दर्शन — औलूक्य दर्शन (वैशेषिक दर्शन) भाग–१० : आत्मा और मन — ज्ञान किसमें उत्पन्न होता है?

 दर्शनऔलूक्य दर्शन (वैशेषिक दर्शन)

भाग१० : आत्मा और मनज्ञान किसमें उत्पन्न होता है?

मैं जानता हूँ”—इसमैंकी दार्शनिक सत्ता क्या है?

भाग में हमने वैशेषिक के परमाणुवाद को देखा। वहाँ स्थूल जगत की व्याख्या परमाणुओं, उनके संयोग-विभाग और उनसे उत्पन्न कार्य-द्रव्यों के माध्यम से की गई।

लेकिन वहीं एक निर्णायक प्रश्न उठकर सामने आया

यदि शरीर परमाणुओं से बना है, तोमैं जानता हूँकौन कहता है?

आँख देखती है। कान सुनता है। मन विचार से जुड़ता है।

लेकिन

दृष्टि का ज्ञान किसे होता है?
श्रवण का ज्ञान किसे होता है?
सुख-दुःख का अनुभव किसे होता है?

यहीं औलूक्य दर्शन पदार्थ की बाहरी दुनिया से भीतर की ओर मुड़ता है।

अब प्रश्न हैआत्मा। और उसके साथमन।

क्या शरीर ही आत्मा है?

साधारण अनुभव में हम कहते हैं— “मैं शरीर हूँ।

लेकिन वैशेषिक इस पहचान को स्वीकार नहीं करता। क्यों?

क्योंकि शरीर निरन्तर बदलता है।

बाल्यावस्था का शरीर अलग। यौवन का शरीर अलग। वृद्धावस्था का शरीर अलग।

फिर भी व्यक्ति कहता हैमैं वही हूँ।

यदिमैंकेवल शरीर होता, तो शरीर के निरन्तर परिवर्तन के साथ व्यक्ति की आत्म-पहचान भी निरन्तर बदल जानी चाहिए थी।

इसलिए वैशेषिक के सामने आवश्यकता उत्पन्न होती है

शरीर से भिन्न किसी स्थायी द्रव्य को स्वीकार करने की।

वही हैआत्मा।

 

आत्मा भी एक द्रव्य है

वैशेषिक की दृष्टि से आत्मा कोई अमूर्त कल्पना मात्र नहीं।

वहद्रव्य है। और इस प्रकार वह वैशेषिक के द्रव्य-सिद्धान्त का अंग बनती है।

लेकिन आत्मा भौतिक द्रव्यों की तरह नहीं।

वहपृथ्वी नहीं। जल नहीं। तेजस् नहीं। वायु नहीं। और ही परमाणुओं के संयोग से बनी कोई स्थूल सत्ता है।

इसलिएआत्मा भौतिक परमाणुवाद की सीमा के बाहर स्थित एक स्वतंत्र द्रव्य है।

 

आत्मा नित्य है

शरीर उत्पन्न होता है। बढ़ता है। बदलता है। नष्ट होता है।

लेकिन आत्मानित्य मानी जाती है।

इससे वैशेषिक के अस्तित्व-विवेचन में एक महत्वपूर्ण विभाजन बनता है

अनित्य शरीर और नित्य आत्मा।

यही विभाजन आगे कर्म और पुनर्जन्म की व्याख्या के लिए भी आधार प्रदान करता है।

 

आत्मा एक है या अनेक?

यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है। यदि आत्मा केवल एक ही होती

तो क्या एक व्यक्ति का सुख दूसरे व्यक्ति का सुख होना चाहिए?

यदि मैं दुखी हूँतो क्या संसार के सभी जीवों को उसी समय वही दुःख अनुभव होना चाहिए?

ऐसा नहीं होता।  इसलिए वैशेषिकअनेक आत्माओं को स्वीकार करता है। प्रत्येक जीव की अपनी आत्मा है।

 

अनेक आत्माओं की आवश्यकता

मान लीजिएएक व्यक्ति सो रहा है। दूसरा जाग रहा है।

एक व्यक्ति सुखी है। दूसरा दुःखी। एक व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर रहा है। दूसरा अज्ञान में है।

यदि आत्मा केवल एक होती, तो इन भिन्न अनुभवों को समझाना कठिन होता।

इसलिएव्यक्तिगत अनुभवों की भिन्नता के लिए अनेक आत्माओं का स्वीकार आवश्यक है।

यह वैशेषिक की बहुवादी आत्ममीमांसा है।

 

आत्मा का ज्ञान कैसे होता है?

आत्मा आँख से दिखाई नहीं देती। न उसका कोई स्थूल आकार प्रत्यक्ष होता है।

तो फिर हम उसके अस्तित्व को कैसे जानते हैं?

वैशेषिक परम्परा अनुभवजन्य लक्षणों से आत्मा का अनुमान करती है।

हम अनुभव करते हैंइच्छा। द्वेष। सुख। दुःख। ज्ञान। प्रयत्न। ये सब किसके गुण हैं?

इनका आश्रय किसी द्रव्य में होना चाहिए। और वैशेषिक उस द्रव्य कोआत्मा कहता है।

 ज्ञान आत्मा का गुण है

यहाँ वैशेषिक का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त सामने आता है।

वैशेषिक के अनुसारज्ञान आत्मा का गुण है।

यह बात वेदान्त से उसके भेद को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

वेदान्त की कुछ धाराओं मेंचैतन्य आत्मा का स्वरूप है।

लेकिन वैशेषिक मेंज्ञान आत्मा का गुण है।

अर्थात् आत्मा और ज्ञान को एक ही सत्ता नहीं माना जाता।

 

आत्मा = ज्ञाननहीं

यहाँ एक सूक्ष्म दार्शनिक अन्तर समझिए।

यदि ज्ञान आत्मा का गुण हैतो आत्मा ज्ञान से भिन्न है।

जैसेफूलद्रव्य, रंगगुण।, उसी प्रकारआत्माद्रव्य , ज्ञानगुण।

इसलिएआत्मा ज्ञान का आश्रय है, स्वयं ज्ञान मात्र नहीं।

यही वैशेषिक को अद्वैत वेदान्त से मूलतः अलग कर देता है।

 

क्या आत्मा में सदैव ज्ञान रहता है?

यहाँ वैशेषिक का उत्तर बहुत रोचक है।

यदि ज्ञान आत्मा का गुण है, तो क्या आत्मा में हर समय ज्ञान उपस्थित रहता है?

नहीं। वैशेषिक परम्परा में ज्ञान कोउत्पन्न होने वाला गुण माना जाता है।

जब उचित परिस्थितियाँ उपस्थित होती हैं, तब आत्मा में ज्ञान उत्पन्न होता है।

इसलिएगहरी निद्रा में किसी विशेष वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान होनाआत्मा के अस्तित्व के निषेध का प्रमाण नहीं।

 

ज्ञान की उत्पत्ति के लिए क्या चाहिए?

अब एक जटिल श्रृंखला बनती है। बाहरी वस्तु है। इन्द्रिय है। मन है। आत्मा है।

इन सबका उचित सम्बन्ध होने पर ज्ञान उत्पन्न होता है।

इसे सरल रूप में ऐसे देख सकते हैंवस्तुइन्द्रियमनआत्माज्ञान

लेकिन यह केवल एक सरल शिक्षण-क्रम है। वैशेषिक की वास्तविक epistemological संरचना में

आत्मामनइन्द्रियअर्थ के सम्बन्ध की विशिष्ट शर्तें होती हैं।

 

मन की आवश्यकता क्यों?

यदि आत्मा सर्वव्यापक हैतो एक साथ सभी इन्द्रियों के अनुभव क्यों नहीं होते?

मैं एक ही क्षण मेंदेख भी सकता हूँ, सुन भी सकता हूँ, स्पर्श भी अनुभव कर सकता हूँ, और किसी अन्य विषय पर भी विचार कर सकता हूँलेकिन हमारी अनुभूति सामान्यतः क्रमिक होती है।

वैशेषिक इस समस्या का समाधानमन के माध्यम से करता है।

 

मन एक द्रव्य है

मन कोई केवलविचारनहीं। वैशेषिक के अनुसार मनद्रव्य है।

लेकिन वह बाहरी भौतिक द्रव्यों जैसा स्थूल नहीं। वहअणु है।

इसीलिए इसेअणुत्वयुक्त मन कहा जाता है।

 

मन अणु क्यों?

यदि मन एक ही समय में सभी इन्द्रियों से जुड़ सकतातो एक ही क्षण में सभी प्रकार के ज्ञान उत्पन्न होने चाहिए।

लेकिन अनुभव ऐसा नहीं दिखाता। हमारा ध्यान क्रमशः बदलता है।

कभी हम सुन रहे हैं। फिर देखने लगते हैं। फिर भीतर विचार करने लगते हैं। फिर किसी स्मृति में चले जाते हैं।

वैशेषिक इस क्रमिकता की व्याख्या मन की सूक्ष्म और एकदेशी प्रकृति से करता है।

 

मन का कार्य

मनआत्मा को इन्द्रियों और उनके विषयों से जोड़ने वाला आन्तरिक साधन है।

यदि आत्मा और इन्द्रिय के बीच मन का सम्बन्ध होतो ज्ञान उत्पन्न नहीं होगा।

इसलिएमन ज्ञानोत्पत्ति की आवश्यक कड़ी है।

 

एक समय में एक ज्ञान

वैशेषिक मन की अणु-संरचना से एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त निकालता है

एक समय में मन एक ही इन्द्रिय से सम्बन्ध स्थापित करता है।

इसलिए ज्ञान का क्रम दिखाई देता है।

उदाहरणपहले आपने घंटी की आवाज सुनी। फिर सामने व्यक्ति को देखा। फिर उसके चेहरे को पहचाना।

फिर उसके बारे में स्मरण किया। यह क्रममन की एकदेशी क्रियाशीलता से समझाया जाता है।

क्या मन आत्मा है? नहीं। यह भेद बहुत महत्वपूर्ण है। आत्माचेतन अनुभव का आश्रय।

मनआन्तरिक द्रव्य।मन स्वयं अंतिम ज्ञाता नहीं। वह ज्ञान-उत्पत्ति की प्रक्रिया में साधन है।

इसलिएमन सोचने वाला अंतिममैंनहीं। यह वैशेषिक का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक निष्कर्ष है।

 

मन और मस्तिष्क आधुनिक पाठक अक्सर पूछ सकता है— “क्या वैशेषिक का मन modern brain के समान है?”

नहीं। दोनों को समान मानना उचित नहीं। आधुनिक neuroscience में brain— भौतिक जैविक संरचना है।

वैशेषिक का मनसूक्ष्म द्रव्य है।

इसलिए दोनों की तुलना केवल प्रश्नों के स्तर पर की जा सकती है, ontology के स्तर पर नहीं।

 

इन्द्रिय और मन

अब ज्ञान की संरचना को थोड़ा और स्पष्ट करें।

आँखचक्षुरिन्द्रिय।

कानश्रोत्रेन्द्रिय।

त्वचात्वगिन्द्रिय।

जिह्वारसनेन्द्रिय।

नाकघ्राणेन्द्रिय।

लेकिन इन्द्रिय और आत्मा के बीचमन की आवश्यकता है।

इसी कारण वैशेषिक में केवल इन्द्रिय होना ज्ञान के लिए पर्याप्त नहीं।

 

मैं देख रहा हूँकैसे बनता है?

अब एक अनुभव लें— “मैं फूल देख रहा हूँ।

यहाँ

फूलबाह्य वस्तु।, आँखइन्द्रिय।, मनआन्तरिक सम्पर्क-साधन।, आत्माज्ञान का आश्रय।

औरफूल का ज्ञानआत्मा में उत्पन्न गुण।

इस प्रकारमैं जानता हूँके पीछे एक पूरा ontological mechanism है।

 

ज्ञान के साथ सुख-दुःख भी

वैशेषिक के लिए आत्मा केवल ज्ञान का आश्रय नहीं। आत्मा में अन्य गुण भी माने जाते हैं

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, प्रयत्न  आदि।

इससे मानव अनुभव का एक पूरा psychological structure बनता है।

हम किसी वस्तु को जानते हैं। फिर उसे चाह सकते हैं। या उससे द्वेष कर सकते हैं। उससे सुख या दुःख अनुभव कर सकते हैं। और उसके लिए प्रयत्न कर सकते हैं।

इच्छा

इच्छा का अर्थकिसी वस्तु या अवस्था की प्राप्ति की अभिलाषा।

मैं सुख चाहता हूँ। ज्ञान चाहता हूँ। भोजन चाहता हूँ। किसी व्यक्ति से मिलना चाहता हूँ।

यह चाहत शरीर की केवल mechanical movement नहीं।

वैशेषिक इसे आत्मा का गुण मानता है।

 

 द्वेष

इसी प्रकारअप्रिय वस्तु से दूर हटने की प्रवृत्ति द्वेष है। हम दुःख से बचना चाहते हैं।

अप्रिय अनुभव से दूर जाना चाहते हैं। इसलिए इच्छा और द्वेष मानव व्यवहार की दो मूल प्रेरक दिशाएँ बनते हैं।

 

सुख और दुःख

सुख और दुःख भी आत्मा के गुण हैं। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है

शरीर अनुभव का उपकरण है; अनुभव का अंतिम आश्रय आत्मा है।

इसी कारण शरीर के परिवर्तन के बावजूद अनुभवकर्ता की निरन्तरता समझाई जा सकती है।

 

प्रयत्न

केवल इच्छा पर्याप्त नहीं। इच्छा के बादप्रयत्न होता है।

मैं जल चाहता हूँ। फिर उसे पाने के लिए हाथ बढ़ाता हूँ। यह क्रियात्मक ऊर्जाप्रयत्न

के रूप में समझी जाती है। इस प्रकारज्ञानइच्छाप्रयत्नकर्म की एक मनोवैज्ञानिक श्रृंखला बनती है।

 

आत्मा और कर्म

अब भाग का परमाणुवाद फिर यहाँ लौटता है। शरीर परमाणुओं से बना है।

लेकिनइच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, ज्ञान और प्रयत्न आत्मा से सम्बन्धित हैं।

तो कर्म केवल शरीर की गति नहीं। कर्म के पीछे

एक आत्मगत नैतिक और मनोवैज्ञानिक संरचना भी है।

यहीं वैशेषिक आगे चलकर कर्मफल और पुनर्जन्म की समस्या से जुड़ता है।

आत्मा और पुनर्जन्म

यदि आत्मा नित्य है और शरीर अनित्यतो मृत्यु के बाद क्या?

यदि कर्मों के संस्कार आत्मा से जुड़े हैंतो नए शरीर की प्राप्ति कैसे होती है?

यह प्रश्न केवल आत्ममीमांसा का नहीं। यहकर्म और पुनर्जन्म की समस्या है।

न्याय-वैशेषिक परम्परा इसे अदृष्ट और कर्म-सिद्धान्त से जोड़ती है।

अर्थात् कर्म के अदृश्य संस्कार भविष्य के अनुभवों और जन्मों की व्यवस्था में भूमिका निभाते हैं।

 

अदृष्ट की ओर पहला संकेत

अभी हम अदृष्ट का विस्तार नहीं करेंगे, क्योंकि वह हमारी आगामी चर्चा का स्वतंत्र विषय है।

लेकिन इतना समझना आवश्यक हैहर कर्म का फल तत्काल प्रत्यक्ष नहीं होता।

मनुष्य कोई कर्म करता है। फल बहुत बाद में मिल सकता है।

कभी अगले जन्म में। इस बीच जो कर्म-संस्कार फल की व्यवस्था को सम्भव बनाता है

उसे न्याय-वैशेषिक परम्परा मेंअदृष्ट से जोड़ा गया।

 

आत्मा और मोक्ष

अब प्रश्न उठता हैयदि आत्मा नित्य है, कर्म करता है, कर्मफल भोगता है, और पुनर्जन्म लेता है

तो क्या इस चक्र का कोई अन्त है? हाँ।

वैशेषिक का अंतिम लक्ष्यमोक्ष से जुड़ता है।

लेकिन यहाँ वैशेषिक का मोक्ष वेदान्त के ब्रह्मानुभव जैसा नहीं।

यहाँ मोक्ष की व्याख्या मुख्यतःदुःख और बन्धन से पूर्ण निवृत्ति के रूप में होती है।

 

मोक्ष में ज्ञान की भूमिका

यदि अज्ञान के कारण हमशरीर, इन्द्रिय, मन, और आत्मा को ठीक से नहीं पहचानते

तो कर्म और बन्धन चलता रहता है। यथार्थ ज्ञानवस्तुओं की वास्तविक प्रकृति का ज्ञान है।

जब तत्त्वों का सही ज्ञान प्राप्त होता है, तब कर्मबन्धन की प्रक्रिया समाप्त होने की दिशा में जाती है।

इसलिए वैशेषिक में दर्शन केवल जगत की सूची बनाना नहीं।

उसका अंतिम प्रयोजनदुःख से निवृत्ति है।

 

वैशेषिक आत्मा और वेदान्त की आत्मा

अब एक महत्वपूर्ण तुलना। वैशेषिक-

आत्मा = द्रव्य, ज्ञान = आत्मा का गुण, अद्वैत वेदान्त  आत्मा = चैतन्यस्वरूप, ज्ञान = आत्मा का स्वरूप

यह अन्तर छोटा नहीं। यह दोनों दर्शन की पूरी ontology को अलग कर देता है।

वैशेषिकबहुवादी यथार्थवाद की ओर है।

अद्वैतअद्वैत चैतन्यवाद की ओर।

 

वैशेषिक और सांख्य

सांख्य मेंपुरुष चेतन है। प्रकृति जड़ है।

वैशेषिक मेंआत्मा चेतन अनुभव का आश्रय है।

लेकिन ज्ञान आत्मा का गुण है।

इसलिए वैशेषिक की आत्मा सांख्य के पुरुष से भी पूर्णतः समान नहीं।

दोनों में आत्मा/पुरुष का शरीर से भेद महत्वपूर्ण है।

लेकिन चेतना की metaphysical स्थिति अलग है।

 

वैशेषिक की सबसे बड़ी दार्शनिक उपलब्धि

यहाँ हमें एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए।

औलूक्य दर्शन नेबाहरी जगत और  आन्तरिक अनुभव को दो अलग-अलग संसार नहीं माना।

उसने दोनों कोद्रव्य, गुण, कर्म और सम्बन्धों की एक ही व्यापक ontologyमें समझने का प्रयास किया।

शरीर भी द्रव्य। इन्द्रिय भी द्रव्य। मन भी द्रव्य। आत्मा भी द्रव्य। ज्ञान आत्मा का गुण।  दुःख आत्मा के गुण।

कर्म शरीर और अन्य द्रव्यों की गति।

इस प्रकारब्रह्माण्ड और मनुष्य एक ही दार्शनिक प्रणाली में जाते हैं।

 

लेकिन एक बड़ी समस्या अभी बाकी है

अब तक हमने कहाआत्मा ज्ञान का आश्रय है।

लेकिनआत्मा और मन का सम्बन्ध कैसे बनता है?

औरमन इन्द्रिय से कैसे जुड़ता है?

औरवस्तु से इन्द्रिय का सम्पर्क ज्ञान कैसे उत्पन्न करता है?

और सबसे बड़ा प्रश्नयथार्थ ज्ञान और मिथ्या ज्ञान में अन्तर कैसे किया जाए?

यदि मैं रस्सी को साँप समझ लूँतो मेरे भीतर ज्ञान तो उत्पन्न हुआ।लेकिन वह सही ज्ञान नहीं।

तोप्रमाण क्या है? प्रमा क्या है? प्रत्यक्ष और अनुमान कैसे काम करते हैं?

अब औलूक्य दर्शन पदार्थमीमांसा से सीधेज्ञानमीमांसा में प्रवेश करता है।

अगले भाग की ओर

भाग११ : प्रमाण और प्रत्यक्षहम सत्य को जानते कैसे हैं?

अगले भाग में हम देखेंगे

प्रमा क्या है?
प्रमाण क्या है?
प्रत्यक्ष क्या है?
इन्द्रियार्थसन्निकर्ष क्या है?
निर्विकल्पक और सविकल्पक प्रत्यक्ष क्या हैं?
इन्द्रिय और मन की भूमिका क्या है?
यथार्थ ज्ञान और भ्रम में अन्तर कैसे किया जाए?

और फिर एक कठिन प्रश्न

यदि आँख कभी भ्रमित हो सकती है, तो प्रत्यक्ष को प्रमाण क्यों माना जाए?

यहीं से औलूक्य दर्शन की बाहरी पदार्थमीमांसा एक सुसंगत ज्ञानमीमांसा में परिवर्तित होगी।

 

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

औलूक्य दर्शन — 15 भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग१० : आत्मा और मनज्ञान किसमें उत्पन्न होता है?

नोट : इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग पिछले भाग से आगे बढ़ता है। पूर्व में विवेचित विषयों की अनावश्यक पुनरावृत्ति करते हुए प्रत्येक भाग औलूक्य दर्शन के एक नये दार्शनिक पक्ष को खोलता है।

(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)

 

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