दर्शन — न्याय दर्शन भाग–५ : उपमान और शब्द — भाषा, तुलना और ज्ञान का प्रमाण
दर्शन — न्याय दर्शन
भाग–५ : उपमान और शब्द — भाषा, तुलना और ज्ञान का प्रमाण
“क्या
किसी दूसरी वस्तु से तुलना या किसी विश्वसनीय व्यक्ति के कथन से हमें वास्तविक ज्ञान मिल सकता है?”
न्याय
दर्शन की प्रमाण-यात्रा
अब एक महत्त्वपूर्ण मोड़
पर पहुँचती है।
प्रत्यक्ष
ने दिखाया कि इन्द्रिय और
वस्तु के उचित सम्बन्ध
से यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो सकता है।
अनुमान ने यह स्पष्ट
किया कि प्रत्यक्ष रूप
से उपलब्ध न होने वाली
वस्तु का ज्ञान भी
स्थापित व्याप्ति के आधार पर
सम्भव है।
लेकिन
मानव-ज्ञान की दुनिया इससे
भी बड़ी है।
हम
ऐसी वस्तुओं को पहचानते हैं
जिन्हें पहले कभी नहीं
देखा।
हम
ऐसे स्थानों, घटनाओं और वस्तुओं के
विषय में जानते हैं
जहाँ हम स्वयं उपस्थित
नहीं थे।
हम
इतिहास जानते हैं, भूगोल जानते
हैं, किसी विशेषज्ञ की
बात पर विश्वास करते
हैं और भाषा के
माध्यम से ऐसी असंख्य
बातें सीखते हैं जिन्हें स्वयं
अनुभव करना सम्भव नहीं।
यहीं
न्याय के दो अन्य
प्रमाण सामने आते हैं— उपमान
और शब्द।
उपमान
क्या है?
सामान्य
रूप में उपमान का सम्बन्ध तुलना
अथवा समानता से उत्पन्न ज्ञान
से है।
मान
लीजिए किसी व्यक्ति ने
कभी “गवय” नहीं देखा।
उसे किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बताया जाता
है—
“गवय
गाय के समान दिखने
वाला वन्य पशु है।”
बाद
में वन में उसे
गाय के समान एक
अपरिचित पशु दिखाई देता
है और उसे पूर्व
कथन का स्मरण होता
है।
वह समझता है— “यह वही
गवय है जिसके विषय
में मुझे बताया गया
था।”
यहाँ
केवल प्रत्यक्ष नहीं हुआ।
उसने
पशु को देखा अवश्य,
लेकिन उस वस्तु और पूर्व में बताए गए समानता-सम्बन्ध के माध्यम से
उसे गवय के रूप
में जाना।
न्याय
इसी विशिष्ट ज्ञान-प्रक्रिया को उपमान के रूप में
स्वीकार करता है।
क्या
उपमान केवल प्रत्यक्ष है?
यहीं
न्याय की सूक्ष्मता सामने
आती है। आलोचक कह सकता है—
“गवय
तो आँखों से दिखाई दिया।
फिर अलग प्रमाण की
आवश्यकता क्यों?”
न्याय
का उत्तर है कि वस्तु
को देख लेना और
उसे उस विशेष संज्ञा से जान लेना एक ही ज्ञान-प्रक्रिया नहीं हैं।
आँखों
ने पशु का रूप
ग्रहण किया।
लेकिन—
“यह गवय है” का
ज्ञान पूर्व में सुनी हुई
समानता और वर्तमान प्रत्यक्ष
के विशिष्ट सम्बन्ध से उत्पन्न हुआ।
इसलिए
न्याय उपमान को प्रत्यक्ष में
विलीन नहीं करता।
यहाँ
प्रमाणों की स्वतंत्रता का
प्रश्न सामने आता है।
उपमान
का मूल सम्बन्ध
उपमान
में तीन पक्षों का
सम्बन्ध महत्त्वपूर्ण है—
पूर्व
में सुना गया ज्ञान — वर्तमान समानता का प्रत्यक्ष — संज्ञा और वस्तु का सम्बन्ध।
अर्थात्
पहले किसी अपरिचित वस्तु
के बारे में एक
परिचित वस्तु से समानता बताई
जाती है।
फिर
उस वस्तु को देखकर वह
पूर्व कथन स्मरण होता
है।
और अन्ततः उस वस्तु और
उसके नाम का सम्बन्ध
जाना जाता है।
यही
उपमान की विशिष्टता है।
इसलिए
उपमान को केवल “comparison” कहना अधूरा
होगा।
यह संज्ञा-संज्ञि-सम्बन्ध के ज्ञान की एक विशिष्ट
न्यायीय प्रक्रिया है।
उपमान
और आधुनिक तुलना
आज हम किसी अपरिचित
वस्तु को समझाने के
लिए कहते हैं—
“यह
फल लगभग अमुक फल
जैसा है।”
या—
“यह उपकरण उस पुराने उपकरण
की तरह काम करता
है।”
यह भी तुलना का
प्रयोग है।
लेकिन
हर आधुनिक comparison को न्याय का
उपमान नहीं कहा जा
सकता।
न्याय
का उपमान एक विशिष्ट प्रमाणमीमांसात्मक
अर्थ रखता है।
उसका
लक्ष्य केवल किसी चीज
को आसान भाषा में
समझाना नहीं, बल्कि अपरिचित वस्तु और उसके नाम के सम्बन्ध का यथार्थ ज्ञान उत्पन्न करना है।
इसलिए
आधुनिक analogy और न्यायीय उपमान
में कुछ संवाद अवश्य
सम्भव है, पर दोनों
को पूर्णतः समान मानना उचित
नहीं।
अब
प्रश्न शब्दप्रमाण का
उपमान
के बाद न्याय हमें
एक और अत्यन्त गहरे
प्रश्न तक ले जाता
है—
क्या
भाषा स्वयं ज्ञान का प्रमाण हो सकती है?
मनुष्य
अपने जीवन का बहुत
बड़ा हिस्सा स्वयं देखकर नहीं जानता।
हम जानते हैं कि किसी
दूसरे देश में क्या
हुआ।
हम इतिहास की घटनाओं को
जानते हैं।
हम किसी दूरस्थ स्थान
का भूगोल जानते हैं।
हम किसी विशेषज्ञ से
किसी जटिल विषय की
जानकारी प्राप्त करते हैं।
हम अपने माता-पिता,
शिक्षक, चिकित्सक, वैज्ञानिक, ग्रंथ और परम्परा से
असंख्य बातें सीखते हैं।
यदि
प्रत्येक ज्ञान के लिए स्वयं
प्रत्यक्ष अनुभव आवश्यक हो, तो मानव
ज्ञान का बहुत बड़ा
भाग असम्भव हो जाएगा।
न्याय
इसलिए शब्द को स्वतंत्र प्रमाण
के रूप में स्वीकार
करता है।
शब्दप्रमाण
क्या है?
न्याय
के अनुसार आप्तोपदेशः शब्दः—विश्वसनीय आप्त के उपदेश
को शब्दप्रमाण के रूप में
स्वीकार किया जाता है।
यहाँ
दो बातें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं— वक्ता का आप्त होना।
और—
उसका यथार्थ कथन करना।
इसलिए
न्याय में हर बोले
गए शब्द को प्रमाण
नहीं माना जाता।
यदि
कोई व्यक्ति अज्ञानी है, स्वयं भ्रमित
है अथवा जानबूझकर असत्य
कह रहा है, तो
उसका कथन अपने-आप
प्रमाण नहीं बन जाता।
शब्दप्रमाण
के पीछे विश्वसनीयता का प्रश्न अनिवार्य
है।
आप्त
कौन है?
आप्त
वह है जो वस्तु
को यथार्थ रूप में जानता
है और उसे यथार्थ
रूप में बताता है।
इसलिए
आप्तता के दो महत्त्वपूर्ण
पक्ष हैं— यथार्थ ज्ञान और यथार्थ कथन।
केवल
विद्वान होना पर्याप्त नहीं।
यदि
किसी व्यक्ति को विषय का
ज्ञान है लेकिन वह
जानबूझकर गलत सूचना देता
है, तो उसका कथन
प्रमाण नहीं होगा।
और यदि कोई व्यक्ति
सत्य बोलना चाहता है लेकिन स्वयं
विषय को नहीं जानता,
तब भी उसके कथन
की प्रमाणिकता संदिग्ध होगी।
इसलिए
न्याय में शब्दप्रमाण के
पीछे वक्ता की ज्ञान-संपन्नता और सत्याभिसंधि दोनों महत्त्वपूर्ण हैं।
क्या
वैदिक शब्द भी शब्दप्रमाण है?
न्याय
परम्परा में शब्दप्रमाण का
क्षेत्र लौकिक और वैदिक दोनों
प्रकार के वचनों तक
जाता है।
एक ओर किसी योग्य
मनुष्य का विश्वसनीय कथन
है— लौकिक शब्द।
दूसरी
ओर वेद का प्रामाण्य
है— वैदिक शब्द।
न्याय
की उत्तरवर्ती परम्परा में ईश्वर और
वेद के सम्बन्ध को
लेकर भी विस्तृत दार्शनिक
तर्क विकसित हुए।
लेकिन
यहाँ एक ऐतिहासिक अन्तर
आवश्यक है।
प्रारम्भिक
न्यायसूत्र, वात्स्यायन, उद्योतकर और उत्तरवर्ती न्यायाचार्यों
में शब्दप्रमाण की व्याख्या को
एक ही स्तर पर
रख देना उचित नहीं
होगा।
इसी
प्रकार नव्य-न्याय की अत्यन्त तकनीकी
भाषा को गौतम के
मूल न्यायसूत्र की भाषा नहीं
मानना चाहिए।
शब्द
प्रमाण क्यों है?
अब मूल प्रश्न— दूसरे
के कथन से ज्ञान प्रमाणिक कैसे हो जाता है?
न्याय
का उत्तर है—
यदि
वक्ता वस्तु को यथार्थ जानता
है और सत्य बताने
की इच्छा से उसका कथन
करता है, तो उसका
वचन ज्ञान उत्पन्न कर सकता है।
उदाहरण—
कोई व्यक्ति किसी दूरस्थ नगर
से लौटकर बताता है—
“उस
नगर में अमुक नदी
बहती है।”
यदि
वह उस नगर को
जानता है और सत्य
कह रहा है, तो
उसका कथन उस व्यक्ति
के लिए उस नदी
का ज्ञान उत्पन्न कर सकता है
जिसने स्वयं उसे नहीं देखा।
यहाँ
ज्ञान का साधन प्रत्यक्ष
नहीं है। न ही वह अनुमान
है।
यह शब्दप्रमाण है।
क्या
शब्दप्रमाण अन्धविश्वास है?
नहीं।
यही
न्याय और अन्धविश्वास के
बीच एक महत्त्वपूर्ण अन्तर
है।
अन्धविश्वास
में कथन को केवल
इसलिए सत्य मान लिया
जाता है कि किसी
ने कह दिया।
न्याय
में प्रश्न उठता है—
किसने
कहा?
क्या
वह विषय को जानता है?
क्या
वह सत्य कह रहा है?
कथन
किस अर्थ में है?
वाक्य
से वह ज्ञान कैसे उत्पन्न हुआ?
अर्थात्
न्याय शब्द को प्रमाण
मानता है, लेकिन बिना
शर्त विश्वास को प्रमाण नहीं मानता।
शब्द
और भाषा का सम्बन्ध
शब्दप्रमाण
की समस्या केवल वक्ता तक
सीमित नहीं।
एक वाक्य से ज्ञान उत्पन्न
होने के लिए शब्दों
का अर्थबोध और उनका परस्पर
सम्बन्ध भी आवश्यक है।
यदि
कोई व्यक्ति कुछ शब्द बोल
दे, लेकिन वे किसी व्यवस्थित
वाक्यार्थ का निर्माण ही
न करें, तो ज्ञान कैसे
उत्पन्न होगा?
इसलिए
न्याय की भाषा-दृष्टि
में— शब्द — अर्थ — वाक्य — वक्ता — श्रोता
के बीच सम्बन्ध महत्त्वपूर्ण
हो जाता है।
शब्दप्रमाण
हमें धीरे-धीरे एक
गहरे प्रश्न तक ले जाता
है— भाषा वस्तु का ज्ञान कैसे कराती है?
यही
प्रश्न आगे भारतीय दर्शन
की विभिन्न परम्पराओं में अत्यन्त गम्भीर
विवाद का विषय बना।
शब्द
और वेद
न्याय
की दृष्टि में वैदिक वचन
की प्रमाणिकता का प्रश्न केवल
धार्मिक विश्वास का विषय नहीं
है।
यह ज्ञानमीमांसा का प्रश्न भी
है— वेद प्रमाण क्यों है?
उत्तरवर्ती
न्याय में ईश्वर की
भूमिका इस प्रश्न के
समाधान से जोड़ी गई।
न्याय-परम्परा के अनुसार वेद
का प्रामाण्य ईश्वर के सर्वज्ञत्व और
विश्वसनीयता के साथ सम्बन्धित
किया गया।
लेकिन
यहाँ भी इसे पूरे
न्याय दर्शन की आरम्भ से
अन्त तक एक ही
रूप में उपस्थित धारणा
नहीं मानना चाहिए।
ईश्वर-सिद्धि और वेदप्रामाण्य का व्यवस्थित विकास
उत्तरवर्ती न्याय में विशेष रूप
से दिखाई देता है।
इसका
विस्तार आगे ईश्वर-विचार वाले भाग में
किया जाएगा।
शब्दप्रमाण
और आधुनिक ज्ञान
आज हमारा अधिकांश ज्ञान किसी न किसी
रूप में testimony पर आधारित है।
हम समाचार पढ़ते हैं। वैज्ञानिकों की रिपोर्ट स्वीकार
करते हैं। किसी चिकित्सक की विशेषज्ञ राय
लेते हैं।
मानचित्रों
पर भरोसा करते हैं। किसी विश्वविद्यालय
या शोध-संस्था द्वारा
प्रकाशित जानकारी स्वीकार करते हैं।
हमने
इन सबका प्रत्यक्ष परीक्षण
स्वयं नहीं किया होता।
फिर
भी हमारा ज्ञान सम्भव होता है।
इस अर्थ में न्याय
का शब्दप्रमाण आधुनिक ज्ञान-संस्कृति के लिए एक
महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न उठाता है—
विश्वास
और ज्ञान में अन्तर क्या है?
किसी
स्रोत पर भरोसा करना
तभी ज्ञान का साधन बन
सकता है जब उसकी
विश्वसनीयता का उचित आधार
हो।
इसलिए
आज के fake news,
misinformation और
AI-generated information के
युग में न्याय का
यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक
हो गया है— किसे
प्रमाण मानें?
क्या
AI का उत्तर शब्दप्रमाण हो सकता है?
यह आधुनिक प्रश्न न्याय की कसौटी पर
विशेष रोचक है।
यदि
कोई AI किसी तथ्य के
बारे में उत्तर देता
है, तो केवल इसलिए
कि उसने आत्मविश्वास से
उत्तर दिया, वह आप्तवचन नहीं बन जाता।
न्यायीय
कसौटी पर हमें पूछना
होगा— ज्ञान का स्रोत क्या है?
उत्तर
की सत्यता कैसे जाँची जा सकती है?
क्या
स्रोत विश्वसनीय है?
क्या
कथन सत्याभिसंधि और यथार्थ ज्ञान पर आधारित है?
इसलिए
AI द्वारा दिया गया प्रत्येक
उत्तर स्वतः शब्दप्रमाण नहीं माना जा
सकता।
उसे
स्वतंत्र प्रमाणों से सत्यापित करना
होगा।
यह आधुनिक परिस्थिति न्याय के शब्दप्रमाण को
एक नई प्रयोगभूमि देती
है।
चार
प्रमाणों की यात्रा पूर्ण
अब न्याय के चार प्रमाण
हमारे सामने हैं—
प्रत्यक्ष
— अनुमान — उपमान — शब्द।
प्रत्यक्ष
हमें वस्तु के प्रत्यक्ष ज्ञान
की ओर ले गया।
अनुमान
ने अप्रत्यक्ष वस्तु तक पहुँचने की
पद्धति दी।
उपमान
ने समानता के माध्यम से
अपरिचित वस्तु और उसकी संज्ञा
के सम्बन्ध को समझाया।
शब्द
ने विश्वसनीय वचन से ज्ञान
की सम्भावना स्थापित की।
लेकिन
अब एक और प्रश्न
सामने आता है।
यदि
प्रमाण उपलब्ध हैं, तो क्या
मनुष्य तुरन्त निर्णय तक पहुँच जाता
है? - नहीं।
मनुष्य
अक्सर पहले संशय में होता है।
फिर
किसी विषय में उसकी
रुचि या प्रयोजन उत्पन्न
होता है।
वह दृष्टान्त खोजता है। सिद्धान्त निर्धारित करता है। तर्क करता
है।
और अन्ततः निर्णय तक पहुँचता है।
अर्थात्
न्याय का ज्ञानशास्त्र केवल
प्रमाणों की सूची नहीं
है।
उसके
बाद एक पूरी ज्ञान-प्रक्रिया चलती है।
अगले
भाग की ओर
अब तक हमने जाना—
प्रमाण यथार्थ ज्ञान का साधन है।
लेकिन
व्यवहार में ज्ञान की
यात्रा हमेशा इतनी सीधी नहीं
होती।
कई बार हमारे सामने
दो सम्भावनाएँ होती हैं—
“यह
मनुष्य है या कोई
मूर्ति?”
“दूर
दिखाई देने वाली वस्तु
वृक्ष है या मनुष्य?”
“यह
शब्द इस अर्थ में
प्रयुक्त हुआ है या
उस अर्थ में?”
यहाँ
संशय उत्पन्न होता है।
संशय
के बाद ही वास्तविक
जिज्ञासा और परीक्षण की
आवश्यकता जन्म लेती है।
यहीं
से न्याय की अगली विशिष्ट
संरचना सामने आती है—
संशय
→ प्रयोजन → दृष्टान्त → सिद्धान्त → अवयव → तर्क → निर्णय।
अगला
प्रश्न इसलिए होगा— “सन्देह से निश्चित ज्ञान तक पहुँचने की न्यायिक प्रक्रिया क्या है?”
यहीं
न्याय का तर्कशास्त्र अपनी
व्यवस्थित संरचना में प्रवेश करेगा।
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
न्याय
दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–५ : उपमान और शब्द — भाषा, तुलना और ज्ञान का प्रमाण
नोट
: इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग पिछले भाग से आगे बढ़ते हुए न्याय दर्शन के एक नये दार्शनिक पक्ष को सामने लाता है। अनावश्यक पुनरावृत्ति से बचते हुए प्रत्येक भाग को स्वतंत्र भी रखा गया है और सम्पूर्ण श्रृंखला से जोड़ा भी गया है। प्रारम्भिक न्याय, उत्तरवर्ती न्याय तथा नव्य-न्याय के मतों को जहाँ आवश्यक हो, ऐतिहासिक रूप से अलग रखा जाएगा।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
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