दो आत्माओं के बीच का मौन
दो आत्माओं के बीच का मौन
तुम्हारे बिना पहला दिन
प्रेम का पता तब चलता है,
जब कोई सामने नहीं होता।
उपस्थिति में तो सब कुछ सहज लगता है।
लेकिन अनुपस्थिति...
मनुष्य को उसके अपने भीतर ले जाती है।
वह शहर से बाहर गई थी।
केवल तीन दिनों के लिए।
सिर्फ़ तीन दिन।
इतने छोटे,
कि कैलेंडर पर उन्हें देखकर कोई भी कह सकता था
"यह तो कुछ भी नहीं।"
लेकिन प्रेम में समय घड़ी से नहीं चलता।
वह प्रतीक्षा से चलता है।
पहली सुबह मैंने सहजता से फ़ोन उठाया।
फिर याद आया—
आज उसका कोई संदेश नहीं आएगा।
मैंने फ़ोन वापस रख दिया।
कुछ देर बाद फिर उठा लिया।
फिर वापस रख दिया।
मनुष्य अपने भीतर कितनी छोटी-छोटी आदतें बना लेता है,
उसे तब पता चलता है,
जब वे अचानक अनुपस्थित हो जाती हैं।
नाश्ते की मेज़ पर चाय रखी थी।
मैंने कप उठाया।
एक घूँट लिया।
फिर अनायास मुस्कुरा दिया।
वह हमेशा कहती थी—
*"तुम चाय को पीते नहीं हो...
उसे धीरे-धीरे ख़त्म करते हो।"*
मैंने कप को देखा।
आज चाय कुछ अधिक कड़वी थी।
शायद चीनी कम थी।
या शायद...
उसकी आवाज़ नहीं थी।
दिन भर काम में मन लगाने की कोशिश की।
किताब खोली।
कुछ पंक्तियाँ पढ़ीं।
फिर अचानक लगा,
यदि वह यहाँ होती तो इस वाक्य पर क्या कहती?
मैंने पुस्तक बंद कर दी।
अजीब है...
किसी के प्रेम में पड़ने के बाद
हम केवल उसे याद नहीं करते।
हम अपनी हर अनुभूति उसके साथ बाँटने लगते हैं।
शाम को मैं उसी पार्क में चला गया।
वही पगडंडी।
वही पेड़।
वही पुरानी बेंच।
लेकिन उस दिन बेंच बहुत बड़ी लग रही थी।
जैसे किसी ने उसके आधे हिस्से को उठा लिया हो।
मैं बैठ गया।
हवा चल रही थी।
सूखे पत्ते गिर रहे थे।
सब कुछ वैसा ही था।
फिर भी कुछ भी वैसा नहीं था।
तभी फ़ोन बजा।
उसका संदेश था—
"आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है।"
मैंने देर तक उस एक पंक्ति को देखा।
फिर उत्तर लिखा—
"मुझे भी।"
कुछ देर बाद उसका संदेश आया—
"बस इतना?"
मैं मुस्कुराया।
लिखा—
"कुछ बातें लिख देने से छोटी हो जाती हैं।"
उसका उत्तर तुरंत आया—
"तो फिर बोलो।"
मैंने फ़ोन पर उसका नंबर मिलाया।
दूसरी ओर उसकी साँसों की आवाज़ सुनाई दी।
मैंने कुछ नहीं कहा।
उसने भी कुछ नहीं कहा।
लेकिन उस मौन में जैसे पूरा दिन हमारे बीच लौट आया।
उसने धीरे से पूछा—
"क्या कर रहे थे?"
"तुम्हें याद कर रहा था।"
"सच?"
"हाँ।"
"कितनी?"
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
रात उतर रही थी।
"इतनी...
कि आज चाँद को देखा,
तो तुम्हारा चेहरा याद नहीं आया।"
वह चुप हो गई।
मैंने आगे कहा—
"तुम्हारी आवाज़ याद आई।"
दूसरी ओर बहुत धीमी हँसी सुनाई दी।
"तुम्हें पता है...
कभी-कभी मुझे लगता है,
तुम्हें प्रेम करना बहुत आसान है।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुम बातों को सुनते हो।
लोग सुनते नहीं...
केवल अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं।"
मैं कुछ नहीं बोला।
उस रात हमारी बातचीत बहुत लंबी नहीं थी।
लेकिन फ़ोन रखने के बाद
मुझे पहली बार महसूस हुआ—
दूरी ने हमें दूर नहीं किया।
उसने केवल यह दिखा दिया कि
हमारे बीच की निकटता कितनी गहरी हो चुकी है।
तीन दिन बाद वह लौटी।
मैं उसे लेने स्टेशन गया।
ट्रेन के आने में देर थी।
मैं प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा रहा।
लोग आते रहे।
जाते रहे।
हर चेहरा कुछ क्षण के लिए आशा बनता,
फिर किसी और का निकल जाता।
और फिर...
वह दिखाई दी।
हाथ में छोटा-सा बैग।
बाल थोड़े बिखरे हुए।
चेहरे पर यात्रा की थकान।
लेकिन आँखों में वही शांति।
उसने मुझे देखा।
रुक गई।
हम दोनों के बीच कुछ कदमों की दूरी थी।
फिर वह धीरे-धीरे मेरी ओर आई।
मैंने पूछा
"यात्रा कैसी रही?"
वह मुस्कुराई।
"अब ठीक है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
उसने अपना बैग नीचे रखा।
और बिना किसी शब्द के
मेरे सीने से लग गई।
स्टेशन पर लोग आते-जाते रहे।
घोषणाएँ होती रहीं।
रेल की सीटी बजती रही।
लेकिन उस क्षण
हम दोनों के लिए संसार की सारी आवाज़ें
बहुत दूर चली गई थीं।
उसने मेरे कंधे पर चेहरा छिपाकर कहा
"तुम्हारे बिना तीन दिन बहुत लंबे थे।"
मैंने उसके बालों पर हाथ रखा।
"मुझे पता है।"
वह थोड़ा पीछे हटी।
"तुम्हें कैसे पता?"
मैंने मुस्कुराकर कहा
"क्योंकि मेरे भी।"
उसने मुझे देखा।
और उस क्षण मुझे समझ आया—
प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा दूरी नहीं है।
प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि
दूरी के बाद मिलकर
क्या दोनों के भीतर वही अपनापन बचा रहता है।
हमारे भीतर बचा था।
बल्कि...
अब वह पहले से अधिक गहरा था।
क्योंकि उस दिन हमने पहली बार जाना
एक-दूसरे के साथ रहना प्रेम है,
लेकिन एक-दूसरे के बिना रहकर भी
एक-दूसरे को अपने भीतर बचाए रखना...
शायद उससे भी बड़ा प्रेम है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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