दर्शन — न्याय दर्शन भाग–७ : हेत्वाभास — जब तर्क सही दिखाई दे, पर प्रमाणित न करे

 दर्शनन्याय दर्शन

भाग : हेत्वाभासजब तर्क सही दिखाई दे, पर प्रमाणित करे

हर तर्क जो सुनने में सही लगे, क्या वह वास्तव में सही होता है?”

पिछले भाग में न्याय ने हमें संशय से निर्णय तक पहुँचने की प्रक्रिया दिखाई।

लेकिन निर्णय तक पहुँचने के लिए केवल तर्क प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है। तर्क का आधार भी सही होना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति कहे— “पर्वत पर अग्नि है, क्योंकि वहाँ धुआँ है।

तो हमें पूछना होगा

क्या वहाँ वास्तव में धुआँ है?

क्या वह धुआँ अग्नि से व्याप्त है?

क्या धुएँ का कोई दूसरा कारण तो नहीं?

क्या कोई ऐसा प्रमाण है जो अग्नि के निष्कर्ष को बाधित करता हो?

यदि इनमें से किसी स्तर पर दोष हो, तो अनुमान विफल हो सकता है।

इसीलिए न्याय दर्शन ने अनुमान की शुद्धता के साथ-साथ गलत हेतु की पहचान के लिए एक विस्तृत व्यवस्था विकसित कीहेत्वाभास।

 

हेत्वाभास क्या है?

हेतु + आभास = हेत्वाभास।

अर्थात् ऐसा कारण जो हेतु जैसा दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में साध्य की सिद्धि करने में समर्थ नहीं है।

यही इसका मूल अर्थ है।

यहाँआभासशब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

गलत हेतु हमेशा स्पष्ट रूप से गलत दिखाई नहीं देता।

वह कई बार इतना आकर्षक होता है कि प्रथम दृष्टि में सही तर्क जैसा लगता है।

न्याय का काम है उस बाहरी आकर्षण के भीतर छिपे दोष को पहचानना।

इसलिए हेत्वाभास केवलगलत तर्कनहीं है।

यह है

ऐसे तर्क का विश्लेषण जो प्रमाणिक हेतु का रूप धारण कर चुका हो, परन्तु वास्तविक सिद्धि कर सके।

 

सही हेतु की कसौटी

पिछले भाग में हमने हेतु की पञ्चरूपता देखी थी।

एक समर्थ हेतु में सामान्यतः अपेक्षित हैंपक्षधर्मता, सपक्षसत्त्व, विपक्षासत्त्व, अबाधितत्व, असत्प्रतिपक्षत्व

यदि इन अपेक्षाओं में दोष उत्पन्न हो जाए, तो हेतु की प्रमाणिकता पर प्रश्न उठता है।

यहीं से हेत्वाभासों की पहचान सम्भव होती है।

 

न्याय में प्रमुख हेत्वाभास

न्याय परम्परा में पाँच प्रमुख हेत्वाभासों का प्रसिद्ध वर्गीकरण मिलता हैसव्यभिचार, विरुद्ध,  सत्प्रतिपक्ष, असिद्ध, बाधित

इन पाँचों को समझना न्याय के अनुमानशास्त्र की आत्मा को समझने के समान है।

 

सव्यभिचारजब हेतु निश्चित दिशा में ले जाए

सव्यभिचार का अर्थ हैऐसा हेतु जो साध्य के साथ निश्चित और अविनाभावी सम्बन्ध रखता हो।

अर्थात् वह कभी साध्य के साथ पाया जाता है और कभी उसके बिना भी।

उदाहरण लें

यह पशु गाय है, क्योंकि यह सींग वाला है।

यहाँसींग होनागाय का विशेष लक्षण नहीं।

भैंस, बैल आदि में भी सींग हो सकते हैं।

इसलिए

सींग होनागाय होना

की व्याप्ति सिद्ध नहीं है।

हेतु अनेक प्रकार की वस्तुओं में पाया जा रहा है।

इसलिए यह सव्यभिचार है।

 

सव्यभिचार का मूल दोष

सव्यभिचार में समस्या यह नहीं कि हेतु अस्तित्वहीन है।

हेतु वास्तव में मौजूद हो सकता है।

समस्या यह है कि वह साध्य का अनिवार्य सूचक नहीं है।

इसलिए न्याय हमें एक महत्त्वपूर्ण बात सिखाता है

किसी वस्तु में किसी गुण की उपस्थिति यह सिद्ध नहीं करती कि वही गुण इच्छित निष्कर्ष का निश्चित कारण है।

आज की भाषा में कहें तोCorrelation is not sufficient for proof. हालाँकि आधुनिक correlation और न्यायीय व्याप्ति को पूर्णतः समान मानना उचित नहीं होगा।

 

विरुद्धजब हेतु उलटा निष्कर्ष सिद्ध करे

अब एक अधिक गंभीर दोष। मान लीजिए कोई व्यक्ति कहता है— “यह वस्तु अग्निमान है, क्योंकि यह ठंडी है।

यदि किसी विशेष प्रसंग मेंठंडापनवास्तव में अग्नि के अभाव से सम्बन्धित हो, तो दिया गया हेतु साध्य को सिद्ध करने के बजाय उसके विपरीत को स्थापित कर सकता है।

यही विरुद्ध का मूल स्वरूप है।

अर्थात्हेतु ऐसा हो जो साध्य के स्थान पर साध्य के विरोधी धर्म को सिद्ध करे।

यहाँ तर्क केवल कमजोर नहीं है। वह निष्कर्ष को उलटी दिशा में ले जाता है।

सत्प्रतिपक्षजब समान शक्ति का विरोधी हेतु सामने जाए

मान लीजिए कोई व्यक्ति किसी निष्कर्ष को एक हेतु से सिद्ध करता है।

लेकिन प्रतिपक्ष उसी शक्ति वाला दूसरा हेतु प्रस्तुत कर देता है जो विपरीत निष्कर्ष को सिद्ध करता है।

तब पहले हेतु की प्रमाणिकता पर प्रश्न उठता है। यही सत्प्रतिपक्ष है।

इसे सरल रूप में ऐसे समझ सकते हैं

तुम्हारे निष्कर्ष के पक्ष में एक कारण है।

प्रतिपक्ष कहता है

उसी विषय में विपरीत निष्कर्ष के पक्ष में भी प्रमाणिक कारण है।

अब निर्णय के लिए दोनों हेतुओं की परीक्षा आवश्यक होगी।

इसलिए न्याय में केवल अपना हेतु प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं।

यह भी देखना होगाक्या उसका कोई प्रमाणिक प्रतिपक्ष मौजूद है?

 

असिद्धजब हेतु सिद्ध ही नहीं हुआ

यह अत्यन्त सामान्य और महत्त्वपूर्ण दोष है।

यदि किसी तर्क का आधार ही सिद्ध नहीं है, तो उस आधार से निष्कर्ष कैसे निकलेगा?

उदाहरण

आकाश में कमल सुगन्धित है, क्योंकि उसमें पुष्पत्व है।

यहाँ समस्या यह है कि आकाश-कमल ही वास्तविक वस्तु नहीं।

जब पक्ष ही असिद्ध है, तो उसके सम्बन्ध में दिया गया हेतु भी प्रमाणिक नहीं हो सकता।

इसलिएअसिद्ध हेतु वह है जिसकी अपेक्षित स्थिति ही सिद्ध नहीं हुई।

न्याय परम्परा में असिद्ध के भी विभिन्न प्रकारों की चर्चा मिलती है।

विशेष रूप सेआश्रयासिद्धि, स्वरूपासिद्धि और व्याप्यत्वासिद्धि

जैसी विभाजन-पद्धतियाँ उत्तरवर्ती न्याय में अधिक स्पष्ट रूप से विकसित होती हैं।

आश्रयासिद्धि

जब जिस पक्ष में हेतु स्थापित किया जा रहा है, वही असिद्ध हो, तब आश्रयासिद्धि की समस्या आती है।

अर्थात्आश्रय ही प्रमाणित नहीं हुआ।

यदि कोई व्यक्ति ऐसी वस्तु को पक्ष बनाकर तर्क कर रहा है जिसका अस्तित्व ही सिद्ध नहीं, तो उसका पूरा अनुमान प्रारम्भिक स्तर पर ही अस्थिर हो जाता है।

स्वरूपासिद्धि

कभी पक्ष तो स्वीकार्य है, लेकिन उसमें बताया गया हेतु मौजूद ही नहीं।

उदाहरणतः— “यह पर्वत जलमय है, क्योंकि इसमें धुआँ है।

यदि पर्वत पर धुआँ है ही नहीं, तोधूमवत्त्वहेतु पक्ष में सिद्ध नहीं हुआ।

यह स्वरूपासिद्धि की दिशा का दोष है।

 

बाधितजब कोई अधिक प्रबल प्रमाण निष्कर्ष का निषेध कर दे

यह हेत्वाभासों में विशेष महत्त्व रखता है। मान लीजिए कोई व्यक्ति कहता है— “अग्नि ठंडी है, क्योंकि वह पदार्थ है।

लेकिन प्रत्यक्ष अनुभव और स्पर्शजन्य प्रमाण स्पष्ट रूप से बताते हैं कि अग्नि उष्ण है।

अब कोई अधिक प्रबल प्रमाण पहले निष्कर्ष को बाधित कर रहा है।

इस स्थिति को बाधित कहा जाता है।

अर्थात्

जिस निष्कर्ष को कोई अधिक प्रबल प्रमाण पहले ही निषिद्ध कर चुका है, उसे किसी कमजोर हेतु से सिद्ध नहीं किया जा सकता।

यहाँ न्याय प्रमाणों के बीच प्राबल्य और बाध का प्रश्न उठाता है।

 

हेत्वाभास का वास्तविक महत्व

अब प्रश्न हैन्याय ने इतने सूक्ष्म दोषों की आवश्यकता क्यों समझी?

क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी बौद्धिक भूल केवल अज्ञान नहीं है।

कई बार हमगलत ज्ञान को सही ज्ञान समझ लेते हैं। और उससे भी अधिक खतरनाक स्थिति है

गलत तर्क को सही तर्क समझ लेना। हेत्वाभास की पूरी व्यवस्था इसी समस्या से लड़ती है।

न्याय की आलोचनात्मक दृष्टि

न्याय हमें केवल यह नहीं सिखाता— “सही तर्क कैसे करें?”

वह यह भी सिखाता हैतुम्हारा तर्क कहाँ टूट सकता है?”

यह दूसरी क्षमता पहली से कम महत्त्वपूर्ण नहीं।

किसी सिद्धान्त की शक्ति केवल उसके समर्थन में दिए गए प्रमाणों से नहीं समझी जाती।

यह भी देखना पड़ता है कि

उसका प्रतिपक्ष क्या है?

उसके हेतु में दोष तो नहीं?

व्याप्ति में कोई अपवाद तो नहीं?

कोई अधिक प्रबल प्रमाण उसके निष्कर्ष को बाधित तो नहीं करता?

यही आलोचनात्मक दर्शन का आधार है।

 

हेत्वाभास और आज का संसार

आज सूचना की गति बहुत अधिक है। सोशल मीडिया पर कोई व्यक्ति लिखता है

यह घटना इसलिए हुई क्योंकि अमुक व्यक्ति ने ऐसा किया।

हम अक्सर कारण पूछे बिना निष्कर्ष स्वीकार कर लेते हैं।

किसी उत्पाद के बारे में कहा जाता है

इसे लेने वाले लोग अधिक सफल हुए, इसलिए यह उत्पाद सफलता का कारण है।

लेकिन सम्भव हैसफल लोग ही उसे अधिक खरीदते हों।

तब कारण-कार्य का सम्बन्ध सिद्ध नहीं हुआ।

किसी राजनीतिक विचार के समर्थन में कहा जाता है— “अमुक व्यक्ति यह मानता है, इसलिए यह विचार सही है।

यह भी अपने आप में प्रमाण नहीं।

किसी वैज्ञानिक दावे में एक सहसम्बन्ध दिखाई देता है और उसे कारण मान लिया जाता है।

यहाँ भी व्याप्ति की परीक्षा आवश्यक है।

इस प्रकार न्याय का हेत्वाभास-विचार आधुनिक logical fallacies से संवाद कर सकता है, यद्यपि दोनों की वर्गीकरण-पद्धतियाँ समान नहीं हैं।

न्याय औरबहस जीतना

एक और महत्त्वपूर्ण बात।

हेत्वाभास का ज्ञान केवल अपने तर्क को मजबूत करने के लिए नहीं।

यह हमें प्रतिपक्ष के तर्क की जाँच करना भी सिखाता है।

लेकिन यहाँ एक नैतिक प्रश्न उठता है

क्या हम दोष इसलिए खोज रहे हैं कि सत्य सामने आए, या इसलिए कि सामने वाले को हरा दें?

न्याय दर्शन ने इस अन्तर को पहचाना।

इसीलिए आगे वह वाद, जल्प और वितण्डा के बीच भेद करेगा।

जहाँ लक्ष्य सत्य की स्थापना है और जहाँ लक्ष्य केवल विजयदोनों को एक नहीं माना जा सकता।

 

एक सूक्ष्म निष्कर्ष

अब तक न्याय की ज्ञान-प्रक्रिया को यदि एक क्रम में रखें तो

प्रमाण हमें ज्ञान देते हैं।

अनुमान में हेतु और व्याप्ति की आवश्यकता होती है।

तर्क प्रमाण की सहायता करता है।

निर्णय संशय का अन्त करता है।

और

हेत्वाभास हमें बताता है कि अनुमान कहाँ असफल हो सकता है।

अर्थात् न्याय केवल ज्ञान की सकारात्मक रचना नहीं करता।

वह ज्ञान की त्रुटियों का शास्त्र भी निर्मित करता है।

 

लेकिन क्या हर गलत तर्क हेत्वाभास है?

नहीं।

यहाँ एक और सूक्ष्म सीमा है।

कभी कोई व्यक्ति गलत शब्द का प्रयोग करता है।

कभी वह जानबूझकर अर्थ बदल देता है।

कभी वह प्रतिपक्ष की बात को उसी अर्थ में ग्रहण नहीं करता जिसमें वह कही गई थी।

कभी कोई तर्क मूल विषय से हटकर किसी दूसरे मुद्दे पर चला जाता है।

ये सब केवल हेतु-दोष नहीं हैं।

न्याय ने इनके लिए भी अलग-अलग विश्लेषण विकसित किए

छल, जाति और निग्रहस्थान।

अब हम अनुमान के दोष से आगे शास्त्रार्थ के दोष की ओर बढ़ेंगे।

अगले भाग की ओर

अगला प्रश्न और भी रोचक है

यदि दो व्यक्ति किसी सत्य की खोज के लिए तर्क कर रहे हों, तो न्याय उन्हें कैसे अलग करेगा जो सत्य की खोज कर रहा है, उससे जो केवल बहस जीतना चाहता है?

क्या हर विवाद वाद है?

क्या प्रतिपक्ष को पराजित करने के लिए तर्कों का उपयोग करना जल्प है?

क्या किसी मत का खण्डन करना लेकिन अपना कोई पक्ष रखना वितण्डा है?

और

छल और जाति जैसे तर्क-दोषों को न्याय ने क्यों अलग श्रेणी दी?

इन प्रश्नों के साथ न्याय दर्शन अब केवल ज्ञान कैसे प्राप्त हो से आगे बढ़कर पूछेगा

सत्य के लिए शास्त्रार्थ कैसे किया जाए?”

 

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

न्याय दर्शन१५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग : हेत्वाभासजब तर्क सही दिखाई दे, पर प्रमाणित करे

नोट : इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग पिछले भाग से आगे बढ़ते हुए न्याय दर्शन के एक नये दार्शनिक पक्ष को सामने लाता है। अनावश्यक पुनरावृत्ति से बचते हुए प्रत्येक भाग को स्वतंत्र भी रखा गया है और सम्पूर्ण श्रृंखला से जोड़ा भी गया है। प्रारम्भिक न्याय, उत्तरवर्ती न्याय तथा नव्य-न्याय के मतों को जहाँ आवश्यक हो, ऐतिहासिक रूप से अलग रखा जाएगा।

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