थोड़ा सा ठहरना
थोड़ा सा ठहरना
हर जगह पहुँचने की
जल्दी में
हमने यह देखना छोड़ दिया
कि जाना कहाँ है।
हर किसी को
पीछे छोड़ते हुए
एक दिन
अपने ही पीछे रह गए।
अब लगता है
कुछ रास्ते
चलने के लिए नहीं होते,
सिर्फ़ यह समझने के लिए होते हैं
कि हमें वहाँ नहीं जाना।
थोड़ा सा ठहरना भी
ज़रूरी है।
क्योंकि कभी-कभी
उत्तर रास्ते में नहीं,
उस क्षण में मिलता है
जब हम
चलना बंद कर देते हैं।
— मुकेश
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