तारे भी मस्ताने निकले
तारे भी मस्ताने निकले
तेरे ही दीवाने निकले
इक तू ही है सीधी - सादी
बाकी सब सयाने निकले
लिख के ग़ज़ल तेरे नाम
तुझको ही सुनाने निकले
सहरा जैसे अपने दिल में
गुले ईश्क़ खिलाने निकले
यूँ तो मै कोई रिन्द नहीं
पी के ग़म भुलाने निकले
मुकेश इलाहाबादी -----
Comments
Post a Comment