दर्शन -पाणिनीय दर्शन भाग–२ अष्टाध्यायी की संरचना —
पाणिनीय दर्शन
भाग–२
अष्टाध्यायी
की संरचना — भाषा को नियमों में बाँधने की पाणिनीय क्रान्ति
सूत्र
से प्रणाली तक — पाणिनीय व्याकरण की स्थापत्य-कला
पिछले
भाग में हमारा मूल
प्रश्न था— क्या व्याकरण भी दर्शन हो सकता है?
हमने
वहाँ यह सावधानीपूर्वक देखा
कि पाणिनि को बिना परीक्षा
के किसी स्वतंत्र दार्शनिक
मत का संस्थापक घोषित
करना उचित नहीं है।
लेकिन यह भी स्पष्ट
हुआ कि अष्टाध्यायी भाषा
को केवल शब्दों के
संग्रह के रूप में
नहीं, बल्कि नियमबद्ध व्यवस्था के रूप में
ग्रहण करती है।
अब स्वाभाविक अगला प्रश्न है—
वह व्यवस्था बनी कैसे है?
यदि
पाणिनीय व्याकरण को केवल हजारों
सूत्रों का संग्रह मान
लिया जाए, तो उसकी
वास्तविक प्रतिभा दिखाई नहीं देती। अष्टाध्यायी
की शक्ति उसके सूत्रों की
संख्या में नहीं, बल्कि
उन सूत्रों के बीच स्थापित
व्यवस्थात्मक सम्बन्ध में है।
पाणिनि
का आश्चर्य केवल यह नहीं
कि उन्होंने बहुत कुछ कहा;
बल्कि यह है कि
उन्होंने अत्यल्प शब्दों में ऐसी संरचना
निर्मित की जिसमें एक
सूत्र दूसरे सूत्रों के साथ मिलकर
काम करता है।
इसलिए
इस भाग का विषय
स्वयं कोई एक व्याकरणिक
नियम नहीं, बल्कि—
पाणिनीय
व्याकरण की आन्तरिक स्थापत्य-कला है।
अष्टाध्यायी
— ग्रन्थ नहीं, एक कार्यशील प्रणाली
अष्टाध्यायी
के नाम में ही
उसकी मूल संरचना का
संकेत है— आठ अध्याय।
प्रत्येक
अध्याय चार पादों में
विभक्त है। इस प्रकार
पूरा ग्रन्थ एक क्रमबद्ध सूत्र-व्यवस्था के रूप में
सामने आता है।
लेकिन
केवल “आठ अध्याय और
बत्तीस पाद” कह देना
उसकी वास्तविक प्रकृति को नहीं समझाता।
महत्त्वपूर्ण
बात यह है कि—
सूत्र अलग-अलग द्वीप नहीं हैं।
उनके
बीच अधिकार, अनुवृत्ति, संज्ञा और नियम-संबन्धों
के माध्यम से एक प्रकार
का नेटवर्क बनता है।
इस कारण अष्टाध्यायी को
पढ़ना किसी सामान्य पुस्तक
को पढ़ने जैसा नहीं है।
यहाँ
एक सूत्र को समझने के
लिए कभी-कभी उससे
पहले स्थापित किसी संज्ञा या
अधिकार को ध्यान में
रखना पड़ता है। इसका अर्थ है—
पाणिनीय
व्याकरण का अर्थ केवल प्रत्येक सूत्र में नहीं, सूत्रों के पारस्परिक सम्बन्ध में भी निहित है।
यही
इसकी स्थापत्यगत विशेषता है।
सूत्र
की अर्थ-व्यवस्था
पाणिनीय
सूत्र अत्यन्त संक्षिप्त हैं। लेकिन संक्षिप्तता यहाँ केवल साहित्यिक
अलंकार नहीं है।
सूत्रों
में प्रयुक्त तकनीकी पद पहले से
निश्चित अर्थ रखते हैं।
एक बार कोई संज्ञा
निर्धारित हो जाए तो
बाद के अनेक नियमों
में उसी संज्ञा का
पुनः उपयोग किया जा सकता
है।
उदाहरण
के लिए अष्टाध्यायी के
आरम्भिक सूत्रों में— वृद्धिरादैच्। १।१।१ और— अदेङ्
गुणः।१।१।२
जैसे
सूत्र संज्ञात्मक व्यवस्था निर्मित करते हैं।
यहाँ
“वृद्धि” और “गुण” केवल
सामान्य भाषा के शब्द
नहीं रह जाते; वे
पाणिनीय व्याकरण में विशिष्ट तकनीकी
संज्ञाएँ बन जाते हैं।
अर्थात्
पाणिनि पहले— व्याकरण की भाषा बनाते हैं, फिर उसी
भाषा के माध्यम से—
व्याकरण
का वर्णन करते हैं। यह विशेषता
अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
किसी
भी व्यवस्थित विज्ञान में अपने तकनीकी
शब्दों का निर्माण उस
विज्ञान की स्वायत्तता की
दिशा में एक बड़ा
कदम होता है।
संज्ञा
— व्यवस्था का पहला आधार
पाणिनीय
प्रणाली में संज्ञा का महत्त्व अत्यन्त
गहरा है।
संज्ञा
का सरल अर्थ है—
किसी वस्तु या प्रक्रिया को
विशिष्ट नाम देना।
लेकिन
व्याकरण में यह नामकरण
केवल पहचान के लिए नहीं
होता।
संज्ञा
मिलने के बाद वह
वस्तु आगे आने वाले
नियमों के लिए एक
व्यवहारिक इकाई बन जाती है।
उदाहरण
के लिए यदि किसी
विशेष ध्वनि-समूह या व्याकरणिक
घटक को कोई तकनीकी
संज्ञा प्राप्त हो गई, तो
आगे के सूत्र उस
पूरे समूह के लिए
बार-बार लम्बा वर्णन
करने के बजाय उसी
संज्ञा का उपयोग कर
सकते हैं।
इससे
दो बातें होती हैं—
पहली - भाषा का विशाल
पदार्थ छोटी-छोटी तकनीकी
श्रेणियों में व्यवस्थित हो
जाता है।
दूसरी -
एक बार निर्मित संज्ञा
आगे अनेक नियमों में
पुनः प्रयुक्त हो सकती है।
इसलिए
पाणिनीय व्यवस्था में— संज्ञा केवल नाम नहीं; नियमों को चलाने वाली परिचालन इकाई है।
यहाँ
से पाणिनीय व्याकरण की विशिष्ट बौद्धिक
शैली सामने आती है।
अधिकार
— किसी नियम का कार्यक्षेत्र
अब अगली समस्या आती
है।
मान
लें कि एक सूत्र
किसी विशेष परिस्थिति के लिए है।
तो प्रश्न होगा— वह नियम कहाँ तक लागू होगा?
यहीं
अधिकार की संकल्पना महत्त्वपूर्ण
हो जाती है।
अधिकार
को सरल भाषा में
किसी नियम या नियम-समूह के— कार्य-क्षेत्र के रूप में
समझा जा सकता है।
किसी
स्थान पर स्थापित कोई
विषय या नियम आगे
आने वाले सूत्रों पर
तब तक प्रभाव डाल
सकता है जब तक
उसका अधिकार समाप्त या परिवर्तित न
हो जाए।
इससे
सूत्रों की पुनरावृत्ति कम
होती है।
पाणिनि
को हर सूत्र में
बार-बार यह नहीं
कहना पड़ता कि— “यह नियम
इसी प्रसंग में लागू है।”
पूर्व
स्थापित अधिकार आगे की सामग्री
को संदर्भ देता है।
इस प्रकार— एक सूत्र की शक्ति उसके शब्दों से आगे उसके अधिकार-क्षेत्र तक फैलती है।
यह पाणिनीय स्थापत्य का दूसरा महत्वपूर्ण
स्तम्भ है।
अनुवृत्ति
— जो कहा गया, वह आगे भी चलता है
अष्टाध्यायी
की संक्षिप्तता को समझने के
लिए अनुवृत्ति की भूमिका अत्यन्त
महत्वपूर्ण है।
सरल
रूप में— पूर्व सूत्र
का कोई पद या
आशय आगे के सूत्र
में बिना पुनः लिखे
ग्रहण किया जाता है।
इससे
पाणिनि को बार-बार
समान सामग्री लिखने की आवश्यकता नहीं
रहती।
लेकिन
यहाँ केवल लेखन की
बचत नहीं हो रही।
अनुवृत्ति
के कारण सूत्र एक-दूसरे से सक्रिय रूप से जुड़े रहते हैं।
इसलिए
अष्टाध्यायी को अकेले-अलग
सूत्रों की पुस्तक समझना
कठिन है।
यह अधिक उपयुक्त होगा
कि इसे— परस्पर सम्बद्ध नियम-प्रणाली के रूप में
समझा जाए।
यही
कारण है कि अष्टाध्यायी
का अध्ययन करते समय केवल
किसी एक सूत्र का
शब्दार्थ जान लेना पर्याप्त
नहीं होता।
यह जानना भी आवश्यक है
कि— उसमें क्या अनुवर्तित हो रहा है?
परिभाषा
— नियमों को पढ़ने का नियम
पाणिनीय
व्याकरण में केवल नियम
ही नहीं हैं।
नियमों
को समझने और उनके पारस्परिक
सम्बन्ध को निर्धारित करने
वाली परम्परा भी है।
इसी
क्षेत्र में परिभाषा अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती है।
परिभाषाएँ
सामान्यतः उन परिस्थितियों में
मार्गदर्शन करती हैं जहाँ—
अनेक
नियम सामने हों, किसी नियम
की सीमा स्पष्ट करनी
हो,नियमों के पारस्परिक सम्बन्ध
का निर्णय करना हो,या
किसी सूत्र के प्रयोग की
पद्धति समझनी हो।
यहाँ
एक अत्यन्त रोचक बौद्धिक स्थिति
बनती है—
व्याकरण
के नियमों के ऊपर नियमों की व्याख्या और संचालन की एक दूसरी व्यवस्था भी कार्य करती है।
अर्थात्
पाणिनीय परम्परा केवल— नियम नहीं देती, बल्कि— नियमों को समझने की बुद्धि भी विकसित करती
है।
यही
वह बिन्दु है जहाँ व्याकरण
एक अत्यन्त परिपक्व शास्त्रीय प्रणाली के रूप में
दिखाई देता है।
सामान्य
और विशेष — नियमों का संघर्ष
किसी
भी नियम-व्यवस्था में
एक स्वाभाविक समस्या होती है।
यदि
दो नियम एक ही
परिस्थिति पर लागू होते
दिखाई दें तो— कौन-सा नियम प्रभावी होगा?
पाणिनीय
प्रणाली में ऐसी समस्याओं
से निपटने के लिए नियमों
की पारस्परिक प्राथमिकता और कार्यक्षेत्र का
विचार आवश्यक होता है।
यहाँ
व्याकरण केवल “नियम A” और “नियम B” नहीं
कहता।
प्रश्न
यह बनता है— दोनों
में सम्बन्ध क्या है?
कौन-सा नियम किस
परिस्थिति में लागू है?
क्या
कोई विशेष नियम सामान्य नियम
को सीमित करता है?
क्या
कोई पूर्ववर्ती व्यवस्था बाद की व्यवस्था
से परिवर्तित होती है?
इस प्रकार पाणिनीय व्याकरण में— नियमों का संगठन स्वयं एक विषय बन जाता है।
यही
उसकी प्रणालीगत प्रकृति है।
पाणिनीय
संक्षिप्तता — न्यूनतम में अधिकतम
पाणिनीय
प्रणाली की एक अद्भुत
विशेषता उसकी अर्थ-आर्थिकता है।
जहाँ
एक सामान्य लेखक किसी बात
को बार-बार स्पष्ट
करेगा, वहाँ पाणिनि—
एक संज्ञा, एक अधिकार, एक
अनुवृत्ति,या— एक
संक्षिप्त सूत्र के माध्यम से आगे के
अनेक नियमों को प्रभावित कर
सकते हैं।
इसका
परिणाम है— कम शब्दों में अत्यधिक कार्य।
इसे
केवल “संक्षिप्त लेखन” कहना उचित नहीं
होगा। यह एक प्रकार की—
संरचनात्मक अर्थ-व्यवस्था है।
अर्थात्
पाणिनि सूत्र लिखते समय केवल यह
नहीं सोचते कि— “क्या
कहना है?”
बल्कि
उनकी पूरी प्रणाली यह
भी पूछती हुई प्रतीत होती
है—
“कितना
कम कहकर अधिकतम नियम-व्यवस्था संचालित की जा सकती है?”
यही
पाणिनीय सूत्र-शैली की असाधारण
शक्ति है।
शिवसूत्र
और तकनीकी संक्षिप्तता
पाणिनीय
प्रणाली में ध्वनियों के
संगठन के लिए शिवसूत्र
अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
उनकी
सहायता से आगे प्रत्याहारों
का निर्माण सम्भव होता है।
लेकिन
इस भाग का विषय
प्रत्याहार की विस्तृत व्याख्या
नहीं है—वह भाग–४ का स्वतंत्र
विषय रहेगा।
यहाँ
केवल प्रणालीगत दृष्टि से इतना देखना
पर्याप्त है कि—
पाणिनीय
व्यवस्था किसी विशाल सूची
को हर बार पूर्ण
रूप में दोहराने के
बजाय उसके लिए एक
अत्यन्त संक्षिप्त संकेत-पद्धति निर्मित करती है।
यह उसी व्यापक सिद्धान्त
का उदाहरण है जिसे हम
पूरे अष्टाध्यायी-तन्त्र में देख रहे
हैं—
विशाल
भाषिक सामग्री को छोटी, पुनःप्रयोज्य तकनीकी इकाइयों में बदलना।
यही
कारण है कि अष्टाध्यायी
की भाषा पहली दृष्टि
में कठिन लगती है,
लेकिन एक बार इसकी
प्रणाली समझ में आने
लगे तो उसकी संक्षिप्तता
ही उसकी शक्ति दिखाई
देती है।
अष्टाध्यायी
का स्थापत्य — ऊपर से नीचे नहीं, जाल की तरह
सामान्य
ग्रन्थ में हम प्रायः—
अध्याय १ → अध्याय २
→ अध्याय ३ → अध्याय ४
की रैखिक गति से चलते
हैं।
लेकिन
अष्टाध्यायी को केवल इसी
प्रकार पढ़ना पर्याप्त नहीं।
क्योंकि
किसी सूत्र का अर्थ और
प्रयोग कई बार— पूर्ववर्ती
संज्ञाओं, अधिकारों, अनुवृत्तियों, तकनीकी पदों, और नियम-संबन्धों
पर निर्भर करता है।
इसलिए
अष्टाध्यायी की संरचना को
एक— परस्पर सम्बद्ध तन्त्र के रूप में
समझना अधिक उपयोगी है।
यहाँ
“पाठ” केवल आगे बढ़ता
नहीं; पाठ अपने भीतर सम्बन्धों का जाल बनाता है।
यही
कारण है कि पाणिनीय
व्याकरण का अध्ययन केवल
सूत्र-कण्ठस्थ करने से पूर्ण
नहीं होता।
व्याकरण
में “मेटा-भाषा” की सम्भावना
यहाँ
एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विचार सामने आता है।
पाणिनि
भाषा का व्याकरण लिखने
के लिए स्वयं एक
तकनीकी भाषा का प्रयोग
करते हैं।
अर्थात्—
भाषा के बारे में बात करने के लिए एक विशिष्ट व्याकरणिक भाषा निर्मित होती है।
उदाहरणतः—
संज्ञा, इत्, अधिकार, प्रत्यय,
धातु,
आदि
पद सामान्य बोलचाल में जिस अर्थ
में आते हैं, पाणिनीय
तन्त्र में वे विशेष
तकनीकी अर्थ ग्रहण कर
सकते हैं।
इससे
एक स्तर-विभाजन दिखाई
देता है—
प्रथम
स्तर भाषा का वास्तविक
प्रयोग।
द्वितीय
स्तर उस प्रयोग का
व्याकरणिक विश्लेषण।
तृतीय
स्तर उस विश्लेषण को
नियंत्रित करने वाली तकनीकी
व्यवस्था।
यह विभाजन आगे के पाणिनीय
दर्शन के लिए अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण होगा।
लेकिन
अभी हम इसका केवल
स्थापत्यगत पक्ष देख रहे
हैं।
अष्टाध्यायी
में “प्रक्रिया” का महत्व
पाणिनीय
व्याकरण को केवल परिणामों
की सूची समझना गलत
होगा।
व्याकरण
में यह महत्त्वपूर्ण है
कि किसी रूप की—
सिद्धि कैसे हुई।
अर्थात्
केवल अन्तिम शब्दरूप नहीं, बल्कि उसके निर्माण की
प्रक्रिया भी महत्त्वपूर्ण है।
यहीं
से व्याकरण एक प्रकार की—
प्रक्रियात्मक बुद्धि प्रकट करता है।
एक आधार से दूसरा
रूप कैसे प्राप्त होता
है?
कौन-सा प्रत्यय जुड़ता
है? कहाँ परिवर्तन होता
है? कहाँ कोई ध्वनि
लुप्त होती है? कौन-सा नियम सक्रिय
होता है?
इस प्रकार पाणिनीय प्रणाली में भाषा— स्थिर
वस्तु से अधिक— नियमों
के माध्यम से उत्पन्न होने वाली प्रक्रिया
के रूप में दिखाई
देती है।
इस विचार का विस्तृत रूप
हम भाग–३ में
शब्द-रचना के प्रसंग
में देखेंगे।
अष्टाध्यायी
और वैज्ञानिक पद्धति — कितनी दूर तक?
यहाँ
एक आधुनिक प्रश्न उठ सकता है—
क्या
अष्टाध्यायी को वैज्ञानिक प्रणाली
कहा जा सकता है?
यदि
“वैज्ञानिक” का अर्थ— अवलोकन,
वर्गीकरण, नियम-निर्धारण और
व्यवस्थित व्याख्या
जैसी
विशेषताओं से है, तो
पाणिनीय व्याकरण में ऐसी कई
विशेषताएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।
लेकिन
यदि “विज्ञान” से हम आधुनिक
प्रयोगशाला-आधारित empirical science का अर्थ लें,
तो पाणिनीय व्याकरण को उसी अर्थ
में आधुनिक विज्ञान कहना ऐतिहासिक रूप
से अनुचित होगा।
इसलिए
अधिक सावधान निष्कर्ष होगा—
अष्टाध्यायी
एक अत्यन्त विकसित औपचारिक और नियमबद्ध शास्त्रीय प्रणाली है।
आधुनिक
विज्ञान अथवा formal grammar से इसकी तुलना
बाद में की जा
सकती है।
यही
कारण है कि इस
श्रृंखला में आधुनिक भाषाविज्ञान
का विस्तृत तुलनात्मक अध्ययन भाग–१३ के
लिए सुरक्षित रखा गया है।
क्या
पाणिनि ने भाषा को “मशीन” बना दिया?
आधुनिक
पाठक कभी-कभी पाणिनीय
प्रणाली की नियमबद्धता देखकर
कह सकता है—
“क्या
पाणिनि ने भाषा को
एक मशीन की तरह
बना दिया?”
यह उपमा आकर्षक है,
लेकिन सावधानी माँगती है।
भाषा
मनुष्य का जीवित व्यवहार
है।
पाणिनीय
व्याकरण भाषा को समाप्त
नहीं करता; वह उसके भीतर
कार्यरत नियमितताओं को व्यवस्थित करता
है।
इसलिए
अधिक उपयुक्त कथन होगा—
पाणिनि
ने भाषा को मशीन नहीं बनाया; उन्होंने भाषा की नियमबद्धता को इतनी सूक्ष्मता से निरूपित किया कि वह एक औपचारिक प्रणाली की तरह विश्लेषणीय हो गई।
यह अन्तर अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
पाणिनीय
प्रणाली में अर्थ-व्यवस्था का पहला संकेत
यद्यपि
इस भाग का मुख्य
विषय संरचना है, फिर भी
एक सीमा तक अर्थ
का प्रश्न यहाँ से दिखाई
देता है।
क्योंकि
कोई भी नियम—
किसी
वस्तु को किसी दूसरी
वस्तु से जोड़ता है,
किसी
प्रक्रिया को किसी परिस्थिति
में लागू करता है,
या—
किसी
रूप को किसी विशेष
श्रेणी में रखता है।
अर्थात्
व्याकरणिक व्यवस्था पूरी तरह अर्थ-विहीन यांत्रिक संरचना नहीं है।
लेकिन
शब्द और अर्थ के
वास्तविक सम्बन्ध की विस्तृत चर्चा
भाग–८ में होगी।
इसलिए
अभी केवल इतना कहना
पर्याप्त है—
पाणिनीय
प्रणाली में संरचना और अर्थ के बीच सम्बन्ध की सम्भावना प्रारम्भ से उपस्थित है, पर उसका दार्शनिक विस्तार बाद के भागों में होगा।
पाणिनीय
स्थापत्य की दार्शनिक सम्भावना
अब हम भाग–१
के प्रश्न को एक नये
स्तर पर रख सकते
हैं।
भाग–१ में हमने
पूछा था— क्या व्याकरण दर्शन हो सकता है?
अब भाग–२ के
बाद हमारे पास एक अधिक
ठोस आधार है।
पाणिनीय
व्याकरण—
संज्ञाएँ
बनाता है, नियमों का
क्षेत्र निर्धारित करता है, पूर्ववर्ती
सामग्री को आगे ले
जाता है, नियमों के
सम्बन्ध को व्यवस्थित करता
है, भाषिक घटकों को वर्गीकृत करता
है, और रूप-सिद्धि
की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता
है।
इससे
कम-से-कम इतना
तो स्पष्ट है कि— यह
केवल शब्दों की सूची नहीं है। यह
एक— व्यवस्थित ज्ञान-तन्त्र है। लेकिन क्या हर व्यवस्थित
ज्ञान-तन्त्र दर्शन होता है? नहीं।
यही हमारी अगली परीक्षा है।
कठोर
परीक्षा — क्या “व्यवस्था” ही दर्शन है?
आपत्ति
यदि
किसी शास्त्र में नियम और
व्यवस्था हो तो उससे
उसे दर्शन नहीं कहा जा
सकता।
गणित
में भी नियम हैं।
छन्दशास्त्र में
भी नियम हैं। वास्तुशास्त्र में भी
नियम हैं।
तो केवल पाणिनीय व्याकरण
की नियमबद्धता उसे दर्शन कैसे
बना सकती है?
समाधान
नियमबद्धता
अकेले दर्शन का प्रमाण नहीं
है।
किन
पाणिनीय व्याकरण का प्रश्न केवल—
“कौन-सा रूप सही
है?” तक सीमित नहीं
रहता।
उसकी
प्रणाली भाषा की इकाइयों,
उनके सम्बन्धों, प्रक्रियाओं और अर्थ-सापेक्ष
प्रयोग की ओर बढ़ती
है।
जब यही प्रश्न आगे—
शब्द क्या है?
वाक्य
क्या है?
अर्थ
कैसे प्रकट होता है?
शब्द
और ज्ञान का सम्बन्ध क्या
है?
तक पहुँचते हैं, तब दार्शनिक
क्षेत्र खुलता है।
अतः—
अष्टाध्यायी
की संरचना स्वयं पूर्ण दर्शन का प्रमाण नहीं है; वह दर्शन की सम्भावना का संरचनात्मक आधार है।
यह अधिक कठोर और
सुरक्षित निष्कर्ष है।
इस
भाग में क्या स्थापित हुआ?
इस भाग में हमने
किसी एक व्याकरणिक विषय
की विस्तारपूर्वक व्याख्या नहीं की।
हमने
अष्टाध्यायी की स्थापत्य-व्यवस्था को देखा।
मुख्यतः—
संज्ञा, अधिकार, अनुवृत्ति,
परिभाषात्मक व्यवस्था,
नियमों का
पारस्परिक सम्बन्ध ,सूत्र-संक्षिप्तता, प्रक्रियात्मकता, तकनीकी
भाषा इनके माध्यम से
यह स्पष्ट हुआ कि अष्टाध्यायी
को एक—
कार्यशील
नियम-तन्त्र के रूप में
समझना चाहिए। और यही अगले प्रश्न
की भूमि तैयार करता
है।
अगले
भाग की ओर — शब्द बनता कैसे है?
अब हमारे सामने एक स्वाभाविक प्रश्न
खड़ा है।
यदि
पाणिनि ने भाषा को
नियमों में व्यवस्थित किया,
तो— भाषा की मूल इकाई “शब्द” उनके यहाँ बनती कैसे है?
क्या
शब्द कोई पहले से
पूर्ण वस्तु है?
या—
धातु, प्रकृति, प्रत्यय, विभक्ति, और अन्य प्रक्रियाओं
के माध्यम से उसका रूप
निर्मित होता है?
यहीं
से हम अष्टाध्यायी की
स्थापत्य-कला से उसके
रूपनिर्माण-विज्ञान में प्रवेश करेंगे।
अगला
भाग इसलिए केवल “धातु और प्रत्यय”
की व्याकरणिक सूची नहीं होगा।
उसका
मूल दार्शनिक प्रश्न होगा—
क्या
शब्द पहले से विद्यमान है, या व्याकरणीय प्रक्रिया से उसकी अभिव्यक्ति निर्मित होती है?
यहीं
से पाणिनीय दर्शन की यात्रा— व्यवस्था
से शब्दरचना की ओर आगे
बढ़ेगी।
समापन
भाग–१ में हमने
अष्टाध्यायी को दर्शन की
सम्भावना का द्वार माना
था।
भाग–२ में हमने
उस द्वार की स्थापत्य-कला देखी।
अब यह स्पष्ट है
कि पाणिनि की शक्ति केवल
सूत्रों की संख्या में
नहीं, बल्कि उनके बीच निर्मित
सम्बन्धों में है।
एक संज्ञा आगे अनेक नियमों
को संचालित कर सकती है।
एक अधिकार अनेक सूत्रों को
एक प्रसंग में बाँध सकता
है।
एक अनुवृत्ति अनेक बार लिखे
जाने वाले पद को
बचा सकती है।
एक परिभाषात्मक व्यवस्था अनेक नियमों के
सम्बन्ध को स्पष्ट कर
सकती है।
और इन सबके भीतर
एक बड़ी बौद्धिक आकांक्षा
दिखाई देती है—
भाषा
की अनन्त विविधता को एक व्यवस्थित तन्त्र में समझना।
यही
पाणिनीय क्रान्ति का पहला स्पष्ट
रूप है।
लेकिन
अभी हमने केवल— व्यवस्था
देखी है।
अब हमें देखना है—
उस व्यवस्था में शब्द जन्म कैसे लेता है?
यही
प्रश्न पाणिनीय दर्शन को उसके अगले
चरण में ले जाएगा।
नोट
: इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग
पाणिनीय दर्शन के एक स्वतंत्र
और नये पक्ष का
अध्ययन करता है। पूर्ववर्ती
भागों में विवेचित विषयों
की अनावश्यक पुनरावृत्ति नहीं की जाएगी।
अष्टाध्यायी को मूल आधार,
वार्तिक और महाभाष्य को
प्राथमिक व्याख्यात्मक आधार तथा परवर्ती
व्याकरण-दर्शन को दार्शनिक विकास
के रूप में ग्रहण
किया जाएगा। माधवाचार्यकृत सर्वदर्शनसंग्रह का उपयोग तुलनात्मक
एवं ऐतिहासिक स्रोत के रूप में
किया जाएगा।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
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