महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 14 : अक्षौहिणी सेनाएँ
महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 14 : अक्षौहिणी सेनाएँ — कुरुक्षेत्र में कौन-कौन सी राजनीतिक शक्तियाँ एकत्र हुईं?
उद्योगपर्व का आरम्भ जिस प्रश्न से हुआ था, वह मूलतः राजनीतिक था—पाण्डवों को उनका अधिकार मिलेगा या नहीं? इसके बाद दूत गए, संवाद हुए, विदुर ने समझाया, सनत्सुजात ने धृतराष्ट्र को भीतर की मृत्यु का अर्थ समझाया, कृष्ण स्वयं शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर गए और अन्ततः कर्ण तथा कुन्ती के स्तर तक जाकर युद्ध को रोकने का प्रयास हुआ।
अब कथा एक निर्णायक मोड़ पर पहुँचती है।
राजनीतिक संवाद समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उसके पीछे सैन्य शक्ति पूरी तरह खड़ी हो चुकी है।
कुरुक्षेत्र में केवल दो व्यक्तियों या दो परिवारों का संघर्ष नहीं होने वाला था। भारत के अनेक जनपदों और राजवंशों की राजनीतिक शक्तियाँ दो बड़े सैन्य गठबंधनों में विभाजित हो चुकी थीं।
यही कारण है कि उद्योगपर्व के इस चरण को केवल “सेनाओं की संख्या” के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। यहाँ महाभारत हमें प्राचीन भारत के एक बड़े राजनीतिक गठबंधन-तंत्र का चित्र भी देता है।
अक्षौहिणी क्या है?
महाभारत की सैन्य गणना में अक्षौहिणी एक निश्चित सैन्य-संख्या की इकाई है।
परम्परागत गणना के अनुसार एक अक्षौहिणी में—
21,870 रथ, 21,870 गज, 65,610 अश्व और 1,09,350 पदाति माने जाते हैं।
अर्थात् गणितीय रूप से एक अक्षौहिणी में कुल 2,18,700 सैन्य इकाइयाँ निर्धारित होती हैं।
यहाँ “सैन्य इकाई” कहना अधिक सावधान भाषा है। रथ में सारथि और योद्धा होते हैं तथा हाथी पर भी सैनिक होते हैं; इसलिए 2,18,700 को सीधे-सीधे आधुनिक अर्थ में “व्यक्तियों की संख्या” मानना उचित नहीं है।
अक्षौहिणी इसलिए आधुनिक सेना की तरह केवल सैनिकों की गिनती नहीं है। यह रथ–गज–अश्व–पदाति के निश्चित अनुपात पर आधारित सैन्य संगठन है।
महाभारत की विशेषता यह है कि उसने युद्ध को केवल वीरों की व्यक्तिगत शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि संगठित सैन्य व्यवस्था के रूप में भी प्रस्तुत किया है।
कुरुक्षेत्र में संख्या का पहला बड़ा अन्तर
पाण्डवों के पास सात अक्षौहिणी सेना थी और कौरवों के पास ग्यारह अक्षौहिणी।
अर्थात् दोनों पक्षों के बीच सैन्य संख्या में स्पष्ट अन्तर था।
परन्तु इस संख्या को देखकर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—
यदि दुर्योधन के पास अधिक सेना थी, तो इतने बड़े युद्ध में केवल संख्या ही निर्णायक क्यों नहीं बनी?
इसका उत्तर स्वयं महाभारत की कथा में छिपा है।
सेना केवल संख्या नहीं होती।
उसमें नेतृत्व, युद्धकौशल, निष्ठा, उद्देश्य, संगठन और सेनापति पर विश्वास—सभी सम्मिलित होते हैं।
इसलिए 11 और 7 अक्षौहिणियों की तुलना को “कौन अधिक शक्तिशाली था” का सरल गणित नहीं बनाया जा सकता।
सात अक्षौहिणियों के पीछे कौन था?
पाण्डवों की सेना केवल पाँच भाइयों की व्यक्तिगत शक्ति नहीं थी।
उनके पीछे अनेक राजनीतिक शक्तियाँ थीं।
पाञ्चाल पाण्डव पक्ष का अत्यन्त महत्वपूर्ण आधार था। द्रुपद और उसके वंश का सम्बन्ध पाण्डवों से केवल वैवाहिक नहीं था; द्रौपदी के कारण यह सम्बन्ध पारिवारिक और राजनीतिक दोनों बन चुका था। धृष्टद्युम्न बाद में पाण्डव सेना का सेनापति बना।
मत्स्य राज्य भी विराट के कारण पाण्डव पक्ष में था। अज्ञातवास के समय पाण्डवों को आश्रय देने के बाद विराट और पाण्डवों का सम्बन्ध विवाह तथा राजनीतिक गठबंधन में बदल चुका था।
चेदि से धृष्टकेतु पाण्डव पक्ष में था।
केकय राजकुमारों का एक समूह भी पाण्डव पक्ष में आया, यद्यपि केकय-सम्बन्धी परम्पराओं में दोनों पक्षों की उपस्थिति मिलती है। यह स्वयं बताता है कि प्राचीन राजनीतिक गठबंधन आज के “एक राज्य = एक पक्ष” जैसे सरल ढाँचे में नहीं थे।
यादव शक्ति भी विभाजित थी। सात्यकि पाण्डवों के साथ था, जबकि कृष्ण की नारायणी सेना दुर्योधन को मिली थी।
यहीं महाभारत का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण राजनीतिक तथ्य सामने आता है—
एक ही वंश के भीतर भी राजनीतिक निर्णय अलग हो सकते थे।
यादवों का विभाजन
कृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न उठाने का निर्णय किया।
दुर्योधन और अर्जुन दोनों कृष्ण के पास पहुँचे।
दुर्योधन को कृष्ण की विशाल नारायणी सेना मिली और अर्जुन ने कृष्ण को चुना।
बाद की गीता-दृष्टि से हम इस घटना को बहुत बड़े आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में देखते हैं, लेकिन उद्योगपर्व के इस प्रसंग को उसके तत्काल राजनीतिक संदर्भ में भी देखना चाहिए।
यहाँ दो विकल्प सामने थे—
सैन्य शक्ति और कृष्ण का व्यक्तिगत नेतृत्व/सहयोग।
दुर्योधन ने सेना चुनी। अर्जुन ने कृष्ण को।
यह केवल धार्मिक कथा नहीं; यह प्राचीन राजनीतिक निर्णय की एक असाधारण स्थिति भी है।
और इसके साथ यादव शक्ति दो भागों में दिखाई देती है—
जबकि बलराम युद्ध से अलग रहे।
इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि महाभारत का युद्ध दो पूर्णतः एकरूप जातीय या पारिवारिक समूहों का युद्ध था।
यह अनेक राजनीतिक शक्तियों का गठबंधन था।
ग्यारह अक्षौहिणियों के पीछे कौन था?
कौरव पक्ष की संख्या अधिक थी और उसका राजनीतिक आधार भी व्यापक था। कुरु शक्ति उसका मूल केन्द्र थी।
हस्तिनापुर की राजसत्ता, धृतराष्ट्र का राजपरिवार और दुर्योधन के नेतृत्व में कौरव राजकुमार इस पक्ष की मुख्य राजनीतिक धुरी थे।
इसके साथ गान्धार का सम्बन्ध शकुनि के माध्यम से था।
सिन्धु से जयद्रथ महत्वपूर्ण सहयोगी था।
मद्र के शल्य का प्रसंग विशेष रूप से रोचक है। शल्य मूलतः पाण्डवों के प्रति सहानुभूति रखते थे, लेकिन दुर्योधन की राजनीतिक रणनीति और आतिथ्य के कारण वे ऐसी स्थिति में पहुँचे जहाँ उनकी प्रतिज्ञा उन्हें कौरव पक्ष से जोड़ देती है।
यह उदाहरण बताता है कि युद्धकालीन गठबंधन केवल पारिवारिक प्रेम या वैर से नहीं बनते थे।
प्रतिज्ञा, आतिथ्य, राजनीतिक दायित्व और परिस्थितियाँ भी राजा को किसी पक्ष में बाँध सकती थीं।
इसी प्रकार त्रिगर्त के सुशर्मा और उसके योद्धा कौरव पक्ष में थे।
कम्बोज, बाह्लीक तथा अनेक अन्य राजाओं और योद्धाओं का सहयोग भी कौरव पक्ष को प्राप्त हुआ।
इस प्रकार दुर्योधन की 11 अक्षौहिणियाँ वास्तव में एक बड़े राजनीतिक संघ का प्रतिनिधित्व करती थीं।
भीष्म की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है
यदि कौरव सेना को केवल “दुर्योधन के समर्थकों” की सेना कहा जाए तो महाभारत की जटिलता समाप्त हो जाती है।
भीष्म दुर्योधन के व्यक्तिगत निर्णयों के कारण युद्ध में नहीं आए थे।
उनकी मूल प्रतिबद्धता हस्तिनापुर के राजसिंहासन और अपने प्रतिज्ञाबद्ध दायित्व से थी।
द्रोण की स्थिति भी सरल नहीं थी।
कृपाचार्य, अश्वत्थामा, शल्य, कर्ण और अन्य योद्धाओं की अपनी-अपनी निष्ठाएँ और परिस्थितियाँ थीं।
इसलिए कौरव सेना को समझने के लिए हमें “कौन किसके साथ था?” से आगे बढ़कर पूछना चाहिए—
“वह किस कारण से उसके साथ था?”
यही प्रश्न महाभारत के राजनीतिक मनोविज्ञान को खोलता है।
सेना के भीतर भी एक समान चेतना नहीं थी
यहाँ उद्योगपर्व का सबसे महत्वपूर्ण शोध-बिन्दु सामने आता है।
पाण्डव पक्ष में भी सभी लोग एक ही कारण से नहीं आए थे।
किसी के लिए द्रौपदी का सम्बन्ध था, किसी के लिए मित्रता, किसी के लिए पारिवारिक गठबंधन, किसी के लिए राजनीतिक हित।
ठीक इसी प्रकार कौरव पक्ष में भी किसी के लिए राजधर्म था, किसी के लिए प्रतिज्ञा, किसी के लिए मित्रता, किसी के लिए कृतज्ञता और किसी के लिए राजनीतिक परिस्थिति।
इसलिए— सेना एक होती है; लेकिन उसकी निष्ठाएँ अनेक हो सकती हैं।
महाभारत इसी जटिलता को बार-बार सामने लाता है।
अक्षौहिणी की संख्या और युद्ध का वास्तविक अर्थ
सात और ग्यारह अक्षौहिणी को जोड़ने पर कुल अठारह अक्षौहिणी का पारम्परिक सैन्य-आँकड़ा बनता है।
यदि पारम्परिक गणितीय इकाई को आधार माना जाए तो यह संख्या लगभग 39,36,600 सैन्य इकाइयों तक पहुँचती है।
लेकिन इस संख्या को आधुनिक जनगणना की तरह पढ़ना ऐतिहासिक रूप से सावधानी माँगता है।
महाभारत का उद्देश्य आधुनिक अर्थ में युद्ध का “मैनपावर डेटा” देना नहीं है।
अक्षौहिणी एक मानकीकृत काव्य-सैन्य गणना भी है, जिसके माध्यम से महाभारत युद्ध की विशालता को व्यक्त करता है।
इसलिए यहाँ दो स्तर अलग रखने चाहिए—
पाठ का तथ्य: पाण्डव सात और कौरव ग्यारह अक्षौहिणियों के साथ युद्धभूमि में आए।
आधुनिक ऐतिहासिक प्रश्न: क्या इन संख्याओं को वास्तविक जनसंख्या और सैनिक संख्या का प्रत्यक्ष पुरातात्त्विक आँकड़ा माना जा सकता है?
दूसरे प्रश्न का उत्तर केवल महाभारत के संख्यात्मक उल्लेख से नहीं दिया जा सकता।
एक और बड़ा प्रश्न — इतनी दूर की शक्तियाँ यहाँ क्यों आईं?
यही इस प्रसंग का वास्तविक राजनीतिक प्रश्न है।
यदि यह केवल हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ का पारिवारिक विवाद था, तो भारत के इतने विभिन्न क्षेत्रों के राजा इसमें क्यों सम्मिलित हुए?
उत्तर यही है कि पाण्डव–कौरव संघर्ष अब राजवंशीय विवाद से आगे बढ़कर अन्तर-राज्यीय शक्ति-संघर्ष बन चुका था।
राजाओं के लिए यह प्रश्न केवल दुर्योधन बनाम युधिष्ठिर नहीं था।
इसके भीतर थे—
राजनीतिक मित्रता, वैवाहिक सम्बन्ध, प्रतिज्ञाएँ, पूर्व वैर, राजकीय हित, आश्रय-संबंध और भविष्य की शक्ति-संतुलन की सम्भावनाएँ।
इस दृष्टि से कुरुक्षेत्र केवल युद्धभूमि नहीं था। वह उस समय के अनेक राजनीतिक सम्बन्धों का संगम था।
विरोधाभास — संख्या अधिक, लेकिन निष्ठा एक नहीं
यहाँ महाभारत एक महत्वपूर्ण विरोधाभास प्रस्तुत करता है।
कौरवों के पास— 11 अक्षौहिणी।
पाण्डवों के पास— 7 अक्षौहिणी।
लेकिन संख्या का यह अन्तर अपने आप यह सिद्ध नहीं करता कि कौरव पक्ष की राजनीतिक एकता भी उतनी ही अधिक थी।
कौरव पक्ष में भीष्म की निष्ठा हस्तिनापुर से जुड़ी थी, कर्ण की दुर्योधन से, शल्य की परिस्थिति से और कृष्ण की सेना की निष्ठा यादव राजनीतिक संरचना से।
अर्थात् एक ही ध्वज के नीचे खड़े योद्धाओं के भीतर अलग-अलग कारण काम कर रहे थे।
पाण्डव पक्ष में भी स्थिति पूरी तरह एकरूप नहीं थी।
इसलिए महाभारत हमें एक अत्यन्त आधुनिक-सा राजनीतिक सत्य दिखाता है—
गठबंधन की संख्या और गठबंधन की आन्तरिक एकता दो अलग बातें हैं।
शोध-निष्कर्ष
अक्षौहिणी प्रसंग को केवल “कौरवों के पास 11 और पाण्डवों के पास 7 सेनाएँ थीं” कहकर छोड़ देना महाभारत के इस अंश को बहुत छोटा कर देना होगा।
इसके भीतर प्राचीन भारतीय राजनीतिक संरचना की एक महत्वपूर्ण तस्वीर दिखाई देती है।
कुरुक्षेत्र का युद्ध पाँच पाण्डवों और सौ कौरवों का युद्ध नहीं रह गया था।
यह अनेक राज्यों, राजवंशों और राजनीतिक सम्बन्धों का महासंघर्ष बन चुका था।
और इसीलिए कृष्ण का शान्ति-दूतत्व भी केवल एक परिवार के बीच समझौता कराने का प्रयास नहीं था।
युद्ध रोकने का अर्थ था—एक ऐसे व्यापक राजनीतिक संघर्ष को रोकना जिसमें अनेक राजसत्ताएँ पहले ही अपने पक्ष चुन चुकी थीं।
यहीं उद्योगपर्व अपनी अन्तिम अवस्था में प्रवेश करता है। अब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि युद्ध होगा या नहीं।
प्रश्न यह है—
युद्धभूमि पर खड़ी इन विशाल शक्तियों का नेतृत्व कौन करेगा, उनकी वास्तविक निष्ठा क्या होगी और कौन-सा सेनापति किस राजनीतिक उद्देश्य के साथ युद्ध करेगा?
यही हमें अगले प्रसंग की ओर ले जाता है—
भीष्म, द्रोण, कर्ण और अन्य महारथियों की वास्तविक भूमिका।
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