बदन के ज़ख्म पाँव के छाले तो छुपा लूँगा

बदन के ज़ख्म पाँव के छाले तो छुपा लूँगा
पेट की आग, दिल के शोले कँहा ले जाऊँगा

जिस्म काट दोगे जला दोगे मार दोगे मगर
ख्वाब में तुम्हारे प्रेत बन - बन कर आऊँगा

तीरगी को मुझसे हर हाल में डरना ही पड़ेगा
कि सूरज हूँ,मै ख़ाक होने तक उजाला बाँटूंगा

सुबह होते ही अपनी खिड़कियाँ खोल देना
बुलबुल हूँ तुम्हारी छत पे देर तक चहकूँगा

मुकेश इत्र के समंदर में नहा के आया हूँ, मै 
ज़माने से लिपट जाऊँगा, देर तक महकूँगा

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है