हमारे पास सिर्फ एक ही रास्ता था,

हमारे पास सिर्फ एक ही रास्ता था,
शहर छोड़ना या तुझे भूल जाना था

सफर में तनहा खुश था, पूछा चूँकि
साथ साथ चलोगे तुम्ही ने कहा था

राह के पत्थरों से पेड़ों से पूछ लेना
बहुत देर तक तुम्हारी राह तका था

मुहब्बत की राह में दर दर पे रोड़े हैं
कभी, ईश्क़ की किताब  में  पढ़ा था

दरिया ऐ ग़म बहता है मेरे सीने में
मत पूछ मै कब तक बहता रहा था 

गर कभी याद करोगे तो कहोगे कि
कुछ भी हो, मुकेश इक दीवाना था

मुकेश इलाहाबादी ------------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार

हरिवंश पुराण - भाग ३० — बाणासुर :