महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 15 ध्यानयोग — मन को देखने वाला स्वयं को कैसे देखे?

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 15

ध्यानयोग — मन को देखने वाला स्वयं को कैसे देखे?

प्रकृति, गुण, कर्तापन और बन्धन के विवेचन के बाद अब गीता के सामने एक व्यावहारिक प्रश्न खड़ा होता है—

मनुष्य यह सब जान तो ले, लेकिन इस ज्ञान को अपने अनुभव में स्थिर कैसे करे?

किसी व्यक्ति को यह बौद्धिक रूप से ज्ञात हो सकता है कि क्रोध उचित नहीं है। फिर भी क्रोध आ जाता है।

उसे ज्ञात हो सकता है कि फल की आसक्ति दुःख का कारण है। फिर भी परिणाम की चिन्ता बनी रहती है।

वह जान सकता है कि शरीर परिवर्तनशील है। फिर भी शरीर के सुख-दुःख से उसका मन विचलित होता है।

इसलिए केवल जानकारी पर्याप्त नहीं। दृष्टि को स्थिर करने की आवश्यकता है।

यहीं से गीता में ध्यानयोग का महत्व सामने आता है।

मन ही मित्र, मन ही शत्रु

गीता के छठे अध्याय में कृष्ण कहते हैं— 

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

मनुष्य स्वयं अपने को ऊपर उठाए और स्वयं को नीचे न गिराए; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

यहाँ “आत्मा” शब्द के प्रयोग को यांत्रिक ढंग से एक ही अर्थ में लेना उचित नहीं होगा। गीता के विभिन्न प्रसंगों में यह शब्द अलग संदर्भों में मन, अन्तःकरण या स्व के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

इसलिए यहाँ मुख्य दार्शनिक बात है—

मनुष्य के भीतर स्वयं को उठाने और गिराने वाली दोनों सम्भावनाएँ उपस्थित हैं।

अर्जुन के लिए ध्यान क्यों?

अर्जुन युद्धभूमि में खड़ा है। उसके सामने बाहरी शत्रु हैं। लेकिन उसका वास्तविक संकट भीतर है।

विषाद भीतर है। मोह भीतर है। भय भीतर है। स्मृति भीतर है। कर्तव्य का प्रश्न भीतर है।

अर्थात् बाहरी युद्ध से पहले अर्जुन को अपने भीतर के द्वन्द्व को समझना है।

इसलिए गीता में ध्यान कोई युद्ध से पलायन नहीं।

ध्यान वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य अपने भीतर की गति को पहचान सकता है।

मन को रोकना या समझना?

ध्यान के विषय में सामान्य धारणा होती है— मन को रोक देना। लेकिन गीता की दृष्टि इससे अधिक सूक्ष्म है।

मन चंचल है। अर्जुन स्वयं कहता है— चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।

मन चंचल है, प्रमथन करने वाला है, बलवान है और दृढ़ है। यह अर्जुन की वास्तविक मनोवैज्ञानिक समस्या है।

वह जानना चाहता है— ऐसे मन को स्थिर कैसे किया जाए?

कृष्ण का उत्तर है— अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।

अर्थात् अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को साधा जा सकता है।

यहाँ दो आधार सामने आते हैं— अभ्यास और वैराग्य।

अभ्यास क्या है?

अभ्यास का अर्थ केवल प्रतिदिन कुछ मिनट आँखें बन्द करना नहीं है।

अभ्यास का गहरा अर्थ है— चेतना को बार-बार अपनी चुनी हुई दिशा में वापस लाना।

मन विषयों में चला गया। उसे देखा। फिर वापस लाया। कामना उठी। उसे देखा। फिर विवेक की ओर लौटे।

क्रोध आया। उसे देखा। फिर प्रतिक्रिया से पहले ठहरे। इस दृष्टि से अभ्यास मन को जबरन बाँधना नहीं है।

यह मन को बार-बार प्रशिक्षित करना है।

वैराग्य क्या है?

वैराग्य का अर्थ विषयों से घृणा करना नहीं। वैराग्य का अर्थ है—

विषय उपस्थित हो, लेकिन मन उसकी अनिवार्य दासता में न जाए।

सुख मिला— लेकिन “मुझे यही हमेशा चाहिए” न बने।

दुःख आया— लेकिन “यह कभी समाप्त नहीं होगा” न बने।

प्रशंसा मिली— लेकिन उससे पहचान न बने।

अपमान हुआ— लेकिन उससे पूरा अस्तित्व परिभाषित न हो।

इस प्रकार वैराग्य मनुष्य को अनुभव से नहीं काटता।

वह अनुभव के साथ अत्यधिक तादात्म्य को कम करता है।

पतञ्जलि और गीता

यहाँ एक महत्वपूर्ण दार्शनिक तुलना आवश्यक है। पतञ्जलि योगसूत्र में मिलता है— अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।

गीता में भी मन के नियंत्रण के लिए— अभ्यास और वैराग्य का उल्लेख मिलता है।

दोनों परम्पराओं में स्पष्ट वैचारिक समानता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों ग्रन्थों की रचना, काल और पारस्परिक सम्बन्ध सरलता से निश्चित कर दिए जाएँ।

गीता का ध्यानयोग कर्मयोग, आत्मज्ञान और ईश्वर-सम्बन्धी विचारों से जुड़ा हुआ है।

पतञ्जलि का योग एक विशिष्ट चित्तवृत्ति-निरोध की दार्शनिक-साधनात्मक संरचना विकसित करता है।

इसलिए समान शब्दों के आधार पर दोनों को पूर्णतः समान दर्शन मानना उचित नहीं।

बल्कि शोध का प्रश्न यह होना चाहिए—

अभ्यास और वैराग्य की अवधारणा अलग-अलग परम्पराओं में किस प्रकार विकसित हुई?

मन को नियंत्रित कौन कर रहा है?

यहाँ एक अत्यन्त गहरा प्रश्न आता है। यदि मन चंचल है और उसे नियंत्रित करना है, तो— मन को नियंत्रित कौन करेगा?

क्या मन ही मन को नियंत्रित करेगा?

यदि मन ही अस्थिर है तो वह स्वयं को स्थिर कैसे करेगा?

यहीं बुद्धि की भूमिका सामने आती है। मन विकल्पों और प्रतिक्रियाओं में चलता है।

बुद्धि विवेक करती है। साक्षी उस पूरी प्रक्रिया को जान सकता है।

इसलिए साधना की एक सम्भावित संरचना बनती है— मन → बुद्धि → साक्षी-दृष्टि। मन को दबाना लक्ष्य नहीं।

मन की गति को पहचानना लक्ष्य है।

ध्यान में साक्षी की भूमिका

जब साधक बैठता है और विचारों को देखता है, तब एक रोचक घटना घटती है।

विचार आते हैं। जाते हैं। स्मृतियाँ आती हैं। जाती हैं। भावनाएँ उठती हैं। शान्त होती हैं।

लेकिन देखने की क्षमता बनी रहती है।

यहीं प्रश्न उठता है— क्या देखने वाला विचार स्वयं है?

यदि विचार बदलते रहते हैं, तो विचारों का ज्ञाता क्या स्वयं वही बदलता हुआ विचार है?

यहीं ध्यान आत्मविचार की ओर मुड़ता है।

ध्यान से आत्मदर्शन

ध्यान की यात्रा को एक सरल क्रम में रखा जा सकता है—

विषय से ध्यान हटाना → मन को देखना → विचार को देखना → भावना को देखना → अहंकार को देखना → देखने वाले की ओर मुड़ना।

आरम्भ में साधक वस्तु पर ध्यान देता है। फिर श्वास पर। फिर मन की गति पर। फिर विचारों पर। फिर भावनाओं पर। और अन्ततः प्रश्न उठता है— इन सबको जानने वाला कौन है?

यहीं ध्यान केवल मानसिक शान्ति की तकनीक नहीं रहता। वह आत्मदर्शन का माध्यम बन जाता है।

गीता का ध्यानयोग और युद्ध

यहाँ फिर कुरुक्षेत्र की ओर लौटना आवश्यक है।

यदि ध्यान का अर्थ संसार से भाग जाना होता, तो अर्जुन को युद्धभूमि में ध्यानयोग की शिक्षा देना विचित्र प्रतीत होता।

लेकिन गीता में ध्यान और कर्म अलग नहीं हैं। अन्ततः अर्जुन को— स्थिर बुद्धि + समत्व + कर्म के साथ युद्ध करना है।

अर्थात् ध्यान का परिणाम केवल आँखें बन्द करके बैठना नहीं है। उसकी परीक्षा जीवन के कर्म में होगी।

यही गीता की विशिष्टता है।

ध्यान और समत्व

गीता के अनुसार योग की एक प्रसिद्ध परिभाषा है— समत्वं योग उच्यते। समत्व को योग कहा गया है।

यहाँ ध्यान का परिणाम स्पष्ट होता है।

यदि मनुष्य ध्यान में शान्त बैठता है लेकिन व्यवहार में छोटी-सी घटना से पूरी तरह टूट जाता है, तो साधना अभी जीवन में नहीं उतरी।

ध्यान की परिपक्वता का एक संकेत यह हो सकता है कि—

अनुभव बदलते रहें, लेकिन प्रतिक्रिया की अनिवार्यता कम हो।

सुख आए— समत्व। दुःख आए— समत्व। लाभ— समत्व। हानि— समत्व। जय— समत्व। पराजय— समत्व।

यह भाव निष्क्रियता नहीं है। यह अन्तःस्थिरता है।

क्या समत्व भावशून्यता है?

नहीं। यदि समत्व का अर्थ भावनाओं का नष्ट होना मान लिया जाए तो गीता का अर्जुन एक भावहीन व्यक्ति बन जाएगा।

लेकिन गीता ऐसा नहीं चाहती। अर्जुन को कर्म करना है। निर्णय लेना है। धर्म की रक्षा करनी है। युद्ध करना है।

अर्थात् संवेदना बनी रहती है।

लेकिन संवेदना निर्णय पर अनियंत्रित अधिकार न कर ले—यह साधना का उद्देश्य है।

इसलिए— समत्व ≠ भावशून्यता।

समत्व है— भावना के बीच विवेक की उपस्थिति।

मन, बुद्धि और आत्मा

अब हमारी पूरी श्रृंखला में एक और संरचना बनती है।

शरीर कर्म का उपकरण है।

इन्द्रियाँ विषयों से सम्बन्ध स्थापित करती हैं।

मन अनुभवों और विकल्पों में चलता है।

बुद्धि निर्णय और विवेक करती है।

अहंकार “मैं” और “मेरा” का सम्बन्ध बनाता है।

और— आत्मा/क्षेत्रज्ञ चेतना के रूप में इन सबका ज्ञाता है।

यहाँ ध्यान का काम है— इन स्तरों को अनुभव में अलग-अलग पहचानना।

एक वैज्ञानिक सावधानी

ध्यान के विषय में आधुनिक विज्ञान में अनेक अध्ययन हुए हैं और ध्यान के विभिन्न रूपों के मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक प्रभावों पर शोध उपलब्ध है।

लेकिन गीता के आत्मदर्शन को सीधे आधुनिक न्यूरोसाइंस का सिद्ध सिद्धान्त कहना उचित नहीं होगा।

ध्यान के वैज्ञानिक प्रभाव और ध्यान से आत्मा का दार्शनिक ज्ञान दो अलग प्रश्न हैं।

एक का परीक्षण अनुभवजन्य विज्ञान से किया जा सकता है। दूसरा दर्शन और आत्मानुभूति के क्षेत्र में आता है।

महाभारत के हमारे शोध में यह अन्तर बनाए रखना आवश्यक है।

कुरुक्षेत्र से अन्तःक्षेत्र तक

अब तक महाभारत का बाहरी युद्ध हमारे सामने था। लेकिन गीता के भीतर एक दूसरा क्षेत्र खुल रहा है—

अन्तःक्षेत्र। बाहर— कौरव और पाण्डव। भीतर— मोह और विवेक। बाहर— रथ और सेना। भीतर— मन और बुद्धि। बाहर— युद्ध। भीतर— कर्तापन और साक्षित्व का संघर्ष।

इसलिए कुरुक्षेत्र केवल ऐतिहासिक युद्धस्थल हो या उसके साथ प्रतीकात्मक अर्थ भी जुड़े हों—दोनों प्रश्नों को अलग-अलग स्तर पर रखना चाहिए।

इतिहास का प्रश्न अपने प्रमाण माँगता है। प्रतीक का प्रश्न अपनी व्याख्या। दोनों को मिलाकर इतिहास सिद्ध नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

भाग 14 में हमने देखा— बन्धन तादात्म्य से बनता है।

भाग 15 में उसका व्यावहारिक समाधान सामने आया— 

मन को अभ्यास और वैराग्य से प्रशिक्षित करना। ध्यान मन को समाप्त नहीं करता।

वह मन को देखने की क्षमता विकसित करता है। अभ्यास मन को बार-बार लौटाता है।

वैराग्य उसे विषयों की अनिवार्य दासता से मुक्त करता है। समत्व उसे जीवन के द्वन्द्वों में स्थिर करता है।

और ध्यान अन्ततः उस प्रश्न तक पहुँचता है— जो मन को देख रहा है, वह कौन है?

अब हमारी यात्रा फिर उसी मूल प्रश्न पर लौटती है जहाँ से आत्मदर्शन प्रारम्भ हुआ था—

ज्ञाता कौन है? लेकिन इस बार प्रश्न केवल क्षेत्रज्ञ का नहीं है।

अब प्रश्न है— आत्मा और परमात्मा — व्यक्तिगत चेतना और सार्वभौम चेतना का सम्बन्ध क्या है?

यहीं से भीष्मपर्व की गीता का अगला चरण भक्ति, ईश्वर और परम चेतना की ओर खुलता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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