भाग–३ : योग का दार्शनिक आधार — चित्त, वृत्ति और पुरुष

 भाग : योग का दार्शनिक आधारचित्त, वृत्ति और पुरुष

इस भाग में चर्चा केवल सूत्रों के अर्थ तक सीमित रहकर यह खोजेगी कि पतञ्जलि के यहाँ योग वास्तव में किस समस्या का समाधान है इसके केंद्र में रहेगा

  1. चित्त की संकल्पना
  2. चित्त और पुरुष का भेद
  3. वृत्ति का स्वरूप
  4. चित्तवृत्ति-निरोध का वास्तविक अर्थ
  5. प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति
  6. क्लेश और चित्त की अशुद्धि
  7. सांख्य और योग का दार्शनिक संबंध
  8. पुरुष की साक्षित्व-स्थिति
  9. समाधि की ओर चित्त की गति
  10. योग को केवल साधना नहीं, बल्कि चेतना-विज्ञान के रूप में समझने की सम्भावना

योग का दार्शनिक आधारचित्त, वृत्ति और पुरुष

प्रस्तावना : योग आखिर किस समस्या का उत्तर है?

पतञ्जलि का योगदर्शन यदि केवल आसन, प्राणायाम, ध्यान और समाधि की साधना-पद्धति होता, तो उसे समझना अपेक्षाकृत सरल होता। लेकिन पतञ्जलि का उद्देश्य इससे कहीं अधिक गहरा है।

वे मनुष्य से यह नहीं पूछते कि— “तुम अपने मन को कैसे शांत करोगे?”

उनका मूल प्रश्न इससे पहले आता हैजिसे तुम अपना मन कहते हो, वह वास्तव में क्या है?”

और इसके साथ दूसरा प्रश्नजो मन को जानता है, क्या वह स्वयं मन ही है?”

यहीं से पातञ्जल योगदर्शन साधना-शास्त्र से आगे बढ़कर तत्त्वमीमांसा बन जाता है।

मनुष्य का सामान्य अनुभव यह है कि

मैं सोचता हूँ। मैं चाहता हूँ। मैं दुखी हूँ। मैं प्रसन्न हूँ। मैं स्मरण करता हूँ। मैं निर्णय करता हूँ। मैं स्वप्न देखता हूँ।
मैं ध्यान करता हूँ। लेकिन पतञ्जलि इस पूरे अनुभव को एक ही सत्ता नहीं मानते। विचार बदलता है। भावना बदलती है। स्मृति बदलती है। ज्ञान बदलता है। नींद आती-जाती है। सुख-दुःख आते-जाते हैं।

फिर प्रश्न उठता हैइन सब परिवर्तनों को जानने वाला कौन है?

यही प्रश्न योगदर्शन को उसकी विशिष्ट दार्शनिक भूमि देता है।

चित्त : योगदर्शन का केंद्रीय क्षेत्र

पतञ्जलि का अत्यंत प्रसिद्ध सूत्र हैयोगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥ योगसूत्र .

इस सूत्र मेंयोगकी परिभाषा देने से पहले पतञ्जलि नेचित्तऔरवृत्तिकी समस्या को सामने रखा है।

इसका अर्थ यह नहीं कि योग केवल विचारों को रोक देना है। यदि ऐसा होता, तो गहरी नींद ही सर्वोच्च योग होती।

लेकिन निद्रा में चित्त की गतिविधि एक विशेष रूप में उपस्थित रहती है। अतः केवल विचार-शून्यता योग नहीं है।

योग का प्रश्न अधिक सूक्ष्म है।

चित्त में जो-जो रूप उत्पन्न होते हैं, वे पुरुष के वास्तविक स्वरूप को ढँक देते हैं।

इसलिए योग का प्रयत्न चित्त को नष्ट करना नहीं, बल्कि उसकी वृत्तिमय चंचलता का निरोध करना है।

चित्त और मन में अंतर

आधुनिक भाषा में “mind” शब्द को प्रायः मन के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। परन्तु पातञ्जल योगदर्शन काचित्तआधुनिक मन की सरल समानता नहीं है।

योगदर्शन में चित्त को व्यापक अन्तःकरणीय क्षेत्र के रूप में समझना अधिक उचित है।

मनविकल्प करता है।

बुद्धिनिर्णय करती है।

अहंकार— “मैंकी अनुभूति से जोड़ता है।

इन सबका व्यापक कार्यक्षेत्र चित्त के रूप में समझा जा सकता है।

लेकिन यहाँ एक सावधानी आवश्यक है।

पतञ्जलि का उद्देश्य आधुनिक मनोविज्ञान की शब्दावली को संस्कृत शब्दों से बदलना नहीं है।

चित्तको केवल brain, mind या psychological consciousness कह देना योगदर्शन के साथ न्याय नहीं करेगा। क्योंकि चित्त स्वयं द्रष्टा नहीं है। वह दृश्य के क्षेत्र में आता है।

 पुरुष : जो जानता है, पर स्वयं दृश्य नहीं बनता

योगदर्शन की सबसे निर्णायक स्थापना हैपुरुष और चित्त एक नहीं हैं।

चित्त परिवर्तनशील है। पुरुष अपरिवर्तनशील है।

चित्त में विचार उत्पन्न होते हैं। पुरुष उन विचारों को जानता है।

चित्त में सुख-दुःख का अनुभवात्मक रूप प्रकट होता है। पुरुष उनका साक्षी है।

चित्त कभी एकाग्र होता है, कभी विक्षिप्त।  पुरुष इन अवस्थाओं का प्रकाशक है।

यहीं योगदर्शन का प्रश्न अत्यंत गहरा हो जाता है

यदि चित्त बदल रहा है और पुरुष नहीं बदलता, तो मनुष्य अपने को चित्त क्यों मानता है?

पतञ्जलि के अनुसार इसका कारण हैअविद्या।

द्रष्टा और दृश्य

योगसूत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है  द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः॥ योगसूत्र .२०

द्रष्टा केवल देखने की सत्ता है। वह स्वयं शुद्ध है।

किन्तु वह चित्त में उत्पन्न प्रत्ययों के माध्यम से मानो उनके साथ जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।

यही मनुष्य के अनुभव का रहस्य है। क्रोध उठता हैऔर मनुष्य कहता हैमैं क्रोधित हूँ।

विचार उठता है  मैं सोच रहा हूँ।

दुःख आता हैमैं दुखी हूँ।

भय आता हैमैं भयभीत हूँ।

लेकिन योगदृष्टि पूछती हैक्या वास्तव मेंमैंभय हूँ?

यदि भय एक अवस्था है और वह आती-जाती है, तो उसका साक्षी कौन है?

यहीं से साधना का वास्तविक आरम्भ होता है।

 चित्तवृत्ति क्या है?

वृत्तिका सामान्य अर्थ हैचित्त का किसी रूप में परिणत होना।

जब कोई वस्तु देखी जाती है, तो चित्त में उसका एक ज्ञानात्मक रूप उत्पन्न होता है।

जब कोई स्मृति आती है, तो चित्त एक स्मृतिरूप धारण करता है।

जब कल्पना होती है, तो चित्त विकल्परूप होता है। जब भ्रम होता है, तो चित्त विपर्ययरूप हो जाता है।

अर्थात् चित्त स्वयं एक गतिशील क्षेत्र है और वृत्तियाँ उसके परिवर्तनशील रूप हैं।

इसलिएचित्त = आधार , वृत्ति = उसका विशेष परिणमन

यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैसे जल एक है, पर उसमें तरंगें अनेक हो सकती हैं।

वैसे ही चित्त का क्षेत्र एक है, लेकिन उसकी वृत्तियाँ असंख्य हो सकती हैं।

पाँच प्रमुख वृत्तियाँ

पतञ्जलि कहते हैंवृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः॥ योगसूत्र .

अर्थात् वृत्तियाँ पाँच प्रकार की हैंप्रमाण,विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति

इन पाँचों को समझे बिनाचित्तवृत्तिनिरोधका अर्थ पूरी तरह समझ में नहीं सकता।

प्रमाण

सूत्रप्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि॥ योगसूत्र .७, प्रमाण वह वृत्ति है जो यथार्थ ज्ञान उत्पन्न करती है।

पतञ्जलि तीन प्रमाण स्वीकार करते हैं  प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम।

प्रत्यक्षजो सीधे अनुभव में आता है।

अनुमानजो किसी ज्ञात लक्षण से अज्ञात की ओर ले जाता है।

आगमविश्वसनीय प्रमाणिक वचन।

यहाँ एक महत्वपूर्ण दार्शनिक तथ्य है। योगदर्शन प्रमाण को भी वृत्ति कहता है।

अर्थात् सही ज्ञान भी चित्त में एक विशेष प्रकार का रूप है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रमाण गलत है।

अर्थ यह है कियथार्थ ज्ञान भी अभी चित्त की एक अवस्था है।

योग की अंतिम अवस्था ज्ञान के विरोध में नहीं है; बल्कि वह उस स्थिति की खोज है जहाँ चित्त की समस्त वृत्तिमयता का अतिक्रमण हो।

विपर्यय

सूत्रमिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठं विपर्ययः॥  योगसूत्र .

जो ज्ञान वस्तु के वास्तविक स्वरूप पर प्रतिष्ठित नहीं है, वह विपर्यय है।

उदाहरण के लिएअंधकार में रस्सी को सर्प समझ लेना।

वस्तु वहाँ है। ज्ञान भी उत्पन्न हुआ। लेकिन ज्ञान वस्तु के वास्तविक स्वरूप के अनुरूप नहीं है।

इसलिए समस्या केवलज्ञान का होनानहीं है। समस्या हैज्ञान का वस्तु के साथ असंगत होना।

यह सूत्र योगदर्शन की epistemology अर्थात् ज्ञानमीमांसा का आधार बनता है।

विकल्प

सूत्रशब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः॥ योगसूत्र .

जहाँ शब्द है, ज्ञान का एक रूप है, लेकिन उसके अनुरूप कोई वास्तविक वस्तु नहीं है, वहाँ विकल्प है।

मानव चेतना की एक बड़ी शक्ति यही है कि वह उन वस्तुओं के बारे में भी विचार कर सकती है जो वर्तमान में प्रत्यक्ष नहीं हैं।

वह कल्पना करती है। वह संभावनाएँ बनाती है।वह भविष्य की संरचना करती है।वह मिथकीय जगत बनाती है।

वह गणितीय संरचनाएँ बनाती है। इसलिए विकल्प केवल दोष नहीं है। यह चेतना की सृजनात्मक शक्ति भी है।

किन्तु योगदर्शन के लिए समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य विकल्प को वास्तविकता समझ बैठता है।

निद्रा

पतञ्जलि कहते हैंअभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा॥ योगसूत्र .१०

निद्रा भी वृत्ति है। यह सूत्र अत्यंत गहरा है। सामान्यतः हम सोचते हैं कि नींद में कुछ नहीं होता।

पतञ्जलि कहते हैंनींद भी चित्त की एक अवस्था है।

अतःविचार का अभावचेतना के प्रश्न को समाप्त नहीं करता।

यही कारण है कि योगदर्शन में निद्रा और समाधि समान नहीं हैं।

समाधि में चित्त की विशेष पारदर्शिता उत्पन्न होती है।

निद्रा में चित्त एक अलग प्रकार की वृत्ति में स्थित है।

दोनों में बाह्य मानसिक गतिविधि कम हो सकती है, लेकिन उनकी दार्शनिक स्थिति एक नहीं है।

स्मृति

सूत्रअनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः॥ योगसूत्र .११

अनुभूत विषय का असंप्रमोषअर्थात् उसका चित्त से पूर्णतः नष्ट होनास्मृति है।

स्मृति केवल अतीत का पुनरुत्पादन नहीं है।

वह वर्तमान चेतना को प्रभावित करती है। मनुष्य वर्तमान में जीता हुआ भी अतीत से संचालित होता है।

किसी व्यक्ति का एक शब्दपुरानी स्मृति जगा देता है।

एक स्थानबीते हुए जीवन को पुनः उपस्थित कर देता है।

एक गंधवर्षों पुराने अनुभव को वर्तमान में ला देती है।

इस प्रकार स्मृति चित्त की निरंतरता का निर्माण करती है।

लेकिन यही स्मृति आसक्ति, भय और पहचान का आधार भी बन सकती है।

वृत्तियों का निरोध क्यों?

अब मूल सूत्र पुनः सामने आता हैयोगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥ यहाँनिरोधका अर्थ दमन नहीं समझना चाहिए।

दमन में वृत्ति को दबाया जाता है। निरोध में चित्त की वृत्तिमय गति अपने कारणों से शांत होती है।

यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति क्रोध को दबा देता है, तो क्रोध समाप्त नहीं हुआ।

यदि कोई इच्छा को बलपूर्वक रोकता है, तो इच्छा समाप्त नहीं हुई।

यदि कोई विचार को दबाता है, तो विचार के संस्कार बने रह सकते हैं।

अतः योग repression नहीं है। योग है

चित्त की ऐसी परिष्कृति जिसमें वृत्ति की सत्ता धीरे-धीरे अपनी अनिवार्यता खो देती है।

अभ्यास और वैराग्य

पतञ्जलि इसका साधन बताते हैं

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥ योगसूत्र .१२

दो पंख हैंअभ्यास और वैराग्य।

अभ्यास बिना वैराग्य के आसक्ति बन सकता है। वैराग्य बिना अभ्यास के निष्क्रियता बन सकता है।

अभ्यास चित्त को एक दिशा देता है। वैराग्य चित्त को अनावश्यक आकर्षणों से मुक्त करता है।

एक चित्त को स्थिर करता है। दूसरा चित्त को हल्का करता है।

एक गति देता है। दूसरा भार हटाता है।

इसलिए योग में साधना केवलकुछ करनानहीं है।

योग में उतना ही महत्वपूर्ण हैजो आवश्यक नहीं है, उससे मुक्त होना।

सांख्य और योग : दो दर्शन या एक दार्शनिक आधार?

पातञ्जल योगदर्शन को समझने के लिए सांख्य दर्शन को समझना अनिवार्य है।

सांख्य ने जगत की व्याख्या के लिए प्रकृति और पुरुष का द्वैत प्रस्तुत किया।

प्रकृतिपरिवर्तनशील। पुरुषचैतन्यस्वरूप।

प्रकृति के विकास सेबुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ और भौतिक तत्त्वों की संरचना समझी जाती है।

योगदर्शन इस दार्शनिक आधार को स्वीकार करते हुए उसमें साधना की वैज्ञानिक पद्धति जोड़ता है।

इसी कारण परंपरा में सांख्य को ज्ञानप्रधान और योग को साधनाप्रधान रूप में समझा गया।

लेकिन दोनों के बीच संबंध इससे भी गहरा है।

सांख्य पूछता हैवास्तविकता की संरचना क्या है?”

योग पूछता हैउस संरचना के भीतर बंधा हुआ पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को कैसे पहचान सकता है?”

इस अर्थ में सांख्य मानचित्र है। योग यात्रा है। सांख्य विवेक की दार्शनिक भूमि देता है।

योग उस विवेक को अनुभव में परिणत करने की पद्धति देता है।

योगदर्शन का मूल संकट : तादात्म्य

मनुष्य की समस्या केवल यह नहीं कि उसके मन में बहुत विचार हैं। समस्या इससे गहरी है।

समस्या है

वह अपने विचारों को स्वयं मान लेता है।

वह अपनी स्मृति को स्वयं मानता है। अपनी भूमिका को स्वयं मानता है।

अपने शरीर को स्वयं मानता है। अपने सुख-दुःख को स्वयं मानता है।

अपने अहंकार को स्वयं मानता है। यही तादात्म्य है।

जब चित्त में क्रोध उठता है और व्यक्ति कहता है— “मैं क्रोध हूँ।

तब चित्त की वृत्ति और पुरुष के बीच भेद मिट जाता है।

जब साधक यह देखना शुरू करता है— “मेरे भीतर क्रोध उठ रहा है”—

तब एक दूरी उत्पन्न होती है। फिर— “मैं क्रोध को देख रहा हूँ।

यह दूरी केवल मनोवैज्ञानिक दूरी नहीं है।

यही दूरी धीरे-धीरे द्रष्टा और दृश्य के विवेक में बदलती है।

समाधि की दिशा

योगसूत्र का प्रारम्भिक अध्याय इसी दिशा में आगे बढ़ता है। पतञ्जलि चित्त की वृत्तियों को पहचानते हैं।

फिर उनके निरोध का उपाय बताते हैं। फिर अभ्यास और वैराग्य।

फिर समाधि। समाधि का अर्थ केवल ध्यान में खो जाना नहीं है।

समाधि वह अवस्था है जहाँ चित्त का अपने विषय के साथ संबंध इतना सूक्ष्म हो जाता है कि साधक की सामान्य अहंकारी मध्यस्थता क्षीण होने लगती है।

अन्ततः योग का लक्ष्य केवलमन की शांतिनहीं है।

उसका लक्ष्य हैद्रष्टा का अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित होना।

इसलिए पतञ्जलि आगे कहते हैंतदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥ योगसूत्र .३ यही योग की निर्णायक परिणति है।

सूत्र . और . का दार्शनिक संबंध

इन दोनों सूत्रों को अलग-अलग पढ़ना योगदर्शन की शक्ति को कम कर देता है।

पहलायोगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥ दूसरातदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥

पहले में साधना की स्थिति है। दूसरे में साधना का फल।

पहलेचित्त की वृत्तिमयता शांत होती है।

दूसरेद्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।

इससे योग की एक अत्यंत महत्वपूर्ण संरचना सामने आती है

वृत्ति-निरोध स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं है।

वह उस स्थिति का द्वार है जिसमें द्रष्टा अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है।

इसलिए यदि कोई व्यक्ति केवल विचार-शून्यता को योग मान ले, तो उसने पतञ्जलि के लक्ष्य को अधूरा समझा।

योग : मन का विज्ञान या चेतना का विज्ञान?

आधुनिक दृष्टि से योग को मनोविज्ञान कहा जा सकता है। लेकिन केवल मनोविज्ञान कहना पर्याप्त नहीं है।

क्योंकि पतञ्जलि का अंतिम प्रश्न मन के बारे में नहीं है। अंतिम प्रश्न हैमन को जानने वाला कौन है?

यहीं योगदर्शन आधुनिक consciousness studies से संवाद करने की क्षमता प्राप्त करता है।

आधुनिक विज्ञान पूछ सकता हैचेतना मस्तिष्क से कैसे संबंधित है?

अनुभव कैसे उत्पन्न होता है? स्मृति कैसे बनती है? ध्यान कैसे काम करता है?

पतञ्जलि का प्रश्न थोड़ा अलग हैजिसमें ये सब अनुभव प्रकट होते हैं, क्या वह स्वयं भी अनुभव की वस्तु है?

यदि वह वस्तु नहीं है, तो उसका स्वरूप क्या है?

यह प्रश्न योगदर्शन को केवल मानसिक स्वास्थ्य की तकनीक से उठाकर चेतना के दर्शन के क्षेत्र में ले जाता है।

भाग का केंद्रीय निष्कर्ष

पातञ्जल योगदर्शन की यात्रा को यदि एक सूत्र में संक्षेपित करें तो वह इस प्रकार है

मनुष्य चित्त की वृत्तियों में स्वयं को पहचानता है।

योग उस पहचान पर प्रश्न करता है।

फिर वह पूछता हैक्या मैं विचार हूँ? क्या मैं स्मृति हूँ? क्या मैं इच्छा हूँ? क्या मैं भय हूँ? क्या मैं सुख-दुःख हूँ?

क्या मैं शरीर हूँ? यदि ये सभी बदलते हैं, तो वह क्या है जो इनके परिवर्तन को जानता है?

यहीं सेचित्त से द्रष्टा की ओर यात्रा प्रारम्भ होती है।

और यही पातञ्जल योगदर्शन का वास्तविक दार्शनिक प्रवेशद्वार है।

भाग का सूत्रात्मक सार

चित्तं दृश्यं, वृत्तयस्तस्य विकाराः।
पुरुषो द्रष्टा, तु दृश्यः।
वृत्तीनां निरोधो योगस्य साधनम्।
द्रष्टुः स्वरूपावस्थानं योगस्य फलम्॥

अर्थात्

चित्त दृश्य है और वृत्तियाँ उसके परिवर्तन हैं।
पुरुष द्रष्टा है, वह स्वयं दृश्य नहीं है।
वृत्तियों का निरोध योग की साधना है।
और द्रष्टा का अपने स्वरूप में स्थित होना योग का फल है।

 

आगे की दिशा

भाग ने चित्तवृत्तिद्रष्टानिरोधस्वरूपावस्थान की मूल दार्शनिक श्रृंखला स्थापित कर दी।

अब अगले भाग में इसी आधार पर हम प्रवेश करेंगे

भाग : क्लेश, कर्म, संस्कार और बन्धनमनुष्य दुःख में बँधता कैसे है?

इसमें विशेष रूप सेअविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश, संस्कार, कर्माशय, जन्म, दुःख, कर्मफल, कर्मबन्धन और कैवल्य

का विश्लेषण योगसूत्र . से .२५ के आधार पर किया जाएगा।

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