पाणिनीय दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला भाग–१२ : वाक् की चार अवस्थाएँ
पाणिनीय दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–१२ : वाक् की चार अवस्थाएँ — परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी : मौन से उच्चारण तक की यात्रा
भाग–११ में हमने
एक अत्यन्त मूल प्रश्न उठाया
था—
शब्द
क्या है?
ध्वनि
और शब्द को एक
ही मान लेना पर्याप्त
नहीं है। उच्चरित ध्वनि
क्रमशः आती और चली
जाती है, जबकि अर्थबोध
अनेक बार एक अखण्ड
अनुभूति के रूप में
प्रकट होता है। इसी
समस्या से स्फोट, वाक्य
और प्रतिभा की मीमांसा सामने
आई।
अब प्रश्न उससे भी भीतर
जाता है— शब्द बाहर आने से पहले कहाँ रहता है?
मनुष्य
बोलने से पहले जानता
है कि वह क्या
कहना चाहता है।
विचार
पहले है। शब्द बाद में है।
उच्चारण उससे भी बाद में
है।
तो क्या वाक् की
कोई ऐसी आन्तरिक यात्रा
है जिसमें वह पहले अव्यक्त
रहती है और फिर
क्रमशः व्यक्त होती हुई ध्वनि
बन जाती है?
भारतीय
वाङ्मय में वाक् के
चार स्तरों की चर्चा इसी
रहस्य की ओर संकेत
करती है।
लेकिन
यहाँ आरम्भ में ही एक
ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है—
ऋग्वेद
में “चार वाक्-पद” का उल्लेख है, पर वहाँ सीधे “परा–पश्यन्ती–मध्यमा–वैखरी” नामों में चार अवस्थाओं का स्पष्ट वर्गीकरण नहीं दिया गया है। ऋग्वेद 1.164.45 कहता है कि
वाक् के चार सीमित
पद हैं, जिनमें तीन
गुप्त हैं और मनुष्य
चौथे को बोलते हैं।
यास्क की निरुक्त में भी इस
मन्त्र की व्याख्या एक
से अधिक प्रकार से
मिलती है। परवर्ती व्याकरण,
तन्त्र और प्रत्यभिज्ञा परम्पराओं
में इन चार अवस्थाओं
को विशिष्ट नामों और दार्शनिक अर्थों
के साथ विकसित किया
गया।
इस अन्तर को बनाए रखना
आवश्यक है, क्योंकि वेद
में संकेत और परवर्ती दर्शन में विकसित सिद्धान्त एक ही बात
नहीं हैं।
ऋग्वेद
का रहस्य — “चत्वारि वाक् परिमिता पदानि”
ऋग्वेद
का प्रसिद्ध मन्त्र है—
चत्वारि
वाक् परिमिता पदानि, तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति, तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥
अर्थात्—
वाक्
के चार सीमित पद हैं। मनीषी ब्राह्मण उन्हें जानते हैं। उनमें तीन गुप्त रूप से स्थित हैं; मनुष्य वाक् के चौथे रूप को बोलते हैं।
यह मन्त्र भारतीय भाषा-दर्शन के
इतिहास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
है।
लेकिन
इसकी व्याख्या एकरेखीय नहीं रही।
सायण
ने इसके अनेक वैदिक-सन्दर्भगत अर्थ प्रस्तुत किए
हैं और यास्क की
निरुक्त में भी चार
के अर्थ के विभिन्न
विकल्प मिलते हैं। एक आधुनिक
शोध-अध्ययन यास्कीय व्याख्या के सन्दर्भ में
परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी की
परवर्ती व्याख्या का उल्लेख करता
है, साथ ही अन्य
व्याख्यात्मक परम्पराओं को भी दर्ज
करता है। (
इसलिए
यह कहना अधिक वैज्ञानिक
होगा—
चार
वाक्-स्तरों का बीज वैदिक वाङ्मय में दिखाई देता है; उनके व्यवस्थित मनो-दर्शनात्मक रूप बाद की परम्पराओं में विकसित होते हैं।
बोलने
से पहले बोलना
एक बहुत साधारण अनुभव
लें। आपके मन में कोई
बात आती है— “मुझे
आज बाहर जाना है।”
आपने
अभी कुछ कहा नहीं।
फिर भी— आप जानते हैं
कि क्या कहना है।
फिर
आपके मन में शब्दों
का रूप बनने लगता
है— “मुझे... आज... बाहर... जाना...” फिर आप उन्हें
उच्चारित करते हैं। यहाँ कम-से-कम तीन
अलग घटनाएँ दिखाई देती हैं—
भाव
या आशय
↓
मानसिक
भाषिक गठन
↓
उच्चरित
ध्वनि
इससे
एक गहरा प्रश्न उठता
है—
यदि
वाणी का बाहरी रूप
ही वाक् का सम्पूर्ण
स्वरूप होता, तो बोलने से
पहले “कहने की इच्छा”
और “कहने का ज्ञान”
कहाँ से आया?
यहीं
भारतीय वाक्-दर्शन का
आन्तरिक आयाम खुलता है।
परा
— वाक् का अव्यक्ततम आयाम
परवर्ती
परम्पराओं में परा-वाक् को वाक् की
अत्यन्त सूक्ष्म या मूल अवस्था
के रूप में समझाया
जाता है।
यह वह अवस्था नहीं
है जिसमें कोई शब्द कान
से सुनाई देता है।
यहाँ—
वाक् अभी ध्वनि नहीं बनी। वह अभी विभाजित
नहीं हुई।
वक्ता
के भीतर कहे जाने
वाला अर्थ और उसे
व्यक्त करने वाली शक्ति
एक गहरे स्तर पर
अविभक्त मानी जाती है।
इसे
एक उदाहरण से समझें। बीज के
भीतर वृक्ष की सम्भावना होती
है।
परन्तु
बीज में— न शाखा
दिखाई देती है, न
पत्ते, न फूल, न
फल। फिर भी वृक्ष की
सम्भावना वहाँ उपस्थित है।
उसी
प्रकार परा को वाक्
की ऐसी अवस्था के
रूप में समझा जा
सकता है जहाँ विभाजित
शब्द-रूप अभी प्रकट नहीं हुआ, लेकिन अभिव्यक्ति की सम्पूर्ण सम्भावना
निहित है।
यह
व्याख्या विशेषतः परवर्ती तान्त्रिक और प्रत्यभिज्ञा परम्पराओं
में अधिक विकसित होती
है। भर्तृहरि की अपनी व्यवस्था
में तीन अवस्थाएँ—पश्यन्ती,
मध्यमा और वैखरी—विशेष
रूप से मिलती हैं;
बाद के व्याकरणाचार्यों ने
परा को चौथे स्तर
के रूप में जोड़ा।
इसलिए—
परा को सीधे पाणिनि का सिद्धान्त कहना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
पश्यन्ती
— शब्द को सुनने से पहले देखना
“पश्यन्ती”
का सामान्य व्युत्पत्तिगत संकेत है— जो देखती है। यहाँ “देखना” आँख से देखना
नहीं है।
यह अर्थ का आन्तरिक साक्षात्कार है।
जब कोई कवि कविता
लिखने से पहले उसके
पूरे भाव को भीतर
अनुभव करता है, तब
वह अभी शब्दों को
नहीं लिख रहा।
वह पहले— कविता को भीतर देख रहा है।
जब कोई वैज्ञानिक किसी
सिद्धान्त को सूत्र में
लिखने से पहले उसकी
पूरी संरचना को मन में
देखता है, तब भी
ऐसा ही कुछ होता
है।
जब कोई माँ अपने
बच्चे की ओर देखकर
बिना बोले उसकी आवश्यकता
समझ जाती है, तब
भी अर्थ शब्द से
पहले उपस्थित हो सकता है।
इसीलिए
पश्यन्ती को वाक् की
वह अवस्था माना जा सकता
है जहाँ—
अर्थ
का आन्तरिक रूप उपस्थित है, परन्तु भाषिक विभाजन अभी पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुआ।
भर्तृहरि
की परम्परा में पश्यन्ती को
वाक् की अत्यन्त सूक्ष्म
अवस्था से जोड़ा जाता
है और प्रतिभा के
साथ उसका सम्बन्ध भी
विवेचित किया गया है।
मध्यमा
— विचार से भाषा की ओर
अब वाक् और भीतर
से थोड़ा बाहर आती है।
अर्थ को व्यक्त करने के लिए
मन भाषिक संरचना ग्रहण करने लगता है।
अब—
शब्दों का चयन होता
है, वाक्य की रचना बनती
है, क्रम निर्धारित होता
है, व्याकरण सक्रिय होता है।
लेकिन
अभी बाहरी ध्वनि उत्पन्न नहीं हुई।
इसे
मध्यमा-वाक् की दिशा में
समझा जा सकता है।
यहाँ
वाणी— अर्थ और उच्चारण के बीच का सेतु बन जाती है।
यही
वह स्तर है जहाँ
मनुष्य जानता है— “मुझे क्या
कहना है”
और “इसे किस प्रकार
कहना है।”
इस दृष्टि से मध्यमा को
केवल “मन में बोली
जाने वाली भाषा” कहना
भी अपर्याप्त होगा।
यह उस सम्पूर्ण आन्तरिक
भाषिक गठन की ओर
संकेत करती है जो
उच्चारण से पहले घटित
होता है।
वैखरी
— वाक् का दृश्य और श्रव्य रूप
अब वाक् पूर्णतः व्यक्त
हो जाती है। वक्ता का
श्वास, कण्ठ, जिह्वा, तालु, ओष्ठ और मुख की अन्य
क्रियाएँ मिलकर ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
अब शब्द— सुना जा सकता है। यही वैखरी है।
भर्तृहरि
की परम्परा में वैखरी को
वाक् की वह व्यक्त
अवस्था माना जाता है
जो श्रव्य ध्वनि के रूप में
प्रकट होती है। इसे
ध्वनि के भौतिक स्तर
से भी जोड़ा गया
है।
इसलिए
वाक् की यात्रा को
एक सरल क्रम में
इस प्रकार समझा जा सकता
है—
परा
→ पश्यन्ती → मध्यमा → वैखरी
अर्थात्—
अव्यक्त सम्भावना → अर्थ का आन्तरिक बोध → मानसिक भाषिक गठन → उच्चरित वाणी
लेकिन
यह क्रम आधुनिक मनोविज्ञान
की प्रयोगशाला में प्रमाणित चार
न्यूरल अवस्थाओं का वर्णन नहीं
है।
यह भारतीय वाक्-दर्शन का दार्शनिक मॉडल है।
मौन
भी वाणी हो सकता है
यहाँ
एक अत्यन्त गहरी बात सामने
आती है। हम सामान्यतः सोचते हैं— जहाँ शब्द नहीं, वहाँ वाणी नहीं।
लेकिन
वाक् की सूक्ष्म अवस्थाओं
की दृष्टि से यह निष्कर्ष
बहुत जल्दी निकाल दिया गया निष्कर्ष
होगा।
किसी
व्यक्ति ने कुछ नहीं
कहा।
फिर
भी— उसके भीतर विचार
है। भाव है। अर्थ है। कहने की इच्छा है।
और सम्भवतः एक पूरा वाक्य
भी तैयार है। केवल वैखरी अनुपस्थित है।
इसका
अर्थ यह नहीं कि
“मौन में शब्द सुनाई
दे रहा है।” बल्कि
यह कि—
वाक्
का अस्तित्व उसके बाहरी ध्वनि-रूप से व्यापक माना जा सकता है।
यहीं
भाषा का दर्शन चेतना
के दर्शन से जुड़ने लगता
है।
शब्द
जन्म नहीं लेता — प्रकट होता है?
यदि
वाक् के ये स्तर
स्वीकार किए जाएँ, तो
“शब्द बनता कैसे है?”
इस प्रश्न का रूप भी
बदल जाता है।
सामान्य
दृष्टि कहेगी— पहले मन में
विचार आया। फिर शब्द बना। फिर ध्वनि
निकली।
लेकिन
वाक्-दर्शन इससे अधिक सूक्ष्म
प्रश्न पूछता है— क्या शब्द
वास्तव में “बनता” है?
या कोई पहले से
उपस्थित अर्थ-शक्ति क्रमशः
व्यक्त होती है?
यही
प्रश्न स्फोटवाद से भी जुड़ता
है।
ध्वनि
क्रमिक है। लेकिन अर्थ का बोध
अखण्ड हो सकता है।
वाक्
की चार अवस्थाओं का
सिद्धान्त इस समस्या को
एक और दिशा से
देखता है—
अर्थ
से ध्वनि तक की अभिव्यक्ति क्रमिक हो सकती है, पर मूल वाक् की एकता उससे नष्ट नहीं होती।
पाणिनि
यहाँ कहाँ खड़े हैं?
अब फिर हमें अपने
मूल विषय—पाणिनीय दर्शन—पर लौटना चाहिए।
क्या
पाणिनि ने परा–पश्यन्ती–मध्यमा–वैखरी का सिद्धान्त दिया?
नहीं,
कम-से-कम उस विकसित चार-स्तरीय रूप में नहीं।
पाणिनि
का प्रमुख क्षेत्र है— व्यक्त भाषा की संरचना। वर्ण, प्रत्यय, धातु, पद, विभक्ति, समास,
तद्धित, कृदन्त,
वाक्यगत
प्रयोग— इन सबको नियमबद्ध
करना।
लेकिन
पाणिनीय व्याकरण की यही संरचनात्मक
शक्ति बाद के आचार्यों
को एक बड़ा प्रश्न
पूछने की सुविधा देती
है—
जिस
वाणी का हम व्याकरण बनाते हैं, उसकी सत्ता केवल उच्चरित ध्वनि तक सीमित है या उसका कोई सूक्ष्म आधार भी है?
इसलिए
यहाँ पाणिनि प्रत्यक्ष सिद्धान्तकार से अधिक दार्शनिक आधारभूमि प्रदान करते हैं।
पतञ्जलि
और फिर भर्तृहरि के
यहाँ भाषा की दार्शनिक
समस्या अधिक स्पष्ट होती
जाती है। आधुनिक दार्शनिक
अध्ययनों में भी पाणिनि–पतञ्जलि–भर्तृहरि को भारतीय व्याकरण
की एक ऐसी परम्परा
के रूप में देखा
जाता है जिसने भाषा
की औपचारिक संरचना से आगे अर्थ
और वाक् की दार्शनिक
समस्या को विकसित किया।
चार
वाक् और चार चेतना-अवस्थाएँ — क्या यह समानता है?
भारतीय
परम्परा में बाद के
अनेक चिन्तकों ने वाक् के
इन स्तरों को चेतना की
सूक्ष्म अवस्थाओं से जोड़ा।
परन्तु
यहाँ भी सावधानी आवश्यक
है।
परा
= अवचेतन, पश्यन्ती
= subconscious, मध्यमा
= cognition, वैखरी
= speech production
इस प्रकार सीधी आधुनिक मनोवैज्ञानिक
समानता स्थापित करना उचित नहीं।
ऐसा
करना प्राचीन सिद्धान्त को आधुनिक विज्ञान
की भाषा में अनावश्यक
रूप से सीमित कर
देगा।
हाँ,
तुलनात्मक दृष्टि से हम कह
सकते हैं कि दोनों
में एक रोचक प्रश्न
समान है—
मनुष्य
के भीतर उपस्थित अर्थ बाहरी भाषा में कैसे परिवर्तित होता है?
भारतीय
वाक्-दर्शन इसका उत्तर वाक्
की अभिव्यक्ति-क्रम के माध्यम से
खोजता है।
आधुनिक
विज्ञान इसे मस्तिष्कीय भाषिक
प्रक्रियाओं, संज्ञानात्मक संरचनाओं और speech production के माध्यम से
जाँचता है। दोनों की पद्धतियाँ अलग
हैं।
संवाद
सम्भव है। प्रत्यक्ष समानता का दावा नहीं।
ऋग्वैदिक
“चतुष्पदा वाक्” का एक और महत्त्व
ऋग्वेद
1.164.45 का महत्व केवल चार अवस्थाओं
की संख्या में नहीं है।
उसमें
कहा गया है— तीन
गुप्त हैं। और— मनुष्य चौथे को बोलते हैं।
यह कथन भारतीय परम्परा
में एक अत्यन्त गहरी
भाषिक अनुभूति को जन्म देता
है—
जो
भाषा हम बोलते हैं, वह भाषा की सम्पूर्णता नहीं है।
हमारा
उच्चारण वाक् का दृश्यतम
भाग है। उसके पीछे— अर्थ, ज्ञान, संकल्प, भाषिक संरचना,और सम्भावित रूप
से चेतना के अधिक सूक्ष्म
स्तर— स्थित माने जा सकते
हैं।
यही
कारण है कि वाक्
भारतीय परम्परा में केवल “speech” नहीं
रही।
वह ज्ञान और सत्ता के
बीच का एक महत्त्वपूर्ण
सेतु बन गई।
वाक्
और ज्ञान
यदि
किसी वस्तु का नाम हमें
ज्ञात नहीं है, तो
उसके सम्बन्ध में हमारी वैचारिक
पकड़ भी कई बार
अस्पष्ट रहती है।
नाम
मिलने पर— अनुभव को
वर्ग मिलता है। वर्ग मिलने पर— स्मृति स्थिर
होती है।
स्मृति
स्थिर होने पर— विचार
सम्भव होता है।
विचार
सम्भव होने पर— विवेचन
सम्भव होता है।
इस प्रकार भाषा केवल ज्ञान
की अभिव्यक्ति नहीं करती।
वह ज्ञान को व्यवस्थित करने में भी भाग लेती है।
यहीं
पाणिनीय व्याकरण का महत्त्व फिर
सामने आता है।
व्याकरण
भाषा को नियम देता
है। और नियम भाषा को
संरचना देता है। संरचना अर्थ
को स्पष्टता देती है।
इस
अर्थ में—व्याकरण ज्ञान की अभिव्यक्ति का अनुशासन है।
वाक्
और मन्त्र
वैदिक
परम्परा में वाक् का
सम्बन्ध मन्त्र से भी है।
मन्त्र
केवल अर्थपूर्ण वाक्य नहीं है।
उसमें—
ध्वनि, स्वर, छन्द, उच्चारण, क्रम, और परम्परागत प्रयोग—
सभी का महत्व है।
इसलिए
वैदिक वाणी में ध्वनि
की शुद्धता और अर्थ की
शुद्धता को अलग-अलग
नहीं देखा जा सकता।
यहीं
से व्याकरण, शिक्षा, निरुक्त, छन्द और कल्प
जैसी वेदाङ्गीय परम्पराएँ परस्पर सम्बद्ध दिखाई देती हैं।
व्याकरण
शब्दरूप की रक्षा करता
है।
शिक्षा
उच्चारण और स्वर की।
छन्द
संरचना की।
निरुक्त
अर्थ-व्याख्या की।
इस समूची व्यवस्था में वाक् केवल
बोलने की क्रिया नहीं
रहती—
वह संरक्षित ज्ञान-परम्परा का माध्यम बन जाती है।
वाक्
का अन्तिम रहस्य — शब्द से पहले क्या है?
अब तक हमारी यात्रा—
ध्वनि → शब्द → स्फोट → वाक् तक आ चुकी
है।
लेकिन
अब एक और प्रश्न
खड़ा है—
यदि
वाक् की सबसे सूक्ष्म
अवस्था में शब्द और
अर्थ अभी विभाजित नहीं
हुए, तो वहाँ वास्तव
में क्या उपस्थित है?
क्या
वह केवल अर्थ है? क्या वह केवल चेतना है? क्या वह शब्द-शक्ति है?
या—
क्या भारतीय व्याकरण-दर्शन यहाँ भाषा और सत्ता के बीच कोई मूल एकता देखता है?
भर्तृहरि
के दर्शन में यही प्रश्न
आगे चलकर अत्यन्त गम्भीर
रूप लेता है। उनके
वाक्यपदीय में व्याकरण केवल
भाषा के सही प्रयोग
की विद्या नहीं रह जाता;
वह भाषा, अर्थ और अस्तित्व
के सम्बन्ध की दार्शनिक खोज
बनता है। (यहीं से
अगले भाग की भूमि
तैयार होती है।
अगला
द्वार — शब्दब्रह्म
यदि—
वाक्
केवल ध्वनि नहीं, शब्द केवल उच्चारण नहीं, अर्थ केवल शब्दों का जोड़ नहीं,
और भाषा
केवल संचार नहीं, तो भारतीय व्याकरण-दर्शन का अगला प्रश्न
स्वाभाविक है—
क्या
शब्द स्वयं अस्तित्व की किसी मूल सत्ता का प्रकाश है?
भर्तृहरि
की परम्परा में यह प्रश्न
शब्दब्रह्म की ओर जाता
है।
यहाँ
व्याकरण अचानक ब्रह्मविद्या नहीं बन जाता।
बल्कि एक दार्शनिक संभावना सामने आती है—
यदि
समस्त अनुभव को हम भाषा के माध्यम से जानते और व्यक्त करते हैं, तो भाषा और सत्ता का सम्बन्ध कितना मूलभूत है?
यही
प्रश्न अगले भाग का
केन्द्र होगा।
अर्थात् हमारी
यात्रा अब— ध्वनि से शब्द और— शब्द से वाक् के बाद— वाक्
से शब्दब्रह्म की ओर बढ़ेगी।
और वहीं पाणिनीय दर्शन
का सबसे अद्भुत पक्ष
सामने आएगा—
व्याकरण
केवल भाषा को सही करने का शास्त्र नहीं; वह यह पूछने का माध्यम भी बन सकता है कि मनुष्य भाषा के द्वारा सत्य को जानता कैसे है।
स्रोत
एवं आधार
इस
भाग में ऋग्वेद 1.164.45 के
“चत्वारि वाक् परिमिता पदानि”
मन्त्र, यास्कीय व्याख्या-परम्परा, भर्तृहरि के वाक्यपदीय में वाक् की
अवस्थाओं तथा परवर्ती व्याकरण,
तन्त्र और प्रत्यभिज्ञा परम्पराओं
में विकसित चार-स्तरीय वाक्-विचार को पृथक् ऐतिहासिक
स्तरों पर रखा गया
है। भर्तृहरि के यहाँ पश्यन्ती,
मध्यमा और वैखरी की
त्रिस्तरीय चर्चा तथा परवर्ती आचार्यों
द्वारा परा को जोड़े
जाने का भेद विशेष
रूप से ध्यान में
रखा गया है।
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
पाणिनीय
दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–१२ : वाक् की चार अवस्थाएँ — परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी : मौन से उच्चारण तक की यात्रा
शोध-टिप्पणी : इस भाग में
वैदिक “चतुष्पदा वाक्” और परवर्ती “परा–पश्यन्ती–मध्यमा–वैखरी” सिद्धान्त के बीच ऐतिहासिक
अन्तर को स्पष्ट रखा
गया है। ऋग्वेद में
चार वाक्-पदों का
मूल संकेत मिलता है, जबकि चार
अवस्थाओं के विशिष्ट नाम
और उनका मनो-दर्शनात्मक
विकास बाद की व्याकरण,
तन्त्र और प्रत्यभिज्ञा परम्पराओं
में अधिक स्पष्ट रूप
से मिलता है। भर्तृहरि के
त्रिस्तरीय वाक्-विवेचन को
परवर्ती चतुष्टयी व्यवस्था से अलग रखा
गया है। आधुनिक मनोविज्ञान
या न्यूरोसाइंस के साथ की
गई तुलनाएँ केवल तुलनात्मक हैं;
प्राचीन वाक्-सिद्धान्त को
आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्त का प्रत्यक्ष पूर्वरूप
या वैज्ञानिक रूप से सिद्ध
तथ्य नहीं माना गया
है।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
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