जज़ीरे तक जाती आवाज़

 जज़ीरे तक जाती आवाज़


सुनो

समुंदर के बीचोंबीच

एक छोटा-सा जज़ीरा है,

रेत का एक अकेला टुकड़ा

जिस पर सन्नाटा

धीरे-धीरे साँस लेता है।


वहाँ

बस तुम हो।


और समुंदर के

इस पार

मैं खड़ा हूँ

पानी की इतनी वुसअत के बावजूद

तुमसे उतना ही दूर

जितना कोई ख़्वाब

सुबह से होता है।


मैं तुम्हें आवाज़ देता हूँ

धीरे, फिर ज़ोर से,

फिर पूरी रूह की ताक़त से।


मगर

मेरी आवाज़

समुंदर के शोर में

कहीं खो जाती है,

तुम तक पहुँचने से पहले ही

पानी उसे निगल लेता है।


फिर मैं सोचता हूँ

क्यों न लहरों से कहूँ

कि वे मेरा पैग़ाम

तुम तक पहुँचा दें।


मैं अपने दिल की बात

एक लहर के हाथ में रख देता हूँ।


लहर चल पड़ती है

धीरे-धीरे

तुम्हारी तरफ़।


मगर रास्ते में

और लहरें उससे मिल जाती हैं,

वे सब साथ-साथ बहती हैं

और फिर अचानक

सबकी पहचान मिट जाती है


वे

सिर्फ़ समुंदर रह जाती हैं।


मेरा पैग़ाम

पानी की उस भीड़ में

कहीं घुल जाता है।


अब

कभी-कभी सोचता हूँ


शायद

हवाओं से कहूँ

कि वे मेरे अल्फ़ाज़

तुम्हारे बालों तक पहुँचा दें।


या उस

भटकी हुई व्हेल से कहूँ

जो गहराइयों में

दूर-दूर तक सफ़र करती है।


या किनारे पर खड़ी

उस टूटी हुई नाव से

जो बहुत पहले

समुंदर पार कर चुकी है।


शायद

उसे रास्ता याद हो।


मगर

इन सब सोचों के बीच

एक सच्चाई

धीरे-धीरे समझ में आती है


कि कभी-कभी

समुंदर की दूरी

पानी से नहीं बनती,

ख़ामोशी से बनती है।


और उस ख़ामोशी में

मैं यहाँ खड़ा हूँ,

तुम वहाँ उस जज़ीरे पर—


दोनों के बीच

पूरा समुंदर है,

मगर


फिर भी

मैं हर रोज़

एक नई आवाज़

लहरों के हवाले कर देता हूँ


मुकेश ,,,,,,

Comments

  1. लाज़वाब,बेहद खूबसूरत एहसास पिरोया है आपने सर।
    सादर।
    --------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १७ मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. देखा जाये कोई बोर आदमी ही इस दुनिया की हक़ीक़त को देख सकता है

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  3. वाह! लाज़वाब भाव! बहुत नाजुक, मुलायम और सुंदर।

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  4. बार बार पढ़ने की इच्छा होती है।

    ReplyDelete
  5. बहुत ही सुंदर, संवेदनशील रचना!

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