अपनों से बिछड़ के रोता बहुत है


अपनों से बिछड़ के रोता बहुत है
मन का पंक्षी फड़फड़ाता बहुत है

जग में सारे बंधन मन के मन ही
मोह - माया  में  फंसाता  बहुत है

जब हों अपनी मन मर्ज़ी के काज
तो, मुकेश मन खुश होता बहुत है

मुकेश इलाहाबादी ------------------

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