महाभारत — विराटपर्व — भाग 14 : अभिमन्यु–उत्तरा विवाह से उपप्लव्य तक — विराटपर्व का राजनीतिक अर्थ
महाभारत — विराटपर्व — भाग 14 : अभिमन्यु–उत्तरा विवाह से उपप्लव्य तक — विराटपर्व का राजनीतिक अर्थ
विराटपर्व की कथा यदि केवल अज्ञातवास की समाप्ति पर रोक दी जाए, तो उसका सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पक्ष छूट जाएगा।
पाण्डवों की पहचान खुल चुकी है। विराट को अब पता है कि उसके यहाँ रहने वाले लोग साधारण सेवक नहीं, कुरुवंश के निर्वासित राजकुमार थे। अर्जुन ने उत्तरा को अपनी पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करने का निर्णय लिया है और अभिमन्यु उसका वर बनने वाला है।
अब प्रश्न बदल जाता है। पाण्डवों ने तेरह वर्ष पूरे कर लिए—अब आगे क्या?
महाभारत का उत्तर है— उपप्लव्य।
यहीं से विराटपर्व निजी संकट से निकलकर सार्वजनिक राजनीति में प्रवेश करता है।
TEXT — विवाह से राजनीतिक सभा तक
विराट अर्जुन के प्रस्ताव को स्वीकार करता है। युधिष्ठिर भी इस सम्बन्ध को अपनी स्वीकृति देते हैं।
इसके बाद महाभारत बताता है कि पाण्डवों की ओर से वासुदेव कृष्ण तथा उनके मित्रों और सम्बन्धियों को निमन्त्रण भेजे गए और विराट ने भी अपने सम्बन्धियों को आमन्त्रित किया।
तेरहवाँ वर्ष पूरा होने के बाद पाण्डव उपप्लव्य नामक विराट के नगर में रहने लगे।
मूल पाठ में आता है— त्रयोदशे तु संप्राप्ते वर्षे व्यतीते च पाण्डवाः। उपप्लव्ये तदा रम्ये न्यवसन्त परन्तपाः॥
इसी क्रम में अर्जुन अभिमन्यु, जनार्दन कृष्ण और अन्य यादवों को भी वहाँ लाता है।
यह छोटा-सा स्थान परिवर्तन वास्तव में बहुत बड़ा राजनीतिक परिवर्तन है।
यही दोनों अवस्थाओं का सबसे बड़ा अन्तर है।
विवाह — केवल पारिवारिक सम्बन्ध नहीं
अभिमन्यु और उत्तरा का विवाह पहली दृष्टि में सामान्य राजवंशी विवाह दिखाई देता है।
लेकिन सम्बन्धों को देखें तो इसका विस्तार बहुत बड़ा है।
अभिमन्यु किसका पुत्र है?- अर्जुन और सुभद्रा का।
सुभद्रा किसकी बहन है?- कृष्ण की।
उत्तरा किसकी पुत्री है? विराट की।
इस विवाह से तीन शक्तियाँ एक पारिवारिक सूत्र में आ जाती हैं—
पाण्डव — यादव — मत्स्य।
और आगे पाण्डवों के साथ पहले से जुड़ा हुआ पाञ्चाल भी इस राजनीतिक संरचना में उपस्थित है।
अतः विवाह के बाद पाण्डवों की स्थिति केवल निर्वासित राजकुमारों की नहीं रह जाती।
उनके सामने अब एक संगठित मित्र-सम्बन्धों का संसार है।
यही कारण है कि विवाह के प्रसंग में विभिन्न राजाओं और सम्बन्धियों के आने का वर्णन महाभारत केवल उत्सव की सूचना के रूप में नहीं करता। वह वस्तुतः यह दिखाता है कि पाण्डवों के चारों ओर राजनीतिक समर्थन का क्षेत्र बनने लगा है।
विराटपर्व का वास्तविक अन्त कहाँ है?
यहाँ एक पाठगत सावधानी आवश्यक है।
विराटपर्व के अन्तिम अध्यायों में परम्परागत पाठों में कुछ संरचनात्मक और नामगत अन्तर मिलते हैं। दक्षिणी पाठ-परम्परा के उपलब्ध पाठ में अन्तिम अध्याय विवाह तथा उसके बाद की व्यवस्था से जुड़ा है।
विभिन्न संस्करणों में अध्याय-संख्या और उप-पर्व विभाजन समान नहीं हैं।
लेकिन कथा की दिशा स्पष्ट है—
अज्ञातवास समाप्त → पहचान प्रकट → विराट से सम्बन्ध → उत्तरा–अभिमन्यु विवाह → उपप्लव्य में पाण्डवों का निवास।
यही वह बिन्दु है जहाँ विराटपर्व स्वाभाविक रूप से उद्योगपर्व की ओर बढ़ता है।
CONTEXT — उपप्लव्य क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उपप्लव्य केवल रहने का नया स्थान नहीं है।
यह वह स्थान है जहाँ पाण्डव अब पहली बार अपने अधिकार के प्रश्न को खुले रूप में उठा सकते हैं।
तेरह वर्ष की शर्त पूरी हो चुकी है। अब उनकी मूल माँग सामने है— इन्द्रप्रस्थ और उनका राज्य उन्हें वापस मिले।
वन में प्रश्न था— “हम कैसे जीवित रहें?” विराट में प्रश्न था— “हम अपनी पहचान कैसे बचाएँ?”
उपप्लव्य में प्रश्न बन जाता है— “अब हमारा अधिकार कौन लौटाएगा?”
यही परिवर्तन अगले पर्व की दिशा निर्धारित करता है।
अज्ञातवास की सफलता का वास्तविक अर्थ
अज्ञातवास की सफलता केवल इतनी नहीं कि दुर्योधन पाण्डवों को समय रहते पहचान नहीं पाया।
उसकी सफलता के तीन स्तर हैं। पहला— पाण्डवों ने प्रतिज्ञा पूरी की।
दूसरा— उन्होंने अपनी शक्ति को परिस्थितियों के अनुसार नियंत्रित किया।
तीसरा— उन्होंने अपने लिए एक नया राजनीतिक आधार तैयार कर लिया।
तीसरा बिन्दु सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।
यदि पाण्डव केवल छिपकर तेरहवाँ वर्ष पूरा करते और उसके बाद अकेले हस्तिनापुर लौटते, तो उनकी स्थिति कमजोर होती।
लेकिन विराट के साथ सम्बन्ध, उत्तरा–अभिमन्यु विवाह और यादवों तथा अन्य मित्र-राज्यों की उपस्थिति ने परिस्थिति बदल दी।
अब संघर्ष केवल दो भाइयों के परिवार का विवाद नहीं रह गया।
वह धीरे-धीरे राज्यों और राजनीतिक गठबंधनों का प्रश्न बन रहा था।
COMPARISON — सभापर्व से उपप्लव्य तक
यहाँ महाभारत की संरचना में एक अत्यन्त रोचक उलटाव दिखाई देता है।
सभापर्व में पाण्डवों के पास— राज्य था, सत्ता थी, वैभव था।
लेकिन उनके राजनीतिक सम्बन्धों की परीक्षा पासे की सभा में हुई और वे सब खो बैठे।
विराटपर्व के अन्त में स्थिति उलट है। अब— राज्य उनके पास नहीं है।
लेकिन— सम्बन्ध उनके पास हैं। उनके साथ विराट है। उनके साथ यादव हैं। उनके साथ पाञ्चाल है।
अभिमन्यु और उत्तरा का विवाह एक नई पारिवारिक कड़ी बन चुका है।
इसलिए सभापर्व में पाण्डवों की शक्ति का आधार राज्य था।
विराटपर्व के अन्त में उनकी शक्ति का आधार सम्बन्ध और सहयोग बन रहा है।
यह महाभारत की राजनीतिक दृष्टि का महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है।
CONTRADICTION — क्या युद्ध पहले से निश्चित था?
यहाँ एक सामान्य धारणा पर प्रश्न उठाना आवश्यक है।
अभिमन्यु–उत्तरा विवाह के बाद यह मान लेना कि अब युद्ध निश्चित हो गया था, पाठ से थोड़ा आगे निकल जाना होगा।
विवाह स्वयं युद्ध की घोषणा नहीं है।
उपप्लव्य में मित्रों और सम्बन्धियों का एकत्र होना भी अपने आप में युद्ध का निर्णय नहीं है।
आगे चलकर कृष्ण शान्ति का प्रयास करेंगे। अर्थात् महाभारत का क्रम यह नहीं है—
विराट → विवाह → तुरन्त युद्ध। बल्कि—
विराट → राजनीतिक पुनर्संगठन → अधिकार की माँग → शान्ति का प्रयास → असफलता → युद्ध।
इस अन्तर को बनाए रखना आवश्यक है।
क्योंकि महाभारत में युद्ध केवल इसलिए नहीं हुआ कि दोनों पक्षों के पास सेनाएँ थीं।
पहले यह प्रश्न उठाया गया कि— क्या बिना युद्ध के न्यायपूर्ण समाधान सम्भव है?
CREATION — विराटपर्व की सबसे बड़ी उपलब्धि
अब पूरे विराटपर्व को पीछे मुड़कर देखें। आदिपर्व से पाण्डवों की पहचान बनती है।
सभापर्व में वह पहचान सत्ता प्राप्त करती है। द्यूत के बाद वही पहचान संकट में पड़ती है।
वनपर्व में पाण्डव अपनी शक्ति, ज्ञान और धैर्य का पुनर्निर्माण करते हैं।
विराटपर्व में वे पहली बार अपनी पहचान को स्वेच्छा से नियंत्रित करते हैं।
और अन्त में वही पहचान पुनः सार्वजनिक होती है। लेकिन अब वे पहले वाले पाण्डव नहीं हैं।
उनके पास— अनुभव है। संयम है। अस्त्र हैं। राजनीतिक सम्बन्ध हैं। और अपने अधिकार के लिए स्पष्ट आधार है।
इसलिए विराटपर्व को केवल “अज्ञातवास का पर्व” कहना उसके वास्तविक महत्त्व को छोटा कर देता है।
मेरा शोध-निष्कर्ष इससे आगे जाता है—
विराटपर्व पाण्डवों की शक्ति की पुनर्प्राप्ति का नहीं, उनकी राजनीतिक पुनर्संरचना का पर्व है।
उनकी शक्ति वन में तैयार हुई। उनकी पहचान विराट में सुरक्षित रही।
लेकिन उनकी राजनीतिक वापसी उपप्लव्य से शुरू हुई।
विराटपर्व और कुरुक्षेत्र के बीच छिपी हुई कड़ी
अभिमन्यु–उत्तरा विवाह को केवल सुखद पारिवारिक प्रसंग मानना भी अधूरा होगा।
यही विवाह आगे आने वाली पीढ़ी को कुरुवंश के संकट से जोड़ता है।
अभिमन्यु युद्ध में मरेगा। उत्तरा गर्भवती होगी। और उसी गर्भ से आगे चलकर परीक्षित जन्म लेगा।
इस प्रकार विराटपर्व में सम्पन्न विवाह का प्रभाव कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद तक जाता है।
यहाँ महाभारत की कथा में एक गहरी रचना दिखाई देती है—
एक पीढ़ी का विवाह दूसरी पीढ़ी के युद्ध और तीसरी पीढ़ी के वंश-रक्षण से जुड़ जाता है।
इसलिए उत्तरा का प्रसंग विराटपर्व का अन्त नहीं, महाभारत की दीर्घकालिक वंश-कथा की शुरुआत भी है।
विराटपर्व का समेकित निष्कर्ष
चार पर्वों की यात्रा को यदि एक सूत्र में बाँधें तो—
आदिपर्व — पहचान का निर्माण।
सभापर्व — सत्ता का उत्कर्ष और पतन।
वनपर्व — शक्ति और व्यक्तित्व का पुनर्निर्माण।
विराटपर्व — पहचान, शक्ति और सत्ता में पुनः प्रवेश की तैयारी।
इस क्रम में विराटपर्व का सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द शायद “अज्ञात” नहीं, बल्कि “प्रकट” है।
क्योंकि पाण्डवों का पूरा वर्ष छिपने के लिए नहीं था। वह इस बात की परीक्षा था कि—
क्या मनुष्य परिस्थितियों के अनुसार अपना बाहरी रूप बदलकर भी अपने मूल स्वरूप को सुरक्षित रख सकता है?
पाण्डवों ने इसका उत्तर दिया।
और जब वे विराट से बाहर आए, तो उनकी पहचान के साथ-साथ उनकी राजनीतिक स्थिति भी बदल चुकी थी।
यहीं विराटपर्व समाप्त होता है। लेकिन महाभारत का अगला प्रश्न शुरू होता है—
अब जब पाण्डवों का वनवास और अज्ञातवास दोनों समाप्त हो चुके हैं, तो क्या हस्तिनापुर उन्हें उनका राज्य वापस करेगा?
यहीं से उद्योगपर्व आरम्भ होगा।
और उद्योगपर्व की वास्तविक धुरी युद्ध नहीं, पहले शान्ति का अन्तिम प्रयास है।
अंतिम शोध-सूत्र
आदिपर्व ने पाण्डवों को बनाया।सभापर्व ने उन्हें सत्ता दी और फिर सत्ता छीन ली।वनपर्व ने उन्हें भीतर से पुनर्निर्मित किया।विराटपर्व ने उन्हें पुनः समाज और राजनीति में स्थापित किया।अब उद्योगपर्व यह तय करेगा कि यह पुनर्स्थापना शान्ति से होगी या युद्ध से।
इस अर्थ में विराटपर्व महाभारत का विराम नहीं—कुरुक्षेत्र की राजनीतिक भूमिका का आरम्भ है।
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