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खुशनुमा - खुशनुमा एहसास रहता है

खुशनुमा - खुशनुमा एहसास रहता है  तेरी यादों का गुलदस्ता साथ रहता है  मेरा वज़ूद महकता है, लोग पूछते हैं तुम्हारी हँसी का गुलाब पास रहता है   दिन मुझे फुर्सत दे तुझे जी भर सोचूँ  रात गहराने का मुझे इंतज़ार रहता है  दुनिया की कोई बात मज़ा नहीं देती  तू पास रहे वही लम्हा ख़ास रहता है  क्या ऐसा कर दूँ, मै तू खिलखिला दे    मेरे ज़ेहन में बस यही सवाल रहता है  मुकेश इलाहाबादी -----------------

कदम न बढ़ाओ तो सदियों का है

कदम न बढ़ाओ तो सदियों का है  वैसे चंद कदमो का ही फासला है  इक मुलाकात में ही अपने से लगे  शायद जन्मो- जन्मो का रिस्ता है  तुम्हारा चेहरा ताज़ा खिला गुलाब  और जिस्म चन्दन सा महकता है   जिस्म के खंडहर में तेरी यादों का  कबूतर गुटरगूँ - गुटरगूँ करता है  दरिया बर्फ हो रहे इस दिसम्बर में  फिर मेरे सीने में क्या पिघलता है  मुकेश इलाहाबादी ---------------

मै भी नाराज़ होऊँ कोई मुझे भी मनाये तो

मै भी नाराज़ होऊँ कोई मुझे भी मनाये तो कोई लतीफ़ा सुनाए और मुझको हँसाए तो बहुत सर्द मौसम है ये अलाव से न जाएगी अपनी मुहब्बत का कोई अलाव जलाये तो हमने तो अजनबियों को भी अपना बनाया कोई शिद्दत से मुझको भी गले लगाए तो मुद्दतों हुई तनहा बैठे हुए वीराने में,चाहत है मुकेश कभी कोई मुझसे भी मिलने आये तो मुकेश इलाहाबादी --------------------

हम अपनी ही धुन में जा रहे थे

हम अपनी ही धुन में जा रहे थे  तुम्हारा ही नाम गुनगुना रहे थे  तुम मुँह चिढ़ा के भाग गयी तो  तेरी इस अदा पे मुस्कुरा रहे थे   कागज़ पे बेतरतीब लकीरें नहीं  तेरा नाम लिख के मिटा रहे थे  लोग समझते रहे मुस्कुरा रहा हूँ  दरअसल अपना ग़म छुपा रहे थे   तेरी दोस्ती के लायक हो जाऊँ  ख़ुद को इस क़ाबिल बना रहे थे  मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,,,,,,,,,,

मैंने, ऐतबार किया

मैंने, ऐतबार किया ख़ुद को बर्बाद किया दिल का सूरज बुझा दिन को रात किया जला कर अपने को ख़ुद को अंगार किया ईश्क़ ही ईश्क़ किया गल्ती बार बार किया आराम मैंने मौत के बाद किया मुकेश इलाहाबादी ---

समंदर होने के लिए

सिर्फ  बहुत सारी नदियों को  ख़ुद में समाहित कर लेने भर से ही  समंदर नहीं हो जाता कोई  समंदर  होने के लिए  ख़ुदा को खारा होने के लिए  तैयार होना पड़ता है  समंदर होने के लिए  अपने अंदर सिर्फ हीरे मोती ही नहीं  सीप , घोंघे , शैवालों को भी समोना होता है  समंदर होने के लिए  अपने अंदर निर्विकार हो के  रंग बिरंगी मछलियां ही नहीं  मगरमच्छों और घड़ियालों को भी  पनाह देना होता है  समंदर होने के लिए  कभी बेहद शांत और कभी  तूफानी भी बनना पड़ता है  समंदर होने के लिए  अपने से बहुत दूर  बहुत छोटे से चाँद के इशारे पे  अपनी गंभीरता छोड़  चंचल भी होना पड़ता है  समंदर होने के लिए  बहुत बहुत अकेला भी होना होता है  समंदर होना भी इतना आसान कहाँ होता है ? मुकेश इलाहाबादी ------------------------

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे तुम हवा देते रहो, सुलग उठेंगे यादों के अलाव जलाये रखो ये, हिज़्र की सर्द रातों में मज़ा देंगे ये बारिश की बूंदो से कंहा बुझेंगे अंगार चाहत के हैं खूब दहकेंगे  तुम्हे जब भी फुर्सत मिले आना  हम इंतज़ार की डेहरी पे मिलेंगे  दिन भर के बाद शाखों पे बैठें हैं  यादों के परिंदे देर तक चहकेंगे  मुकेश इलाहाबादी -------------