सकता है—
“शब्दोऽर्थं
प्रकाशयति, अर्थो बोधं जनयति, बोधः ज्ञानाय, ज्ञानं स्वरूपदर्शनाय।”
अर्थात्—
शब्द
अर्थ को प्रकाशित करता है,
अर्थ बोध को जन्म देता है,
बोध ज्ञान की ओर ले जाता है,
और ज्ञान अन्ततः अपने स्वरूप के दर्शन की ओर।
यहीं
पाणिनीय दर्शन हमारे लिए केवल प्राचीन
व्याकरण नहीं रहता।
वह एक यात्रा बन
जाता है—
ध्वनि
से अर्थ तक, अर्थ से ज्ञान तक, ज्ञान से चेतना तक।
और शायद— चेतना से उस मौन तक, जहाँ शब्द अपना अंतिम कार्य पूरा कर चुका होता है।
समापन
पन्द्रह
भागों की यह शोधपरक
श्रृंखला यहीं समाप्त होती
है।
लेकिन
पाणिनीय परम्परा का अध्ययन यहाँ
समाप्त नहीं होता।
क्योंकि
अब आगे अनेक स्वतंत्र
दिशाएँ खुलती हैं—
पाणिनि
बनाम आधुनिक भाषाविज्ञान।
भर्तृहरि
और आधुनिक philosophy of
language।
स्फोट
और contemporary
theories of meaning।
पाणिनीय
व्याकरण और computational linguistics।
शब्दब्रह्म
और भारतीय चेतना-दर्शन।
और सबसे गहरा प्रश्न—
क्या
भाषा केवल चेतना की अभिव्यक्ति है,
या चेतना स्वयं अपने को भाषा के माध्यम से पहचानती है?
शायद
इसी प्रश्न पर—
व्याकरण
दर्शन बन जाता है। और— दर्शन आत्मचिन्तन।
अन्तिम
शोध-टिप्पणी
इस
पन्द्रह-भागीय श्रृंखला में “पाणिनीय दर्शन”
शब्द का प्रयोग पाणिनि
की अष्टाध्यायी से विकसित व्याकरण-दर्शन की व्यापक परम्परा के अर्थ में
किया गया है। पाणिनि
को किसी स्वतंत्र दर्शन-संप्रदाय के संस्थापक के
रूप में प्रस्तुत नहीं
किया गया। पाणिनि, पतञ्जलि
और भर्तृहरि के काल, ग्रन्थ
और दार्शनिक उद्देश्यों में अन्तर को
यथासम्भव बनाए रखा गया
है। “देवभाषा”, “शब्दब्रह्म”, “स्फोट”, “वाक्”, “जाति”, “अपोह” और “शब्दप्रमाण” जैसी
अवधारणाओं को उनके सम्बन्धित
ऐतिहासिक और दार्शनिक सन्दर्भों
में समझने का प्रयास किया
गया है। आधुनिक भाषाविज्ञान,
कम्प्यूटेशन या विज्ञान से
की गई तुलनाएँ केवल
तुलनात्मक हैं; उनसे प्राचीन
सिद्धान्तों की आधुनिक वैज्ञानिक
पुष्टि का दावा नहीं
किया गया है।
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
पाणिनीय
दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–१५ : शब्द से बोध तक — पाणिनीय परम्परा का दार्शनिक उत्कर्ष और समापन
शोध-टिप्पणी : यह पन्द्रहवाँ एवं
समापन भाग पाणिनीय व्याकरण-परम्परा की समग्र दार्शनिक
यात्रा का पुनर्संयोजन करता
है। पाणिनि की औपचारिक व्याकरणिक
प्रणाली, पतञ्जलि के भाष्यपरम्परा-आधारित
विमर्श तथा भर्तृहरि के
शब्द–वाक्य–अर्थ–बोध सम्बन्धी
दर्शन को ऐतिहासिक भेद
बनाए रखते हुए एक
विकासशील बौद्धिक परम्परा के रूप में
देखा गया है। “शब्द
से बोध” की यात्रा
को किसी एक दार्शनिक
निष्कर्ष में सीमित नहीं
किया गया है। आधुनिक
भाषाविज्ञान, कम्प्यूटेशनल व्याकरण और चेतना-विज्ञान
के साथ किए गए
संकेत केवल तुलनात्मक हैं,
प्रत्यक्ष समानता अथवा प्राचीन सिद्धान्तों
की आधुनिक वैज्ञानिक पुष्टि का दावा नहीं।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
Comments
Post a Comment