पाणिनीय दर्शन भाग–७ पद, कारक और वाक्य — शब्द जब सम्बन्धों में प्रवेश करता है
पाणिनीय दर्शन
भाग–७
पद,
कारक और वाक्य — शब्द जब सम्बन्धों में प्रवेश करता है
एक
शब्द का अर्थ कहाँ समाप्त होता है और वाक्य का अर्थ कहाँ आरम्भ होता है?
पिछले
भाग में हमने एक
निर्णायक प्रश्न उठाया था—
शब्द
और अर्थ का सम्बन्ध क्या है?
हमने
देखा कि शब्द केवल
ध्वनि नहीं है। उसके
साथ व्याकरणिक संरचना, संकेत, प्रयोग और अर्थ-बोध
का सम्बन्ध है। लेकिन वहीं
एक और कठिनाई सामने
आई—
एक
अकेला शब्द सामान्यतः पूर्ण कथन नहीं करता।
जब शब्द वाक्य में
प्रवेश करता है, तब
वह दूसरे शब्दों के साथ सम्बन्ध
स्थापित करता है।
उदाहरण
के लिए— रामः वनं गच्छति।
यहाँ
तीन पद हैं— रामः
— वनम् — गच्छति।
लेकिन
इन तीनों को अलग-अलग
जान लेना वाक्य के
पूर्ण अर्थ को जान
लेना नहीं है।
“रामः”
केवल एक व्यक्ति का
बोध नहीं करा रहा।
वह— गमन-क्रिया का कर्ता बन रहा है।
“वनम्”
केवल एक स्थान का
नाम नहीं। वह— गमन-क्रिया का लक्ष्य/कर्म-संबन्ध प्रकट कर रहा है।
और
“गच्छति” इन दोनों के
बीच क्रियात्मक सम्बन्ध स्थापित करता है।
इसलिए
अब हमारी यात्रा— शब्द → अर्थ से आगे बढ़कर—
शब्द
→ पद → कारक-संबन्ध → वाक्य → वाक्यार्थ की ओर जाएगी।
शब्द
से पद तक
पाणिनीय
व्याकरण में “शब्द” और
“पद” को एक ही
स्तर पर रख देना
उचित नहीं।
व्याकरणिक
प्रक्रिया में जब कोई
रूप विशिष्ट पद-संज्ञा प्राप्त
करता है, तब वह
वाक्य-व्यवस्था में प्रवेश करने
योग्य बनता है।
अष्टाध्यायी
का प्रसिद्ध सूत्र है— सुप्तिङन्तं पदम्। १।४।१४
अर्थात्
सामान्यतः— सुप् अथवा तिङ् अन्त वाला रूप पद कहलाता है।
यह सूत्र पाणिनीय व्याकरण की दृष्टि से
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि यहाँ “पद” केवल— “शब्द”
का सामान्य पर्याय नहीं। यह एक— व्याकरणिक तकनीकी संज्ञा है।
पद
क्यों आवश्यक है?
यदि
हम केवल शब्दों की
सूची बनाते रहें, तो वाक्य की
संरचना समझना कठिन होगा।
वाक्य
में हमें यह जानना
पड़ता है कि— कौन-सा रूप किस
प्रकार का है?
उसकी
विभक्ति क्या है?
उसका
क्रिया से क्या सम्बन्ध
है?
वह किस अन्य पद
से सम्बद्ध है?
पद-संज्ञा इस पूरी प्रक्रिया
के लिए एक व्याकरणिक
आधार देती है।
इसलिए—
पद केवल शब्द का नाम नहीं; वाक्य में कार्य करने वाली व्याकरणिक इकाई है।
यहाँ
पाणिनीय व्याकरण की संरचनात्मक शक्ति
फिर दिखाई देती है।
सुप् और तिङ् — पद की दो बड़ी दिशाएँ
पाणिनीय
व्यवस्था में पद का
एक महत्त्वपूर्ण विभाजन है— सुबन्त
जिसमें
सुप्-प्रत्यय की व्यवस्था से
नामपद बनते हैं। तिङन्त
जिसमें
तिङ्-प्रत्ययों से क्रियाप द बनते
हैं। इससे वाक्य की दो प्रमुख
दिशाएँ सामने आती हैं—
नामात्मक
संरचना और— क्रियात्मक संरचना।
लेकिन
वाक्य केवल नाम और
क्रिया का जोड़ नहीं।
इन दोनों के बीच जो
सम्बन्ध बनते हैं, वे
अर्थ-संरचना का अधिक गहरा
स्तर खोलते हैं।
यहीं
से— कारक का प्रवेश होता
है।
कारक
— सम्बन्ध का व्याकरण
“कारक”
शब्द को केवल “कर्ता”
के अर्थ में लेना
एक सामान्य भूल है।
पाणिनीय
व्याकरण में कारक एक
व्यापक व्याकरणिक अवधारणा है।
अष्टाध्यायी
का सूत्र— कर्तुरीप्सिततमं कर्म। १।४।४९ कर्म की एक
विशिष्ट परिभाषा देता है।
इसी
प्रकार— ध्रुवमपायेऽपादानम्।
१।४।२४ अपादान
की परिभाषा देता है।
और—
साधकतमं करणम्। १।४।४२ करण की ओर
संकेत करता है।
इन सूत्रों से स्पष्ट होता
है कि पाणिनि केवल
विभक्तियों की सूची नहीं
बना रहे। वे—
क्रिया
और उसके सहभागी तत्वों के सम्बन्ध को व्यवस्थित कर
रहे हैं।
कारक
और विभक्ति में अन्तर
यह भेद अत्यन्त आवश्यक
है। यदि हम कहते हैं—
रामः फलम् खादति। तो— “रामः”
प्रथमा विभक्ति में है।
और—
“फलम्” द्वितीया विभक्ति में। लेकिन— विभक्ति और— कारक एक ही चीज
नहीं हैं।
विभक्ति
किसी रूप का व्याकरणिक
चिह्न है।
कारक
क्रिया के साथ उस
पद के— अर्थ-संबन्ध को व्यक्त करता
है।
अर्थात्—
विभक्ति रूपगत है; कारक सम्बन्धगत है।
यह भेद पाणिनीय व्याकरण
की दार्शनिक समझ के लिए
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
एक
ही विभक्ति, अनेक सम्बन्ध
यदि
विभक्ति और कारक बिल्कुल
समान होते, तो प्रत्येक विभक्ति
का केवल एक ही
अर्थ होना चाहिए था।
लेकिन
भाषा में ऐसा नहीं
है।
उदाहरणतः
तृतीया विभक्ति विभिन्न प्रसंगों में विभिन्न अर्थ-संबन्ध व्यक्त कर सकती है।
इसीलिए—
केवल रूप देखकर सम्पूर्ण
अर्थ-संरचना नहीं समझी जा
सकती।
हमें
देखना पड़ता है— यह पद क्रिया के साथ किस प्रकार सम्बद्ध है?
यहीं
पाणिनीय दर्शन रूप और अर्थ
के बीच एक मध्यवर्ती
संरचना प्रस्तुत करता है— कारक-सिद्धान्त।
कारक
— क्रिया के चारों ओर निर्मित संरचना
वाक्य
को केवल शब्दों की
पंक्ति मानना पर्याप्त नहीं। उसे इस प्रकार भी
देखा जा सकता है—
क्रिया
केन्द्र में है और विभिन्न कारक उसके साथ सम्बन्ध स्थापित करते हैं।
उदाहरण—
- रामः हस्तेन लेखनीं गृह्णाति।
यहाँ—
रामः — कर्ता, हस्तेन — करण, लेखनीम् — कर्म , गृह्णाति — क्रिया यह केवल चार शब्द
नहीं।
यह एक— सम्बन्ध-जाल - है। - और कारक इस जाल
की व्याकरणिक संरचना को समझने का
साधन हैं।
“कर्ता”
और “कारक” एक नहीं
सामान्य
भाषा में हम कहते
हैं— “जो काम करता
है वही कर्ता।”
लेकिन
पाणिनीय परिभाषा इससे अधिक सूक्ष्म
है। अष्टाध्यायी में— स्वतन्त्रः कर्ता। १।४।५४ कहा गया है।
यहाँ
“स्वतन्त्रता” अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
कर्ता
केवल वह नहीं जिसे
आधुनिक व्याकरण “subject” कह दे।
पाणिनीय
कर्ता— क्रिया के सम्बन्ध में स्वतन्त्र होने की संकल्पना
से जुड़ा है।
इसलिए
आधुनिक grammatical
subject और पाणिनीय कर्ता को बिना विवेक
के समान मानना उचित
नहीं।
कर्म
— केवल object नहीं इसी प्रकार— कर्तुरीप्सिततमं
कर्म।
के आधार पर कर्म
को केवल अंग्रेजी के
“object” से पूरी तरह समान
नहीं किया जा सकता।
पाणिनीय
कर्म की अपनी परिभाषात्मक
भूमिका है।
इसका
सम्बन्ध— क्रिया, कर्ता की अभिप्सा, और—
क्रिया के लक्ष्य से जुड़ता
है।
इसलिए
पाणिनीय कारक-व्यवस्था को
आधुनिक grammatical
categories में सीधे अनुवाद कर
देना उसके दार्शनिक सूक्ष्म
अर्थ को कम कर
सकता है।
छह
प्रमुख कारक
पाणिनीय
परम्परा में सामान्यतः छह
कारक माने जाते हैं—
कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान,
अपादान, अधिकरण
इनमें—
कर्ता - क्रिया
के सम्बन्ध में स्वतन्त्रता को
व्यक्त करता है।
कर्म- क्रिया
के लक्ष्य या ईप्सिततम सम्बन्ध
को।
करण - क्रिया-सिद्धि के साधकतम उपकरण
को।
सम्प्रदान
- प्रदान/सम्बन्धित
लक्ष्य को।
अपादान -वियोग
या अपगमन के आधार को।
अधिकरण - आश्रय
या स्थिति के आधार को।
यहाँ
फिर वही बात सामने
आती है—
वाक्य
का अर्थ केवल शब्दों में नहीं; उनके सम्बन्धों में भी है।
कारक-सिद्धान्त की दार्शनिक शक्ति
अब एक गहरा प्रश्न।
यदि— “रामः” एक शब्द है,
और— “वनम्” दूसरा,तो इन दोनों
के बीच सम्बन्ध कहाँ
से आया?
केवल
शब्दकोशीय अर्थ से? नहीं।
वाक्य में उनका— कारक-सम्बन्ध अर्थ-संरचना को
निर्धारित करने में सहायता
करता है।
इस प्रकार पाणिनीय व्याकरण हमें बताता है
कि— अर्थ केवल वस्तुओं के नामों का संग्रह नहीं है।
अर्थ—
क्रिया और उसके सहभागी तत्वों के सम्बन्धों से भी निर्मित होता है।
यह विचार आगे भारतीय वाक्य-दर्शन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
बनेगा।
विभक्ति
— सम्बन्ध की दृश्य अभिव्यक्ति
अब प्रश्न है— कारक सम्बन्ध
हमें दिखाई कैसे देता है? भाषा
में उसका एक प्रमुख
माध्यम है—
विभक्ति।
प्रथमा,
द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी आदि रूपगत चिह्न
पदों के सम्बन्धों को
व्यक्त करने में सहायता
करते हैं।
लेकिन
फिर वही सावधानी— विभक्ति
= कारक नहीं।
विभक्ति—
कारक अथवा अन्य सम्बन्धों की अभिव्यक्ति का एक व्याकरणिक साधन हो सकती है।
यही
कारण है कि पाणिनीय
प्रणाली को केवल case-marking system मानना अधूरा होगा।
कारक
और अर्थ-संरचना
यहाँ
एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक परिवर्तन होता है। भाग–६
में हमने पूछा था—
शब्द अर्थ कैसे देता
है?
अब भाग–७ में
हम देखते हैं—
शब्द
अकेला अर्थ नहीं बनाता; वाक्य में उसके सम्बन्ध अर्थ को संगठित करते हैं।
इसलिए
अर्थ की संरचना को
इस प्रकार देखा जा सकता
है—
शब्द
→ पद → कारक-संबन्ध → वाक्यगत संरचना → वाक्यार्थ
यह क्रम पाणिनीय व्याकरण
की एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक
सम्भावना को सामने लाता
है।
वाक्य
केवल शब्दों का योग है?
अब हम उस प्रश्न
पर पहुँचते हैं जो आगे
पूरी श्रृंखला का एक प्रमुख
दार्शनिक प्रश्न बनेगा।
मान
लीजिए— रामः वनं गच्छति। क्या वाक्य का
अर्थ केवल— राम + वन + जाना को जोड़
देने से बन गया?
यदि
ऐसा है, तो वाक्य-अर्थ एक प्रकार
का योग होगा।
लेकिन
वास्तविक समझ में हम
केवल तीन अलग अर्थ
नहीं जानते।
हम जानते हैं— राम वन की ओर जाता है।
अर्थात्
शब्दों के बीच एक
सम्बन्धित स्थिति का बोध होता
है।
तो प्रश्न उठता है— क्या
वाक्यार्थ शब्दार्थों का मात्र योग है, या उससे अधिक कुछ है?
यही
आगे व्याकरण-दर्शन का निर्णायक प्रश्न
बनेगा।
क्रिया
— वाक्य का केन्द्र?
पाणिनीय
कारक-सिद्धान्त को देखते हुए
एक बात विशेष रूप
से ध्यान देने योग्य है।
अनेक
कारक-सम्बन्ध— क्रिया के साथ जुड़े
हैं।
इसलिए
वाक्य में क्रिया की
भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दिखाई देती है।
“रामः”
का कर्तृत्व तभी स्पष्ट होता
है जब कोई क्रिया
हो।
“वनम्”
का कर्मत्व भी क्रिया-सन्दर्भ
में समझा जाता है।
“हस्तेन”
का करणत्व भी किसी क्रिया
से सम्बद्ध है।
इससे
प्रश्न उठता है— क्या
क्रिया वाक्य की अर्थ-संरचना का केन्द्र है?
पाणिनीय
कारक-सिद्धान्त इस प्रश्न की
ओर संकेत करता है, लेकिन
इसे सीधे “पाणिनि ने वाक्य का
यही दर्शन माना” कहना सावधान ऐतिहासिक
निष्कर्ष नहीं होगा।
यहीं
हमें पाणिनि और परवर्ती व्याकरण-दर्शन के बीच अन्तर
बनाए रखना चाहिए।
आकांक्षा
की दिशा
जब हम— “रामः…” सुनते
हैं, तो मन स्वाभाविक
रूप से पूछ सकता
है—रामः क्या करता
है?
यदि
कोई कहे— “रामः वनम्…”
तो अब भी अपेक्षा
बनी रहती है— वन
के साथ क्या हुआ?
फिर—
“गच्छति।”
और वाक्य पूर्ण हो जाता है।
यह
भाषिक अनुभव आगे भारतीय वाक्य-दर्शन में— आकांक्षा
जैसी
अवधारणाओं को समझने के
लिए आधार बनता है।
अर्थात् एक पद दूसरे पद
की अपेक्षा उत्पन्न कर सकता है।
यहाँ भाषा केवल— शब्दों की उपस्थिति नहीं है।
वह—
परस्पर अपेक्षाओं की संरचना भी है।
योग्यता
केवल
शब्दों का साथ-साथ
आ जाना पर्याप्त नहीं।
उन्हें अर्थ की दृष्टि से
परस्पर उपयुक्त भी होना चाहिए।
उदाहरणतः—
“रामः जलं पिबति।” सार्थक
है।
लेकिन
यदि कोई ऐसा संयोजन
बने जिसका अर्थ-संबन्ध सामान्य
रूप से असंगत हो,
तो केवल व्याकरणिक रूप
पर्याप्त नहीं।
यहाँ—
योग्यता की दिशा खुलती
है।
इससे
हमें पता चलता है
कि वाक्य-बोध में केवल
व्याकरणिक रूप नहीं, बल्कि—
अर्थगत
संगति भी महत्त्वपूर्ण है।
सन्निधि
वाक्यबोध
में एक और बात
आवश्यक है— पदों का
उचित भाषिक सम्पर्क।
यदि
वाक्य के शब्द इतने
अलग-अलग समय या
प्रसंग में प्रस्तुत हों
कि उनका पारस्परिक सम्बन्ध
ही न बने, तो
वाक्यार्थ की सिद्धि कठिन
हो सकती है।
भारतीय
वाक्य-दर्शन में आगे— आकांक्षा,
योग्यता, सन्निधि जैसे सिद्धान्त इसी समस्या को
अधिक स्पष्ट करेंगे।
इस भाग में उनका
केवल संकेत पर्याप्त है, क्योंकि अभी
हमारा केन्द्र पाणिनीय कारक-संरचना है।
पद
और वाक्य के बीच तनाव
अब एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
दार्शनिक तनाव सामने आता
है।
एक ओर— पद अर्थवान
है।
दूसरी
ओर— वाक्य का अर्थ पदों
के अलग-अलग अर्थों
से पूरी तरह समझ
में नहीं आता।
तो—
प्राथमिक क्या है—पद या वाक्य?
यदि
पद प्राथमिक है, तो वाक्य
उसके अर्थों का सम्बन्ध होगा।
यदि
वाक्य प्राथमिक है, तो पद
का अर्थ भी वाक्य
के भीतर ही पूर्ण
रूप से प्रकट होगा।
यही
समस्या आगे— वाक्यैकत्व और— स्फोट जैसी धारणाओं तक
पहुँचती है।
लेकिन
अभी हम उस दार्शनिक
निष्कर्ष को स्थगित रखेंगे।
पाणिनीय
व्याकरण की संरचनात्मक दृष्टि
अब तक पाणिनीय प्रणाली
का एक नया रूप
सामने आता है।
वह केवल यह नहीं
बताती कि— कौन-सा
शब्द सही है।
वह यह भी बताती
है— कौन-सा पद
किस सम्बन्ध में है।
कौन-सी विभक्ति किस
प्रक्रिया से आई।
कौन-सा कारक किस
क्रिया से सम्बद्ध है।
कौन-सा रूप किस
अर्थ-सन्दर्भ में प्रयुक्त होता
है।
इसलिए
पाणिनीय व्याकरण को केवल— word formation system कहना बहुत छोटा
कर देना होगा।
यह एक— relational
grammatical system भी
है।
कठोर
परीक्षा — क्या कारक ही अर्थ है?
पूर्वपक्ष
- यदि कारक वाक्य में
पदों के सम्बन्ध को
निर्धारित करता है, तो
क्या हम कह सकते
हैं कि कारक ही
वाक्य का अर्थ है?
उत्तर नहीं।
कारक
अर्थ-संरचना का एक महत्त्वपूर्ण
अंग है, सम्पूर्ण वाक्यार्थ
नहीं।
उदाहरण—
“रामः वनं गच्छति।”
इसमें
कर्ता और कर्म/सम्बन्ध
की पहचान हो जाने पर
भी— “गच्छति” का पूर्ण क्रियार्थ,
काल,
पुरुष, वचन, और वाक्य
का समग्र आशय अभी शेष है।
इसलिए—
कारक वाक्यार्थ का निर्माण करता है, लेकिन अकेला वाक्यार्थ नहीं है।
कठोर परीक्षा — क्या विभक्ति ही कारक है?
पूर्वपक्ष
- प्रथमा कर्ता को और द्वितीया
कर्म को व्यक्त करती
है। इसलिए विभक्ति और कारक एक
ही होने चाहिए।
उत्तर -
यदि ऐसा होता, तो
हर प्रथमा कर्ता और हर द्वितीया
कर्म ही होती।
लेकिन
पाणिनीय प्रणाली में विभक्ति के
प्रयोग अधिक व्यापक हैं।
इसलिए—
विभक्ति रूपात्मक चिह्न है, कारक अर्थ-संबन्ध की संज्ञा है।
दोनों
के बीच सम्बन्ध है,
लेकिन पूर्ण अभिन्नता नहीं। यही पाणिनीय व्याकरण की सूक्ष्मता है।
कठोर
परीक्षा — क्या वाक्य केवल पदों का योग है?
पूर्वपक्ष
- वाक्य में जितने पद
हैं, उनके अर्थ जोड़
दीजिए—वाक्य का अर्थ मिल
जाएगा।
आपत्ति
- “रामः वनं गच्छति” में—
राम + वन + गमन का मात्र
योग पर्याप्त नहीं।
इनके
बीच— कर्ता, क्रिया, लक्ष्य/कर्म, और— काल-पुरुष-वचन का सम्बन्ध स्थापित होता है।
निष्कर्ष
वाक्य— पदों का यांत्रिक संग्रह नहीं। वह— सम्बन्धित संरचना है।
पाणिनीय
दर्शन का अगला दार्शनिक द्वार
अब तक हमारी यात्रा
इस प्रकार हो गई—
ध्वनि से— रूप फिर— शब्द फिर— पद फिर— कारक और अब— वाक्य
तक।
यह यात्रा आकस्मिक नहीं। हर चरण पिछले चरण
की सीमा को पार
करता है।
ध्वनि
अकेली पर्याप्त नहीं। शब्द बना।
शब्द
अकेला पर्याप्त नहीं। पद और सम्बन्ध आए।
पद अकेले पर्याप्त नहीं। वाक्य बना।
लेकिन
अब— - वाक्य का अर्थ किस प्रकार एक अखण्ड बोध बनता है?
यही
अगला प्रश्न है।
अगले
भाग की भूमिका — वाक्य और वाक्यार्थ
अगले
भाग में हमारी दृष्टि
व्याकरण के सबसे गहरे
क्षेत्रों में से एक
की ओर जाएगी— वाक्य।
हम पूछेंगे—
- क्या वाक्य पदों से बनता है?
- क्या पद पहले अर्थ देते हैं और फिर उनका अन्वय होता है?
- या वाक्य एक समग्र अर्थ का बोध कराता है?
- क्या वाक्य का अर्थ शब्द-शब्द करके प्राप्त होता है?
- क्या वाक्य में कोई ऐसी एकता है जो उसके अलग-अलग पदों से अधिक है?
- स्फोट की अवधारणा किस समस्या का समाधान करने का प्रयास करती है?
- भर्तृहरि का वाक्य-दर्शन पाणिनीय परम्परा से कहाँ जुड़ता है और कहाँ आगे बढ़ जाता है?
यहाँ
से श्रृंखला केवल पाणिनीय व्याकरण
की संरचना का अध्ययन नहीं
करेगी।
अब वह— व्याकरण से भाषा-दर्शन की ओर प्रवेश
करेगी।
निष्कर्ष
पाणिनीय
दृष्टि में वाक्य केवल
शब्दों की कतार नहीं।
पद अपने-अपने अर्थ
रखते हुए भी— कारक-संबन्धों और क्रिया-संरचना के भीतर
एक दूसरे से जुड़ते हैं।
इससे एक गहरी बात सामने
आती है—
अर्थ
वस्तुओं के नामों में ही नहीं, उनके सम्बन्धों में भी प्रकट होता है।
और यही पाणिनीय कारक-सिद्धान्त का दार्शनिक महत्व
है।
यदि
भाग–६ का सूत्र
था— शब्द से अर्थ की ओर।
तो भाग–७ का
सूत्र है— अर्थ से सम्बन्ध की ओर।
और अब अगला प्रश्न
अनिवार्य है—
क्या
वाक्य का अर्थ पदों के अर्थों का योग है, या वाक्य स्वयं एक अखण्ड अर्थ-बोध की सत्ता है?
यहीं
से पाणिनीय परम्परा हमें उस क्षेत्र
में ले जाएगी जहाँ—
पाणिनि
से पतञ्जलि और पतञ्जलि से भर्तृहरि तक भाषा स्वयं दर्शन का विषय बन जाती है।
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
पाणिनीय
दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–७ : पद, कारक और वाक्य — शब्द जब सम्बन्धों में प्रवेश करता है
नोट
: इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग पाणिनीय दर्शन के एक स्वतंत्र और नये पक्ष का अध्ययन करता है। पूर्ववर्ती भागों में विवेचित विषयों की अनावश्यक पुनरावृत्ति नहीं की जाएगी। अष्टाध्यायी को मूल आधार, वार्तिक और महाभाष्य को प्राथमिक व्याख्यात्मक आधार तथा परवर्ती व्याकरण-दर्शन को उसके ऐतिहासिक विकास के रूप में ग्रहण किया जाएगा। माधवाचार्यकृत सर्वदर्शनसंग्रह का उपयोग तुलनात्मक एवं ऐतिहासिक स्रोत के रूप में किया जाएगा। पाणिनि, पतञ्जलि और भर्तृहरि के सिद्धान्तों को कालक्रम और दार्शनिक विकास के अनुसार अलग-अलग रखा जाएगा; परवर्ती सिद्धान्तों को अनावश्यक रूप से पाणिनि पर आरोपित नहीं किया जाएगा।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
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