महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 13 - प्रकृति और पुरुष — जो करता है और जो देखता है
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 13 - प्रकृति और पुरुष — जो करता है और जो देखता है
भीष्मपर्व में भगवद्गीता का संवाद अब उस बिन्दु पर पहुँच रहा है जहाँ कर्म, कर्ता और गुणों की चर्चा एक मूल दार्शनिक प्रश्न में परिवर्तित हो जाती है—
यदि प्रकृति कर्म करती है, तो चेतना क्या करती है?
मनुष्य के भीतर विचार उठते हैं, इच्छाएँ पैदा होती हैं, निर्णय होते हैं और शरीर कर्म करता है।
लेकिन इन सबको जानने वाला कौन है?
मैं अपने विचार को जानता हूँ। मैं अपने सुख-दुःख को जानता हूँ।
मैं अपने शरीर को भी “मेरा शरीर” कहता हूँ।
तो फिर वह “मैं” कौन है जो शरीर, मन और विचार—इन सबको जान रहा है?
यहीं से प्रकृति और पुरुष का प्रश्न सामने आता है।
गीता का मूल सूत्र
गीता के तेरहवें अध्याय में कृष्ण कहते हैं— इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥
अर्थात् यह शरीर “क्षेत्र” कहलाता है और जो इसे जानता है, उसे ज्ञानीजन “क्षेत्रज्ञ” कहते हैं।
यहाँ गीता एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विभाजन करती है—
क्षेत्र — जिसे जाना जाता है।
क्षेत्रज्ञ — जो जानता है।
शरीर देखा जा सकता है। इन्द्रियों के अनुभव को जाना जा सकता है।
मन के विचारों को जाना जा सकता है। भावनाओं को जाना जा सकता है।
यहाँ तक कि “मैं” के विचार को भी देखा जा सकता है।
तो प्रश्न उठता है— इन सबका ज्ञाता कौन है?
युद्धभूमि से शरीर तक
अर्जुन की समस्या युद्ध से शुरू हुई थी। कृष्ण ने उसे आत्मा और शरीर का भेद बताया।
फिर कर्मयोग समझाया। फिर कर्तापन की समस्या सामने आई।
फिर प्रकृति और उसके तीन गुणों का विवेचन हुआ।
अब उसी विचार को और सूक्ष्म बनाकर कृष्ण शरीर और उसके ज्ञाता का भेद सामने रखते हैं।
यहाँ गीता का प्रश्न युद्ध से बहुत आगे निकल जाता है। अब यह प्रश्न हर मनुष्य का प्रश्न है—
मैं शरीर हूँ या शरीर का ज्ञाता?
यदि मैं शरीर ही हूँ, तो शरीर में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन “मेरे” अस्तित्व का परिवर्तन होना चाहिए।
लेकिन मनुष्य अपने अनुभव में कहता है— “मेरा शरीर बदल रहा है।”
बचपन का शरीर अलग था। यौवन का शरीर अलग है। वृद्धावस्था का शरीर अलग है।
फिर भी “मैं” की निरन्तरता का अनुभव बना रहता है। यहीं आत्मदर्शन की समस्या जन्म लेती है।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
क्षेत्र का अर्थ केवल शरीर नहीं है।
गीता आगे क्षेत्र के अन्तर्गत अनेक तत्त्वों का उल्लेख करती है—
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त, इन्द्रियाँ, मन और इन्द्रियों के विषय—ये सब क्षेत्र के विवेचन में आते हैं।
अर्थात् “क्षेत्र” की सीमा केवल स्थूल शरीर तक नहीं है।
शरीर + इन्द्रिय + मन + बुद्धि + अहंकार + अनुभव का क्षेत्र मिलकर प्रकृति के क्षेत्र को निर्मित करते हैं।
और इन सबको जानने वाला है— क्षेत्रज्ञ।
यहाँ गीता का दर्शन एक महत्वपूर्ण दिशा लेता है।
मन भी ज्ञेय है। बुद्धि भी ज्ञेय है। अहंकार भी ज्ञेय है।
तो फिर— ज्ञाता कौन है?
सांख्य का पुरुष
अब इसकी तुलना सांख्य से करनी होगी।
सांख्य की दार्शनिक संरचना में— प्रकृति = परिवर्तनशील, त्रिगुणात्मक सत्ता
और पुरुष = चेतन, साक्षी सत्ता।
प्रकृति में परिवर्तन होता है। पुरुष स्वयं परिवर्तनशील नहीं माना जाता।
प्रकृति के अन्तर्गत बुद्धि, अहंकार, मन और इन्द्रियों जैसी प्रक्रियाएँ आती हैं।
इस दृष्टि से गीता का क्षेत्र–क्षेत्रज्ञ विवेचन सांख्य के प्रकृति–पुरुष विवेक से निकट सम्बन्ध रखता है।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण शोध-सावधानी है।
निकटता का अर्थ पूर्ण समानता नहीं है।
गीता का दार्शनिक ढाँचा केवल सांख्य की पुनरावृत्ति नहीं है।
गीता अपने व्यापक ब्रह्मविद्या-सन्दर्भ में क्षेत्रज्ञ, परमात्मा और ईश्वर के प्रश्नों को भी सामने लाती है।
इसलिए गीता को केवल बाद के शास्त्रीय सांख्य के चश्मे से पढ़ना उसके अर्थ को सीमित कर सकता है।
यदि पुरुष केवल साक्षी है तो संसार चलता कैसे है?
यहीं सबसे कठिन प्रश्न सामने आता है।
यदि पुरुष— निष्क्रिय है, साक्षी है, परिवर्तनरहित है,
तो प्रकृति के साथ उसका सम्बन्ध कैसे बना?
और यदि पुरुष कुछ करता ही नहीं, तो— जीवन का अनुभव किसे हो रहा है?
दुःख किसे होता है? सुख किसे मिलता है? बंधन किसका है? और मुक्ति किसकी?
सांख्य का पूरा दर्शन इसी समस्या को समझाने का प्रयास करता है।
प्रकृति कार्य करती है। पुरुष चेतना प्रदान करता है।
दोनों का संयोग अनुभव की स्थिति उत्पन्न करता है।
लेकिन पुरुष स्वयं प्रकृति के कर्मों से वास्तव में परिवर्तित नहीं होता।
चेतना और अनुभव का रहस्य
इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। आँख दृश्य को ग्रहण करती है।
मन उसका अनुभव करता है। बुद्धि उसका अर्थ निर्धारित करती है।
लेकिन इन सबके होने की जानकारी किसे है? चेतना को।
चेतना स्वयं लाल, नीली या पीली नहीं होती। वह वस्तुओं को प्रकाशित करती है।
जैसे सूर्य किसी वस्तु को प्रकाशित करता है, वैसे ही चेतना अनुभवों को प्रकाशित करती है।
लेकिन यह उदाहरण पूर्ण समानता नहीं है। सूर्य बाहरी प्रकाश देता है।
चेतना अनुभव की उपस्थिति को प्रकाशित करती है।
यही कारण है कि भारतीय दर्शन में चेतना को केवल किसी एक मानसिक प्रक्रिया के समान नहीं माना गया।
“मैं” की समस्या अब अहंकार की ओर लौटें।
जब बुद्धि में कोई अनुभव आता है, तब अहंकार कहता है—
मैं देख रहा हूँ। मैं सोच रहा हूँ। मैं दुखी हूँ। मैंने निर्णय लिया।
यहाँ एक सूक्ष्म प्रक्रिया होती है। शरीर की अनुभूति— “मेरा शरीर।”
मन की अनुभूति— “मेरा मन।”
विचार— “मेरे विचार।”
भावना— “मेरी भावना।”
लेकिन यदि शरीर, मन, विचार और भावना सभी “मेरे” हैं, तो— “मैं” कौन हूँ?
यही आत्मविचार का द्वार है।
क्षेत्रज्ञ और आत्मा
गीता के इस विवेचन में “ज्ञाता” शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
लेकिन यहाँ एक और गहरा प्रश्न है। क्या प्रत्येक जीव का क्षेत्रज्ञ अलग-अलग है?
या चेतना एक ही है और शरीर-मन की संरचनाओं के कारण अनेक ज्ञाता दिखाई देते हैं?
गीता आगे कहती है— क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
अर्थात् हे भारत, सभी क्षेत्रों में मुझे क्षेत्रज्ञ जानो।
यह श्लोक गीता के दर्शन में अत्यन्त महत्वपूर्ण मोड़ है।
अब चर्चा केवल व्यक्तिगत आत्मा और शरीर तक सीमित नहीं रहती।
सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ की बात आती है।
यहाँ गीता का दर्शन शास्त्रीय सांख्य से एक महत्वपूर्ण अन्तर की दिशा में जाता दिखाई देता है।
क्योंकि शास्त्रीय सांख्य अनेक पुरुषों को स्वीकार करता है, जबकि गीता अपने ईश्वर-केन्द्रित व्यापक ढाँचे में क्षेत्रज्ञ को कृष्ण से जोड़ती है।
इस अन्तर को स्पष्ट रखे बिना गीता और सांख्य को एक ही दर्शन मान लेना उचित नहीं होगा।
एक चेतना — अनेक जीवन?
यहीं से एक अत्यन्त गहरा दार्शनिक प्रश्न जन्म लेता है—
यदि शरीर अनेक हैं, मन अनेक हैं, अनुभव अनेक हैं, व्यक्तित्व अनेक हैं—
तो चेतना कितनी है? क्या चेतना भी अनेक है?
या चेतना एक है और उसकी अभिव्यक्तियाँ अनेक हैं?
गीता के विभिन्न श्लोक इस प्रश्न पर विचार की पर्याप्त भूमि प्रदान करते हैं।
लेकिन इसका उत्तर सीधे आधुनिक विज्ञान के किसी सिद्धान्त से जोड़ देना उचित नहीं होगा।
यह मूलतः दार्शनिक और आध्यात्मिक प्रश्न है।
यही प्रश्न आगे उपनिषदों और अद्वैत वेदान्त में और अधिक तीव्र रूप लेता है।
महाभारत के संदर्भ में इसका महत्व
महाभारत केवल यह नहीं पूछता कि— कौन किसे मार रहा है?
गीता के माध्यम से वह उससे भी गहरा प्रश्न पूछती है—
मारने वाला कौन है?
मारा जाने वाला कौन है?
शरीर क्या है?
आत्मा क्या है?
कर्म किस स्तर पर होता है?
चेतना किस स्तर पर है?
युद्धभूमि इस दार्शनिक विवेचन की पृष्ठभूमि है।
भीष्म सामने हैं। द्रोण सामने हैं। अर्जुन का अपना शरीर भी उसी युद्ध के भीतर है।
इसलिए शरीर और आत्मा का प्रश्न किसी अमूर्त कक्षा में नहीं उठाया गया।
यह मृत्यु के प्रत्यक्ष अनुभव के बीच उठाया गया है। यही महाभारत की विशेषता है।
क्या कृष्ण केवल सांख्य समझा रहे हैं?
यहाँ एक महत्वपूर्ण शोध-प्रश्न फिर सामने आता है।
यदि कृष्ण प्रकृति, गुण, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की बात करते हैं, तो क्या वे केवल सांख्य दर्शन को अर्जुन को समझा रहे हैं?
उत्तर इतना सरल नहीं है।
गीता में सांख्य की भाषा और तत्त्व दिखाई देते हैं।
योग की साधना दिखाई देती है।
वेदान्तीय आत्मबोध की दिशा दिखाई देती है।
भक्ति का उत्कर्ष दिखाई देता है।
और ईश्वर का स्पष्ट स्थान दिखाई देता है।
इसलिए गीता को किसी एक पूर्ववर्ती दर्शन की मात्र प्रतिलिपि मानना उसके बहुस्तरीय स्वरूप को कम कर देगा।
अधिक उचित यह देखना होगा कि—
गीता विभिन्न दार्शनिक धाराओं को अर्जुन के अस्तित्वगत संकट में किस प्रकार पुनर्संगठित करती है।
महाभारत की दार्शनिक प्रयोगशाला
इस दृष्टि से कुरुक्षेत्र एक प्रयोगशाला है।
यहाँ—
शरीर उपस्थित है। मन उपस्थित है। बुद्धि उपस्थित है। अहंकार उपस्थित है। प्रकृति सक्रिय है। गुण सक्रिय हैं।
और इनके बीच— चेतना का प्रश्न उपस्थित है।
अर्जुन का विषाद केवल भावनात्मक घटना नहीं रह जाता।
वह आत्मा और प्रकृति के सम्बन्ध की खोज का द्वार बन जाता है।
इसलिए गीता को केवल “युद्ध करो” या “कर्म करो” का ग्रन्थ मानना उसके दार्शनिक विस्तार को अत्यन्त छोटा कर देना होगा।
उसका प्रश्न इससे कहीं गहरा है—
जो जीवन को देख रहा है, वह स्वयं जीवन की किस श्रेणी में आता है?
अब तक की यात्रा को एक सूत्र में बाँधें— कर्म → कर्ता → प्रकृति → गुण → क्षेत्र → क्षेत्रज्ञ।
कर्म प्रकृति में होता है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है।
अहंकार कर्तापन का दावा करता है।
शरीर-मन-बुद्धि अनुभव का क्षेत्र हैं।
और उस क्षेत्र को जानने वाला क्षेत्रज्ञ है।
लेकिन यहाँ हमारी यात्रा समाप्त नहीं होती।
बल्कि अब सबसे बड़ा प्रश्न सामने आता है—
यदि क्षेत्रज्ञ शरीर और मन से भिन्न है, तो वह बन्धन में कैसे आता है?
यदि आत्मा चेतन और साक्षी है—
तो उसे सुख-दुःख का अनुभव क्यों होता है?
उसे जन्म-मरण का भय क्यों होता है?
वह स्वयं को शरीर क्यों मानता है?
और फिर— मुक्ति वास्तव में किसकी होती है?
यहीं से भीष्मपर्व की गीता का अगला चरण और भी गहरा हो जाता है—
बन्धन और मोक्ष — जो मुक्त है, वह बँधा कैसे?
यह प्रश्न केवल गीता का नहीं है।
यही प्रश्न आगे सांख्य, उपनिषद् और वेदान्त—तीनों की दार्शनिक यात्राओं को अलग-अलग दिशाओं में ले जाता है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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