तुम्हारे हिस्से की ख़ामोशी
तुम्हारे हिस्से की ख़ामोशी
कुछ रिश्ते शायद इसलिए ख़ूबसूरत रहते हैं कि उनमें सब कुछ कह दिया नहीं जाता। हमारे बीच भी न जाने कब एक ऐसी ख़ामोशी आकर ठहर गई, जिसमें शब्दों से ज़्यादा मतलब था। तुम मिलती हो तो बहुत सहज होकर अपने दिन की छोटी-बड़ी बातें बताती हो—किसी किताब का ज़िक्र, किसी पुराने गीत की याद, रास्ते में देखी कोई मामूली-सी बात। मैं सुनता रहता हूँ और हैरत से सोचता हूँ कि तुम्हारी इन मामूली बातों में भी मेरे लिए इतना कुछ क्यों छुपा रहता है।
समय बीत रहा है। हम दोनों बदल रहे हैं। चेहरे पर उम्र की बहुत हल्की-सी परछाइयाँ उतर आई हैं, मगर तुम्हें देखने की मेरी आदत जाने क्यों वैसी ही नहीं रही—वह हर दिन थोड़ी और गहरी होती गई है। पहले तुम्हारा इंतज़ार करता था, अब तुम्हारी मौजूदगी के बाद की ख़ामोशी भी याद आती है।
तुम कभी-कभी बहुत क़रीब आकर कोई बात कहती हो, फिर अचानक किसी और विषय पर चली जाती हो। मुझे मालूम है, उस अधूरे वाक्य में कुछ और भी था। मगर मैं उसे पूरा करने की कोशिश नहीं करता। शायद तुम्हारी आँखों का वह ठहराव, तुम्हारे होंठों पर आकर लौट जाने वाला वह लफ़्ज़—उसे सुन लेने से ज़्यादा ख़ूबसूरत है।
तुमने कभी नहीं कहा कि मैं तुम्हारे लिए क्या हूँ। मैंने भी कभी नहीं पूछा।
हमने बस एक-दूसरे के जीवन में अपनी-अपनी जगह बना ली है—बिना किसी वादे के, बिना किसी नाम के।
और शायद उम्र के इस पड़ाव पर आकर समझ में आया है कि हर मोहब्बत को हासिल करना ज़रूरी नहीं होता। कुछ मोहब्बतें बस इसलिए ज़िन्दा रहती हैं कि उन्हें छुआ नहीं जाता, उन्हें किसी रिश्ते की परिभाषा में बाँधा नहीं जाता।
तुम अपनी ख़ामोशी में रहो,
मैं अपनी समझ में।
तुम कुछ मत कहो—
मैं तुम्हारे न कहे को सुनता रहूँगा।
— मुकेश
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