महाभारत — विराटपर्व — भाग 13 : उत्तरा–अर्जुन प्रसंग — विवाह से इनकार क्यों?

 महाभारत — विराटपर्व — भाग 13 : उत्तरा–अर्जुन प्रसंग — विवाह से इनकार क्यों?

विराट के सामने पाण्डवों की पहचान खुल चुकी है। राजा को यह जानकर अत्यन्त प्रसन्नता होती है कि जिन लोगों को उसने अपने राज्य में सामान्य सेवक समझकर रखा था, वे वास्तव में युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी हैं।

विराट पाण्डवों से अपने अज्ञान में हुई भूलों के लिए क्षमा चाहता है और उनके साथ मैत्री का प्रस्ताव रखता है। वह अपना राज्य और सम्पत्ति तक पाण्डवों को देने की इच्छा प्रकट करता है। इसी क्रम में वह अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन से करने का प्रस्ताव रखता है।

यहीं विराटपर्व का एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रसंग सामने आता है।

अर्जुन उस विवाह को स्वीकार नहीं करता।

लेकिन उसका उत्तर केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं है। इसमें गुरु-शिष्य सम्बन्ध, स्त्री की प्रतिष्ठा, सामाजिक धारणा, आत्मसंयम और राजनीतिक सम्बन्ध—सभी एक साथ उपस्थित हैं।

TEXT — मूल पाठ : विराट का प्रस्ताव

विराट अर्जुन के सामने अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह प्रस्ताव रखता है।

अर्जुन उत्तर देता है— उत्तरा मम पुत्रवधू भवतु।

विस्तृत पाठ में उसका तर्क और स्पष्ट है। वह कहता है कि वह पूरे एक वर्ष विराट के अन्तःपुर में रहा और उत्तरा उसे पिता के समान मानती रही। उसने उसे नृत्य और संगीत की शिक्षा दी और उत्तरा भी उसे अपना संरक्षक मानती थी।

अर्जुन का मूल तर्क यह है कि इस परिस्थिति में उत्तरा को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा।

इसलिए वह कहता है कि वह उत्तरा को पत्नी के रूप में नहीं, पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करेगा।

और इसके लिए वह अपने पुत्र अभिमन्यु का प्रस्ताव रखता है— मम पुत्रोऽभिमन्युस्ते जामाता भवितुमर्हति।

अर्थात् अभिमन्यु उत्तरा के लिए उपयुक्त वर है।

यहाँ एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है—अर्जुन केवल विवाह से इनकार नहीं करता; वह उसी सम्बन्ध को दूसरी दिशा देता है।

विराट के साथ सम्बन्ध समाप्त नहीं होता।

बल्कि वह और अधिक निकट हो जाता है— अर्जुन → पिता के समान, उत्तरा → पुत्री के समान, अभिमन्यु → वर, विराट → समधी

CONTEXT — यह प्रस्ताव इसी समय क्यों आया?

इस प्रसंग को केवल प्रेम या विवाह के प्रश्न के रूप में देखना विराटपर्व को छोटा कर देना होगा।

तेरहवाँ वर्ष पूरा हो चुका था। पाण्डवों की पहचान सामने आ चुकी थी।

विराट को अब स्पष्ट हो गया था कि उसके राज्य में रहने वाले ये लोग साधारण व्यक्ति नहीं थे।

उसने देखा था कि जिस बृहन्नला को उसकी पुत्री नृत्य-संगीत का शिक्षक मानती थी, वही अर्जुन निकला—और वही उसके राज्य की गौओं को कौरवों से वापस लाया था।

इसलिए विराट के लिए अर्जुन केवल एक योद्धा नहीं रहा।

वह अब सम्भावित परिवार और राजनीतिक सहयोगी दोनों था।

अतः उत्तरा का विवाह अर्जुन से प्रस्तावित करना स्वाभाविक राजनीतिक दृष्टि से भी समझ में आता है।

लेकिन अर्जुन ने इस प्रस्ताव को एक दूसरी दृष्टि से देखा।

उसके लिए पिछले एक वर्ष का सम्बन्ध निर्णायक था।

वह उत्तरा का शिक्षक रहा था। वह उसके अन्तःपुर में रहा था।

और उत्तरा उसे अपने रक्षक तथा गुरु के रूप में देखती थी।

इसलिए अर्जुन ने सम्बन्ध की मर्यादा बदलने से इनकार किया।

CONCEPT — गुरु और शिष्य के सम्बन्ध की मर्यादा

अर्जुन के उत्तर में सबसे महत्वपूर्ण शब्द है— “पुत्री”।

वह उत्तरा को केवल इसलिए पुत्री नहीं कहता कि वह अब उसके पुत्र की पत्नी बनने वाली है।

वह पहले से बने सम्बन्ध को आधार बनाता है।

एक वर्ष तक वह उसके शिक्षक के रूप में उसके निकट रहा था। इसलिए विवाह द्वारा उसी सम्बन्ध को पति-पत्नी के रूप में बदलना उसे उचित नहीं लगा। मूल पाठ में वह अपने और उत्तरा दोनों के बारे में किसी प्रकार के अपवाद या कलंक की सम्भावना को भी समाप्त करना चाहता है।

यहाँ अर्जुन का निर्णय दो स्तरों पर है। 

पहला — व्यक्तिगत संयम

अर्जुन के पास विवाह स्वीकार करने का कोई राजनीतिक या सामाजिक दबाव नहीं था।

विराट स्वयं प्रस्ताव दे रहा था।

फिर भी अर्जुन अपनी इच्छा या सुविधा को निर्णायक नहीं बनाता।

दूसरा — उत्तरा की प्रतिष्ठा

अर्जुन केवल यह नहीं सोचता कि उसका अपना आचरण शुद्ध है।

वह यह भी सोचता है कि भविष्य में कोई व्यक्ति उत्तरा और उसके सम्बन्ध के बारे में अनुचित संदेह न करे।

अर्थात् वह अपनी प्रतिष्ठा के साथ-साथ उत्तरा की प्रतिष्ठा की भी रक्षा करता है।

यहीं इस प्रसंग का नैतिक भार बढ़ जाता है।

एक सूक्ष्म अन्तर — अर्जुन ने उत्तरा को अस्वीकार नहीं किया

यह बात विशेष रूप से समझने योग्य है। अर्जुन ने विराट का प्रस्ताव ठुकराकर सम्बन्ध समाप्त नहीं किया।

उसने कहा— उत्तरा मेरी पुत्री के समान है; इसलिए वह मेरी पुत्रवधू बने।

अर्थात् विवाह का प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए भी उसने विराट के साथ सम्बन्ध को और मजबूत कर दिया।

यह महाभारत की राजनीति की सूक्ष्मता है। यदि अर्जुन सीधे कह देता— “मैं उत्तरा से विवाह नहीं करूँगा”—

तो विराट के लिए यह व्यक्तिगत अस्वीकार जैसा दिखाई दे सकता था।

लेकिन अर्जुन ने उसी क्षण दूसरा विकल्प दिया— उत्तरा का विवाह अभिमन्यु से।

इससे तीन सम्बन्ध एक साथ बनते हैं— मात्स्य + पाण्डव + यादव

क्योंकि अभिमन्यु सुभद्रा का पुत्र और कृष्ण का भांजा है।

मूल पाठ में अर्जुन स्वयं अभिमन्यु को वासुदेव का प्रिय भानजा और महान अस्त्रज्ञ बताकर विराट के सामने योग्य वर के रूप में प्रस्तुत करता है।

COMPARISON — अर्जुन का यह निर्णय उसके चरित्र से कैसे जुड़ता है?

विराटपर्व में अर्जुन का एक नया रूप सामने आता है।

अब तक हमने उसे मुख्यतः— योद्धा → बृहन्नला → पुनः अर्जुन के रूप में देखा था।

लेकिन इस प्रसंग में उसकी परीक्षा युद्धभूमि में नहीं है। यहाँ उसकी परीक्षा कामना और मर्यादा के बीच है।

वह चाहे तो विवाह स्वीकार कर सकता था। राजनीतिक दृष्टि से यह लाभकारी था।

विराट उसका सम्मान करता था। उत्तरा युवा थी। और स्वयं विराट प्रस्ताव दे रहा था।

फिर भी अर्जुन उस सम्बन्ध को स्वीकार नहीं करता जिसे वह अपने पूर्व सम्बन्ध के अनुरूप अनुचित मानता है।

यहाँ वनपर्व की तपस्या और विराटपर्व का अज्ञातवास एक दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।

वन में अर्जुन ने शक्ति अर्जित की। विराट में उसने उस शक्ति को नियंत्रित किया।

और अब विवाह के प्रसंग में वह इच्छा पर भी नियंत्रण दिखाता है।

इसलिए विराटपर्व में अर्जुन की परीक्षा केवल अस्त्रों की नहीं थी।

वह तीन स्तरों पर थी— शक्ति का संयम → पहचान का संयम → इच्छा का संयम।

यह तीनों बातें पहले के प्रसंगों से अलग-अलग सिद्ध हो चुकी हैं; यहाँ उनका एक नया परिणाम दिखाई देता है।

CONTRADICTION — क्या यह केवल “गुरु-पुत्री” सम्बन्ध था?

यहाँ पाठ को आधुनिक नैतिक अवधारणाओं में सीधे अनुवाद करने से सावधान रहना चाहिए।

महाभारत में अर्जुन ने उत्तरा को नृत्य-संगीत की शिक्षा दी और उसके अन्तःपुर में एक वर्ष बिताया। पाठ में अर्जुन स्वयं इस सहवास को विवाह के प्रस्ताव के संदर्भ में निर्णायक मानता है। वह यह भी कहता है कि ऐसा विवाह दोनों के बारे में अनुचित संदेह उत्पन्न कर सकता है।

इसलिए इसका सरल अर्थ केवल यह कहना नहीं होना चाहिए कि—

“अर्जुन ने उत्तरा को बेटी माना, इसलिए विवाह नहीं किया।”

वास्तविक पाठ इससे अधिक सूक्ष्म है।

उसके निर्णय में तीन बातें साथ हैं— 

पूर्व स्थापित गुरु-शिष्य सम्बन्ध। एक वर्ष का अन्तःपुर-निवास। भविष्य में उत्पन्न होने वाली सामाजिक शंका से उत्तरा की रक्षा।

इसलिए अर्जुन का निर्णय व्यक्तिगत इच्छा से अधिक सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व का निर्णय है।

CREATION — इस विवाह का वास्तविक महत्त्व क्या था?

यहाँ से एक नया शोध-निष्कर्ष निकलता है।

विराट और पाण्डवों का सम्बन्ध केवल आतिथ्य और कृतज्ञता पर आधारित रह सकता था।

लेकिन अभिमन्यु–उत्तरा विवाह ने उसे रक्त-संबंध और राजनीतिक गठबंधन में बदल दिया।

अब पाण्डवों के साथ मत्स्य राज्य का सम्बन्ध केवल— “हमने तुम्हारे राज्य में शरण ली थी”

तक सीमित नहीं रहा। वह बदल गया— “अब हम एक ही परिवार हैं।”

और यह परिवर्तन आगे आने वाले महाभारत के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

क्योंकि कुरुक्षेत्र से ठीक पहले पाण्डवों को केवल नैतिक समर्थन नहीं चाहिए था; उन्हें राजाओं और राज्यों का राजनीतिक सहयोग भी चाहिए था।

विराट इस सहयोग का प्रमुख आधार बन गया।

अभिमन्यु का प्रवेश — विराटपर्व से युद्धपर्व की ओर

अर्जुन द्वारा अभिमन्यु का प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के साथ कथा का केन्द्र धीरे-धीरे अगली पीढ़ी की ओर जाता है।

अब तक महाभारत का मुख्य संघर्ष था— पाण्डव बनाम कौरव।

लेकिन अभिमन्यु–उत्तरा के विवाह के बाद एक नया वंशगत सूत्र बनता है।

अभिमन्यु— अर्जुन + सुभद्रा और उत्तरा— विराट की पुत्री।

इस विवाह से आगे चलकर वह पुत्र जन्म लेगा जो कुरुवंश के विनाश के बाद भी वंश की निरन्तरता का वाहक बनेगा।

अर्थात् विराटपर्व का अन्त केवल विवाह से नहीं होता। यह भविष्य के कुरुवंश के पुनर्जन्म की भूमिका तैयार करता है।

मूल पाठ के अन्तिम भाग में विवाह के बाद पाण्डवों का उपप्लव्य में निवास, कृष्ण और अन्य यादवों का आगमन तथा आगे की राजनीतिक गतिविधियों की तैयारी का वर्णन मिलता है।

इसलिए विराटपर्व का अन्त वास्तव में अगले पर्व की प्रस्तावना है।

निष्कर्ष

अर्जुन का उत्तरा से विवाह न करना किसी व्यक्तिगत अस्वीकार की कथा नहीं है।

यह उस अर्जुन का निर्णय है जिसने— अस्त्रों पर अधिकार पाया, अपनी पहचान छिपाई, और अब अपने सम्बन्धों की मर्यादा पर भी अधिकार रखा।

विराट ने अपनी पुत्री दी।

अर्जुन ने उसे अपने पुत्र के लिए स्वीकार किया।

इससे एक व्यक्तिगत विवाह प्रस्ताव बदलकर मात्स्य–पाण्डव–यादव राजनीतिक और पारिवारिक गठबंधन बन गया।

इसलिए विराटपर्व का यह प्रसंग एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सूत्र देता है— संबंध केवल इच्छा से नहीं बनते; उनकी पूर्वभूमि भी उनका धर्म निर्धारित करती है।

और शायद इससे भी बड़ा निष्कर्ष— 

जिसने अपनी शक्ति को नियंत्रित करना सीख लिया, वही अपने अधिकार और अपनी इच्छा के बीच भी मर्यादा स्थापित कर सकता है।

अर्जुन ने उत्तरा को पत्नी के रूप में नहीं, पुत्रवधू के रूप में स्वीकार किया।

और इसी निर्णय से विराटपर्व की कथा पाण्डवों की पहचान से आगे बढ़कर अभिमन्यु और आने वाली पीढ़ी की कथा बनने लगती है।

अगला और विराटपर्व का अन्तिम शोध-भाग इसी विवाह को केवल वैवाहिक प्रसंग न मानकर देखेगा—अभिमन्यु–उत्तरा विवाह, उपप्लव्य में पाण्डवों का पुनर्संगठन और विराटपर्व का कुरुक्षेत्र की राजनीति में वास्तविक योगदान।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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