महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 15 : युद्ध के पहले कौरव सैन्य-संरचना — कौन किसके लिए लड़ रहा था?

महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 15 : युद्ध के पहले कौरव सैन्य-संरचना — कौन किसके लिए लड़ रहा था?

कुरुक्षेत्र में ग्यारह अक्षौहिणी सेना एकत्र हो चुकी है। संख्या की दृष्टि से कौरव पक्ष पाण्डवों से बड़ा है। लेकिन महाभारत का वास्तविक प्रश्न केवल यह नहीं है कि किसके पास कितने सैनिक हैं।

अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है— इन सैनिकों का नेतृत्व कौन करेगा और वे किस उद्देश्य से युद्ध कर रहे हैं?

क्योंकि सेना की शक्ति केवल उसकी संख्या में नहीं होती। उसके शीर्ष पर बैठे सेनानायकों की निष्ठा, उनके पारस्परिक सम्बन्ध, उनके युद्ध-सिद्धान्त और उनके राजनीतिक दायित्व भी युद्ध की दिशा निर्धारित करते हैं।

कौरव सेना को इसी दृष्टि से पढ़ना चाहिए।

भीष्म — दुर्योधन के सेनापति या हस्तिनापुर के?

युद्ध के प्रारम्भ में दुर्योधन की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति थी—भीष्म

भीष्म केवल एक महान योद्धा नहीं थे। वे कुरुवंश की राजनीतिक स्मृति थे। उनका जीवन हस्तिनापुर के राजसिंहासन की रक्षा की प्रतिज्ञा से बँधा हुआ था।

यही कारण है कि भीष्म का कौरव पक्ष में होना और दुर्योधन की प्रत्येक नीति का समर्थन करना—दो अलग बातें हैं।

उद्योगपर्व में भीष्म अनेक बार पाण्डवों के अधिकार और उनके सामर्थ्य को स्वीकार करते हैं। वे जानते हैं कि पाण्डवों को सरलता से पराजित करना सम्भव नहीं होगा।

फिर भी वे युद्ध से हटते नहीं। यहाँ महाभारत एक गहरा नैतिक द्वंद्व सामने रखता है—

क्या किसी संस्था के प्रति लिया गया दायित्व उस संस्था के वर्तमान निर्णय से असहमति होने पर भी निभाया जाना चाहिए?

भीष्म का उत्तर उनके कर्म से मिलता है। वे हस्तिनापुर के पक्ष में रहते हैं।

लेकिन उनकी व्यक्तिगत चेतना दुर्योधन की चेतना के समान नहीं है।

यही कारण है कि भीष्म को “दुर्योधन का समर्थक” कहना उनके चरित्र को बहुत सरल बना देता है।

वे मूलतः कुरु-राजसत्ता के रक्षक हैं। 

द्रोण — गुरु, ऋणी और राजकीय योद्धा

द्रोण की स्थिति और अधिक जटिल है। वे पाण्डवों और कौरवों दोनों के गुरु हैं।

अर्जुन उनके प्रिय शिष्यों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है, फिर भी युद्ध में द्रोण कौरव पक्ष से लड़ते हैं।

क्यों? क्योंकि उनका जीवन केवल गुरु-शिष्य सम्बन्ध से निर्धारित नहीं है।

द्रोण हस्तिनापुर की राजव्यवस्था से जुड़े हुए हैं। उनका जीवन, सम्मान और राजकीय स्थिति कुरु सत्ता से जुड़ी है। अश्वत्थामा उनका पुत्र है और उसकी सुरक्षा तथा भविष्य भी उनके निर्णयों को प्रभावित करता है।

इसलिए द्रोण का कौरव पक्ष में होना किसी एक कारण से नहीं समझाया जा सकता।

यहाँ महाभारत का एक महत्वपूर्ण सूत्र दिखाई देता है—

व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार के ऋण होते हैं; कभी-कभी वे ऋण उसके नैतिक निर्णयों को परस्पर खींचते हैं।

द्रोण के भीतर गुरु और राजकीय योद्धा दोनों उपस्थित हैं। कुरुक्षेत्र में राजकीय भूमिका प्रबल हो जाती है।

कृपाचार्य — संस्था से जुड़ी निष्ठा

कृपाचार्य की स्थिति भी इसी संरचना को मजबूत करती है। वे कुरु दरबार और राजपरिवार के स्थायी आचार्य हैं।

उनका पाण्डवों से कोई व्यक्तिगत वैर नहीं है, लेकिन वे कौरव राजसत्ता के सैन्य ढाँचे का हिस्सा हैं।

यहाँ हमें एक महत्वपूर्ण अन्तर समझना चाहिए—

व्यक्तिगत प्रेम और संस्थागत दायित्व एक ही चीज नहीं हैं।

महाभारत में अनेक पात्र किसी व्यक्ति के मित्र होने के कारण नहीं, बल्कि अपने दायित्व के कारण किसी पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।

कर्ण — सबसे स्पष्ट व्यक्तिगत निष्ठा

कर्ण का मामला अलग है।

उसकी निष्ठा का सबसे प्रमुख आधार दुर्योधन के प्रति कृतज्ञता है।

जब कर्ण की सामाजिक स्थिति पर प्रश्न उठाए गए, तब दुर्योधन ने उसे अंगराज का सम्मान दिया और उसे राजकीय प्रतिष्ठा प्रदान की।

इस सम्बन्ध ने कर्ण और दुर्योधन के बीच ऐसी व्यक्तिगत निष्ठा उत्पन्न की जो युद्ध के पहले कृष्ण के सामने भी नहीं टूटी।

कृष्ण ने कर्ण को उसके जन्म का सत्य बताया और पाण्डव पक्ष में आने पर राजकीय भविष्य का प्रस्ताव रखा।

कर्ण ने उसे स्वीकार नहीं किया। यह निर्णय कर्ण के चरित्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष है।

उसने केवल यह नहीं कहा कि वह पाण्डवों का ज्येष्ठ भाई है; उसने यह भी स्वीकार किया कि उसके जीवन का एक बड़ा हिस्सा दुर्योधन के साथ बना है।

यहीं कर्ण का धर्म-संकट जन्म लेता है।

जन्म का सत्य एक ओर है, जीवन का ऋण दूसरी ओर।

कर्ण ने जीवन के ऋण को चुना। लेकिन महाभारत इस चुनाव को सरल नैतिक विजय के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।

कृतज्ञता एक गुण है; परन्तु किसी व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता उस व्यक्ति के प्रत्येक कर्म को धर्मसंगत नहीं बना देती।

यही कर्ण की त्रासदी है।

शल्य — युद्ध में निष्ठा का दूसरा रूप

शल्य का प्रसंग हमें बताता है कि युद्धकालीन गठबंधन हमेशा स्वैच्छिक विचारधारा पर आधारित नहीं होते।

शल्य पाण्डवों से सम्बन्धित थे और नकुल-सहदेव के मामा थे। वे पाण्डवों की सहायता के लिए निकलते हैं।

लेकिन दुर्योधन ने उनके मार्ग में ऐसी आतिथ्य-व्यवस्था की कि शल्य उससे प्रसन्न होकर वर देने को बाध्य हुए। बाद में उन्हें पता चला कि आतिथ्य दुर्योधन की ओर से था।

शल्य की प्रतिज्ञा उन्हें कौरव पक्ष से जोड़ देती है।

यह घटना बहुत महत्वपूर्ण है।

क्योंकि यहाँ युद्ध का गठबंधन राजनीतिक आतिथ्य और प्रतिज्ञा के माध्यम से निर्मित होता है।

शल्य का हृदय और उनका राजनीतिक दायित्व एक दिशा में नहीं हैं।

यह आगे चलकर कर्ण के सारथि के रूप में उनके व्यवहार में भी दिखाई देता है।

अर्थात्—

एक पक्ष में खड़ा होना और उस पक्ष के प्रति पूर्ण आन्तरिक निष्ठा रखना समानार्थी नहीं है।

जयद्रथ — व्यक्तिगत अपमान से राजनीतिक शत्रुता तक

जयद्रथ का पाण्डवों से सम्बन्ध पहले से ही तनावपूर्ण था।

द्रौपदी-हरण के प्रसंग में उसका अपमान और पराजय हो चुकी थी। बाद में उसका सम्बन्ध कौरव शक्ति से अधिक दृढ़ दिखाई देता है।

इस प्रकार व्यक्तिगत घटना भी बड़े राजनीतिक संघर्ष में दीर्घकालीन शत्रुता का आधार बन सकती है।

महाभारत के युद्ध में ऐसे अनेक व्यक्तिगत इतिहास राजनीतिक गठबंधन के भीतर काम कर रहे थे।

शकुनि — सैन्य शक्ति से अधिक राजनीतिक रणनीति

शकुनि स्वयं भीष्म या द्रोण के स्तर का सेनानायक नहीं है।

लेकिन कौरव संघर्ष की राजनीतिक पृष्ठभूमि में उसका स्थान महत्वपूर्ण है।

उसकी भूमिका बताती है कि युद्ध केवल तलवार और धनुष से नहीं जीता जाता।

कूटनीति, छल, पासा, सूचना और मनोवैज्ञानिक रणनीति भी सत्ता के उपकरण हैं।

द्यूतसभा से लेकर युद्ध तक शकुनि की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि कौरव संघर्ष की जड़ें केवल कुरुक्षेत्र में नहीं थीं।

युद्धभूमि पर दिखाई देने वाला संघर्ष बहुत पहले राजनीतिक निर्णयों में निर्मित हो चुका था।

अश्वत्थामा — पिता की छाया से स्वतंत्र एक निष्ठा

अश्वत्थामा की निष्ठा भी केवल राजकीय नहीं है। उसका दुर्योधन से सम्बन्ध युद्ध के दौरान अधिक स्पष्ट होता है।

उसके भीतर पिता द्रोण की प्रतिष्ठा, स्वयं की योद्धा-अस्मिता और कौरव पक्ष के प्रति निष्ठा—तीनों काम करते हैं।

इसलिए आने वाले युद्ध में अश्वत्थामा का चरित्र हमें दिखाता है कि युद्ध केवल वर्तमान का निर्णय नहीं होता; वह अगली पीढ़ी की मानसिकता को भी बदल सकता है।

कौरव सेना की वास्तविक संरचना

अब इन सभी पात्रों को एक साथ रखें। कौरव पक्ष में—

भीष्म — हस्तिनापुर की प्रतिज्ञा

द्रोण — राजकीय दायित्व और व्यक्तिगत ऋण

कृप — संस्थागत निष्ठा

कर्ण — दुर्योधन के प्रति व्यक्तिगत कृतज्ञता

शल्य — प्रतिज्ञा और राजनीतिक परिस्थिति

जयद्रथ — व्यक्तिगत शत्रुता और राजनीतिक गठबंधन

शकुनि — रणनीतिक राजनीति

अश्वत्थामा — पारिवारिक और व्यक्तिगत निष्ठा

इससे स्पष्ट होता है कि 11 अक्षौहिणियाँ केवल दुर्योधन की इच्छा से संचालित एक समान मानसिकता वाली सेना नहीं थीं।

यह विभिन्न निष्ठाओं का महासंघ था। 

सबसे बड़ा विरोधाभास

कौरव पक्ष की शक्ति का एक बड़ा स्रोत उसकी व्यापकता थी। लेकिन यही व्यापकता उसकी जटिलता भी थी।

एक ओर— हस्तिनापुर की राजसत्ता। दूसरी ओर— व्यक्तिगत मित्रता। तीसरी ओर— प्रतिज्ञाएँ। चौथी ओर—

राजकीय ऋण। पाँचवीं ओर— पुरानी शत्रुताएँ। छठी ओर— राजनीतिक परिस्थितियाँ।

इन सबको एक ही युद्ध में एकत्र कर दिया गया।

इसलिए कुरुक्षेत्र के युद्ध को केवल “धर्म और अधर्म की दो सेनाएँ” कह देना धार्मिक दृष्टि से उपयोगी हो सकता है, लेकिन ऐतिहासिक-पाठीय विश्लेषण के लिए यह पर्याप्त नहीं है।

महाभारत का मनुष्य इससे कहीं अधिक जटिल है।

क्या कौरव पक्ष को अपने सेनानायकों पर पूरा विश्वास था?

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। दुर्योधन स्वयं अनेक अवसरों पर अपने सेनानायकों की शक्ति का उल्लेख करता है, लेकिन साथ ही उसे पाण्डवों की शक्ति का भय भी है।

भीष्म पाण्डवों की शक्ति जानते हैं। द्रोण अर्जुन को जानते हैं। कर्ण अर्जुन को अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानता है।

शल्य की निष्ठा जटिल है। कृप और अन्य योद्धा व्यक्तिगत रूप से पाण्डवों से परिचित हैं।

अर्थात् कौरव पक्ष में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो पाण्डवों की वास्तविक क्षमता से अनजान हो।

यह युद्ध अज्ञान में नहीं लड़ा गया। दोनों पक्ष जानते थे कि सामने कौन है।

उद्योगपर्व की दृष्टि से इसका महत्व

उद्योगपर्व की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह युद्ध को अचानक घटित घटना नहीं बनने देता।

पहले अधिकार का प्रश्न आता है। फिर दूत। फिर संवाद। फिर शान्ति। फिर सीमित माँग। फिर कृष्ण का अंतिम प्रयास। फिर कर्ण से संवाद। और अन्ततः सेनाओं का संगठन।

अर्थात् युद्ध से पहले महाभारत हमें निर्णय बनने की पूरी प्रक्रिया दिखाता है।

कुरुक्षेत्र में जब शंख बजेंगे, तब वह केवल एक दिन का निर्णय नहीं होगा।

उसके पीछे वर्षों के राजनीतिक, पारिवारिक और नैतिक निर्णय खड़े होंगे।

शोध-निष्कर्ष 

कौरव सेना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी संख्या नहीं, उसकी बहुस्तरीय निष्ठाएँ हैं।

भीष्म दुर्योधन नहीं हैं। द्रोण दुर्योधन नहीं हैं।  कर्ण की निष्ठा का आधार भीष्म से अलग है। 

शल्य की स्थिति अलग है। कृप की अलग। शकुनि की अलग।

इसलिए “कौरव पक्ष” एक राजनीतिक छत्र है जिसके भीतर अनेक प्रकार के व्यक्ति और हित एकत्र हैं।

यही बात पाण्डव पक्ष पर भी लागू होगी।

इसलिए अगला प्रश्न स्वाभाविक है—

यदि कौरव पक्ष के भीतर इतनी अलग-अलग निष्ठाएँ थीं, तो पाण्डवों के साथ खड़ी सात अक्षौहिणियों की राजनीतिक संरचना कैसी थी?

और उससे भी बड़ा प्रश्न—

पाण्डवों के पास संख्या कम होने के बावजूद कौन-सी ऐसी राजनीतिक और सैन्य शक्तियाँ थीं जिनके कारण उनका गठबंधन प्रभावशाली बना?

यही अगले भाग का विषय होगा—

“पाण्डव पक्ष की शक्ति और राजनीतिक गठबंधन — सात अक्षौहिणियों के पीछे कौन था?”

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

अब भाग 16 में हम पाण्डव पक्ष को भी इसी कसौटी पर पढ़ेंगे—सिर्फ “कौन-कौन राजा थे” नहीं, बल्कि किस राजा ने किस कारण पाण्डवों का साथ दिया, ताकि दोनों पक्षों की तुलना पाठ के स्तर पर समान रूप से हो सके।

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