दर्शन — मीमांसा दर्शन भाग–४ : शब्द और वाक्य — मीमांसा की भाषादृष्टि

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भाग : शब्द और वाक्यमीमांसा की भाषादृष्टि

यदि वेद धर्म का प्रमाण है, तो वैदिक शब्द अर्थ का बोध कैसे कराता है?

पिछले भाग में हमारी यात्रा एक निर्णायक बिन्दु तक पहुँची थी।

धर्म प्रत्यक्ष नहीं है। इसलिए उसके ज्ञान के लिए एक विशेष प्रमाण की आवश्यकता है। मीमांसा ने उस प्रमाण के रूप में वेद को स्वीकार किया और वेद की प्रमाणिकता को अपौरुषेयता तथा उसके स्वतःप्रामाण्य से जोड़ा।

लेकिन यहाँ एक नई समस्या सामने आती है।

वेद प्रमाण हैयह मान भी लें, तो प्रश्न रहेगा

वेद का शब्द हमें धर्म का ज्ञान कैसे कराता है?

किसी शब्द को सुनना और उसके अर्थ को जान लेना दो अलग घटनाएँ हैं।

यदि कोई कहे— “गौः

तो सुनने वालागौका अर्थ कैसे जानता है?

और यदि कोई पूरा वाक्य सुने— “अग्निहोत्रं जुहुयात्।

तो उसे यह कैसे बोध होता है कि यहाँ केवल किसी वस्तु का वर्णन नहीं, बल्कि एक कर्तव्य का विधान किया जा रहा है?

यहीं मीमांसा का भाषादर्शन आरम्भ होता है।

मीमांसा के लिए भाषा केवल विचारों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने का साधन नहीं है।

भाषा धर्म के ज्ञान का माध्यम है।

और जब धर्म का प्रमाण वेद है, तब वेद की भाषा को समझना स्वयं धर्ममीमांसा का अनिवार्य अंग बन जाता है।

 

शब्द केवल ध्वनि है या ज्ञान का साधन?

हम सामान्य जीवन में शब्द सुनते हैं।

ध्वनि कान तक पहुँचती है और कुछ ही क्षण में समाप्त हो जाती है।

यदि शब्द केवल क्षणिक ध्वनि है, तो एक गम्भीर प्रश्न उठता है

वह ध्वनि समाप्त हो जाने के बाद भी अर्थ का ज्ञान कैसे उत्पन्न करती है?

जब कोई व्यक्तिजलशब्द बोलता है, तो ध्वनि कुछ क्षण बाद समाप्त हो जाती है।

लेकिन सुनने वाले के मन मेंजलका अर्थ उपस्थित हो जाता है।

इसलिए मीमांसा के सामने समस्या केवल ध्वनि की नहीं है।

उसे यह समझना हैवह क्या है जो शब्द को अर्थबोध का साधन बनाता है?

यहीं से शब्द के स्वरूप का दार्शनिक परीक्षण आरम्भ होता है।

 

ध्वनि और शब्द में अन्तर

मीमांसा की भाषादृष्टि मेंउच्चारित ध्वनिऔरशब्दको एक ही वस्तु मान लेना उचित नहीं है।

जो ध्वनि मुख से निकलती है, वह कालविशिष्ट और क्षणभंगुर दिखाई देती है।

लेकिन यदि शब्द केवल वही ध्वनि होता, तो प्रत्येक उच्चारण के साथ शब्द भी नया होना चाहिए।

फिर प्रश्न उठता

एक ही शब्द को अलग-अलग व्यक्ति बोलें तो हम उन्हें एक ही शब्द क्यों समझते हैं?

एक व्यक्ति कहे— “अग्नि।

दूसरा भी कहे— “अग्नि।

दोनों की आवाज़ अलग है।

उनकी ध्वनि की तीव्रता अलग हो सकती है।

उच्चारण का समय अलग है।

फिर भी श्रोता दोनों में एक ही शब्द पहचानता है।

इससे मीमांसा को यह विचार विकसित करने का आधार मिलता है कि

उच्चारण की ध्वनियाँ शब्द की अभिव्यक्ति करती हैं; शब्द को केवल क्षणिक ध्वनि में सीमित नहीं किया जा सकता।

यहीं शब्दनित्यत्व की दिशा खुलती है।

 

शब्द नित्य क्यों माना जाए?

मीमांसा की शब्द-दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष हैशब्द नित्य है।

यहाँनित्यका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक उच्चारित ध्वनि कभी समाप्त नहीं होती।

उच्चारित ध्वनि तो समाप्त होती दिखाई देती है।

नित्यत्व उस शब्दतत्त्व का है जिसे विभिन्न उच्चारणों में पहचाना जाता है।

उदाहरण के लिएगौशब्द को अनेक लोग अनेक बार बोल सकते हैं।

उच्चारण अलग-अलग होंगे।

लेकिन शब्द का बोध एक ही रहेगा।

यदि शब्द प्रत्येक बार नया उत्पन्न होता, तो पूर्व में सुने हुए शब्द और वर्तमान शब्द में एकत्व का बोध कैसे सम्भव होता?

मीमांसा इसी प्रकार के तर्क से शब्द की नित्यता का समर्थन करती है।

 

शब्द उत्पन्न होता है या अभिव्यक्त?

यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रश्न आता है।

यदि शब्द नित्य है, तो बोलने पर होता क्या है?

क्या वक्ता नया शब्द बनाता है?

मीमांसा की दिशा में उत्तर होगा

वक्ता शब्द को उत्पन्न नहीं करता; वह शब्द को अभिव्यक्त करता है।

उच्चारण शब्द की अभिव्यक्ति का कारण बनता है।

जैसे किसी वस्तु पर प्रकाश पड़ने से वह दिखाई देने लगती है, वैसे ही उच्चारण से शब्द का बोध सम्भव होता है।

इस दृष्टि सेध्वनिशब्द की अभिव्यक्तिअर्थबोध का सम्बन्ध समझा जा सकता है।

यहाँ ध्वनि और शब्द की पूर्ण अभिन्नता स्वीकार नहीं की जाती।

 

शब्द और अर्थ का सम्बन्ध

अब दूसरी समस्या सामने आती है।

मान लें कि शब्द एक विशिष्ट सत्ता है।

लेकिन वह अर्थ से कैसे जुड़ता है?

जब हमगौकहते हैं, तो गौ का बोध क्यों होता है?

जबघटकहते हैं, तो घट का बोध क्यों होता है?

क्या शब्द और अर्थ के बीच सम्बन्ध मनुष्य ने बनाया है?

यदि मनुष्य ने बनाया है, तो किसने पहली बार बनाया?

और यदि यह सम्बन्ध मनमाना है, तो अलग-अलग मनुष्य अलग-अलग अर्थ क्यों ग्रहण करें?

मीमांसा के लिए यह प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

शब्द और अर्थ का सम्बन्ध केवल व्यक्तिगत समझौता नहीं हो सकता।

इसीलिए मीमांसा शब्द-अर्थ-सम्बन्ध को नित्य मानने की दिशा में जाती है।

 

 शब्द-अर्थ सम्बन्ध नित्य क्यों?

यदि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध किसी मनुष्य द्वारा बनाया गया होता, तो उस सम्बन्ध की पहली स्थापना के लिए किसी पूर्वज्ञान की आवश्यकता होती।

मान लें किसी व्यक्ति नेगौशब्द को गौ के अर्थ में प्रयुक्त किया।

प्रश्न होगाउस व्यक्ति को कैसे पता चला किगौशब्द इसी अर्थ का द्योतक है?

यदि उसने किसी दूसरे से सीखा, तो वही प्रश्न उस दूसरे व्यक्ति पर भी लागू होगा।

इस प्रकार केवल मानवीय संकेत से शब्द-अर्थ सम्बन्ध की अंतिम व्याख्या कठिन हो जाती है।

मीमांसा इसलिए शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को मनुष्य-निर्मित आकस्मिक सम्बन्ध मानकर एक नित्य सम्बन्ध के रूप में देखती है।

इस सिद्धान्त का महत्त्व वेद के सन्दर्भ में और बढ़ जाता है।

क्योंकि यदि शब्द-अर्थ सम्बन्ध मानवीय रचना है, तो अपौरुषेय वेद की भाषा की प्रमाणिकता पर प्रश्न उठ सकता है।

 

वेद और शब्द की नित्यता

अब पिछले भाग की चर्चा यहाँ लौटती है।

वेद अपौरुषेय है।

लेकिन यदि वेद शब्दों से बना है, तो उन शब्दों का स्वरूप क्या है?

यदि शब्द प्रत्येक बार नया उत्पन्न होता है, तो अपौरुषेय वेद की अवधारणा को समझाना कठिन हो सकता है।

मीमांसा के लिए इसलिए शब्द की नित्यता केवल भाषादर्शन का प्रश्न नहीं है।

यह वेद-प्रामाण्य की दार्शनिक संरचना से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

इस प्रकारवेद की अपौरुषेयताशब्द की नित्यताशब्द-अर्थ सम्बन्ध की नित्यता

एक-दूसरे से गहरे रूप में जुड़े दिखाई देते हैं।

 

क्या प्रत्येक शब्द अकेले वाक्य का अर्थ देता है?

अब हम शब्द से वाक्य की ओर बढ़ते हैं।

मान लें किसी वाक्य में चार शब्द हैं।

यदि प्रत्येक शब्द का अपना अर्थ है, तो क्या चार अर्थों को जोड़ देना ही वाक्य का अर्थ है?

उदाहरण के लिए

देवदत्तः ग्रामं गच्छति।

यहाँदेवदत्तः, ग्रामम्, गच्छति तीनों का अपना अर्थ है।

लेकिन इन तीनों अलग-अलग शब्दों को जान लेना पर्याप्त नहीं है।

वाक्य सुनते ही हमें एक सम्बन्धित अर्थ का बोध होता हैदेवदत्त गाँव जाता है।

तो प्रश्न हैयह सम्बन्धित अर्थ कैसे उत्पन्न हुआ?

यहीं मीमांसा का वाक्यविचार अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है।

 

वाक्य केवल शब्दों का समूह नहीं

वाक्य में शब्द अलग-अलग अर्थ रखते हैं।

लेकिन वाक्य का अर्थ केवल शब्दार्थों का ढेर नहीं होता।

शब्दों के बीच एक सम्बन्ध स्थापित होता है।

यदि कोई कहे— “ग्रामं देवदत्तः गच्छति।

तो क्रम बदलने पर भी अर्थ बना रहता है।

इससे स्पष्ट होता है कि केवल शब्दों का क्रम ही अर्थ का आधार नहीं है।

वाक्य में शब्दों का पारस्परिक सम्बन्ध अधिक महत्त्वपूर्ण है।

मीमांसा इस सम्बन्धित अर्थबोध को समझने के लिए कई शर्तों पर विचार करती है।

इनमें प्रमुख हैंआकांक्षा, योग्यता, सन्निधि / आसत्ति

ये तीनों आगे वाक्यबोध की मीमांसा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होंगी।

 

आकांक्षाशब्दों की पारस्परिक अपेक्षा

जब हम कोई शब्द सुनते हैं, तो कभी-कभी वह अपने आप पूर्ण अर्थ नहीं देता।

उदाहरण के लिए कोई कहे— “देवदत्तः...”

तो सुनने वाले के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठ सकता हैदेवदत्तः क्या करता है?

यहाँ एक शब्द दूसरे शब्द की अपेक्षा करता है।

इसी को मीमांसा की भाषा मेंआकांक्षा कहा जाता है।

अर्थात् वाक्य के शब्दों में ऐसी पारस्परिक अपेक्षा होती है जिसके कारण वे मिलकर एक पूर्ण अर्थ की ओर ले जाते हैं।

वाक्यबोध में आकांक्षा का अर्थ केवल मानसिक उत्सुकता नहीं है।

यह शब्दों की ऐसी अर्थगत अपेक्षा है जिसके बिना पूर्ण वाक्यार्थ का निर्माण नहीं होता।

 

योग्यताअर्थों का संगत होना

अब मान लें शब्दों में परस्पर अपेक्षा है।

फिर भी वाक्य का अर्थ तभी बनेगा जब शब्दों के अर्थों में संगति हो।

यदि कोई कहे— “अग्निना सिञ्चेत्।शब्दों का अर्थ हम जान सकते हैं।

लेकिन अग्नि से सींचना सामान्य अर्थ-संगति के स्तर पर समस्या उत्पन्न करता है।

यहाँ शब्दार्थों के बीच अपेक्षित सम्बन्ध नहीं बनता।

इसीलिए वाक्यबोध के लिएयोग्यता आवश्यक है।

योग्यता का अर्थ हैशब्दों के अर्थों में ऐसी संगति जो वाक्यार्थ को सम्भव बनाए।

 

सन्निधि या आसत्ति

तीसरी आवश्यकता हैसन्निधि।

यदि वाक्य के शब्द इतने अलग-अलग समय पर बोले जाएँ कि उनके बीच कोई अर्थगत सम्बन्ध स्थापित हो सके, तो वाक्यबोध कठिन हो जाएगा।

उदाहरण के लिएकोई आज एक शब्द बोले, कल दूसरा, और कई दिनों बाद तीसरा।

हम उन्हें अलग-अलग शब्दों के रूप में तो जान सकते हैं, लेकिन सामान्यतः एक ही वाक्य का अर्थ सहज रूप से नहीं बनेगा।

इसलिए वाक्यबोध के लिए शब्दों की उचित निकटता या सन्निधि आवश्यक है।

मीमांसा की वाक्य-मीमांसा में इसका महत्त्व है।

 

वाक्यबोध की त्रयी

इस प्रकार सामान्य रूप में वाक्यार्थ-बोध के लिए तीन प्रमुख शर्तें सामने आती हैं

आकांक्षा - शब्दों में परस्पर अपेक्षा हो।

योग्यता - उनके अर्थों में संगति हो।

सन्निधि / आसत्ति - शब्द उचित निकटता में हों।

इन तीनों के बिना शब्दों का समूह पूर्ण वाक्यबोध नहीं दे सकता।

यह मीमांसा के भाषादर्शन की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

भाषा को केवल शब्दों की सूची मानकर वह सम्बन्धित अर्थ की संरचना के रूप में देखती है।

 

शब्द से वाक्य तकएक दार्शनिक परिवर्तन

यहाँ मीमांसा की भाषा-दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन समझना चाहिए।

पहला प्रश्न थाशब्द अर्थ कैसे देता है?

अब प्रश्न हो गयाशब्द मिलकर वाक्यार्थ कैसे देते हैं?

यह परिवर्तन छोटा नहीं है।

क्योंकि किसी शब्द का अर्थ जान लेना और पूरे वाक्य का तात्पर्य समझ लेना एक ही बात नहीं है।

विशेषतः वैदिक वाक्यों में यह समस्या और अधिक जटिल हो जाती है।

वहाँ एक छोटा-सा अर्थभेद पूरे कर्म-विधान को बदल सकता है।

इसलिए मीमांसा के लिए भाषाविचार केवल भाषाशास्त्र नहीं है।

यह धर्मनिर्णय का उपकरण है।

 

वैदिक वाक्य में अर्थ की विशेष समस्या

सामान्य वाक्य में हम बोलने वाले की परिस्थिति, संकेत, उद्देश्य और व्यवहार से अर्थ समझ सकते हैं।

लेकिन वेद अपौरुषेय है।

इसलिए सामान्य मानवीय वक्ता के आशय का सहारा नहीं लिया जा सकता।

तब प्रश्न और कठिन हो जाता हैवैदिक वाक्य का तात्पर्य कैसे निश्चित होगा?

यदि किसी वैदिक वाक्य में कर्म का विधान है, तो उसके प्रत्येक शब्द का अर्थ, वाक्य की संरचना और कर्म का सम्बन्ध अत्यन्त सावधानी से निर्धारित करना होगा।

यहीं से मीमांसा का भाषादर्शन धीरे-धीरे व्याख्याशास्त्र में बदलता है।

 

शब्द, वाक्य और धर्मतीनों का सम्बन्ध

अब पूरी संरचना को देखेंवेद धर्म का प्रमाण है।

वेद शब्दों और वाक्यों में प्रकट होता है।

शब्द अर्थ का बोध कराते हैं।

शब्द वाक्य में परस्पर सम्बन्धित होते हैं।

वाक्य से अर्थ का बोध होता है।

और वैदिक अर्थ सेधर्म का ज्ञान उत्पन्न होता है।

इसलिए मीमांसा में भाषादर्शन कोई अलग विषय नहीं है।

उसका सीधा सम्बन्ध धर्म से है।

इसे एक सूत्र में कहें तोवेदशब्दवाक्यवाक्यार्थधर्मबोध

यही मीमांसा की भाषा-दृष्टि की आधारभूत दिशा है।

 

पूर्वपक्षक्या भाषा केवल सामाजिक संकेत है?

एक आपत्ति यह हो सकती है कि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध समाज ने बना दिया है।

समाज ने तय किया किगौशब्द का अर्थ गौ होगा।

फिर इसमें नित्य सम्बन्ध मानने की क्या आवश्यकता है?

मीमांसा का उत्तर है

यदि शब्द-अर्थ सम्बन्ध पूर्णतः मनुष्य-निर्मित और मनमाना हो, तो भाषा की प्रमाणिकता की अंतिम व्याख्या कठिन होगी।

विशेषतः वेद के मामले में यह समस्या अधिक गम्भीर होगी।

क्योंकि वेद को अपौरुषेय माना गया है।

इसलिए शब्द-अर्थ सम्बन्ध को भी किसी व्यक्ति की इच्छा से निर्मित मानना मीमांसा की समग्र संरचना से मेल नहीं खाता।

 

एक महत्त्वपूर्ण सावधानी

यहाँ एक बात स्पष्ट रखना आवश्यक है।

मीमांसा के सभी भाषादार्शनिक सिद्धान्तों को एक ही रूप में सभी आचार्यों पर आरोपित नहीं किया जाना चाहिए।

कुमारिल भट्ट और प्रभाकर की परम्पराओं में वाक्यार्थ-बोध को लेकर महत्वपूर्ण मतभेद हैं।

विशेषतः आगे चलकरअभिहितान्वयवाद और अन्विताभिधानवाद का प्रसिद्ध विवाद सामने आएगा।

इस भाग में हमने केवल वह आधार तैयार किया है जहाँ से यह विवाद समझ में सके।

अर्थात्

शब्द क्या है?
अर्थ कैसे मिलता है?
वाक्य कैसे अर्थ देता है?

इन प्रश्नों का विस्तृत भट्ट-प्रभाकर विवाद अगले भाग का केन्द्र होगा।

 

आधुनिक भाषाविज्ञान के संदर्भ में

आज भाषाविज्ञान और दर्शन में भी यह प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है

क्या अर्थ शब्द में है या शब्द के प्रयोग और सम्बन्ध में?

आधुनिक भाषादर्शन ने भी संकेत, अर्थ, संदर्भ, वाक्य-संरचना और अर्थबोध की जटिलता को स्वीकार किया है।

मीमांसा का दृष्टिकोण अपने ऐतिहासिक संदर्भ में विकसित हुआ था, इसलिए उसे आधुनिक linguistic theories का प्रत्यक्ष पूर्वरूप कहना उचित नहीं होगा।

लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि भारतीय मीमांसा ने बहुत पहले यह प्रश्न अत्यन्त सूक्ष्मता से उठाया था

वाक्य सुनने पर अर्थ का एकीकृत बोध कैसे उत्पन्न होता है?

यह प्रश्न आज भी भाषा-दर्शन का जीवित प्रश्न है।

 

इस भाग की दार्शनिक उपलब्धि

इस भाग में हमने अभी किसी एक वाक्यवाद को अंतिम रूप से स्थापित नहीं किया।

हमने उससे पहले की भूमि तैयार की है।

अब हमारे सामने स्पष्ट हैवेद प्रमाण है।

वेद शब्द और वाक्यों में प्रकट होता है।

शब्द केवल क्षणिक ध्वनि नहीं माने जा सकते।

शब्द और अर्थ का सम्बन्ध मीमांसा में अत्यन्त गम्भीर दार्शनिक समस्या है।

वाक्य का अर्थ केवल शब्दों की सूची नहीं है।

वाक्यबोध मेंआकांक्षा, योग्यता और सन्निधि का महत्त्व है।

और सबसे महत्त्वपूर्ण

वेद के अर्थ का सही निर्धारण धर्म के सही निर्धारण से जुड़ा हुआ है।

अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि— “शब्द का अर्थ क्या है?”

अब प्रश्न और सूक्ष्म हो गया है

जब अनेक शब्द मिलकर एक वाक्य बनाते हैं, तो उस वाक्य का समग्र अर्थ हमारे सामने कैसे आता है?”

यहीं से मीमांसा का महान भाषादार्शनिक विवाद प्रारम्भ होता है।

 

निष्कर्षभाषा से धर्म तक

मीमांसा ने धर्म के प्रश्न को वेद तक पहुँचाया।

वेद ने हमें भाषा के प्रश्न तक पहुँचाया।

और भाषा ने हमें वाक्य के प्रश्न तक पहुँचा दिया।

इसलिए अब हमारी दार्शनिक यात्रा इस क्रम में आगे बढ़ रही है

धर्मवेदशब्दवाक्यवाक्यार्थ

लेकिन वाक्यार्थ का स्वरूप अभी निर्णीत नहीं हुआ है।

क्या पहले प्रत्येक शब्द अपना स्वतंत्र अर्थ देता है और बाद में वे अर्थ आपस में जुड़ते हैं?

या शब्द स्वयं किसी सम्बन्धित अर्थ का बोध कराते हैं?

यही वह बिन्दु है जहाँ मीमांसा के दो महान प्रवाह आमने-सामने आते हैं

कुमारिल का अभिहितान्वयवाद और प्रभाकर का अन्विताभिधानवाद।

यह केवल भाषा का विवाद नहीं है  

इसके पीछे यह मूल प्रश्न हैअर्थ वास्तव में बनता कैसे है?

और यही प्रश्न अगले भाग का केन्द्र होगा।

 

अगले भाग का प्रश्न

वाक्य का अर्थ पहले शब्दों से बनता है, या शब्द स्वयं सम्बन्धित अर्थ का बोध कराते हैं?”

अगले भाग में हम कुमारिल भट्ट और प्रभाकर के अभिहितान्वयवाद तथा अन्विताभिधानवाद का गम्भीर, तुलनात्मक और शोधपरक परीक्षण करेंगे।

 

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

मीमांसा दर्शन१५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग : शब्द और वाक्यमीमांसा की भाषादृष्टि

नोट : इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग पिछले भाग से आगे बढ़ते हुए मीमांसा दर्शन के एक नये दार्शनिक पक्ष को सामने लाता है। अनावश्यक पुनरावृत्ति से बचते हुए प्रत्येक भाग को स्वतंत्र भी रखा गया है और सम्पूर्ण श्रृंखला से जोड़ा भी गया है। पूर्वमीमांसा, भट्ट, प्रभाकर तथा उत्तरवर्ती मीमांसा-परम्पराओं के मतों को जहाँ आवश्यक हो, ऐतिहासिक और दार्शनिक रूप से अलग रखा जाएगा।

(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)

 

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