महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 13 : युद्ध के पहले कौरव पक्ष
महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 13 : युद्ध के पहले कौरव पक्ष — कौन दुर्योधन के साथ था और कौन केवल कर्तव्य से?
कृष्ण का शान्ति-दूतत्व समाप्त हो चुका है।
कर्ण अपना पक्ष स्पष्ट कर चुका है।
कुन्ती भी अपने पुत्र को पाण्डवों की ओर नहीं ला सकीं।
अब उद्योगपर्व का ध्यान एक दूसरे प्रश्न पर जाता है—
कौरव पक्ष वास्तव में किसका पक्ष था?
लोकप्रिय कथा में इसे अक्सर सरल बना दिया जाता है—एक ओर पाण्डव, दूसरी ओर कौरव।
लेकिन मूल महाभारत को ध्यान से पढ़ने पर कौरव शिविर स्वयं एक समान विचार वाला समूह नहीं दिखाई देता।
दुर्योधन के साथ खड़े योद्धाओं के कारण अलग-अलग हैं।
किसी के लिए राज्यधर्म है, किसी के लिए व्यक्तिगत निष्ठा, किसी के लिए प्रतिज्ञा, किसी के लिए कृतज्ञता और किसी के लिए राजनीतिक विवशता।
यही कारण है कि कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो सेनाओं का युद्ध नहीं, बल्कि अलग-अलग प्रकार की निष्ठाओं का संघर्ष भी है।
भीष्म : दुर्योधन के नहीं, हस्तिनापुर के सेनापति
भीष्म की स्थिति सबसे पहले समझनी होगी।
भीष्म ने जीवनभर हस्तिनापुर की रक्षा की प्रतिज्ञा की थी। उनका सम्बन्ध सिंहासन से था, किसी एक राजा की व्यक्तिगत इच्छा से नहीं।
इसलिए जब युद्ध आता है, वे कौरव सेना के सेनापति बनते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे दुर्योधन के प्रत्येक कर्म को धर्मसंगत मानते हैं।
उद्योगपर्व में वे बार-बार पाण्डवों के अधिकार और उनकी शक्ति को स्वीकार करते दिखाई देते हैं।
यही भीष्म का संकट है।
जिस पक्ष की नीति से वे सहमत नहीं हैं, उसी पक्ष की सेना का नेतृत्व उन्हें करना है।
यह व्यक्तिगत और संस्थागत निष्ठा के बीच का संघर्ष है।
द्रोण : शिष्य दोनों ओर, कर्तव्य एक ओर
द्रोण की स्थिति भी इसी प्रकार जटिल है। अर्जुन उनके प्रिय शिष्यों में है।
अश्वत्थामा उनका पुत्र है और दुर्योधन के पक्ष में है। हस्तिनापुर से उनका सम्बन्ध है।
उन्होंने कौरव और पाण्डव दोनों को शिक्षा दी है। युद्ध के समय वे कौरव पक्ष में खड़े होते हैं।
लेकिन यह कहना कि वे पाण्डवों से घृणा करते थे, पाठ को अत्यधिक सरल बना देगा।
उनकी स्थिति मुख्यतः राजकीय सेवा, दायित्व और व्यक्तिगत सम्बन्धों से बनी है।
इसलिए द्रोण का चरित्र एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है— यदि किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत विवेक एक दिशा में हो और उसका संस्थागत कर्तव्य दूसरी दिशा में, तो वह किसे चुने?
महाभारत इस प्रश्न का कोई आसान उत्तर नहीं देता।
कृपाचार्य : व्यवस्था के प्रति निष्ठा
कृपाचार्य भी कौरव पक्ष में हैं। उनकी भूमिका व्यक्तिगत प्रतिशोध से अधिक राजकीय व्यवस्था से जुड़ी दिखाई देती है।
यहाँ हमें एक महत्वपूर्ण अन्तर समझना चाहिए।
किसी पक्ष में होना और उस पक्ष की प्रत्येक नीति का समर्थक होना समान नहीं है।
महाभारत के अनेक पात्र इस अन्तर को जीते हैं।
यही कारण है कि युद्ध में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को दुर्योधन की विचारधारा का समर्थक मानना ऐतिहासिक और पाठगत दोनों दृष्टियों से उचित नहीं होगा।
कर्ण : व्यक्तिगत निष्ठा का चरम
इसके विपरीत कर्ण की स्थिति बिल्कुल अलग है।
उसकी निष्ठा किसी राजकीय पद या पुरानी प्रतिज्ञा भर पर आधारित नहीं है।
दुर्योधन ने उसे सम्मान दिया। अंगराज बनाया। सामाजिक अपमान के बीच उसे प्रतिष्ठा दी।
इसलिए कर्ण का दुर्योधन के प्रति सम्बन्ध व्यक्तिगत कृतज्ञता और मित्रता से बना है।
कृष्ण और कुन्ती दोनों के सामने जन्म-सत्य जान लेने के बाद भी वह दुर्योधन को नहीं छोड़ता।
यहीं कर्ण और भीष्म में मूल अन्तर दिखाई देता है—
भीष्म हस्तिनापुर के प्रति बँधे हैं।
कर्ण दुर्योधन के प्रति।
दोनों एक ही सेना में हैं, लेकिन उनकी निष्ठा का आधार अलग है।
शल्य : निष्ठा की राजनीति का एक और उदाहरण
उद्योगपर्व का एक महत्वपूर्ण प्रसंग शल्य से सम्बन्धित है।
शल्य पाण्डवों की ओर जाने के लिए निकलते हैं, लेकिन दुर्योधन उनके मार्ग में ऐसी व्यवस्था करता है कि शल्य उसके आतिथ्य को स्वीकार कर लेते हैं।
जब शल्य को पता चलता है कि आतिथ्य दुर्योधन की ओर से था, तब वे उसे एक प्रकार का वचन देने के लिए बाध्य अनुभव करते हैं।
यह प्रसंग दिखाता है कि प्राचीन राजनीति में आतिथ्य भी राजनीतिक साधन बन सकता था।
शल्य का मन पाण्डवों के निकट है, लेकिन परिस्थितियाँ उन्हें कौरव पक्ष से जोड़ देती हैं।
इसलिए कुरुक्षेत्र की सेना को केवल “कौन किसे पसंद करता था” के आधार पर समझना सम्भव नहीं।
बलराम : युद्ध से दूरी
यादव पक्ष में भी एकरूपता नहीं है। कृष्ण पाण्डवों के साथ हैं। लेकिन बलराम युद्ध में सक्रिय पक्ष नहीं लेते।
यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
यदि कृष्ण और बलराम दोनों यादव हैं, तो भी उनका राजनीतिक निर्णय एक जैसा होना आवश्यक नहीं।
इससे स्पष्ट होता है कि— रक्त-संबंध राजनीतिक निर्णय को हमेशा निर्धारित नहीं करते।
व्यक्ति की अपनी दृष्टि और अपनी प्रतिज्ञा भी महत्वपूर्ण होती है।
नारायणी सेना और कृष्ण का चुनाव
यही बात उस प्रसिद्ध प्रसंग में और स्पष्ट होती है जहाँ दुर्योधन और अर्जुन कृष्ण के पास आते हैं।
कृष्ण दोनों को विकल्प देते हैं— एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना,
दूसरी ओर स्वयं कृष्ण—लेकिन बिना शस्त्र उठाए।
दुर्योधन सेना चुनता है। अर्जुन कृष्ण को। यहाँ दोनों की राजनीति का अन्तर दिखाई देता है।
दुर्योधन के लिए— शक्ति = सेना। अर्जुन के लिए— शक्ति = कृष्ण का मार्गदर्शन।
यहाँ सावधानी आवश्यक है। इस घटना को बाद की भगवद्गीता की सम्पूर्ण दार्शनिक अवधारणाओं से पहले ही जोड़ देना उचित नहीं होगा। उस समय कृष्ण ने अभी गीता का उपदेश नहीं दिया है।
इसका तत्काल राजनीतिक अर्थ अधिक सीधा है— दोनों पक्ष शक्ति को अलग-अलग ढंग से देखते हैं।
कौरव पक्ष की वास्तविक संरचना
अब यदि कौरव पक्ष को ध्यान से देखें तो उसमें कम-से-कम ये अलग प्रकार की निष्ठाएँ दिखाई देती हैं—
भीष्म — हस्तिनापुर की प्रतिज्ञा।
द्रोण — राजकीय दायित्व और व्यक्तिगत सम्बन्ध।
कृप — राजकीय व्यवस्था।
कर्ण — दुर्योधन के प्रति व्यक्तिगत कृतज्ञता।
शल्य — राजनीतिक परिस्थिति और वचन।
दुर्योधन — स्वयं की सत्ता और अधिकार-बोध।
इसलिए “कौरव पक्ष” एक मनोवैज्ञानिक इकाई नहीं है। वह विभिन्न निष्ठाओं का राजनीतिक गठबंधन है।
युद्ध की एक बड़ी विडम्बना
यहाँ महाभारत की त्रासदी और गहरी हो जाती है।
कौरव सेना में ऐसे लोग हैं जो पाण्डवों से व्यक्तिगत रूप से जुड़े हैं।
पाण्डव सेना में भी ऐसे लोग हैं जिनके अपने सम्बन्ध कौरवों से हैं।
दोनों सेनाएँ रक्त, शिक्षा, विवाह, मित्रता और पुराने सम्बन्धों से परस्पर जुड़ी हुई हैं।
इसलिए कुरुक्षेत्र में तलवारें केवल दो राजनीतिक समूहों के बीच नहीं उठेंगी।
वे एक ही सभ्यता की आन्तरिक संरचना के भीतर उठेंगी। यही कारण है कि आगे अर्जुन का विषाद इतना गहरा होगा।
स्वतंत्र शोध-निष्कर्ष
कौरव पक्ष को समझने के लिए “दुर्योधन के समर्थक” कहना पर्याप्त नहीं है।
अधिक सटीक निष्कर्ष यह है— कौरव सेना अनेक प्रकार की निष्ठाओं से बनी थी, जिनमें से कुछ दुर्योधन के प्रति थीं, कुछ हस्तिनापुर के प्रति, कुछ व्यक्तिगत वचन के प्रति और कुछ परिस्थितिजन्य राजनीतिक सम्बन्धों के कारण थीं।
यही अन्तर आगे युद्ध के भीतर भी दिखाई देगा।
भीष्म दुर्योधन के लिए लड़ेंगे, लेकिन पाण्डवों को नष्ट करने की वैसी व्यक्तिगत इच्छा उनके भीतर नहीं है जैसी कर्ण में दिखाई देती है।
द्रोण की स्थिति अलग होगी। कर्ण की अलग। शल्य की अलग।
और यही विविधता कुरुक्षेत्र को केवल “धर्म बनाम अधर्म” की सरल दो-खेमे वाली कहानी बनने से रोकती है।
अब युद्ध की तैयारी अपने अंतिम चरण में पहुँच रही है।
लेकिन युद्धभूमि में जाने से पहले एक और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न है—
जब दोनों पक्षों ने अपनी सेनाएँ एकत्र कर लीं, तब किसके पास कितनी सेना थी और पाण्डवों ने कितने तथा कौन-कौन से प्रमुख योद्धाओं को अपने पक्ष में रखा?
यह केवल संख्या का प्रश्न नहीं है।
सेना की संरचना से यह भी समझ में आता है कि कुरुक्षेत्र का युद्ध वास्तव में किन-किन राजनैतिक शक्तियों का महासंघ था।
भाग 14 : अक्षौहिणी सेनाएँ — कुरुक्षेत्र में कौन-कौन सी राजनीतिक शक्तियाँ एकत्र हुईं?
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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