दर्शन - पाणिनीय दर्शन भाग–३ शब्द की रचना — प्रकृति, प्रत्यय और पाणिनीय शब्दमीमांसा

 पाणिनीय दर्शन

भाग–३

शब्द की रचना — प्रकृति, प्रत्यय और पाणिनीय शब्दमीमांसा

क्या शब्द पहले से विद्यमान है, या व्याकरणीय प्रक्रिया से उसका रूप प्रकट होता है?

पिछले भाग में हमने अष्टाध्यायी की बाहरी नहीं, बल्कि उसकी आन्तरिक स्थापत्य-व्यवस्था को समझने का प्रयास किया था। वहाँ संज्ञा, अधिकार, अनुवृत्ति, परिभाषात्मक व्यवस्था और नियमों के पारस्परिक सम्बन्ध के माध्यम से यह स्पष्ट हुआ कि पाणिनीय व्याकरण अलग-अलग सूत्रों का संग्रह नहीं, बल्कि एक कार्यशील नियम-तन्त्र है।

अब उसी व्यवस्था के भीतर प्रवेश करते हुए प्रश्न बदलता है।

यदि भाषा नियमों से व्यवस्थित है, तो—

शब्द बनता कैसे है?

हम “शब्द” को सामान्यतः एक तैयार वस्तु की तरह देखते हैं। “पठति”, “गच्छति”, “रामः”, “ग्रामम्”—ये सब हमें पूर्ण शब्द दिखाई देते हैं।

लेकिन पाणिनीय दृष्टि इस तैयार रूप के पीछे की प्रक्रिया को देखने लगती है।

किसी रूप में—

धातु है,

प्रकृति है,

प्रत्यय है,

विभक्ति है,

और अनेक स्थितियों में ध्वनि तथा रूप-परिवर्तन की प्रक्रियाएँ हैं।

इसलिए इस भाग का मूल प्रश्न केवल व्याकरणिक नहीं, दार्शनिक भी है—

क्या शब्द एक पूर्वस्थित सत्ता है, या व्याकरणीय प्रक्रिया के द्वारा उसका रूप सिद्ध होता है?

यहाँ से पाणिनीय शब्दमीमांसा का प्रथम वास्तविक द्वार खुलता है।


१. शब्द को तैयार वस्तु मानने की समस्या

यदि हम “पठति” शब्द को देखें तो सामान्य अनुभव में हमें एक ही शब्द दिखाई देता है।

लेकिन व्याकरणाचार्य के लिए यह प्रश्न उठता है—

यह रूप बना कैसे?

क्या “पठति” अपने वर्तमान रूप में प्रारम्भ से ही मौजूद था?

या किसी आधार से इसकी सिद्धि हुई?

पाणिनीय व्याकरण का पूरा रूपनिर्माण-तन्त्र इस दूसरे प्रश्न की ओर संकेत करता है।

व्याकरण का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं कि—

“पठति सही है।”

बल्कि यह भी समझना है कि—

यह रूप किस व्याकरणिक प्रक्रिया से सिद्ध होता है।

इस प्रकार शब्द एक स्थिर वस्तु के बजाय—

सिद्ध होने वाली संरचना

के रूप में सामने आता है।

यहाँ “सिद्धि” शब्द केवल व्याकरणिक तकनीक नहीं; आगे चलकर यह हमारे दार्शनिक प्रश्नों के लिए भी महत्त्वपूर्ण होगा।


२. प्रकृति और प्रत्यय — निर्माण की दो दिशाएँ

पाणिनीय व्याकरण में शब्दरचना को समझने के लिए प्रकृति और प्रत्यय की संकल्पनाएँ अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।

सरल रूप में कहा जाए तो—

प्रकृति वह आधार है जिस पर प्रत्यय आदि प्रक्रियाएँ कार्य करती हैं।

और—

प्रत्यय वह व्याकरणिक घटक है जो उस आधार से विशिष्ट रूप या अर्थ-संबन्धी संरचना निर्मित करने में योगदान करता है।

लेकिन यहाँ भी हमें अत्यन्त सावधानी चाहिए।

प्रकृति और प्रत्यय को केवल “शब्द के दो टुकड़े” समझ लेना पाणिनीय व्यवस्था का पर्याप्त वर्णन नहीं है।

वे व्याकरणिक विश्लेषण की—

कार्यशील इकाइयाँ

हैं।

उनकी सहायता से भाषा के विविध रूपों को व्यवस्थित ढंग से समझा जाता है।


३. धातु — क्रिया-रूपों की आधारभूमि

क्रियापदों की व्याख्या में धातु की भूमिका विशेष है।

अष्टाध्यायी में धातुओं से विभिन्न क्रियारूपों की सिद्धि के लिए तिङ्-प्रत्यय आदि की व्यवस्था है।

उदाहरण के लिए—

पठ्

से संबंधित क्रियारूपों की सिद्धि में विभिन्न व्याकरणिक प्रक्रियाएँ सक्रिय होती हैं।

यहाँ हमारा उद्देश्य अभी “पठति” की पूरी प्रक्रिया का तकनीकी भाष्य करना नहीं है। वह इस भाग की सीमा से बाहर चला जाएगा।

हम केवल उस बिन्दु को पकड़ना चाहते हैं जहाँ पाणिनीय दृष्टि कहती हुई दिखाई देती है—

एक भाषिक रूप के पीछे कोई संरचनात्मक आधार खोजा जा सकता है।

इससे भाषा को समझने की दृष्टि बदल जाती है।

शब्द अब केवल सुनाई देने वाला रूप नहीं रहता।

वह—

एक व्याकरणिक इतिहास

रखने लगता है।


४. प्रातिपदिक और नामरूप

क्रियापदों के अतिरिक्त नामपदों की रचना भी पाणिनीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

यहाँ प्रातिपदिक की संकल्पना सामने आती है।

प्रातिपदिक से आगे सुप्-प्रत्ययादि के माध्यम से विभक्तिरूपों की सिद्धि होती है।

उदाहरण के लिए किसी नामपद का—

प्रथमा,

द्वितीया,

तृतीया,

आदि रूप केवल शब्दकोश में अलग-अलग स्वतंत्र शब्दों के रूप में नहीं समझे जाते।

वे एक व्याकरणिक आधार और उसके ऊपर कार्य करने वाली प्रत्यय-व्यवस्था से सम्बद्ध होते हैं।

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—

पाणिनीय व्याकरण में शब्द का रूप उसके व्याकरणिक सम्बन्धों से अलग नहीं है।

यह विचार आगे कारक और वाक्य-संरचना के अध्ययन में और गहरा होगा; अभी हम इसे केवल शब्द-निर्माण के स्तर पर ग्रहण कर रहे हैं।


५. प्रत्यय केवल जोड़ने वाली वस्तु नहीं

प्रत्यय को यदि हम केवल—

“शब्द के पीछे लगने वाला अंश”

समझ लें तो पाणिनीय व्यवस्था का दार्शनिक पक्ष छूट जाएगा।

प्रत्यय रूप के साथ-साथ व्याकरणिक कार्य करता है।

वह किसी आधार को किसी विशिष्ट श्रेणी में ला सकता है।

कहीं वह क्रिया-रूप का निर्माण करता है, कहीं नामरूप का, कहीं कृदन्त या तद्धित संरचना का।

इसलिए प्रत्यय का महत्त्व केवल ध्वन्यात्मक नहीं है।

वह—

रूप, व्याकरणिक सम्बन्ध और अर्थ-संकेत

के बीच एक सेतु का कार्य कर सकता है।

इसीलिए पाणिनीय शब्दमीमांसा में प्रत्यय को केवल “अन्त में जुड़ने वाला हिस्सा” कहना अपर्याप्त है।


६. “शब्द” और “रूप” में अन्तर

यहाँ एक सूक्ष्म भेद सामने आता है।

हम जब किसी शब्द को देखते हैं तो उसके दो पक्ष अलग किए जा सकते हैं—

पहला

उसका रूप

दूसरा

उसका अर्थ

उदाहरणतः “गच्छति” का एक निश्चित ध्वन्यात्मक और रूपात्मक स्वरूप है।

लेकिन वह केवल ध्वनि-समूह नहीं।

उससे एक क्रियात्मक अर्थ का बोध होता है।

पाणिनीय व्याकरण का बड़ा भाग रूप की सिद्धि पर केन्द्रित है, लेकिन रूप की यह व्यवस्था अर्थ से पूरी तरह असम्बद्ध नहीं है।

यही वह बिन्दु है जहाँ व्याकरण आगे चलकर दर्शन के निकट आता है।

फिर भी हमें दोनों स्तरों को मिलाना नहीं चाहिए।

रूप-सिद्धि का व्याकरणिक प्रश्न

और

शब्द-अर्थ सम्बन्ध का दार्शनिक प्रश्न

एक ही चीज नहीं हैं।

दूसरा प्रश्न भाग–८ में स्वतंत्र रूप से सामने आएगा।


७. शब्द की रचना और “सत्ता” का प्रश्न

अब हम एक गहरे प्रश्न के निकट पहुँचते हैं।

यदि किसी शब्द का रूप प्रकृति, प्रत्यय और अन्य प्रक्रियाओं से सिद्ध होता है, तो—

वास्तविक शब्द कौन-सा है?

क्या वह मूल प्रकृति है?

क्या प्रत्यय से बना नया रूप शब्द है?

क्या दोनों का सम्बन्ध ही शब्द है?

या अन्ततः जो रूप प्रयोग में आता है, वही शब्द है?

पाणिनीय व्याकरण का उद्देश्य सीधे इस metaphysical प्रश्न का समाधान देना नहीं है।

इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए कि हम व्याकरणिक विश्लेषण से तुरन्त कोई ontological सिद्धान्त न निकालें।

लेकिन व्याकरण हमें एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक समस्या अवश्य देता है—

जो वस्तु हमें एक दिखाई देती है, उसके भीतर कितनी संरचनात्मक परतें हो सकती हैं?

यह प्रश्न केवल भाषा तक सीमित नहीं है।


८. प्रकृति और विकार

शब्दरचना में एक आधार से रूप के परिवर्तन की प्रक्रिया दिखाई देती है।

एक स्थिति में जो रूप है, दूसरी स्थिति में वह परिवर्तित हो सकता है।

यहाँ—

प्रकृति

और—

विकार/रूपपरिवर्तन

का प्रश्न उठता है।

किन्तु पाणिनीय प्रणाली को सांख्य के प्रकृति-तत्त्व के साथ सीधे जोड़ देना अनुचित होगा।

यहाँ “प्रकृति” व्याकरणिक तकनीकी संदर्भ में है।

इसलिए—

पाणिनीय प्रकृति ≠ सांख्य की प्रकृति

यह अन्तर हमेशा स्मरण में रखना चाहिए।

फिर भी यह समान शब्द एक रोचक दार्शनिक सावधानी सिखाता है—

एक ही शब्द अलग शास्त्रों में अलग तात्त्विक भूमिका निभा सकता है।

शास्त्रार्थ में शब्द-साम्य को सिद्धान्त-साम्य मान लेना बड़ी भूल हो सकती है।


९. रूप-सिद्धि — परिवर्तन नहीं, नियंत्रित परिवर्तन

किसी शब्द का रूप बदलता है तो वह परिवर्तन मनमाना नहीं होता।

पाणिनीय प्रणाली में परिवर्तन—

नियम-निर्धारित

होता है।

यही कारण है कि शब्दरचना में हमें एक प्रकार की प्रक्रिया दिखाई देती है—

आधार → प्रत्यय/प्रक्रिया → परिवर्तन → सिद्ध रूप।

यह क्रम हमें भाषा की एक विशेष छवि देता है।

भाषा में परिवर्तन है, लेकिन—

अनियमित परिवर्तन नहीं।

विविधता है, लेकिन—

नियमबद्ध विविधता।

यही बात भाग–२ की “व्यवस्था” को अब शब्द के स्तर पर मूर्त करती है।

भाग–२ में हमने देखा था कि पाणिनि ने नियमों की प्रणाली बनाई।

भाग–३ में हम देख रहे हैं कि वही प्रणाली—

शब्द के रूप को सिद्ध करने में कार्य करती है।


१०. प्रत्यय और अर्थ का सम्बन्ध

अब एक कठिन प्रश्न।

यदि प्रत्यय शब्दरचना में योगदान करता है, तो क्या वह अर्थ में भी योगदान करता है?

कई व्याकरणिक प्रक्रियाओं में प्रत्यय किसी विशेष अर्थ-संबन्धी स्थिति को व्यक्त करने में सहायक होता है।

लेकिन यहाँ भी सावधानी चाहिए।

प्रत्यय को स्वतन्त्र “अर्थ की वस्तु” मानना और उसके व्याकरणिक कार्य को समझना एक बात नहीं है।

पाणिनीय प्रणाली में—

रूप,

व्याकरणिक वर्गीकरण,

और—

अर्थ-सापेक्ष प्रयोग

परस्पर जुड़े हुए हैं।

इसलिए शब्द-निर्माण को केवल ध्वनि जोड़ने की प्रक्रिया मानना गलत होगा।

शब्दरचना में—

रूप और अर्थ के बीच सम्बन्ध की एक प्रारम्भिक संरचना

दिखाई देती है।

लेकिन शब्द और अर्थ का पूर्ण दार्शनिक सम्बन्ध अभी स्थगित रहेगा।


११. पाणिनीय शब्दमीमांसा में “अर्थ” की सीमा

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण शोध-सावधानी आवश्यक है।

यदि पाणिनीय व्याकरण किसी रूप की सिद्धि करता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि पाणिनि ने उसी स्थान पर—

“अर्थ क्या है?”

का पूर्ण दार्शनिक सिद्धान्त भी दे दिया।

अष्टाध्यायी का मुख्य प्रयोजन व्याकरणिक है।

इसलिए जहाँ हम “अर्थ” की चर्चा करते हैं, वहाँ हमें यह भेद रखना होगा—

व्याकरणिक अर्थ

किसी रूप या प्रत्यय का वह कार्य-सापेक्ष अर्थ-सूचक योगदान जिसे व्याकरणिक नियम में ग्रहण किया जाता है।

दार्शनिक अर्थ

शब्द किस प्रकार वस्तु, ज्ञान या बोध से सम्बद्ध होता है—यह व्यापक प्रश्न।

पहला प्रश्न पाणिनीय व्याकरण की आन्तरिक संरचना में आता है।

दूसरा प्रश्न आगे व्याकरण-दर्शन का स्वतंत्र क्षेत्र बनता है।

यह विभाजन इस पूरी श्रृंखला की scholarly integrity के लिए आवश्यक है।


१२. शब्द की रचना और पहचान

एक और रोचक प्रश्न है—

यदि शब्द अनेक व्याकरणिक प्रक्रियाओं से सिद्ध होता है, तो हम उसे पहचानते कैसे हैं?

मान लीजिए किसी रूप में परिवर्तन हुआ।

फिर भी हम उसे उसी शब्द-परिवार से सम्बन्धित पहचान लेते हैं।

यह पहचान केवल ध्वनि की समानता से नहीं होती।

हम उसके—

मूल,

प्रत्यय,

व्याकरणिक वर्ग,

और प्रयोग

को भी पहचानते हैं।

इससे भाषा में एक प्रकार की—

संरचनात्मक पहचान

का विचार सामने आता है।

यह विचार आगे बहुत महत्त्वपूर्ण होगा, क्योंकि जब हम शब्द और वाक्य के अर्थ की ओर जाएँगे, तब प्रश्न उठेगा—

क्या अर्थ भी ऐसी ही संरचनात्मक प्रक्रिया से पहचाना जाता है?

अभी उसका उत्तर नहीं।

अभी हमने केवल प्रश्न की भूमि तैयार की है।


१३. शब्द-निर्माण में व्याकरण की सक्रिय भूमिका

सामान्य अनुभव में हम कह सकते हैं—

“भाषा पहले से है और व्याकरण बाद में उसे समझाता है।”

यह बात एक सीमा तक सही है।

भाषा का व्यवहार व्याकरण-ग्रन्थ से पहले भी होता है।

लेकिन पाणिनीय व्याकरण उस व्यवहार के भीतर नियमित रूपों को पहचानकर एक ऐसी प्रणाली बनाता है जिसमें रूप-सिद्धि को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है।

इसलिए यहाँ दो स्तर हैं—

भाषिक प्रयोग

मनुष्य भाषा का व्यवहार करता है।

व्याकरणिक विश्लेषण

व्याकरण उस व्यवहार के रूप-संरचनात्मक नियमों को व्यवस्थित करता है।

इस अन्तर को समझना आवश्यक है।

पाणिनि भाषा के निर्माता नहीं हैं।

वे—

भाषिक रूपों की व्यवस्था के महान विश्लेषक और सूत्रकार

हैं।


१४. क्या व्याकरण शब्द बनाता है?

यह प्रश्न जानबूझकर थोड़ा उग्र रूप में पूछना उपयोगी है—

क्या पाणिनि व्याकरण के द्वारा शब्द बनाते हैं?

उत्तर होगा—

व्याकरणिक दृष्टि से शब्दरूप की सिद्धि की जाती है; लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बोलचाल की भाषा में अस्तित्व रखने वाले प्रत्येक शब्द का निर्माण पाणिनि ने किया।

व्याकरण—

रूप-सिद्धि की प्रक्रिया को निरूपित करता है।

इसलिए “शब्द बनाना” और “शब्द की व्याकरणिक सिद्धि समझाना” एक नहीं हैं।

यह अन्तर आगे भाग–१३ में आधुनिक generative grammar से तुलना करते समय भी अत्यन्त उपयोगी होगा।


१५. शब्द की आन्तरिक परतें

अब तक की चर्चा से एक शब्द की एक सम्भावित संरचना इस प्रकार दिखाई देती है—

आधार

प्रकृति

प्रत्यय/व्याकरणिक प्रक्रिया

रूपपरिवर्तन

सिद्ध रूप

लेकिन इस क्रम को हर शब्द पर एक ही साँचे की तरह आरोपित नहीं किया जा सकता।

पाणिनीय व्याकरण में अनेक प्रकार की प्रक्रियाएँ और अपवादात्मक स्थितियाँ हैं।

इसलिए इसे—

व्याख्यात्मक मॉडल

के रूप में समझना चाहिए, न कि हर शब्द के लिए एक ही यांत्रिक सूत्र के रूप में।

यही पाणिनीय प्रणाली की वास्तविक जटिलता है।


१६. शब्दमीमांसा का दार्शनिक प्रश्न

अब इस भाग का मूल दार्शनिक प्रश्न और स्पष्ट हो सकता है।

यदि किसी शब्द का वर्तमान रूप—

प्रकृति,

प्रत्यय,

परिवर्तन,

और नियम

से सिद्ध होता है, तो—

उस शब्द की वास्तविक पहचान कहाँ है?

क्या वह उसके ध्वनि-रूप में है?

क्या उसके निर्माण की प्रक्रिया में?

क्या उसके अर्थ में?

या—

इन सभी के सम्बन्ध में?

पाणिनि स्वयं इस प्रश्न का आधुनिक metaphysical भाषा में उत्तर नहीं देते।

इसलिए इस प्रश्न को पाणिनि पर थोपना उचित नहीं।

लेकिन पाणिनीय व्याकरण का विश्लेषण हमें यह प्रश्न पूछने की बौद्धिक क्षमता देता है।

यही इस भाग का दार्शनिक महत्व है।


१७. कठोर परीक्षा — क्या प्रकृति और प्रत्यय से “शब्द” सिद्ध हो जाता है?

पूर्वपक्ष

यदि शब्द की रचना प्रकृति और प्रत्यय से समझाई जा सकती है, तो शब्द के बारे में दार्शनिक समस्या समाप्त हो जाती है।

हम जानते हैं कि शब्द कैसे बना।

आपत्ति

लेकिन “कैसे बना?” और “वास्तव में क्या है?” एक ही प्रश्न नहीं हैं।

किसी वस्तु की संरचना जान लेने से उसकी सत्ता का अंतिम प्रश्न समाप्त नहीं होता।

उदाहरण के लिए किसी वाक्य का व्याकरणिक निर्माण समझ लेने से यह अभी सिद्ध नहीं होता कि—

उसका अर्थ-बोध कैसे उत्पन्न हुआ।

समाधान

इसलिए—

प्रकृति–प्रत्यय विश्लेषण शब्दरूप की व्याकरणिक संरचना को स्पष्ट करता है; शब्द की पूर्ण दार्शनिक सत्ता को नहीं।

यही विभाजन आगे हमें शब्द-अर्थ और वाक्य-बोध की ओर ले जाएगा।


१८. इस भाग का वास्तविक दार्शनिक योगदान

इस भाग का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह नहीं है कि—

“शब्द प्रकृति और प्रत्यय से बनता है।”

यह तो व्याकरणिक स्तर की बात है।

इस भाग की गहरी उपलब्धि यह है कि—

पाणिनीय व्याकरण हमें शब्द को उसकी सतही ध्वनि से पीछे हटकर उसकी संरचना में देखने की दृष्टि देता है।

हम अब शब्द को केवल सुनते नहीं।

हम पूछते हैं—

उसका आधार क्या है?

उसकी संरचना क्या है?

कौन-सी प्रक्रिया सक्रिय हुई?

कौन-सा रूप क्यों सिद्ध हुआ?

यह—

रूप के पीछे नियम

को देखने की दृष्टि है।

और यहीं से पाणिनीय दर्शन की अगली सम्भावना जन्म लेती है।


१९. भाग–१, भाग–२ और भाग–३ की दार्शनिक कड़ी

तीनों भागों को एक साथ देखें तो एक स्पष्ट क्रम बनता है।

भाग–१

प्रश्न था—

क्या व्याकरण दर्शन हो सकता है?

भाग–२

हमने देखा—

अष्टाध्यायी एक व्यवस्थित नियम-तन्त्र है।

भाग–३

अब वही नियम-तन्त्र—

शब्दरूप की सिद्धि

पर कार्य करता दिखाई दिया।

अर्थात् हमारी यात्रा अब—

दर्शन की सम्भावना

से

व्यवस्था

और फिर—

शब्दरचना

तक पहुँच गई है।

अगला चरण इससे स्वाभाविक रूप से आगे निकलेगा।

यदि शब्द किसी संरचना से सिद्ध होता है, तो—

उस संरचना की सबसे सूक्ष्म आधारभूत सामग्री क्या है?

यह प्रश्न हमें—

वर्ण और ध्वनि

की ओर ले जाएगा।


२०. अगले भाग की दार्शनिक कड़ी

भाग–४ में हम प्रकृति, प्रत्यय और शब्दरचना को दोहराएँगे नहीं।

वहाँ प्रश्न पूरी तरह बदल जाएगा—

शब्द की ध्वन्यात्मक आधारभूमि क्या है?

पाणिनि ने ध्वनियों को किस प्रकार व्यवस्थित किया?

शिवसूत्रों का उद्देश्य क्या है?

प्रत्याहार किस प्रकार एक विशाल ध्वनि-सामग्री को संक्षिप्त संकेत में बदलते हैं?

इत्-संज्ञा का कार्य क्या है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या पाणिनीय ध्वनि-विज्ञान केवल उच्चारण-विज्ञान है, या भाषा की औपचारिक संरचना का एक गहरा सिद्धान्त भी प्रस्तुत करता है?

यह होगा अगले भाग का नया प्रश्न।


निष्कर्ष

शब्द हमारे सामने तैयार रूप में आता है।

हम उसे बोलते हैं, सुनते हैं, लिखते हैं और उसका अर्थ ग्रहण करते हैं।

लेकिन पाणिनीय दृष्टि उस तैयार रूप के भीतर प्रवेश करती है।

वह पूछती है—

यह रूप कैसे सिद्ध हुआ?

प्रकृति क्या है?

प्रत्यय क्या करता है?

धातु किस प्रकार क्रियारूपों की आधारभूमि बनती है?

प्रातिपदिक किस प्रकार नामरूपों की संरचना में आता है?

और इन सबके पीछे—

नियम किस प्रकार कार्य करता है?

इस दृष्टि से पाणिनीय व्याकरण हमें एक महत्वपूर्ण बौद्धिक अनुशासन सिखाता है—

जो दिखाई देता है, उसके पीछे उसकी संरचना को खोजो।

शब्द के स्तर पर यह—

रूप के पीछे प्रक्रिया

की खोज है।

लेकिन अभी एक और परत बाकी है।

शब्दरचना के पीछे जो ध्वनियाँ हैं, वे स्वयं कैसे व्यवस्थित होती हैं?

वहीं से अगला प्रश्न जन्म लेता है—

क्या शब्द का सबसे छोटा आधार ध्वनि है, वर्ण है, या पाणिनीय व्यवस्था में उससे भी अधिक सूक्ष्म कोई भाषिक इकाई?

यही प्रश्न हमें अगले चरण में ले जाएगा—

ध्वनि से शब्द तक।


मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

पाणिनीय दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–३ : शब्द की रचना — प्रकृति, प्रत्यय और पाणिनीय शब्दमीमांसा

नोट : इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग पाणिनीय दर्शन के एक स्वतंत्र और नये पक्ष का अध्ययन करता है। पूर्ववर्ती भागों में विवेचित विषयों की अनावश्यक पुनरावृत्ति नहीं की जाएगी। अष्टाध्यायी को मूल आधार, वार्तिक और महाभाष्य को प्राथमिक व्याख्यात्मक आधार तथा परवर्ती व्याकरण-दर्शन को दार्शनिक विकास के रूप में ग्रहण किया जाएगा। माधवाचार्यकृत सर्वदर्शनसंग्रह का उपयोग तुलनात्मक एवं ऐतिहासिक स्रोत के रूप में किया जाएगा।

(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)

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