दर्शन - सांख्य दर्शन — भाग–३ : प्रमाण और ज्ञान — सांख्य हमें तत्त्वों का ज्ञान कैसे देता है?
सांख्य दर्शन — प्रकृति से पुरुष और विवेक से कैवल्य तक
भाग–३ : प्रमाण और ज्ञान — सांख्य हमें तत्त्वों का ज्ञान कैसे देता है?
आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र - सांख्य दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
यदि
मुक्ति ज्ञान से है, तो ज्ञान आएगा कहाँ से?
पिछले
भाग में हमने देखा
कि सांख्य दर्शन का जन्म किसी
बौद्धिक जिज्ञासा मात्र से नहीं, बल्कि
दुःख से पूर्ण और स्थायी निवृत्ति की खोज से होता है।
मनुष्य
दुःख से बचने के
अनेक लौकिक उपाय करता है।
वे अपने-अपने क्षेत्र
में उपयोगी हैं, किन्तु सांख्य
के अनुसार वे दुःख का
एकान्तिक और आत्यन्तिक निवारण नहीं कर सकते।
इससे
एक प्रश्न उठता है—
यदि
स्थायी मुक्ति के लिए तत्त्वज्ञान आवश्यक है, तो वह तत्त्वज्ञान प्राप्त कैसे होगा?
यहीं
सांख्य की ज्ञानमीमांसा सामने
आती है।
क्योंकि
किसी दर्शन के लिए यह
कहना पर्याप्त नहीं कि— “यथार्थ
को जानो।”
अगला
प्रश्न अनिवार्य है— “जानोगे कैसे?”
जो दिखाई देता है, क्या
वही सत्य है?
जो दिखाई नहीं देता, क्या
उसका अस्तित्व नहीं है?
क्या
अनुमान से ऐसी वस्तु
जानी जा सकती है
जो प्रत्यक्ष नहीं?
और क्या किसी विश्वसनीय
ज्ञाता का वचन ऐसा
ज्ञान दे सकता है
जिसे हम स्वयं प्रत्यक्ष
नहीं कर सकते?
सांख्य
इन प्रश्नों को अनदेखा नहीं
करता।
ईश्वरकृष्ण
की सांख्यकारिका में प्रमाणों का
स्पष्ट विवेचन मिलता है—
दृष्टमनुमानमाप्तवचनं
च सर्वप्रमाणसिद्धत्वात्। त्रिविधं
प्रमाणमिष्टं प्रमेयसिद्धिः प्रमाणाद्धि॥
अर्थात्
सांख्य तीन प्रमाण स्वीकार
करता है— प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तवचन।
लेकिन
इन तीनों को केवल परीक्षा
के लिए याद कर
लेना सांख्य की ज्ञानमीमांसा को
समझना नहीं है।
वास्तविक
प्रश्न यह है— ज्ञान
और यथार्थ के बीच सम्बन्ध कैसे स्थापित होता है?
प्रमाण
क्या है?
‘प्रमाण’
का सामान्य अर्थ है— यथार्थ
ज्ञान उत्पन्न करने वाला साधन।
लेकिन
यहाँ एक सूक्ष्म अन्तर
आवश्यक है। प्रमाण स्वयं ज्ञान नहीं है।
प्रमाण
वह साधन या माध्यम
है जिसके द्वारा किसी वस्तु का
यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है।
उदाहरण
के लिए— हम सामने
रखे दीपक को देखते
हैं। दीपक का प्रत्यक्ष ज्ञान
उत्पन्न होता है।
यहाँ
आँख और उपयुक्त परिस्थितियों
से प्राप्त प्रत्यक्ष ज्ञान के पीछे जो
ज्ञान-साधक प्रक्रिया है,
उसे प्रमाण-विचार के भीतर समझा
जाता है।
इसलिए
सांख्य के लिए प्रमाण
का प्रश्न केवल यह नहीं
है कि—
“मैंने
क्या जाना?”
बल्कि—
“मैंने
जो जाना, उसे जानने का वैध आधार क्या था?”
यही
प्रश्न ज्ञान को अनुमान, कल्पना,
स्मृति या भ्रम से
अलग करता है।
सांख्य
तीन प्रमाण ही क्यों स्वीकार करता है?
सांख्य—
प्रत्यक्ष ,अनुमान आप्तवचन इन तीन प्रमाणों
को स्वीकार करता है।
यहाँ
प्रश्न उठ सकता है—
केवल तीन ही क्यों?
क्या
उपमान नहीं? क्या अर्थापत्ति नहीं?
क्या अनुपलब्धि नहीं?
सांख्य
की दृष्टि में इन अतिरिक्त
ज्ञान-प्रकारों को स्वतंत्र प्रमाण
मानना आवश्यक नहीं है। उन्हें
प्रत्यक्ष, अनुमान या शब्द के
व्यापक क्षेत्र में समझने का
प्रयास किया जाता है।
इससे
सांख्य की एक विशेषता
स्पष्ट होती है—
वह
प्रमाणों की संख्या बढ़ाने के बजाय ज्ञान की कार्यप्रणाली को मूल रूप से तीन प्रमुख साधनों में व्यवस्थित करता है।
यही
तीन साधन आगे उसकी
पूरी तत्त्वमीमांसा को आधार देंगे।
प्रथम
प्रमाण : प्रत्यक्ष
सबसे
पहले है— प्रत्यक्ष। - प्रत्यक्ष का अर्थ है—
जो
ज्ञान इन्द्रिय और उसके विषय के उपयुक्त सम्बन्ध से उत्पन्न होता है।
हम देखते हैं— रूप। सुनते हैं—
शब्द। स्पर्श करते हैं— स्पर्श।
स्वाद लेते हैं— रस। गन्ध ग्रहण
करते हैं—
गन्ध। इस
प्रकार प्रत्यक्ष हमारे अनुभव-जगत् का सबसे
निकटतम ज्ञान-स्रोत है।
लेकिन
सांख्य प्रत्यक्ष को केवल— “जो
आँख से दिखे वही सत्य” जैसी सरल धारणा
में सीमित नहीं करता।
प्रत्यक्ष
का अपना कारण-तन्त्र
है। इन्द्रिय। विषय।उनका
सम्बन्ध। और उससे उत्पन्न ज्ञान।
इसलिए
प्रत्यक्ष स्वयं एक दार्शनिक अध्ययन
का विषय बन जाता
है।
प्रत्यक्ष
की शक्ति और सीमा
प्रत्यक्ष
अत्यन्त शक्तिशाली है क्योंकि यह
हमें वस्तुओं के साथ सीधा
अनुभवात्मक सम्बन्ध देता है।
लेकिन
उसकी सीमा भी उतनी
ही महत्त्वपूर्ण है।
हम अपनी आँखों से
वायु को नहीं देखते।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं
कि वायु का अस्तित्व
नहीं।
हम अपने नेत्र से
बुद्धि को नहीं देखते।
लेकिन हम निर्णय करते हैं।
हम पुरुष को किसी भौतिक
वस्तु की तरह आँखों
से नहीं देखते।
फिर
भी सांख्य पुरुष के अस्तित्व को
स्वीकार करता है।
इससे
एक मूलभूत बात स्पष्ट होती
है— प्रत्यक्ष आवश्यक है, लेकिन प्रत्यक्ष ही सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है।
जहाँ
प्रत्यक्ष पहुँचता है, वहाँ वह
महत्त्वपूर्ण है। लेकिन जहाँ प्रत्यक्ष नहीं
पहुँचता, वहाँ ज्ञान का
अन्त नहीं हो जाता।
यहीं
दूसरा प्रमाण सामने आता है।
दूसरा
प्रमाण : अनुमान
दूसरा
प्रमाण है— अनुमान। अनुमान वह ज्ञान है
जो किसी ज्ञात लक्षण
या सम्बन्ध के आधार पर
किसी अन्य वस्तु या
तथ्य का ज्ञान कराता
है।
सबसे
प्रसिद्ध उदाहरण है— धुआँ देखकर अग्नि का ज्ञान। हम दूर पर्वत
पर धुआँ देखते हैं।
अग्नि
प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देती।
लेकिन धुएँ और अग्नि के
निश्चित सम्बन्ध के ज्ञान के
आधार पर हम निष्कर्ष
निकालते हैं— वहाँ अग्नि है।
यहाँ
प्रत्यक्ष केवल धुएँ तक
पहुँचता है।
अग्नि
का ज्ञान अनुमान से होता है।
यही कारण है कि सांख्य
के लिए अनुमान अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण है।
अनुमान
केवल कल्पना नहीं है
आज सामान्य बातचीत में हम कहते
हैं—
“मेरा
अनुमान है...” और कभी-कभी
अनुमान का अर्थ केवल
अटकल होता है।
लेकिन
दार्शनिक अर्थ में अनुमान
अटकल नहीं है। वह किसी
ज्ञात सम्बन्ध पर आधारित युक्तिसंगत
ज्ञान है।
यदि
किसी निष्कर्ष के पीछे विश्वसनीय
आधार नहीं है, तो
वह केवल कल्पना या
सम्भावना हो सकती है।
इसलिए
सांख्य के अनुमान को
समझते समय यह अन्तर
हमेशा ध्यान में रखना चाहिए—
अनुमान
≠ अटकल। अनुमान का दार्शनिक मूल्य
उसके आधारभूत सम्बन्ध में है।
सांख्य की तत्त्वमीमांसा में अनुमान का महत्त्व
अब प्रश्न और गहरा होता
है। प्रकृति को हम कहाँ
प्रत्यक्ष देखते हैं?
सांख्य
की ‘मूलप्रकृति’ कोई ऐसी वस्तु
नहीं है जिसे हम
सामान्य इन्द्रियों से सामने रखकर
देख सकें।
फिर
सांख्य उसके अस्तित्व को
कैसे स्थापित करेगा?
यहाँ
अनुमान की भूमिका अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
सांख्य
जगत् में उपस्थित विविधता,
परिवर्तन और कार्य-कारण
सम्बन्धों का विश्लेषण करके
एक मूल कारण की
आवश्यकता की ओर संकेत
करता है।
इसी
प्रकार पुरुष के विषय में
भी प्रत्यक्ष के स्थान पर
अनुमानात्मक तर्क की भूमिका
आती है।
इसका
अर्थ यह नहीं कि
सांख्य हर चीज को
केवल अनुमान से सिद्ध करता
है।
बल्कि—
जहाँ
प्रत्यक्ष की सीमा समाप्त होती है, वहाँ युक्तिसंगत अनुमान तत्त्वमीमांसा का मार्ग खोलता है।
तीसरा
प्रमाण : आप्तवचन
तीसरा
प्रमाण है— आप्तवचन। इसे सांख्यकारिका में— आप्तवचन कहा गया है।
आप्त
का सामान्य अर्थ है— विश्वसनीय
ज्ञाता।
ऐसा
व्यक्ति जिसने किसी विषय को
यथार्थ रूप से जाना
हो और जो उसे
बिना भ्रम अथवा छल
के अभिव्यक्त करे।
उसका
वचन ज्ञान का साधन बन
सकता है। यही शब्द-प्रमाण की
आधारभूमि है।
क्या
किसी दूसरे के कहने से ज्ञान हो सकता है?
यहाँ
एक आधुनिक आपत्ति स्वाभाविक है— “मैंने स्वयं नहीं देखा, फिर किसी दूसरे के कथन को प्रमाण क्यों मानूँ?”
सांख्य
का उत्तर है—
मनुष्य
का अधिकांश ज्ञान स्वयं प्रत्यक्ष से प्राप्त नहीं
होता। हमने इतिहास की हर घटना
स्वयं नहीं देखी।
हमने
संसार के प्रत्येक स्थान
को स्वयं नहीं देखा। हमने अपने
जन्म की घटना स्वयं
स्मरण से नहीं जानी।
हम अनेक विषय विशेषज्ञों
के विश्वसनीय ज्ञान पर निर्भर रहते
हैं।
लेकिन
हर कथन प्रमाण नहीं
हो सकता। प्रमाण बनने के लिए
आप्तता आवश्यक है।
अर्थात्—
ज्ञाता का यथार्थ ज्ञान और कथन की विश्वसनीयता। इसलिए आप्तवचन अन्धविश्वास नहीं है।
यह विश्वसनीय ज्ञान-संचरण की दार्शनिक स्वीकृति
है।
आप्त
कौन है? यह प्रश्न बहुत
महत्त्वपूर्ण है।
यदि
कोई भी व्यक्ति कुछ
कह दे और हम
उसे प्रमाण मान लें, तो
प्रमाण की पूरी व्यवस्था
ही टूट जाएगी।
इसलिए
‘आप्त’ होना केवल विद्वान
होने से अधिक है।
आप्त
वह है— जो यथार्थ को जानता हो और उसे यथार्थ रूप में कहता हो।
अर्थात्
ज्ञान और विश्वसनीय अभिव्यक्ति
दोनों आवश्यक हैं।
इसलिए
सांख्य की शब्द-प्रमाण
व्यवस्था को— “किसी ग्रन्थ में लिखा है, इसलिए सत्य है”
तक सीमित करना उचित नहीं
होगा। प्रमाण का प्रश्न यहाँ
भी बना रहता है—
कथन
का स्रोत कितना विश्वसनीय है?
तीन
प्रमाण और तीन ज्ञान-द्वार
अब सांख्य की ज्ञानमीमांसा को
एक सरल रूप में
देखें— प्रत्यक्ष जो सामने अनुभव
में आता है।
अनुमान-
जो प्रत्यक्ष संकेतों से तर्कपूर्वक जाना
जाता है।
आप्तवचन-
जो विश्वसनीय ज्ञाता के कथन से
जाना जाता है।
इन तीनों के कारण सांख्य
की ज्ञान-पद्धति न तो केवल
इन्द्रियवादी है, न केवल
तर्कवादी, और न केवल
शास्त्रवादी।
यह तीनों को एक व्यवस्थित
ज्ञान-संरचना में रखता है।
क्या
प्रत्यक्ष और अनुमान एक-दूसरे के विरोधी हैं? नहीं।
वे एक-दूसरे को
पूरक हैं। प्रत्यक्ष हमें आधार देता
है। अनुमान उस आधार से
आगे बढ़ता है।
उदाहरण—
हम धुआँ देखते हैं।
यह प्रत्यक्ष है।
धुएँ
से अग्नि का निष्कर्ष निकालते
हैं। यह अनुमान है।
इस प्रकार— प्रत्यक्ष → संकेत → अनुमान → निष्कर्ष की प्रक्रिया बन
सकती है।
तत्त्वमीमांसा
में भी ऐसा ही
होता है। हम जगत् में कार्य
देखते हैं। कार्य की संरचना देखते
हैं। परिवर्तन देखते हैं।
परस्पर
निर्भरता देखते हैं। और फिर कारण की
ओर अनुमान करते हैं।
इस प्रकार सांख्य का तत्त्वचिन्तन अनुभव
से पूरी तरह विच्छिन्न
नहीं है।
क्या
अनुमान बिना प्रत्यक्ष के सम्भव है?
यहाँ
विषय और सूक्ष्म हो
जाता है। अनुमान स्वयं किसी पूर्वज्ञान पर
निर्भर करता है।
धुएँ
और अग्नि का सम्बन्ध पहले
जाना गया होगा, तभी
धुएँ से अग्नि का
अनुमान सम्भव है।
इसलिए
अनुमान पूर्णतः शून्य से उत्पन्न नहीं
होता।
उसके
पीछे किसी पूर्व अनुभव,
ज्ञान या प्रमाण की
आवश्यकता होती है।
यही
कारण है कि प्रमाणों
को अलग-अलग डिब्बों
में रख देना पर्याप्त
नहीं।
वे ज्ञान-व्यवस्था के भीतर परस्पर
सम्बद्ध हैं। क्या आप्तवचन अनुमान का विकल्प है?
दोनों
की भूमिका अलग है।
यदि
कोई ज्ञानी हमें किसी ऐसी
वस्तु के बारे में
बताता है जिसे हम
स्वयं अभी प्रत्यक्ष नहीं
कर सकते, तो उसका कथन
हमारे लिए ज्ञान का
साधन बन सकता है।
लेकिन
जहाँ स्वयं परीक्षण सम्भव हो, वहाँ अनुभव
और तर्क की भूमिका
समाप्त नहीं हो जाती।
इस प्रकार सांख्य की ज्ञानमीमांसा में—
विश्वास
का स्थान है, लेकिन अन्धविश्वास का नहीं।
तर्क
का स्थान है, लेकिन निराधार कल्पना का नहीं।
प्रत्यक्ष
का स्थान है, लेकिन प्रत्यक्षवाद की सीमा भी है।
यही
संतुलन सांख्य की प्रमाण-पद्धति
की शक्ति है।
प्रमाण
और प्रमेय
अब एक और महत्त्वपूर्ण
शब्द आता है— प्रमेय।
प्रमाण है— जिससे जाना जाए।
प्रमेय
है— जिसे जाना जाए। यदि प्रमाण ज्ञान
का साधन है, तो
प्रमेय ज्ञान का विषय है।
सांख्य
में यह भेद इसलिए
महत्त्वपूर्ण है क्योंकि आगे
हमें अनेक तत्त्वों को
जानना होगा।
प्रकृति
क्या है? पुरुष क्या
है? महत् क्या है?
अहंकार क्या है? मन
और इन्द्रियाँ क्या हैं? तन्मात्राएँ
क्या हैं?
महाभूत
क्या हैं? इन सबको
जानने के लिए प्रमाण
आवश्यक हैं।
इसलिए
भाग–२ में उठी
जिज्ञासा अब भाग–३
में ज्ञानमीमांसा का रूप लेती
है।
सांख्य
में ज्ञान का लक्ष्य : केवल सही सूचना नहीं
यहाँ
एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है। यदि कोई
व्यक्ति २५ तत्त्वों के
नाम कण्ठस्थ कर ले—
तो क्या वह सांख्यदर्शी
हो गया? नहीं।
यदि
कोई व्यक्ति सांख्यकारिका की सभी कारिकाएँ
याद कर ले— तो
क्या कैवल्य प्राप्त हो गया? नहीं।
सांख्य
का ज्ञान केवल सूचना नहीं है। वह यथार्थ-विवेक की ओर ले
जाने वाला ज्ञान है।
इसलिए
आगे चलकर—तत्त्वों को जानना और— तत्त्वों के वास्तविक सम्बन्ध को पहचानना
दो अलग बातें होंगी।
यही कारण है कि सांख्य
का अंतिम लक्ष्य ज्ञान को मुक्ति से
जोड़ता है।
ज्ञान
और मुक्ति का सम्बन्ध
यदि
अज्ञान के कारण मनुष्य
प्रकृति के परिवर्तनों को
अपने वास्तविक स्वरूप से जोड़ता है,
तो वह सुख-दुःख,
कर्तृत्व और भोक्तृत्व के
बन्धन में रहता है।
यदि
यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है और
प्रकृति-पुरुष का भेद स्पष्ट
होता है, तो बन्धन
की जड़ पर प्रहार
होता है।
इसलिए
सांख्य के लिए— ज्ञान
साधन भी है और मुक्ति की दिशा भी।
लेकिन
यहाँ ‘ज्ञान’ का अर्थ किसी
बाहरी वस्तु की जानकारी नहीं।
यह ऐसा ज्ञान है
जो— द्रष्टा और दृश्य के सम्बन्ध को मूलतः बदल देता है।
इसकी
चरम अवस्था आगे चलकर— विवेकख्याति
और— कैवल्य के रूप में
सामने आएगी।
सांख्य
का अनुमान और प्रकृति
अब उस प्रश्न की
ओर लौटें जो इस श्रृंखला
के अगले चरणों के
लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है—
यदि
मूलप्रकृति प्रत्यक्ष नहीं है, तो सांख्य उसे स्वीकार क्यों करता है?
सांख्य
का तर्क है कि
विविध कार्यों के पीछे एक
सामान्य मूल कारण मानना
आवश्यक है।
जगत्
में जो कुछ व्यक्त
है— वह परिवर्तनशील है।
विभिन्न कार्य उत्पन्न होते हैं।
कार्य
अपने कारण से असम्बद्ध
नहीं हो सकता।
इससे
सांख्य कार्य-कारण सम्बन्ध की
एक विशिष्ट व्याख्या की ओर बढ़ता
है।
यहीं
से आगे— सत्कार्यवाद और— प्रकृति का प्रश्न सामने
आएगा।
लेकिन
इन दोनों का विस्तृत विवेचन
अभी नहीं किया जाएगा।
क्योंकि
अगले भाग का केन्द्र
विशेष रूप से— प्रकृति
होगी।
पुरुष का ज्ञान और प्रमाण
इसी
प्रकार एक और कठिन
प्रश्न है—
यदि
पुरुष इन्द्रियगोचर वस्तु नहीं है, तो उसका अस्तित्व कैसे जाना जाए?
सांख्य
यहाँ भी तर्क प्रस्तुत
करता है। चेतना स्वयं प्रकृति के विकारों जैसी
वस्तु नहीं है।
बुद्धि
बदलती है। मन बदलता है। भावनाएँ बदलती हैं। इन्द्रिय-अनुभव बदलते हैं।
लेकिन
परिवर्तन का ज्ञान भी
किसी स्तर पर सम्भव
होता है।
इसलिए
सांख्य एक ऐसी चेतन
सत्ता की स्थापना करता
है जो प्रकृति के
परिवर्तन से भिन्न है।
यहाँ
अनुमान की भूमिका महत्त्वपूर्ण
है। परन्तु पुरुष का विस्तृत स्वरूप
अगले भागों में आएगा।
क्या
सांख्य अनुभव-विरोधी दर्शन है?
नहीं। यह
एक महत्त्वपूर्ण भ्रान्ति है।
सांख्य
तत्त्वमीमांसा करता है, लेकिन
उसका तत्त्वचिन्तन अनुभव से आरम्भ होकर
तर्क के माध्यम से
आगे बढ़ता है।
वह यह नहीं कहता—
“जो कुछ ग्रन्थ में है, उसे बिना विचार स्वीकार करो।”
और न यह कहता
है— “जो इन्द्रिय से नहीं दिखता, वह अस्तित्वहीन है।”
उसकी
पद्धति अधिक संतुलित है—
प्रत्यक्ष
जहाँ तक ले जाए, वहाँ तक जाओ।
अनुमान
जहाँ आवश्यक हो, वहाँ तर्क करो।
और
जहाँ प्रत्यक्ष-अनुमान पर्याप्त न हों, वहाँ विश्वसनीय आप्तवचन को स्वीकार करो।
यह त्रिप्रमाण व्यवस्था सांख्य के ज्ञान-तन्त्र
की आधारभूमि है।
शास्त्रार्थ
: प्रत्यक्षवादी
का पूर्वपक्ष
अब सांख्य के सामने एक
काल्पनिक लेकिन दार्शनिक रूप से महत्त्वपूर्ण
पूर्वपक्ष रखें। पूर्वपक्ष
“जो
प्रत्यक्ष नहीं है, उसे
क्यों स्वीकार करें? प्रकृति प्रत्यक्ष नहीं। पुरुष प्रत्यक्ष नहीं। तन्मात्राएँ प्रत्यक्ष नहीं।
यदि
ये सब इन्द्रियगोचर नहीं
हैं, तो इनके अस्तित्व
का दावा केवल कल्पना
है।”
यह आपत्ति सतही नहीं है।
यह ज्ञानमीमांसा
की मूल चुनौती है।
यदि
केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण हो,
तो सांख्य की पूरी तत्त्वमीमांसा
संकट में पड़ जाएगी।
सांख्य
का उत्तर
सांख्य
कहेगा— यदि केवल प्रत्यक्ष
को प्रमाण मान लिया जाए,
तो स्वयं अनुमान का निषेध करना
पड़ेगा।
लेकिन
जीवन का सामान्य ज्ञान
ही अनुमान पर आधारित है।
धुएँ
से अग्नि। कार्य से कारण। लक्षण से
लाक्ष्य। परिवर्तन से किसी स्थायी
आधार की खोज।
इसलिए—
अप्रत्यक्ष होना और असत् होना एक ही बात नहीं है।
किसी
वस्तु का प्रत्यक्ष न
होना उसके अस्तित्व का
निषेध नहीं करता।
लेकिन
केवल ‘अप्रत्यक्ष’ कह देने से
उसका अस्तित्व सिद्ध भी नहीं हो
जाता। यहीं प्रमाण की कसौटी आती
है।
सांख्य
का आग्रह यही है कि—
अप्रत्यक्ष
सत्ता को तर्कसंगत प्रमाण के आधार पर स्वीकार किया जाए, कल्पना के आधार पर नहीं।
दूसरा
पूर्वपक्ष : केवल तर्क पर्याप्त है
अब दूसरी आपत्ति। पूर्वपक्ष “यदि अनुमान और
तर्क उपलब्ध हैं, तो आप्तवचन
की आवश्यकता क्यों?”
सांख्य
का उत्तर होगा—
मानवीय
ज्ञान की सीमा को
देखते हुए ऐसा मानना
उचित नहीं कि प्रत्येक
सत्य का प्रत्यक्ष परीक्षण
प्रत्येक व्यक्ति स्वयं कर सकता है।
मानव-ज्ञान परम्परा, साक्ष्य और विश्वसनीय ज्ञाताओं
पर भी निर्भर करता
है।
इसलिए
आप्तवचन का स्थान है।
लेकिन यह स्थान— अन्धविश्वास का स्थान नहीं।
आप्तवचन
भी प्रमाण तभी है जब
वह वास्तविक आप्तता पर आधारित हो।
सांख्य
की प्रमाण-पद्धति का संतुलन
इस प्रकार तीन प्रमाणों को
एक साथ देखें—
|
प्रमाण |
मुख्य
कार्य |
|
प्रत्यक्ष |
अनुभव
में उपलब्ध वस्तु का ज्ञान |
|
अनुमान |
ज्ञात
संकेत/सम्बन्ध से अप्रत्यक्ष का
ज्ञान |
|
आप्तवचन |
विश्वसनीय
ज्ञाता के कथन से
ज्ञान |
लेकिन
इन तीनों को कठोर डिब्बों
की तरह नहीं देखना
चाहिए।
एक जटिल दार्शनिक निष्कर्ष
में इनकी भूमिकाएँ परस्पर
जुड़ सकती हैं।
प्रत्यक्ष
तथ्य देता है। अनुमान सम्बन्ध
और कारण की ओर
ले जाता है।
आप्तवचन
उस ज्ञान-परम्परा को उपलब्ध कराता
है जिसे व्यक्ति स्वयं
प्रत्यक्ष नहीं कर सकता।
आधुनिक
विज्ञान के संदर्भ में एक सावधानी
यहाँ
सांख्य की तुलना आधुनिक
विज्ञान से करने का
आकर्षण बहुत अधिक है।
क्योंकि
विज्ञान भी— observation →
inference → theory जैसी
प्रक्रिया में कार्य करता
है।
लेकिन
दोनों को समान घोषित
करना उचित नहीं।
आधुनिक
विज्ञान प्रयोगात्मक पुनरावृत्ति, गणितीय मॉडल, मापन और सामुदायिक
परीक्षण जैसी पद्धतियों पर
आधारित है।
सांख्य
की प्रमाणमीमांसा एक अलग दार्शनिक
परम्परा में विकसित हुई।
अतः
इतना कहना उचित है
कि—
दोनों
में अनुभव और तर्क के बीच सम्बन्ध की खोज दिखाई देती है; लेकिन उनकी ज्ञानमीमांसात्मक प्रणालियाँ समान नहीं हैं।
यह अन्तर हमारी पूरी श्रृंखला में
बनाए रखना आवश्यक होगा।
सांख्य
की ज्ञानमीमांसा का अगला प्रश्न
अब हमारे पास तीन प्रमाण
हैं। लेकिन केवल प्रमाण जान
लेना पर्याप्त नहीं।
अब प्रश्न है— इन प्रमाणों के द्वारा सांख्य आखिर किस यथार्थ को सिद्ध करना चाहता है?
यहीं
से हमारी यात्रा सीधे प्रकृति की ओर जाती
है।
क्योंकि
यदि जगत् परिवर्तनशील है,
यदि उसके भीतर कार्य-कारण सम्बन्ध है,
यदि विविधता के पीछे कोई
आधार है—
तो वह मूल आधार
क्या है?
क्या
जगत् किसी शून्य से
उत्पन्न हुआ?
या कार्य अपने कारण में
पहले से किसी रूप
में स्थित था?
क्या
इस सम्पूर्ण व्यक्त जगत् के पीछे
कोई अव्यक्त मूल कारण है?
सांख्य
का उत्तर है— प्रकृति। लेकिन प्रकृति को केवल ‘प्रकृति
= Nature’ कह देना पर्याप्त नहीं
होगा।
सांख्य
की प्रकृति आधुनिक प्रकृति की सामान्य धारणा
से कहीं अधिक गहरी
तत्त्वमीमांसात्मक संकल्पना है।
निष्कर्ष
: ज्ञान की सही विधि से ही तत्त्व का सही ज्ञान सम्भव है
भाग–२ ने हमें
एक प्रश्न दिया था— दुःख
से मुक्ति कैसे सम्भव है?
उत्तर
की पहली सीढ़ी थी—
तत्त्वज्ञान।
लेकिन
भाग–३ ने पूछा—
तत्त्वज्ञान आएगा कैसे?
सांख्य
का उत्तर है— प्रमाण से। और उसके लिए
तीन प्रमुख प्रमाण हैं— प्रत्यक्ष। अनुमान। आप्तवचन।
प्रत्यक्ष
हमें अनुभव-जगत् से जोड़ता
है।
अनुमान
हमें प्रत्यक्ष से परे कारण
और सम्बन्धों तक ले जाता
है।
आप्तवचन
विश्वसनीय ज्ञान-परम्परा को हमारे सामने
खोलता है।
लेकिन
इन सबका अंतिम उद्देश्य
केवल अधिक जानकारी प्राप्त
करना नहीं है।
इनका
उद्देश्य है— यथार्थ
का ज्ञान।और उस यथार्थ-ज्ञान का अंतिम लक्ष्य
है— दुःख की जड़ का निवारण।
इसलिए
सांख्य की यात्रा अब
एक निर्णायक मोड़ पर पहुँचती
है।
हमने
पूछा— दुःख क्यों?
फिर
पूछा— ज्ञान कैसे?
अब हमें पूछना होगा—
जिस
जगत् के कारण और संरचना को जानकर हम मुक्ति की ओर बढ़ना चाहते हैं, उसका मूल क्या है?
क्या
इस सम्पूर्ण परिवर्तनशील जगत् के पीछे
कोई अव्यक्त कारण है?
क्या
विविधता के पीछे कोई
एक मूल प्रकृति है?
और यदि है— तो
वह स्वयं किससे उत्पन्न हुई?
यहीं
से अगले भाग का
द्वार खुलता है—
भाग–४ : प्रकृति — समस्त व्यक्त जगत् का मूल कारण
अगले
भाग में हम पहली
बार सांख्य के सबसे मौलिक
तत्त्वों में से एक
के सामने खड़े होंगे—
प्रकृति।
वह प्रकृति जो स्वयं किसी
कार्य से उत्पन्न नहीं
होती, लेकिन जिससे समस्त व्यक्त जगत् के विकास
की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है।
और वहीं से एक
अत्यन्त गहरा प्रश्न उठेगा—
यदि
सब कुछ प्रकृति से विकसित होता है, तो प्रकृति स्वयं किससे?
सांख्य
का उत्तर इस प्रश्न से
उसकी पूरी तत्त्वमीमांसा की
दिशा बदल देगा।
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
सांख्य
दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला - भाग–३ : प्रमाण और ज्ञान — सांख्य हमें तत्त्वों का ज्ञान कैसे देता है?
शोध-टिप्पणी : इस भाग में
ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका के प्रमाण-विवेचन
के आधार पर प्रत्यक्ष,
अनुमान और आप्तवचन—इन
तीन प्रमाणों की भूमिका का
अध्ययन किया गया है।
प्रमाण और प्रमेय के
अन्तर, प्रत्यक्ष की सीमा, अनुमान
की तर्कसंगतता तथा आप्तवचन की
विश्वसनीयता को सांख्य की
तत्त्वमीमांसा से जोड़ा गया
है। आधुनिक विज्ञान से की गई
तुलना केवल तुलनात्मक है;
सांख्य की प्रमाण-व्यवस्था
को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति के समान या
उसका पूर्वरूप नहीं माना गया
है। प्रकृति और पुरुष की
विस्तृत तत्त्वमीमांसा को उनके निर्धारित
आगामी भागों के लिए सुरक्षित
रखा गया है, ताकि
श्रृंखला में अनावश्यक पुनरावृत्ति
न हो।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
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