दर्शन — औलूक्य दर्शन (वैशेषिक दर्शन) भाग–४ : गुण — वस्तु में जो है, पर स्वयं स्वतंत्र द्रव्य नहीं
दर्शन — औलूक्य दर्शन (वैशेषिक दर्शन)
भाग–४ : गुण — वस्तु में जो है, पर स्वयं स्वतंत्र द्रव्य नहीं
“वस्तु
को केवल उसके होने से नहीं, उसके होने के ढंग से जाना जाता है”
भाग–३ में हमने
द्रव्य को वैशेषिक की
उस मूल सत्ता के
रूप में देखा जिसमें
गुण और कर्म आश्रित
होते हैं। हमने यह
भी देखा कि वैशेषिक
का द्रव्य आधुनिक अर्थ के केवल
matter तक सीमित नहीं है; पृथ्वी
से लेकर आत्मा और
मनस् तक उसकी द्रव्य-संरचना फैली हुई है।
अब एक नई समस्या
सामने आती है।
यदि
कोई वस्तु द्रव्य है, तो वह
हमें किस प्रकार दिखाई देती है, अनुभव होती है और पहचानी जाती है?
एक
कमल है। वह लाल है। सुगन्धित है। एक निश्चित आकार का है। एक है, दूसरे से अलग है।
हम उसके बारे में
सुखद अनुभव कर सकते हैं।
तो प्रश्न उठता है—
लालिमा
क्या कमल है?
सुगन्ध
क्या कमल है?
उसका
आकार क्या कमल है?
नहीं। लेकिन
कमल को इनसे अलग
करके भी हम उसका
अनुभव नहीं करते। यहीं से
वैशेषिक का गुण-सिद्धान्त आरम्भ होता है।
गुण
क्या है?
वैशेषिक
में गुण को स्वतंत्र
द्रव्य नहीं माना जाता।
वह किसी द्रव्य में स्थित होता
है।
इसलिए
सरल रूप में— द्रव्य
आश्रय है; गुण आश्रित है।
लेकिन
यहाँ “आश्रित” का अर्थ केवल
इतना नहीं कि गुण
वस्तु से चिपका हुआ
है।
यह एक गहरी सत्तामीमांसा
है।
गुण—
- स्वयं स्वतंत्र कर्म नहीं करता,
- दूसरे गुण का आश्रय नहीं बनता,
- और सामान्यतः किसी द्रव्य में स्थित होकर ही जाना जाता है।
इस प्रकार वैशेषिक ने वस्तु और
उसके धर्मों के बीच एक
स्पष्ट दार्शनिक भेद स्थापित किया।
गुण
को द्रव्य क्यों नहीं माना गया?
यह सबसे पहला प्रश्न
है।
यदि
लाल रंग वास्तविक है,
तो उसे भी द्रव्य
क्यों न मानें?
यदि
सुख वास्तविक अनुभव है, तो उसे
स्वतंत्र सत्ता क्यों न मानें?
यदि
संख्या वास्तविक है, तो “दो”
स्वयं एक द्रव्य क्यों
नहीं?
वैशेषिक
का उत्तर उसकी पूरी ontology की
कुंजी है—
वास्तविक
होना और स्वतंत्र द्रव्य होना एक ही बात नहीं है।
लालिमा
वास्तविक हो सकती है,
लेकिन उसका अस्तित्व किसी
द्रव्य के आश्रय के
बिना नहीं समझाया जा
सकता।
सुख
वास्तविक अनुभव है, लेकिन वह
आत्मा से स्वतंत्र द्रव्य
नहीं है।
संख्या
का ज्ञान वास्तविक है, लेकिन संख्या
स्वयं पृथ्वी या आत्मा जैसी
स्वतंत्र द्रव्य-सत्ता नहीं है।
यहीं
वैशेषिक वास्तविकता के भीतर अस्तित्व
के स्तरों को पहचानता है।
वैशेषिक
में गुणों की संख्या
उत्तरवर्ती
न्याय-वैशेषिक परम्परा में सामान्यतः चौबीस
गुण माने जाते हैं।
ये हैं—
रूप,
रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म, अधर्म और शब्द।
यह सूची केवल स्मरण
करने के लिए नहीं
है। इसके पीछे एक गहरी
दार्शनिक परियोजना है—
अनुभव
में दिखाई देने वाली विभिन्न विशेषताओं को किस प्रकार ontological status दिया जाए?
यही
इस सूची को महत्वपूर्ण
बनाता है।
पहले
चार — रूप, रस, गन्ध और स्पर्श
वैशेषिक
की गुणमीमांसा का सबसे सहज
प्रवेश हमारी इन्द्रिय-अनुभूति से होता है।
रूप - जो आँख से
ग्रहण किया जाता है।
रस - जो जिह्वा से
ग्रहण किया जाता है।
गन्ध - जो घ्राणेन्द्रिय से
ग्रहण किया जाता है।
स्पर्श
-जो त्वचा से अनुभव किया
जाता है।
ये चार गुण हमें
बताते हैं कि वैशेषिक
के लिए अनुभव और
बाहरी वस्तु का सम्बन्ध केवल
मानसिक कल्पना नहीं है।
वस्तुओं
में ऐसे वास्तविक गुण
हैं जिनसे इन्द्रिय-संयोग के माध्यम से
ज्ञान उत्पन्न होता है।
शब्द
— केवल ध्वनि नहीं, एक दार्शनिक समस्या
शब्द
को भी गुण माना
गया। लेकिन प्रश्न उठता है— शब्द
किस द्रव्य का गुण है?
वैशेषिक
का उत्तर है— आकाश।
यहाँ
भाग–३ में स्थापित
आकाश की भूमिका अब
स्पष्ट होने लगती है।
आकाश
को केवल “खाली स्थान” मान
लेने पर शब्द की
वैशेषिक व्याख्या समझ में नहीं
आती।
आकाश
को स्वतंत्र द्रव्य मानने के पीछे शब्द
को उसका विशेष गुण मानने की आवश्यकता भी
है।
इस प्रकार पिछले भाग की एक
बात अब नये अर्थ
में सामने आती है— द्रव्य
की पहचान उसके आश्रित गुण से भी स्पष्ट होती है।
रूप
का दर्शन — क्या रंग वस्तु से अलग है?
मान
लीजिए सामने एक लाल गुलाब
है। हम कहते हैं— “गुलाब
लाल है।” यह वाक्य
दो स्तरों को एक साथ
रखता है— गुलाब — द्रव्य, लालिमा — गुण
लेकिन
लालिमा अकेले कमरे में रखी
हुई कोई स्वतंत्र वस्तु
नहीं है।
हम
“लाल” देखते हैं, पर वह
किसी न किसी आश्रय
में दिखाई देता है।
यहीं
वैशेषिक का सिद्धान्त है—
गुण की सत्ता आश्रय-सापेक्ष है।
यह बात आगे चलकर
समवाय के सिद्धान्त की
आवश्यकता तक पहुँचेगी।
लेकिन
अभी हम केवल इतना
देख रहे हैं कि
गुण को द्रव्य से
अलग स्वतंत्र द्रव्य मानना वैशेषिक की दृष्टि में
उचित नहीं।
संख्या
— ‘एक’ और ‘अनेक’ भी गुण हैं?
यहाँ
वैशेषिक अचानक हमारे सामान्य अनुभव से आगे निकल
जाता है।
हम कहते हैं— एक
वृक्ष। दो वृक्ष। दस वृक्ष।
लेकिन—
“एक” क्या स्वयं एक वस्तु है?
वैशेषिक
इसे संख्या के रूप में
गुणों में रखता है।
इसका अर्थ है कि वस्तुओं
की गणनीयता भी वास्तविकता के
विश्लेषण में स्थान रखती
है।
संख्या
केवल गणित की अमूर्त
कल्पना नहीं रह जाती।
वह वस्तुओं के सम्बन्ध में
प्रकट होने वाला एक
गुणात्मक निर्धारण है।
यहाँ
वैशेषिक का प्रश्न अत्यन्त
आधुनिक-सा प्रतीत होता
है— क्या संख्या वस्तुओं में है या केवल हमारी बुद्धि में?
वैशेषिक
की दिशा इसे वस्तुगत
आधार देने की है।
परिमाण
— बड़ा, छोटा, लंबा, छोटा
अब संख्या के साथ जुड़ा
दूसरा प्रश्न— वस्तु कितनी बड़ी है?
यहीं
आता है— परिमाण।
लघुता,
दीर्घता, महत्त्व, अणुत्व आदि का दार्शनिक
विवेचन इसी क्षेत्र में
आता है।
एक पर्वत और एक कण
दोनों द्रव्य हो सकते हैं,
लेकिन उनके परिमाण में
भारी अन्तर है।
यदि
परिमाण को केवल मानसिक
तुलना मान लें तो
वस्तुओं की संरचनात्मक भिन्नता
को कैसे समझाएँगे?
वैशेषिक
इसे गुण के रूप
में स्वीकार करता है।
इस प्रकार— संख्या बताती है — कितने।
परिमाण
बताता है — कितना/कितने विस्तार का।
पृथक्त्व
— अलग होने का अनुभव
अब एक अत्यन्त सूक्ष्म
गुण— पृथक्त्व। दो वस्तुएँ पास-पास हैं। फिर भी
वे दो हैं।
एक पुस्तक दूसरी पुस्तक नहीं है। एक मनुष्य
दूसरा मनुष्य नहीं है।
यह
“अलग होना” क्या केवल हमारी
भाषा की सुविधा है?
वैशेषिक इसे वास्तविकता की
दार्शनिक संरचना में स्थान देता
है।
पृथक्त्व
बताता है कि—
अनेकता
केवल संख्या नहीं है; वस्तुओं की पारस्परिक भिन्नता का भी अपना आधार है।
यहीं
भाग–२ में उठाया
गया एक और अनेक का प्रश्न अब
गुण-सिद्धान्त में एक नया
आयाम प्राप्त करता है।
संयोग
— दो वस्तुओं का मिलना
अब गुणों में एक और
रोचक श्रेणी— संयोग।
जब दो द्रव्य किसी
प्रकार एक-दूसरे से
सम्बद्ध होते हैं, तो
उस सम्बन्ध को वैशेषिक संयोग
के रूप में समझाता
है।
उदाहरण—
हाथ और पुस्तक। हाथ पुस्तक
के साथ संयोग में
है।
लेकिन
संयोग स्थायी नहीं। हाथ पुस्तक से अलग हो
सकता है।
इसलिए
संयोग का स्वरूप समवाय
से भिन्न है। यह अन्तर आगे बहुत महत्वपूर्ण
होगा।
विभाग — अलग होने
की घटना
जहाँ
संयोग है, वहाँ विभाग
की सम्भावना भी है।
हाथ
पुस्तक से अलग हुआ।
तो— पहले संयोग था, फिर विभाग
हुआ।
इस प्रकार वैशेषिक ने केवल वस्तुओं
को स्थिर अवस्था में नहीं देखा।
उसने
वस्तुओं के सम्बन्धों में
आने और उनसे अलग
होने की प्रक्रिया को
भी दार्शनिक रूप दिया।
लेकिन
ध्यान दें— विभाग और कर्म एक ही नहीं हैं।
विभाग
एक विशिष्ट गुण है, जबकि
गति/क्रिया को आगे हम
कर्म के अन्तर्गत देखेंगे।
यह अन्तर जानबूझकर अभी सुरक्षित रखा
जा रहा है ताकि
भाग–५ में कर्म
की चर्चा दोहराव के बिना खुल
सके।
परत्व
और अपरत्व — निकट और दूर का अनुभव
अब दो अपेक्षाकृत कठिन
गुण— परत्व और अपरत्व।
किसी
वस्तु को दूसरी की
अपेक्षा— दूर या निकट कहा जा सकता है।
इसी
प्रकार कालगत संदर्भ में— पूर्व या उत्तर का निर्धारण भी हो सकता
है।
वैशेषिक
इन तुलनात्मक निर्धारणों को भी गुण-संरचना का हिस्सा मानता
है।
यहाँ
फिर भाग–३ का
काल और दिक् नया अर्थ ग्रहण
करता है। दिक् और काल केवल
द्रव्य हैं—
उनसे
सम्बद्ध निकटता, दूरता, पूर्वता आदि अनुभवों को
गुण-सिद्धान्त के भीतर समझा
जा सकता है।
अब
बाहरी जगत से भीतर — बुद्धि
अब वैशेषिक की गुणमीमांसा का
सबसे बड़ा मोड़ आता
है।
अब तक हम— रूप,
रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण आदि की बात
कर रहे थे।
अब आता है— बुद्धि।
यहाँ
प्रश्न उठता है— ज्ञान
स्वयं क्या है?
वैशेषिक
परम्परा में बुद्धि/ज्ञान
को आत्मा का गुण माना
जाता है।
इससे
एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात सामने आती
है— ज्ञान स्वयं आत्मा नहीं है।
ज्ञान
का आश्रय आत्मा है।
यही
सिद्धान्त आगे आत्मा और
चेतना की वैशेषिक व्याख्या
को वेदान्त और अन्य दर्शनों
से अलग करेगा।
क्या
ज्ञान आत्मा के बिना हो सकता है?
वैशेषिक
के अनुसार नहीं। ज्ञान किसी द्रव्य में
आश्रित होना चाहिए।
और ज्ञान का आश्रय— आत्मा।
इससे
एक दार्शनिक संरचना बनती है—
आत्मा
→ ज्ञान का आश्रय
ज्ञान
→ आत्मा का गुण
यहाँ
से एक बहुत बड़ा
प्रश्न जन्म लेता है—
यदि
ज्ञान आत्मा का गुण है, तो क्या ऐसी अवस्था सम्भव है जिसमें आत्मा हो लेकिन ज्ञान प्रकट न हो?
यही
प्रश्न आगे वैशेषिक मोक्षमीमांसा
में अत्यन्त महत्वपूर्ण बनेगा।
अभी
इसे खुला छोड़ना आवश्यक
है।
सुख
और दुःख — क्या ये भी गुण हैं?
हम सामान्यतः सुख और दुःख
को अनुभव कहते हैं।
वैशेषिक
उन्हें भी गुणों की
श्रेणी में रखता है।
इसका
अर्थ है— सुख और दुःख वास्तविक अनुभवात्मक अवस्थाएँ हैं, लेकिन वे स्वतंत्र द्रव्य नहीं हैं।
उनका
आश्रय आत्मा है। इससे वैशेषिक का दर्शन केवल
बाहरी प्रकृति का दर्शन नहीं
रह जाता।
वह मानव अनुभव की
आन्तरिक अवस्थाओं को भी ontology के
भीतर स्थान देता है।
इच्छा
और द्वेष
अब दो और गुण—
इच्छा और द्वेष।
मनुष्य
किसी वस्तु को चाहता है।
किसी
दूसरी वस्तु से बचना चाहता
है।
किसी
अनुभव को प्राप्त करना
चाहता है।
किसी
अनुभव को दूर करना
चाहता है।
यह मानसिक जीवन का आधार
है।
वैशेषिक
इसे भी वास्तविक गुण
के रूप में स्वीकार
करता है।
इससे
एक श्रृंखला बनती है— ज्ञान
→ इच्छा/द्वेष → प्रयत्न → कर्म यहाँ हम जानबूझकर
आगे के भाग का
संकेत मात्र दे रहे हैं।
क्योंकि यही श्रृंखला आगे कर्म, धर्म-अधर्म और कर्मफल की ओर ले
जाएगी।
प्रयत्न
— इच्छा का सक्रिय रूप
प्रयत्न
वह गुण है जिसके
माध्यम से जीव किसी
कार्य की ओर प्रवृत्त
होता है। हम कुछ करना चाहते
हैं—
फिर
उसे करने का प्रयास
करते हैं। इस प्रकार—
इच्छा के बाद— प्रयत्न
और फिर— कर्म की सम्भावना बनती
है।
यहाँ
वैशेषिक मनुष्य के व्यवहार को
केवल यांत्रिक गति नहीं मान
रहा।
वह उसके पीछे— ज्ञान,
इच्छा और प्रयत्न जैसे आन्तरिक गुणों
को स्वीकार कर रहा है।
इससे
उसका मनुष्य-दर्शन धीरे-धीरे सामने
आता है।
गुरुत्व
— नीचे की ओर जाने की प्रवृत्ति
अब फिर हम भौतिक
जगत में लौटते हैं।
गुरुत्व को
वैशेषिक गुण के रूप
में स्वीकार करता है।
किसी
वस्तु का नीचे की
ओर गिरना इस प्रकार की
प्रवृत्ति से जोड़ा जाता
है।
यह आधुनिक gravity के साथ सीधे
समान नहीं है।
आधुनिक
गुरुत्वाकर्षण का गणितीय और
क्षेत्र-सिद्धान्तात्मक स्वरूप पूरी तरह अलग
है।
इसलिए
अधिक उचित है कहना—
वैशेषिक
में गुरुत्व वस्तुओं की गति के कारणों में से एक गुणात्मक सिद्धान्त है; इसे आधुनिक gravitational theory का हूबहू रूप नहीं माना जा सकता।
द्रवत्व
और स्नेह
दो और गुण— द्रवत्व
और स्नेह। द्रवत्व
का सम्बन्ध तरलता से है।
स्नेह
का सम्बन्ध चिपचिपाहट/आसंजन जैसी गुणात्मक विशेषता
से जोड़ा जाता है।
यहाँ
वैशेषिक का सूक्ष्म निरीक्षण
दिखाई देता है।
वह प्रकृति को केवल— ठोस
/ तरल / गैस जैसी आधुनिक अवस्थाओं
में नहीं बाँटता।
वह अनुभव में उपलब्ध विशिष्ट
गुणधर्मों को अलग-अलग
दार्शनिक स्थान देता है।
संस्कार
— सबसे रहस्यमय गुणों में एक
अब आता है— संस्कार।
यह वैशेषिक की गुण-सूची
में अत्यन्त महत्वपूर्ण और सूक्ष्म संकल्पना
है।
संस्कार
के अन्तर्गत उत्तरवर्ती परम्परा में विभिन्न प्रकार
की प्रवृत्तियाँ समझाई गई हैं, जिनमें
वेग, भावना और स्थितिस्थापक जैसे भेदों का
उल्लेख मिलता है। यहाँ एक गहरी समस्या
है—
कोई
पूर्व घटना भविष्य के व्यवहार को कैसे प्रभावित करती है?
यदि
किसी वस्तु को गति मिली,
तो उसके आगे के
व्यवहार में उस पूर्व
गति की भूमिका कैसे
समझाई जाए?
या अनुभव के बाद स्मृति/भावना की प्रवृत्ति कैसे
बनी रहती है?
संस्कार
की अवधारणा इन समस्याओं को
समझाने का प्रयास करती
है।
यह आगे चलकर मन,
स्मृति और कर्म की
चर्चा से भी जुड़
सकती है।
धर्म
और अधर्म — गुण के रूप में?
यहाँ
वैशेषिक का स्वर अचानक
आध्यात्मिक और नैतिक हो
जाता है।
धर्म
और अधर्म को भी गुणों
में स्थान दिया गया है।
लेकिन
यहाँ धर्म का अर्थ
केवल सामाजिक नियम नहीं।
वैशेषिकसूत्र
के आरम्भ में धर्म को—
अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि का साधन बताया गया था।
अब समझ में आता
है कि धर्म को
गुण-श्रेणी में रखना केवल
नैतिक उपदेश नहीं है।
वैशेषिक
उसे जीव की वास्तविक
स्थिति और कर्मफल-व्यवस्था
से जोड़ता है। यहीं से आगे—
अदृष्ट,
कर्मफल, ईश्वर और मोक्ष जैसे प्रश्नों की
भूमि तैयार होगी।
लेकिन
वे हमारे भाग–१३ और
भाग–१४ के विषय
हैं।
चौबीस
गुणों की संरचना को फिर से देखें
अब पूरी सूची एक
नए अर्थ में दिखाई
देती है—
रूप
— रस — गन्ध — स्पर्श — शब्द - → इन्द्रियगोचर जगत
संख्या
— परिमाण — पृथक्त्व — संयोग — विभाग — परत्व — अपरत्व → वस्तुओं की संरचना और
पारस्परिक निर्धारण
बुद्धि
— सुख — दुःख — इच्छा — द्वेष — प्रयत्न → चेतन अनुभव और
व्यवहार
गुरुत्व
— द्रवत्व — स्नेह — संस्कार → भौतिक एवं गतिशील प्रवृत्तियाँ
धर्म
— अधर्म → नैतिक-कर्मात्मक व्यवस्था
इस प्रकार गुण-सूची वास्तव
में एक विशाल अनुभव-मानचित्र बन जाती है।
क्या
सभी गुण सभी द्रव्यों में होते हैं?
नहीं। यही
वैशेषिक गुण-सिद्धान्त की
सूक्ष्मता है।
रूप
पृथ्वी, जल और तेजस्
आदि में विशिष्ट प्रकार
से सम्बन्धित है।
शब्द
आकाश का विशेष गुण
है।
ज्ञान,
सुख, दुःख, इच्छा और द्वेष आत्मा
से सम्बन्धित हैं।
इसलिए
यह कहना कि— “हर
द्रव्य में सारे गुण
होते हैं”
वैशेषिक
के सिद्धान्त को गलत समझना
होगा।
गुणों
का वितरण द्रव्यों के अनुसार अलग
है।
यही
वितरण हमें द्रव्यों के
भेद को समझने में
सहायता करता है।
क्या
गुण बिना द्रव्य के रह सकता है?
अब इस पूरे भाग
का सबसे कठिन प्रश्न।
मान लीजिए— लालिमा है। लेकिन कोई लाल वस्तु
नहीं।
क्या
लालिमा फिर भी कहीं
स्वतंत्र रूप से मौजूद
हो सकती है?
वैशेषिक
की दिशा है— नहीं।
गुण को किसी आश्रय
की आवश्यकता है।
इसीलिए
गुण की सत्ता को
समझने के लिए द्रव्य
आवश्यक है।
लेकिन
यहाँ एक नई समस्या
पैदा होती है—
यदि
गुण और द्रव्य अलग-अलग हैं, तो गुण द्रव्य में स्थित कैसे है?
क्या
यह केवल संयोग है?
यदि संयोग है, तो क्या
गुण कभी द्रव्य से
अलग हो सकता है?
यदि
नहीं, तो इन दोनों
के बीच कैसा सम्बन्ध
है? यही प्रश्न हमें
आगे ले जाएगा—
समवाय।
संयोग
और समवाय में अन्तर क्यों आवश्यक होगा?
भाग–४ में हमने
संयोग को एक गुण
के रूप में देखा।
दो वस्तुएँ जुड़ सकती हैं
और अलग भी हो
सकती हैं।
लेकिन
गुण और द्रव्य का
सम्बन्ध वैसा नहीं दिखाई
देता।
लालिमा
और लाल वस्तु का
सम्बन्ध केवल ऐसा नहीं
कि—
“दो
वस्तुएँ पास आ गईं।”
यदि
लाल फूल सामने है
तो उसकी लालिमा कोई
अलग वस्तु उसके साथ बैठी
हुई नहीं है।
वह उसी में अवस्थित
है। यहीं वैशेषिक को एक ऐसे
सम्बन्ध की आवश्यकता पड़ती
है जो—
संयोग
से अधिक गहरा और अविभाज्य हो। इस सम्बन्ध का नाम है—
समवाय।
लेकिन
समवाय का पूरा दर्शन
अगले निर्धारित भागों में नहीं, बल्कि
विशेष रूप से भाग–७ में खुलेगा।
अभी
हमने केवल उसकी आवश्यकता
पहचानी है।
गुण-सिद्धान्त की दार्शनिक उपलब्धि
वैशेषिक
का महान योगदान केवल
यह नहीं कि उसने
24 गुणों की सूची बनाई।
उसकी
वास्तविक उपलब्धि यह है कि
उसने पूछा—
वस्तु
को उसके धर्मों से कैसे अलग पहचाना जाए, और फिर दोनों के वास्तविक सम्बन्ध को कैसे समझाया जाए?
इससे
वह एक अत्यन्त सूक्ष्म
भेद स्थापित करता है— वस्तु
और वस्तु का धर्म एक नहीं हैं।
लेकिन—
वस्तु का धर्म केवल मानसिक कल्पना भी नहीं है।
इस बीच की दार्शनिक
जगह ही वैशेषिक की
वास्तविक शक्ति है।
एक
गहरी आलोचनात्मक सम्भावना
लेकिन
क्या गुणों की इतनी बड़ी
सूची बनाना समस्या को हल कर
देता है?
कोई
आलोचक पूछ सकता है—
यदि
हर अनुभव के लिए एक
अलग गुण बना दें,
तो क्या यह केवल
नामकरण नहीं रह जाएगा?
उदाहरण
के लिए—
रंग
को रूप कह दिया,
स्वाद को रस कह
दिया, सुख को सुख
कह दिया। क्या इससे उनका वास्तविक
कारण समझ में आ
गया? यह आपत्ति गंभीर
है।
वैशेषिक
का उत्तर केवल नामकरण नहीं
है।
उसका
दावा है कि इन
गुणों की वस्तुगत/सत्तात्मक स्थिति है और इनके
आश्रय, सम्बन्ध तथा कारणों को
तार्किक रूप से समझाया
जा सकता है। लेकिन क्या
वह यह काम हर
जगह सफलतापूर्वक करता है?
यही
प्रश्न आगे न्याय-वैशेषिक
शास्त्रार्थ में महत्वपूर्ण होगा।
इस
भाग से आगे क्या खुला?
अब हमारे पास वैशेषिक का
एक नया चित्र है।
द्रव्य
हमें बताता है— “किसमें कुछ
स्थित है।”
गुण
बताते हैं— “वह कैसा है।”
लेकिन
अभी एक तीसरी चीज
रह गई— “वह करता क्या है?” क्योंकि संसार स्थिर नहीं है।
वस्तुएँ
चलती हैं। गिरती हैं। उठती हैं।सिकुड़ती हैं। फैलती हैं। एक-दूसरे से जुड़ती और
अलग होती हैं।
यदि
द्रव्य है और गुण
हैं, तो— परिवर्तन कहाँ से आया?
अगले
भाग की ओर
अब औलूक्य दर्शन का संसार स्थिर
पदार्थों से गतिशील जगत
की ओर बढ़ेगा।
प्रश्न
होगा— कर्म क्या है? लेकिन यहाँ ‘कर्म’ का अर्थ अभी
पुण्य-पाप या कर्मफल नहीं है।
यहाँ
कर्म का अर्थ है—
गति और क्रिया।
क्या
हर परिवर्तन कर्म है?
क्या
हर गति का कारण
कोई अन्य गति है?
उत्क्षेपण
और अवक्षेपण क्या हैं?
आकुञ्चन
और प्रसारण क्या हैं?
गमन
किस प्रकार होता है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
द्रव्य
और गुण के होने मात्र से जगत गतिशील क्यों नहीं हो जाता?
यहीं
से प्रवेश होगा— भाग–५ : कर्म — परिवर्तन और गति का वैशेषिक सिद्धान्त
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
औलूक्य
दर्शन — 15 भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–४ : गुण — वस्तु में जो है, पर स्वयं स्वतंत्र द्रव्य नहीं
नोट
: इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग पिछले भाग से आगे बढ़ता है। पूर्व में विवेचित विषयों की पुनरावृत्ति न करते हुए प्रत्येक भाग औलूक्य दर्शन के एक नये दार्शनिक पक्ष को खोलता है।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
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