महाभारत — विराटपर्व — भाग 10 : शमी वृक्ष से गाण्डीव तक — बृहन्नला का अर्जुन में पुनर्जन्म

महाभारत — विराटपर्व — भाग 10 : शमी वृक्ष से गाण्डीव तक — बृहन्नला का अर्जुन में पुनर्जन्म

त्रिगर्तों से युद्ध करके विराट दक्षिण दिशा में चला गया है। उसी समय कौरवों ने दूसरी ओर से मत्स्यराज के गौधन पर आक्रमण कर दिया है।

राजधानी में विराट का पुत्र उत्तर है।

उसके पास उत्साह है, राजकुमार होने का गर्व है, लेकिन युद्ध का वास्तविक अनुभव नहीं।

और उसके साथ सारथि के रूप में कौन है?

बृहन्नला।

राजमहल की स्त्रियों को नृत्य और संगीत सिखाने वाली एक तथाकथित नपुंसक नर्तकी।

किन्तु पाठक जानता है—

वह बृहन्नला नहीं, अर्जुन है।

अब वह क्षण आ गया है जब एक वर्ष से छिपी हुई शक्ति को फिर से अपने वास्तविक रूप में लौटना है।

TEXT — शमी वृक्ष की ओर

उत्तर और बृहन्नला कौरव सेना की ओर बढ़ते हैं।

दूर से कौरवों की विशाल सेना दिखाई देती है।

भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, दुर्योधन और अनेक महारथी वहाँ उपस्थित हैं।

उत्तर का आत्मविश्वास टूट जाता है।

वह युद्धभूमि से भागना चाहता है।

यही वह क्षण है जहाँ बृहन्नला उसे रोकती है।

अर्जुन उसे उस शमी-वृक्ष की ओर ले जाता है जहाँ एक वर्ष पूर्व पाण्डवों ने अपने अस्त्र छिपाए थे।

उत्तर उस वृक्ष पर शव बँधा होने की बात सुनकर उसे छूने से भी संकोच करता है।

वह कहता है कि वह क्षत्रिय है, राजा का पुत्र है और शव को छूना उसके लिए उचित नहीं।

बृहन्नला उत्तर को आश्वस्त करती है—

वहाँ शव नहीं, धनुष हैं।

फिर उत्तर वृक्ष पर चढ़ता है।

और वही दृश्य आता है जिसकी प्रतीक्षा विराटपर्व आरम्भ होने के समय से हो रही थी।

वह आवरण हटाता है और वहाँ—

गाण्डीव सहित पाण्डवों के धनुष दिखाई देते हैं।

महाभारत उन्हें सूर्य के समान दीप्तिमान बताता है; उत्तर उन धनुषों को देखकर रोमांचित और भयभीत हो जाता है।

शमी वृक्ष — जहाँ शक्ति सोयी थी

एक वर्ष पहले यही शमी वृक्ष पाण्डवों की विवशता का साक्षी था।

तब उन्होंने— 

गाण्डीव उतारा था, धनुषों की प्रत्यंचाएँ खोली थीं, अस्त्रों को बाँधा था, और अपनी पहचान को वृक्ष के भीतर छिपा दिया था।

तब उनका उद्देश्य था— शक्ति को निष्क्रिय करना।

अब उद्देश्य बदल गया है— शक्ति को पुनः सक्रिय करना।

यही कारण है कि शमी वृक्ष विराटपर्व की कथा में केवल एक पेड़ नहीं रह जाता।

वह दो अवस्थाओं के बीच की सीमा बन जाता है—

बृहन्नला → अर्जुन

अज्ञातवास → प्रकट शक्ति

संयम → कर्म

छिपाव → युद्ध

लेकिन यहाँ एक सावधानी भी आवश्यक है।

बाद की भारतीय परम्परा में शमी-वृक्ष को विजयादशमी और आयुधपूजा से जिस प्रकार जोड़ा गया, उसे सीधे इस महाभारत प्रसंग का मूल अर्थ मान लेना उचित नहीं होगा।

मूल कथा में शमी का पहला और स्पष्ट कार्य है—

अस्त्रों को सुरक्षित छिपाने का स्थान।

बाद की धार्मिक परम्पराओं ने इस घटना को और व्यापक प्रतीकात्मक अर्थ दिए।

गाण्डीव की पहचान

उत्तर एक-एक करके धनुषों के विषय में पूछता है।

बृहन्नला उसे बताती है कि कौन-सा धनुष किसका है।

और जब गाण्डीव की बारी आती है, तो उसका वर्णन अत्यन्त असाधारण है।

महाभारत के अनुसार यह अर्जुन का विश्वप्रसिद्ध धनुष है— “अर्जुनस्य धनुर्गाण्डीवम्…”

बृहन्नला उसे बताती है कि यह वही गाण्डीव है जिससे अर्जुन मनुष्यों और देवताओं तक को युद्ध में पराजित कर चुका है।

गाण्डीव के पूर्व स्वामियों की एक दीर्घ परम्परा भी बतायी जाती है—शिव, प्रजापति, इन्द्र, सोम और वरुण के बाद वह अर्जुन के पास आया।

यहाँ महाभारत गाण्डीव को केवल एक हथियार के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।

वह अर्जुन की पहचान का सबसे बड़ा चिह्न है।

याद कीजिए— 

वन से निकलते समय युधिष्ठिर ने स्वयं कहा था कि गाण्डीव इतना प्रसिद्ध है कि यदि वे उसे साथ लेकर नगर में प्रवेश करेंगे तो उनकी पहचान शीघ्र हो जाएगी।

अर्थात्—

जिस धनुष को एक वर्ष पहले पहचान छिपाने के लिए छिपाया गया था, वही अब पहचान प्रकट करने का माध्यम बनने वाला है।

CONTEXT — बृहन्नला अब क्यों बदल सकती है?

यह प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है। अर्जुन ने पूरा वर्ष बृहन्नला के रूप में बिताया।

वह नृत्य और संगीत सिखाता रहा। राजमहल के अन्तःपुर में रहा।

उसने अपने युद्धकौशल को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं किया।

अब अचानक वह गाण्डीव उठा लेता है।

क्या यह छद्मवेश की असफलता है?

नहीं।

क्योंकि अज्ञातवास की अवधि अब पूरी होने के निकट है

और उससे भी महत्वपूर्ण— उत्तर स्वयं अब अर्जुन का सहयोगी बन चुका है।

इसलिए अर्जुन को अपनी पहचान बताने का एक सुरक्षित माध्यम मिल जाता है।

यहाँ गुप्तता का नियम टूटता नहीं। बल्कि उसका उद्देश्य पूरा होता है।

अर्जुन का आत्मप्रकाश

अब अर्जुन उत्तर को अपनी वास्तविक पहचान बताता है।

वह स्पष्ट करता है कि वह वास्तव में नपुंसक नहीं है।

उसने यह रूप अपने बड़े भाई की आज्ञा और अपने व्रत के कारण धारण किया था।

वह कहता है कि उसने पूरे एक वर्ष तक इस व्रत का पालन किया है।

यह वाक्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

क्योंकि अर्जुन का बृहन्नला-रूप केवल छल नहीं था। वह व्रत था।

इसलिए उसका समाप्त होना भी किसी अवसरवादी पहचान-परिवर्तन की तरह नहीं आता।

उसने जिस अवधि के लिए वह रूप स्वीकार किया था, उसे पूरा किया।

 CONCEPT — छद्मवेश और सत्य

यहाँ विराटपर्व का एक गहरा दार्शनिक प्रश्न सामने आता है—

क्या अर्जुन ने असत्य कहा था?

वह अपने वास्तविक नाम और पहचान को छिपा रहा था।

लेकिन उसका उद्देश्य क्या था?

धोखा देकर धन प्राप्त करना?

किसी निर्दोष को हानि पहुँचाना?

राजसत्ता हथियाना?

नहीं।

वह अपने भाइयों की प्रतिज्ञा की रक्षा कर रहा था।

इसलिए महाभारत यहाँ सत्य को केवल “जो कुछ ज्ञात है, सब बता देना” के रूप में नहीं रखता।

कभी-कभी सत्य की रक्षा के लिए पहचान का गोपन भी आवश्यक हो सकता है।

लेकिन इसकी सीमा है।

यदि छिपाव स्वार्थ और अधर्म के लिए हो, तो वह छल है।

यदि छिपाव धर्म-संकल्प की रक्षा के लिए हो, तो उसका नैतिक मूल्य अलग हो सकता है।

विराटपर्व इस सीमा को कथा के माध्यम से जाँचता है।

उत्तर का परिवर्तन

अर्जुन की पहचान सुनकर उत्तर का भय समाप्त हो जाता है।

जिस युवक ने थोड़ी देर पहले युद्धभूमि से भागने का विचार किया था, अब अर्जुन का सारथि बनने के लिए तैयार है।

वह स्वयं कहता है कि अब वह युद्ध कर सकता है।

यहाँ एक अत्यन्त सुंदर मनोवैज्ञानिक परिवर्तन है— उत्तर की वीरता स्वयं से नहीं आयी।

उसे अपने से बड़े योद्धा के साथ जुड़ने से आत्मविश्वास मिला।

अर्थात् अर्जुन केवल योद्धा नहीं है।

वह उत्तर के भीतर छिपे हुए कर्तव्य-बोध को सक्रिय करने वाला गुरु भी बन जाता है।

अर्जुन की एक और परीक्षा — सारथि और योद्धा

अब भूमिकाएँ बदलती हैं।

एक वर्ष तक— उत्तर राजकुमार था, बृहन्नला उसका सेवक-समान शिक्षक।

अब— अर्जुन योद्धा है और उत्तर उसका सारथि।

लेकिन अर्जुन उसे केवल रथ चलाने वाला व्यक्ति नहीं बनाता।

वह उसे युद्ध की वास्तविक भूमिका देता है।

वह कहता है कि वह कौरवों से युद्ध करेगा और उत्तर उसके रथ का संचालन करे।

इस प्रकार एक राजकुमार जो युद्ध से भाग रहा था, अचानक एक महान योद्धा का सारथि बन जाता है।

यह परिवर्तन हमें महाभारत की एक स्थायी शिक्षा देता है—

सही गुरु भय को समाप्त नहीं करता; भय के बावजूद कर्तव्य करने योग्य बनाता है।

 COMPARISON — वनपर्व का अर्जुन और विराट का अर्जुन

यहाँ वनपर्व और विराटपर्व को जोड़ना अत्यन्त आवश्यक है।

वनपर्व में अर्जुन— शिव के सामने तप करता है।

पाशुपतास्त्र प्राप्त करता है।

यम, वरुण और कुबेर से दिव्यास्त्र प्राप्त करता है।

इन्द्रलोक जाता है।

निवातकवचों से युद्ध करता है।

अनेक दिव्य अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करता है।

लेकिन विराटपर्व में वही अर्जुन—

नृत्य सिखाता है।

यह विरोधाभास नहीं, अर्जुन के चरित्र की पूर्णता है।

वनपर्व ने उसे सिखाया—

शक्ति कैसे प्राप्त करनी है।

विराटपर्व सिखाता है— शक्ति को कब छिपाना है और कब प्रकट करना है।

इसलिए अर्जुन का वास्तविक विकास केवल अस्त्रप्राप्ति में नहीं है।

उसकी परिपक्वता इस बात में है कि— वह अपनी शक्ति का स्वामी है, शक्ति उसका स्वामी नहीं।

CONTRADICTION — कौरवों ने पहचान ली थी?

शमी वृक्ष की ओर जाते हुए कौरव सेना अर्जुन और उत्तर को देखती है।

और वहाँ एक अत्यन्त रोचक बात होती है।

कौरवों में संदेह उत्पन्न होता है कि यह बृहन्नला वास्तव में अर्जुन हो सकता है।

भीष्म, द्रोण आदि उसके रूप, चाल और शारीरिक गठन को देखते हैं।

पाठ में कहा गया है कि उसका शरीर, सिर, गर्दन, भुजाएँ और चाल अर्जुन से मिलती हैं।

फिर भी वे निश्चित नहीं हो पाते।

यही अज्ञातवास की सफलता है।

पहचान सामने है, लेकिन प्रमाण अभी नहीं।

दुर्योधन तक कहता है कि यदि यह वास्तव में अर्जुन है, तो उसका उद्देश्य पूरा हो चुका—क्योंकि पाण्डव पुनः वनवास के लिए बाध्य हो सकते हैं।

यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात सामने आती है।

दुर्योधन की समस्या अब यह नहीं कि अर्जुन को देखकर पहचानना कठिन है।

समस्या यह है कि—

क्या वह यह सिद्ध कर सकता है कि यह अर्जुन ही है और क्या अज्ञातवास की अवधि वास्तव में पूरी हुई या नहीं?

 गाण्डीव की ध्वनि — पहचान का वास्तविक उद्घोष

अब अर्जुन गाण्डीव उठाता है। उसकी प्रत्यंचा चढ़ती है।

गाण्डीव का घोष युद्धभूमि में फैलता है। यही वह क्षण है जब छिपी हुई पहचान लगभग समाप्त हो जाती है।

एक वर्ष तक— बृहन्नला का नाम था।

अब— गाण्डीव का स्वर अर्जुन का नाम बोलता है।

यहाँ महाभारत का काव्य अपने चरम पर पहुँचता है।

मनुष्य का नाम छिपाया जा सकता है। वस्त्र बदले जा सकते हैं।

व्यवसाय बदला जा सकता है। परन्तु कभी-कभी व्यक्ति की कर्म-शक्ति स्वयं उसकी पहचान बन जाती है।

अर्जुन की पहचान — शरीर से नहीं, कर्म से

यह विराटपर्व की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है।

कौरव अर्जुन को उसके शरीर से पहचानने का प्रयास करते हैं।

उत्तर उसे उसके धनुष से पहचानता है।

और पाठक उसे उसके कर्म से पहचानता है।

अर्जुन की वास्तविक पहचान इन तीनों का योग है— रूप → कौशल → कर्म।

लेकिन इनमें सबसे निर्णायक है— कर्म।

एक वर्ष तक अर्जुन का रूप बदल गया था।

लेकिन उसका धनुर्विद्या-कौशल नहीं बदला।

और जब वह फिर से कर्म करता है, तो उसका वास्तविक स्वरूप सामने आ जाता है।

CREATE — शक्ति का वास्तविक अर्थ

यहाँ से एक नया निष्कर्ष निकलता है— शक्ति को छिपा देना शक्ति का नष्ट होना नहीं है।

एक वर्ष तक गाण्डीव शमी वृक्ष पर पड़ा रहा। उससे कोई युद्ध नहीं हुआ।

लेकिन अर्जुन की शक्ति समाप्त नहीं हुई।

इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि अस्त्र सुरक्षित था।

अर्थ यह भी है— सामर्थ्य की निष्क्रिय अवस्था भी सामर्थ्य का विनाश नहीं होती।

मनुष्य कभी जीवन में ऐसी अवस्था में पहुँचता है जब उसकी क्षमता तत्काल उपयोग में नहीं आती।

वह पीछे हटता है। वह मौन रहता है।

वह अपनी पहचान को सीमित करता है।

लेकिन यदि भीतर का कौशल जीवित है, तो उचित समय आने पर वही शक्ति फिर सक्रिय हो सकती है।

इसलिए— “अभिव्यक्ति का रुकना, सामर्थ्य का समाप्त होना नहीं है।”

यह बात विराटपर्व के इस प्रसंग की सबसे बड़ी दार्शनिक उपलब्धि है।

शमी से गाण्डीव तक — एक वर्ष की साधना

एक वर्ष पहले पाण्डवों ने अपने अस्त्र शमी पर रखे थे।

उस समय वे राजाओं से सेवक बने थे। अब वही अस्त्र फिर हाथ में हैं।

लेकिन उनके भीतर एक परिवर्तन हो चुका है। उन्होंने केवल समय नहीं काटा।

उन्होंने—

अहंकार को नियंत्रित किया, अपनी प्रसिद्धि को छिपाया, अपने कौशल को सीमित किया,
परिस्थिति के अनुसार भूमिकाएँ बदलीं, और अपने वचन की रक्षा की।

इसलिए शमी-वृक्ष से गाण्डीव उठाना केवल हथियार उठाना नहीं है।

यह उस एक वर्ष की आत्मसंयम-साधना का परिणाम है।

आगे क्या?

अब अर्जुन के सामने कौरवों की विशाल सेना है।

उस सेना में—

भीष्म हैं। द्रोण हैं। कृप हैं। कर्ण है। अश्वत्थामा है। दुर्योधन है।

और दूसरी ओर— एक रथ। एक अर्जुन। एक उत्तर।

लेकिन इस एक रथ पर बैठा अर्जुन अब वह बृहन्नला नहीं है जिसे विराट की स्त्रियाँ जानती थीं।

यह वही अर्जुन है जिसने वनपर्व में दिव्यास्त्र प्राप्त किए थे।

अब उसकी अगली परीक्षा है— क्या वह अकेला कौरवों की विशाल सेना को रोक सकता है?

और इससे भी अधिक रोचक प्रश्न—

क्या वह उन्हें पराजित करके भी पाण्डवों की पहचान और अज्ञातवास की शर्त को सुरक्षित रख सकता है?

क्योंकि अर्जुन को केवल युद्ध नहीं जीतना है। उसे समय भी जीतना है।

निष्कर्ष

विराटपर्व में शमी-वृक्ष का प्रसंग सम्पूर्ण अज्ञातवास का चरम प्रतीक बन जाता है।

वनपर्व में अर्जुन ने अस्त्र प्राप्त किए।

विराटपर्व में उसने उन्हीं अस्त्रों को एक वर्ष के लिए त्याग दिया।

और अब— उसी शमी वृक्ष से उन्हें पुनः ग्रहण करता है।

इसलिए यह दृश्य हमें बताता है— शक्ति का सर्वोच्च रूप उसका प्रदर्शन नहीं, उसका संयम है; और संयम की सर्वोच्च परीक्षा यह है कि आवश्यकता आने पर वही शक्ति बिना विलम्ब के पुनः कर्म में उतर सके।

बृहन्नला समाप्त होती है। अर्जुन प्रकट होता है।

शमी वृक्ष पीछे छूट जाता है। गाण्डीव हाथ में आ जाता है।

और अब विराटपर्व पहली बार उस युद्धभूमि पर पहुँच चुका है जहाँ—

एक ओर सम्पूर्ण कौरव शक्ति है और दूसरी ओर अकेला अर्जुन।

यहीं से अगला प्रसंग आरम्भ होगा—

अर्जुन बनाम कौरव सेना — अज्ञातवास के अंतिम दिन की वह युद्धभूमि जहाँ एक योद्धा ने अकेले सम्पूर्ण कौरव शक्ति को रोक दिया।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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