सांख्य दर्शन — भाग १३ पच्चीस तत्त्वों का रहस्य : प्रकृति से पुरुष तक सांख्य का सम्पूर्ण मानचित्र

 सांख्य दर्शनभाग १३

पच्चीस तत्त्वों का रहस्य : प्रकृति से पुरुष तक सांख्य का सम्पूर्ण मानचित्र

पिछले भाग में हमने देखा कि सांख्य किसी तत्त्व को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करता कि वह परम्परा में कहा गया है। वह पूछता हैउसके ज्ञान का प्रमाण क्या है?

प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तवचन के आधार पर सांख्य अपने तत्त्वों की स्थापना करता है।

अब तक हमने इन तत्त्वों को अलग-अलग प्रसंगों में देखा है।

प्रकृति को देखा।

महत् को समझा।

अहंकार से मन और इन्द्रियों की उत्पत्ति समझी। तन्मात्राओं से महाभूतों का विकास देखा।

पुरुष को प्रकृति से भिन्न साक्षी के रूप में समझा।

लेकिन अभी तक यह पूरा दर्शन एक जीवित मानचित्र की तरह हमारे सामने नहीं आया है।

इसलिए इस भाग में सांख्य की सबसे प्रसिद्ध संरचना को एक साथ रखेंगे

पच्चीस तत्त्व।

लेकिन केवल उनकी सूची नहीं।

हम यह भी देखेंगे कि इनमें कौन

प्रकृति है,
कौन विकृति है,
कौन प्रकृति भी है और विकृति भी,
और कौन दोनों से परे है।

यहीं सांख्य की तत्त्वमीमांसा अपनी असाधारण वैज्ञानिक-संगठन क्षमता दिखाती है।

पच्चीस तत्त्वों की आवश्यकता क्यों?

सांख्य के अनुसार संसार केवलपदार्थनहीं है।

यदि केवल स्थूल पदार्थ को स्वीकार कर लिया जाए, तो मनुष्य के अनुभव की पूरी व्याख्या नहीं हो सकती।

क्योंकि मनुष्य मेंशरीर है, इन्द्रियाँ हैं, मन है, अहंकार है, निर्णय करने वाली बुद्धि है,

सूक्ष्म विषयों का आधार है, स्थूल जगत् है, और इन सबके अनुभव का चेतन साक्षी भी है।

इसलिए सांख्य संसार और जीव-अनुभव को एक ही पदार्थ में समेटने के बजाय उसकी विभिन्न कार्य-सत्ताओं को अलग-अलग पहचानता है।

यही तत्त्व-विभाजन है।

पच्चीस का अर्थ

सांख्य में२४ तत्त्व प्रकृति के क्षेत्र से सम्बन्धित हैं।

और२५वाँ तत्त्व पुरुष है।

इसलिए सांख्य को परम्परा में पञ्चविंशतितत्त्ववाद भी कहा जाता है।

यहाँ२४का अर्थ हैमूल प्रकृति से लेकर उसके समस्त व्यक्त परिणाम।

और२५हमें यह याद दिलाता है किचेतना को प्रकृति के परिणाम में नहीं बदला जा सकता।

यही संख्या सांख्य की दार्शनिक सीमा-रेखा है।

 

सबसे पहले : मूल प्रकृति

पच्चीस तत्त्वों की यात्रा का आरम्भ होता है

. प्रकृति इसे कहा जाता हैप्रधान, अव्यक्त , मूलप्रकृति यह किसी दूसरी वस्तु से उत्पन्न नहीं।

इसीलिए यह विकासक्रम का मूल कारण है।

प्रकृति में तीन गुण हैंसत्त्व, रजस् और तमस्।

जब ये तीनों साम्यावस्था में रहते हैं, तब प्रकृति अव्यक्त है।

जब उनका साम्य भंग होता है, तब विकास आरम्भ होता है।

इसलिए प्रकृति को केवल पदार्थ का ढेर समझना भूल होगी।

वहसमस्त व्यक्त जगत् की मूल कारण-सत्ता है।

 

सांख्यकारिका का निर्णायक वर्गीकरण

ईश्वरकृष्ण की तृतीय कारिका सांख्य की पूरी तत्त्व-संरचना को एक अद्भुत संक्षिप्तता में रख देती है

मूलप्रकृतिरविकृतिः महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त।
षोडशकस्तु विकारो प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः॥

यही कारिका पच्चीस तत्त्वों को समझने की कुंजी है। इसमें चार वर्ग सामने आते हैं

. मूलप्रकृति

. प्रकृति-विकृति

. केवल विकृति१६

. प्रकृति, विकृतिपुरुष

यानी सांख्य केवल तत्त्वों की सूची नहीं देता। वह उनके कार्य-कारण सम्बन्ध को भी वर्गीकृत करता है।

पहला वर्ग : मूलप्रकृति - मूलप्रकृति अकेली है।

. प्रकृति - यह किसी की विकृति नहीं। अर्थात् यह किसी पूर्ववर्ती तत्त्व से उत्पन्न नहीं हुई।

लेकिन यह आगे अनेक तत्त्वों को उत्पन्न करती है। इसलिए यहकारण है, कार्य नहीं।

यही कारण है कि कारिका कहती हैमूलप्रकृतिरविकृतिः।

दूसरा वर्ग : प्रकृति-विकृति

अब प्रकृति से पहला विकास होता हैमहत्। महत् सेअहंकार। अहंकार सेपाँच तन्मात्राएँ।

इस प्रकार कुल + + =

तत्त्व ऐसे हैं जो स्वयं किसी पूर्ववर्ती तत्त्व से उत्पन्न भी होते हैं और आगे दूसरे तत्त्वों को उत्पन्न भी करते हैं।

ये हैं महत् / बुद्धि, अहंकार, शब्द तन्मात्रा, स्पर्श तन्मात्रा, रूप तन्मात्रा, रस तन्मात्रा, गन्ध तन्मात्रा

इन्हें कहा जाता हैप्रकृति-विकृति। क्योंकि येविकृति भी हैं और प्रकृति भी।

यह वर्गीकरण इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

मान लेंमहत् प्रकृति से उत्पन्न हुआ। इसलिए महत् स्वयं एक विकृति है। लेकिन महत् से अहंकार उत्पन्न होता है। इसलिए महत् आगे के लिए प्रकृति भी है।

इसी प्रकार अहंकार महत् से उत्पन्न हुआइसलिए विकृति है।

लेकिन उससे तन्मात्राएँ तथा इन्द्रिय-सम्बन्धी विकासक्रम आगे बढ़ता हैइसलिए वह प्रकृति भी है।

यही कारण है कि सांख्य के सात तत्त्वप्रकृति-विकृति कहलाते हैं।

तीसरा वर्ग : केवल विकृति

अब विकास की अगली अवस्था आती है।

ये ऐसे तत्त्व हैं जो किसी कारण से उत्पन्न तो होते हैं, लेकिन आगे किसी नए तत्त्व के मूल कारण नहीं बनते।

इनकी संख्या है१६।

इनमेंपाँच ज्ञानेन्द्रियाँ – चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना, त्वक्

पाँच कर्मेन्द्रियाँ – वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ

मन – 1 पाँच महाभूत- आकाश , वायु, तेजस्, आपः, पृथ्वी

कुल + + + = १६। येविकार हैं।

मन को इन्द्रियों के साथ क्यों रखा गया?

यहाँ सांख्य की मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता फिर दिखाई देती है।

मन को कभी केवल एक मानसिक वस्तु मानकर छोड़ दिया जाता है।

लेकिन सांख्य उसे इन्द्रिय-तंत्र के भीतर विशिष्ट स्थान देता है।

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करती हैं।

पाँच कर्मेन्द्रियाँ क्रिया से सम्बन्धित हैं।

मन दोनों के बीच समन्वय करता है।

इसलिएग्यारह इन्द्रिय

कहलाते हैंदश इन्द्रियाँ + मन। लेकिन मन बुद्धि नहीं है। यह भेद बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है।

बुद्धि और मन में अन्तर

यहाँ आधुनिक भाषा सबसे अधिक भ्रम पैदा कर सकती है। हम “mind” शब्द में

मन, बुद्धि, स्मृति, अहंकार और चित्तसबको मिला देते हैं। सांख्य ऐसा नहीं करता।

उसके अनुसारमन संकल्प-विकल्प करता है।

अहंकार - मैंऔरमेराका अभिमान करता है।

बुद्धि- निश्चय और निर्णय करती है। इसलिए एक अनुभव में तीन स्तर हो सकते हैं

मन पूछता हैयह करूँ या करूँ?”

अहंकार कहता हैमुझे यह करना है।

बुद्धि निर्णय करती हैयह उचित है, अतः करना चाहिए।

यही सांख्य का सूक्ष्म मनोविज्ञान है।

पाँच तन्मात्राएँ : स्थूल से पहले का संसार

अब पच्चीस तत्त्वों के उस भाग पर आएँ जिसे समझे बिना सांख्य का विकासवाद अधूरा रहेगा।

पाँच तन्मात्राएँशब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये स्थूल भूत नहीं हैं।

इनको अनुभव के सूक्ष्म विषयात्मक आधार के रूप में समझना चाहिए।

उदाहरण के लिएगन्ध का स्थूल अनुभव और गन्ध तन्मात्रा एक ही बात नहीं।

तन्मात्रा सूक्ष्म कारण-स्तर है। स्थूल पृथ्वी उसका आगे का व्यक्त परिणाम है।

इसलिए सांख्य की सृष्टि-दृष्टिसूक्ष्मस्थूल की दिशा में चलती है।

तन्मात्रा से महाभूत

अब पाँच तन्मात्राओं से पाँच स्थूल महाभूतों की ओर विकास होता है।

शब्दआकाश

शब्द + स्पर्शवायु

शब्द + स्पर्श + रूपतेजस्

शब्द + स्पर्श + रूप + रसआपः

शब्द + स्पर्श + रूप + रस + गन्धपृथ्वी

यहाँगुणों का जुड़नासांख्य के स्थूलकरण-विचार को समझने में सहायक है।

इसलिए पृथ्वी सबसे अधिक स्थूल मानी जाती है और उसमें पाँचों विषय-गुणों की उपलब्धि मानी जाती है।

 

पाँच महाभूत क्या सचमुच रासायनिक तत्व हैं? नहीं।

यह अत्यन्त महत्वपूर्ण सावधानी है।

आकाश को आधुनिक physics का vacuum या space कहना,

वायु को केवल oxygen-nitrogen mixture कहना,

तेजस् को केवल electromagnetic radiation कहना,

आपः को केवल H₂O कहना,

और पृथ्वी को केवल chemical matter कहना

सांख्य के महाभूतों को आधुनिक विज्ञान में जबरन अनुवाद करना होगा।

महाभूत यहाँ आधुनिक chemistry के “elements” नहीं हैं।

वेअनुभव और स्थूल प्रकृति के पाँच दार्शनिक वर्ग हैं।

इसलिएपंचमहाभूतको आधुनिक आवर्त सारणी से जोड़ना उचित नहीं।

 

अब पूरा विकासक्रम देखें

अब सांख्य की सृष्टि-यात्रा एक क्रम में स्पष्ट हो जाती है

प्रकृति

महत् / बुद्धि

अहंकार

दो प्रमुख विकास-दिशाएँसात्त्विक दिशा- मन + पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ + पाँच कर्मेन्द्रियाँ

तामस दिशा पाँच तन्मात्राएँ औरतन्मात्राएँपाँच महाभूत

इस पूरी प्रक्रिया में रजस् को केवल किसी एक शाखा में रख देना उचित नहीं।

रजस् को सांख्य में प्रवर्तन और क्रिया की प्रेरक शक्ति के रूप में समझना अधिक उचित है।

यही त्रिगुण की वास्तविक अन्तःक्रिया है।

 

रजस् की भूमिका : तीसरी शक्ति क्यों आवश्यक है?

यदि सत्त्व प्रकाश और तमस् आवरण है, तो केवल इन दोनों से विकास कैसे चलेगा?

यहाँ रजस् गति देता है। सत्त्वप्रकाशित करता है। तमस्स्थूलता और आवरण की दिशा देता है।

रजस्गतिशील करता है।

इसलिए सृष्टि को किसी एक गुण की अकेली क्रिया मानना सांख्य की त्रिगुण-व्यवस्था को अत्यन्त सरल बना देना होगा।

वास्तव मेंतीनों गुण परस्पर आश्रित होकर प्रकृति के विकास को सम्भव बनाते हैं।

चौथा वर्ग : पुरुष

अब हम पच्चीसवें तत्त्व पर पहुँचते हैं। पुरुष। और यहाँ सांख्य अचानक अपनी पूरी दिशा बदल देता है।

अब तक हमने जिन तत्त्वों की चर्चा कीवे सभी प्रकृति के क्षेत्र में थे।

वेउत्पन्न होते हैं, बदलते हैं, कार्य करते हैं, परस्पर सम्बन्धित होते हैं।

लेकिन पुरुष

उत्पन्न होता है, किसी का उत्पाद है, किसी दूसरे तत्त्व को उत्पन्न करता है।

इसीलिए कारिका कहती है प्रकृतिः विकृतिः पुरुषः। पुरुष प्रकृति है, विकृति।

 

पुरुष को पच्चीसवाँ तत्त्व कहना क्या विरोधाभास है?

यह एक गहरी बात है। यदि पुरुष प्रकृति का भाग नहींतो फिर उसे प्रकृति के साथ पच्चीस तत्त्वों में क्यों गिना गया?

क्योंकि यहाँतत्त्वका अर्थ केवलप्रकृति का उत्पादनहीं।

तत्त्व का अर्थ हैअस्तित्व की वह मूल सत्ता जिसके बिना सांख्य की सम्पूर्ण व्याख्या अधूरी है।

प्रकृति जगत् की व्याख्या करती है। पुरुष चेतना की।

प्रकृति दृश्य की व्याख्या करती है। पुरुष द्रष्टा की।

प्रकृति परिवर्तन की व्याख्या करती है। पुरुष उस परिवर्तन के साक्षित्व की।

१८. २४ और २५ के बीच की सीमा

यहीं सांख्य का सबसे बड़ा दार्शनिक विभाजन है२४ तत्त्वप्रकृति का क्षेत्र २५वाँपुरुष

यह केवल संख्या का अन्तर नहीं। यह दो अस्तित्व-श्रेणियों का अन्तर है।

एक ओरपरिवर्तन। दूसरी ओरसाक्षित्व।

एक ओरकार्य-कारण। दूसरी ओरअकर्ता चेतना।

एक ओरविकास। दूसरी ओरअपरिणामित्व।

यही सांख्य की पूरी दार्शनिक धुरी है।

 

क्या पुरुष एक है? नहीं।

सांख्य का विशिष्ट मत हैपुरुष अनेक हैं।

प्रत्येक जीव के अनुभव की विशिष्टता को देखते हुए सांख्य बहुपुरुषवाद स्वीकार करता है।

ईश्वरकृष्ण पुरुष की सिद्धि के लिए अनेक तर्क देते हैं।

यदि पुरुष एक ही होता तोएक के सुख-दुःख का सम्बन्ध सभी से होना चाहिए था।

एक की मुक्ति से सभी मुक्त हो जाने चाहिए थे। लेकिन अनुभव ऐसा नहीं दिखाता।

इसलिएपुरुष अनेक हैं। लेकिन यहाँअनेकका अर्थ यह नहीं कि पुरुषों में गुणात्मक भिन्नता है।

सभी पुरुषचैतन्यस्वरूप, अकर्ता और साक्षी हैं।

प्रकृति एक, पुरुष अनेक

यह सांख्य की एक अत्यन्त विशिष्ट संरचना है। एक प्रकृति औरअनेक पुरुष।

प्रकृति सबके अनुभव का सामान्य आधार बन सकती है।

लेकिन प्रत्येक पुरुष का अनुभवात्मक सम्बन्ध उसके अपने सूक्ष्म शरीर और कर्म-संस्कारों के माध्यम से विशिष्ट होता है।

इसलिए संसार साझा भी है और व्यक्तिगत भी। हम एक ही जगत् देखते हैं।

लेकिन उसी जगत् का अनुभव प्रत्येक व्यक्ति अलग ढंग से करता है।

सांख्य की प्रकृतिपुरुष संरचना इस द्वैत को दार्शनिक आधार देती है।

 

२१. क्या पच्चीस तत्त्वों मेंआत्माकहाँ है?

सांख्य की भाषा में यदिआत्माशब्द का प्रयोग किया जाए तो उसे सामान्यतः पुरुष के निकट समझना होगा।

लेकिन यहाँ सावधानी चाहिए।

वेदान्त का आत्मा-विचार और सांख्य का पुरुष-विचार पूरी तरह समान नहीं।

सांख्यपुरुष अनेक मानता है।

वेदान्त की विभिन्न धाराएँआत्मा और ब्रह्म की एकता की ओर जाती हैं।

इसलिए सांख्य के पुरुष को सीधे अद्वैत वेदान्त के आत्मन् के समान रख देना दार्शनिक भेद मिटा देगा।

सांख्य की अद्भुत विशेषता : मन भी प्रकृति है

आधुनिक सामान्य चेतना में हम अक्सर सोचते हैंमन ही मैं हूँ।

सांख्य इससे असहमत है। मनप्रकृति का तत्त्व है।

बुद्धिप्रकृति का तत्त्व है।

अहंकारप्रकृति का तत्त्व है।

स्मृति और मानसिक संस्कार भी इसी प्रकृति-क्षेत्र से सम्बन्धित हैं।

इसलिए मनुष्य का मानसिक संसार कितना ही सूक्ष्म क्यों हो

सांख्य उसे चेतना का अंतिम स्वरूप नहीं मानता।

यह एक अत्यन्त क्रान्तिकारी स्थापना है।

आधुनिक चेतना-विज्ञान के लिए सांख्य की चुनौती

आज consciousness science का सबसे कठिन प्रश्न है

क्या चेतना मस्तिष्क की जटिल प्रक्रिया से उत्पन्न होती है?

सांख्य का उत्तर बहुत पहले से अलग दिशा में है।

उसके अनुसारमस्तिष्क, मन, बुद्धि और इन्द्रिय-तंत्र

प्रकृति के उपकरण हैं। चेतना स्वयं उनका उत्पाद नहीं।

इस दृष्टि से सांख्य आधुनिक चेतना-विज्ञान के सामने एक मूल प्रश्न रखता है

क्या किसी जटिल सूचना-प्रसंस्करण प्रणाली का होना और उस प्रणाली के अनुभव का होना एक ही बात है?

यह प्रश्न आज भी दर्शन और विज्ञान में खुला हुआ है।

इसलिए सांख्य का पुरुष-विचार केवल प्राचीन इतिहास का विषय नहीं।

यह आज भी चेतना-दर्शन के लिए एक चुनौतीपूर्ण प्रतिपक्ष प्रस्तुत करता है।

 

लेकिन सांख्य को आधुनिक विज्ञान सिद्ध मान लेना भी गलत

यहाँ संतुलन आवश्यक है। यह कहना किआधुनिक विज्ञान अब सांख्य को सिद्ध कर चुका है

दार्शनिक रूप से उचित नहीं।

विज्ञान के पास अभी चेतना की पूर्ण व्याख्या पर सर्वसम्मति नहीं है।

लेकिन यह भी उतना ही अनुचित होगा कि सांख्य के प्रश्नों को केवल इसलिए असंगत मान लिया जाए कि वह आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में नहीं लिखा गया।

सही दृष्टि यह हैसांख्य एक स्वतंत्र दार्शनिक मॉडल प्रस्तुत करता है।

और आधुनिक विज्ञान उससे संवाद कर सकता है।

 पच्चीस तत्त्वों का वास्तविक उद्देश्य

अब सबसे महत्वपूर्ण बात।

क्या सांख्य चाहता है कि हम पच्चीस तत्त्व याद कर लें? नहीं।

यदि ऐसा होता तो सांख्य केवल परीक्षा का विषय बनकर रह जाता।

इन तत्त्वों का वास्तविक उद्देश्य हैतादात्म्य को तोड़ना।

जब मैं जानता हूँ

शरीर = प्रकृति

इन्द्रियाँ = प्रकृति

मन = प्रकृति

अहंकार = प्रकृति

बुद्धि = प्रकृति

सुख-दुःख = प्रकृति के गुणों के परिणाम

तब एक प्रश्न उठता है

तो फिर मैं कौन?

और यही प्रश्न पुरुष की ओर ले जाता है।

पच्चीस तत्त्वों से आत्म-पहचान तक

सांख्य का पूरा दर्शन अन्ततः आत्म-पहचान की यात्रा है।

पहले मनुष्य कहता हैमैं शरीर हूँ।

सांख्य कहता हैशरीर प्रकृति का विकार है।

फिर वह कहता हैमैं मन हूँ।

उत्तरमन भी प्रकृति है।

वह कहता हैमैं बुद्धि हूँ।

उत्तरबुद्धि भी प्रकृति का परिणाम है।

वह कहता हैमैं अहंकार हूँ।

उत्तरअहंकार भी प्रकृति का तत्त्व है।

फिर प्रश्न रह जाता हैतो मैं कौन हूँ?”

सांख्य कहता हैतुम पुरुष होद्रष्टा।

भाग १३ का निष्कर्ष

पच्चीस तत्त्वों को यदि केवल सूची की तरह देखा जाए तो सांख्य कठिन और तकनीकी प्रतीत होगा।

लेकिन यदि इन्हें मानव अनुभव की सीढ़ियों की तरह देखें, तो पूरी संरचना अत्यन्त अर्थपूर्ण हो जाती है।

प्रकृतिमूल सम्भावना।

महत्निर्णय की शक्ति।

अहंकार — “मैंकी संरचना।

मनसंकल्प-विकल्प।

इन्द्रियाँअनुभव के द्वार।

तन्मात्राएँसूक्ष्म विषयात्मक आधार।

महाभूतस्थूल जगत्।

और

पुरुषइन सबका साक्षी।

इस प्रकार सांख्य हमें बाहर से भीतर नहीं, बल्कि

दृश्य से द्रष्टा तक ले जाता है।

और जब यह यात्रा पूरी होती है, तब पच्चीस तत्त्वों की संख्या मात्र संख्या नहीं रह जाती।

वे एक प्रश्न में बदल जाते हैं

जो इन चौबीस प्रकृति-तत्त्वों को जान रहा है, क्या वह स्वयं इन चौबीस में से कोई एक हो सकता है?”

सांख्य का उत्तर हैनहीं।

वहीपच्चीसवाँ तत्त्वपुरुष।

और इसी पच्चीसवें तत्त्व की वास्तविक पहचान से कैवल्य का द्वार खुलता है।

 

अगले भाग की दिशा

अब पच्चीस तत्त्वों का मानचित्र हमारे सामने स्पष्ट है।

लेकिन एक बहुत गहरा प्रश्न अभी बाकी है

प्रकृति में तीन ही गुण क्यों हैं?

सत्त्व, रजस् और तमस् वास्तव में क्या हैं?

क्या वे केवल मनुष्य के तीन मानसिक स्वभाव हैं?

या पदार्थ, मन, समाज और सम्पूर्ण प्रकृति में काम करने वाली तीन मूल प्रवृत्तियाँ?

और यदि ये तीन गुण लगातार एक-दूसरे से संघर्ष और सहयोग करते रहते हैं, तो

प्रकृति की साम्यावस्था कैसे टूटती है और सृष्टि का विकास कैसे आरम्भ होता है?

अगला भाग इसी सांख्य के अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त पर केन्द्रित होगा

भाग १४ : सत्त्व, रजस् और तमस्प्रकृति का त्रिगुणात्मक रहस्य

जहाँ हम त्रिगुणों को केवलअच्छा, बुरा और आलस्यजैसी सामान्य धारणाओं से बाहर निकालकर उनके दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और ब्रह्माण्डीय अर्थ को समझेंगे।

 

सांख्य दर्शनशोध-श्रृंखला

भाग १३ : पच्चीस तत्त्वों का रहस्यप्रकृति से पुरुष तक सांख्य का सम्पूर्ण मानचित्र

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)

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