लफ़्ज़ों को धारदार कर लूं
लफ़्ज़ों को धारदार कर लूं कलम को तलवार कर लूं चुनौतियों से घबराकर क्यूँ दामन को दागदार कर लूं ? सोच के दरीचों को खोलकर अपना दर हवादार कर लूं दिल मैला है तो क्या हुआ ? पैरहन तो कलफदार कर लूं मुकेश इलाहाबादी --------------
स्वागत है "एक बोर आदमी" में। यह केवल एक ब्लॉग नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रही उस यात्रा का दस्तावेज़ है जहाँ वह स्वयं से प्रश्न करता है — मैं कौन हूँ? जीवन का अर्थ क्या है? चेतना क्या है? और इस विशाल अस्तित्व में मनुष्य की भूमिका क्या है? इस मंच पर साहित्य, दर्शन, वेदांत, ज्योतिष, मनोविज्ञान और जीवन अनुभवों के माध्यम से उन प्रश्नों को समझने का प्रयास किया गया है जो हर संवेदनशील मनुष्य के भीतर कभी न कभी उठते हैं। — मुकेश इलाहाबादी