मै गुल नहीं हूँ खिल जाऊँ तेरे सहन में


मै गुल नहीं हूँ खिल जाऊँ तेरे सहन में
बादल भी नहीं बरस जाऊँ तेरी छत पे
फक्त अलफ़ाज़ हैं, एहसास हैं, कहो तो
कुछ ग़ज़लें लिख दूँ  तुझे विरासत में

मुकेश इलाहाबादी --------------------

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