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कविता कागज़ पे लिखोगे तो काली ही लिखोगे

कविता कागज़ पे लिखोगे तो काली ही लिखोगे न खुशबू होगी न रंग होगा न स्वाद होगा एक बार माटी के कागज़ बीज की स्याही और हल की कलम से लिख के देखो तुम्हारी कविता धानी,हरी, गुलाबी कई कई रंगो में खिलेगी महकेगी भी जो तुम्हारे ही नहीं बहुतों के रगों में साँसों में रच बस जाएगी और फिर तुम एक अनिवर्चनीय आनंद में डूब जाओगे कवि! एक बार लिख कर देखो तो माटी के कागज़ पे बीज की स्याही और हल नोक से एक कविता - दिल से मुकेश इलाहाबादी ------------------------

तुम्हारी यादें,

तुम्हारी यादें, मेरी पसंदीदा कमीज है जिसे हर रोज़ पहन चल देता हूँ दिन भर की यात्रा पे तुम्हारे ख्वाब ठन्डे पानी की बोतल हैं जो प्यास बुझाती रहती हैं कड़ी धूप में, जब, पसीने से तरबतर होता हूँ जेब में रखी तुम्हारी तस्वीर तसल्ली देती है कभी तो ख़त्म होगी ये तनहा सफर और - तुम होगी मेरे साथ भले ही वो ही ज़िंदगी की शाम हो मुकेश इलाहाबादी ------------------

चाँद थोड़ा शरारती

चाँद थोड़ा शरारती थोड़ा संजीदा है गुस्से में होता है तो उसका चेहरा लाल होता है मुस्कराहट में गुलाबी नज़र होता है शरमाता  है तो बादलों का घूंघट ओढ़ लेता है और फिर थोड़ी देर बाद शरारत से घूंघट हटा मुस्कुराता है चाँद थोड़ा नखरीला भी है, फिलहाल जा रहा हूँ उसे मनाने।  चाँद ! अपनी खिड़की का परदा हटाओ न,  मुझे चांदनी में नहाना है मुकेश इलाहाबादी ------------------------

मुल्तवी कर दें ईश्क़

नदी की धार में साथ साथ बहते हुए हम - तुम न जाने कब दो किनारे हो गए सुबह की पहली लोकल पकड़ कर महानगर के इस कोने से उस कोने का सफर रात देर से वापसी बढ़ी हुई नदी तैर के पार करने से कंही ज़्यदा थकाऊ उबाऊ होता है तुम तो जानती ही हो ये रविवार का दिन भी कंहा फुरसत देता है कमरे की सफाई, हफ्ते भर के मैले कपडे सफाई के लिए मुँह ताकते रहते हैं, छोटी मोटी वस्तुओं की खरीददारी कुछ जान पहचान के लोगों का आना छह दिन की थकी देह भी तो मांगती है थोड़ा आराम वैसे मन तो बहुत करता है तुमसे मिलने को फिर प्रेम पे गणित हावी हो जाती है तुमसे मिलने का मतलब, बस, मेट्रो और रिक्शे का भाड़ा सौ रूपये फिर मुरमुरे चाय आय कॉफी तो पिएंगे ही और मुलकात भी किसी पार्क या सस्ते रेस्टोरेंट के कोने की मेज़ में जंहा सिर्फ हल्की फुल्की बातों के बाद लौट आना थके हुए अपने दबड़े में यह सोचते हुए कि अभी माकन मालिक का किराया देना है घर भी तो कुछ भेजना ही है , ये और बात घर से कोई डिमांड नहीं आयी और फिर न जाने क्या क्या उमड़ घुमड़ करता रहता है और इसी उमड़ घुमड़ के बीच बहने लगती है अवसाद, आलस बेचैनी की नदी जिसमे हांफत...

पंच तत्व और उनका दर्द

पंच तत्व और उनका दर्द ------------------------- पांचो, तत्व अंतरिक्ष में मिल बैठे एक दिन कुशल क्षेम के बाद व्योम ने कहा , पृथ्वी ! अनंत काल से तुम्हे अपनी धुरी पे घुमते हुए और सूर्य की परिक्रमा करते देखता आ रहा हूँ तुम, सदैव नाचती आयी हो अपनी सतरंगी आभा से देते हुए फल फूल, अनाज, सोने बैठने के लिए धरती और घर बनाने को मिट्टी लोहा और सारे अयस्क अपने पुत्रों पुत्रियों और सभी नभचर, जलचर व पृथ्वी पे चलने वाले सभी प्राणियों को बिना भेद भाव, पर अब क्यूँ इतना उदास हो ??? पृथ्वी, यह सुन और उदास हो गयी, सारे तत्व अग्नि, वायु और आकाश भी गंभीर हो गए पृथ्वी ने कहा , हे ! पितृवत व्योम , आप से क्या कुछ छुपा है ? मेरा दुःख मेरा सुख पर वर्तमान में मुझे दुःख सिर्फ मनुष्य से है जिसे मैंने सभी जीवों से ज़्यादा मान दिया, स्नेह दिया परन्तु अफ़सोस ये देख  होता है कि आज तक सभी जीव अपनी अपनी मर्यादा में है सिवाय मनुष्य के, हिंसक से हिंसक जानवर भी पेट भर खाते हैं,  और पेट भरने के बाद अहिंसक हो जाते हैं, पंक्षी भी उतना बड़ा नीड बनाते है जितनी उसकी ज़रुरत होती है यंहा तक की कुछ अ...

नहीं खौलता है खून किसी भी बात पे

चूल्हे पे चढ़ी हांडी भी आँच पा के खौलने लगती है और छलक पड़ती है अगर जल्दी ही न उतारी गयी आग से हिमालय की बर्फ भी पिघल जाती है सूरज के ताप से और फिर नदी से भाप बन उड़ जाती है और बादल बन बरसती है उमस और गर्मी के खिलाफ शायद हम हिमालय के ग्लेशियर से भी ज़्यादा ठन्डे हो चुके हैं , नहीं खौलता है खून किसी भी बात पे मुकेश इलाहाबादी --------------------------

'कुर्सी

गुफा से निकले हुए लोगों ने 'कुर्सी' बनाई, अपने राजा के लिए ज़मीन पे बैठे - बैठे राजा आज भी कुर्सी पे बैठा है शान से कुर्शी बनाने वाले ज़मीन पे सबसे पहली कुर्शी 'पत्थर' की थी फिर इंसान ने लकड़ी की कुर्शी बनाई बाद में सोने चाँदी हीरे जवाहरात की भी कुर्सियां बनाई जाने लगीं इतिहास में तो कई बार नरमुंडों की भी कुर्सियां बनाई गयी और फिर उसपे बैठ के 'राजा' बहुत खुश हुआ कुर्शी बनाई गयी थी ताकि इस्पे बैठा हुआ राजा - राज्य में सुख शांति समृद्धि लाएगा कई बार ऐसा भी हुआ कुर्शी की वजह  से ही सुख शांति और समृद्धि राज्य से विदा हो गईं सबसे पहली कुर्शी पत्थर की थी पर अब तो राजा भी कई बार पत्थर का हो जाता है भले ही कुर्शी किसी भी धातु की हो मुकेश इलाहाबादी -------------------------